राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020

रिपोर्ट का सारांश

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी), 2020 को 30 जुलाई, 2020 को जारी किया गया। मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) ने जून 2017 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए एक कमिटी (चेयर: डॉ. के. कस्तूरीरंगन) का गठन किया था। कमिटी ने मई 2019 में सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए ड्राफ्ट एनईपी सौंपा। एनईपी 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति का स्थान लेगी। एनईपी के मुख्य पहलुओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

स्कूली शिक्षा

  • स्कूलों के करिकुलम का पुनर्गठन: एनईपी ने सुझाव दिया है कि स्कूली शिक्षा के मौजूदा ढांचे को दोबारा बनाया जाए ताकि वह बच्चों के विकास के विभिन्न स्तरों के हिसाब से अधिक प्रासंगिक बन सकें। स्कूली शिक्षा के वर्तमान ढांचे (10+2 डिजाइन) को 5-3-3-4 के करिकुलम से बदला जाएगा जिसमें: (i) पांच साल फाउंडेशनल चरण (3 से 8 वर्ष) (ii) तीन साल प्रिपरेटरी चरण, (8 से 11 वर्ष या कक्षा 3 से 5), (iii) तीन साल मिडिल, (11 से 14 वर्ष या कक्षा 6 से 8), और (iv) चार साल सेकेंडरी चरण (14 से 18 वर्ष या कक्षा 9 से 12) शामिल हैं।

रेखाचित्र 1: स्कूली करिकुलम में संशोधन

मौजूदा ढांचा

प्रस्तावित ढांचा

कवर नहीं होते
(आयु 3-6)

फाउंडेशनल चरण -
प्राइमरी पूर्व के 3 वर्ष (आयु 3-6) + कक्षा 1-2 के 2 वर्ष (6-8 आयु)

कक्षा1-10
(आयु 6-16)

प्रिपरेटरी चरण -
कक्षा 3-5 (आयु 8-11)

मिडिल स्टेज -
कक्षा 6-8 (आयु 11-14)

सेकेंडरी चरण -
कक्षा 9-12 (आयु 14-18)

कक्षा 11-12
(आयु 16-18)

  •  बचपन में प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा (अर्ली चाइल्डहुड केयर एंड एजुकेशन) (ईसीसीई): ईसीसीई में छोटे बच्चों के लिए खेल आधारित और गतिविधि आधारित पढ़ाई होती है जिसमें एल्फाबेट्स, भाषा, पजल्स, पेटिंग और संगीत शामिल होता है। कमिटी ने कहा कि छह वर्ष की आयु तक बच्चों के दिमाग का 85% संचयी विकास हो जाता है। उसने सुझाव दिया कि 5+3+3+4 के स्कूली करिकुलम को अपनाकर 3 से 6 वर्ष के बच्चे के लिए ईसीसीई को स्कूली संरचना में शामिल किया जाना चाहिए। ईसीसीई को निम्नलिखित के जरिए प्रदान किया जा सकता है: (i) स्टैंडएलोन आंगनवाड़ी, (ii) प्राथमिक स्कूलों में स्थित आंगनवाड़ियां, (iii) मौजूदा प्राइमरी स्कूलों की प्राइमरी पूर्व की कक्षाएं, और (iv) स्टैंडएलोन प्री स्कूल। इसके अतिरिक्त ईसीसीई के राष्ट्रीय करिकुलम और पेडेगॉगिकल फ्रेमवर्क को नेशनल काउंसिल फॉर एजुकेशन रिसर्च एंड ट्रेनिंग (एनसीईआरटी) द्वारा विकसित किया जाएगा। सीनियर सेकेंडरी स्तर और उससे अधिक की क्वालिफिकेशन वाली आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को ईसीसीई में छह महीने का सर्टिफिकेट प्रोग्राम कराया जाएगा।
     
  • मूलभूत साक्षरता और अंक ज्ञान हासिल करना: कमिटी ने कहा था कि प्राथमिक स्कूलों में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों ने बड़े अनुपात (लगभग पांच करोड़) में मूलभूत साक्षरता और अंक ज्ञान (मूलभूत टेक्स्ट को पढ़ने और समझने की क्षमता और बुनियादी जमा-घटा करने की क्षमता) हासिल नहीं किया है। उसने सुझाव दिया कि प्रत्येक विद्यार्थी को कक्षा तीन तक की मूलभूत साक्षरता और अंक ज्ञान हासिल होना चाहिए। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए एमएचआरडी के अंतर्गत मूलभूत साक्षरता और अंक ज्ञान संबंधी राष्ट्रीय मिशन की स्थापना की जाएगी। सभी राज्य सरकारों को 2025 तक इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कार्यान्वयन योजनाएं बनानी चाहिए। सरकार के ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म (दीक्षा) पर मूलभूत साक्षरता और अंक ज्ञान पर उच्च क्वालिटी के रिसोर्सेज़ की राष्ट्रीय रेपोजिटरी उपलब्ध कराई जाएगी।
     
  • सार्वभौमिक कवरेज और समावेश सुनिश्चित करना: कमिटी ने कहा था कि हालांकि शिक्षा के अधिकार एक्ट, 2009 ने प्राथमिक शिक्षा में सार्वभौमिक दाखिला हासिल करने में लगभग सफलता हासिल कर ली है, लेकिन बच्चों को स्कूलों में बरकरार रखना अब भी स्कूलिंग प्रणाली की एक चुनौती है। उसने कहा था कि जैसे-जैसे विद्यार्थी ऊंची कक्षाओं में पहुंचते हैं, सकल दाखिला अनुपात (जीईआर) में गिरावट देखी जाती है जो इस बात का संकेत है कि स्कूली प्रणाली में ड्रॉपआउट्स बड़े पैमाने पर होता है। जीईआर समान आयु वर्ग की जनसंख्या के प्रतिशत के रूप में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों को प्रकट करता है।   

तालिका 1: स्कूली शिक्षा में जीईआर

कक्षा

सकल दाखिला अनुपात

कक्षा 6-8

90.9%

कक्षा 9-10

79.3%

कक्षा 11-12

56.5%

इसके अतिरिक्त कमिटी ने कहा था कि सामाजिक-आर्थिक स्तर पर कुछ वंचित समूहों में निम्नलिखित के आधार पर जीईआर में अधिक गिरावट है: (i) लैंगिक पहचान (महिला, ट्रांसजेंडर व्यक्ति), (ii) सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति), (iii) भौगोलिक पहचान (छोटे गांवों और छोटे कस्बों के विद्यार्थी), (iv) सामाजिक-आर्थिक पहचान (प्रवासी समुदाय और निम्न आय वर्ग के परिवार), और (v) विकलांगता। उसने सुझाव दिया था कि ऐसे समूहों से संबंधित योजनाओं/नीतियों को मजबूत किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त जिन क्षेत्रों में इन वंचित समूहों की अधिक संख्या मौजूद है, वहां विशेष शिक्षण जोन्स बनाए जाने चाहिए। लिंग आधारित समावेशी कोष भी बनाए जाने चाहिए जो शिक्षा हासिल करने में महिला और ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों की मदद करें।  

  • करिकुलम के कंटेंट में सुधार: प्रत्येक विषय में करिकुलम के भार को कम किया जाना चाहिए और करिकुलम में उस विषय के मूल कंटेंट पर जोर दिया जाना चाहिए। इससे क्रिटिकल सोच, चर्चा और विश्लेषण आधारित लर्निंग संभव होगी। विद्यार्थियों को अध्ययन के विषय में ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी और विकल्प दिए जाने चाहिए, खासकर सेकेंडरी स्कूल में। इन सिद्धांतों के आधार पर एनसीईआरटी स्कूली शिक्षा का नया और व्यापक राष्ट्रीय करिकुलम फ्रेमवर्क बनाएगा। इस फ्रेमवर्क पर हर पांच से दस साल बाद गौर किया जा सकता है।
     
  • निर्देश का माध्यम: कक्षा पांच तक, या अच्छा हो कि कक्षा आठ तक के बच्चों के लिए निर्देश का माध्यम स्थानीय भाषा/उनकी मातृभाषा होनी चाहिए (सरकारी और निजी, दोनों स्कूलों में)। मौजूदा त्रिभाषा का फार्मूला आगे भी जारी रहेगा। हालांकि इस फार्मूले में ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी होनी चाहिए और किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी। तीन भाषा के फार्मूले के अंतर्गत राज्य निम्नलिखित के अध्ययन को अपना और लागू कर सकते हैं: (i) हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी, अंग्रेजी और आधुनिक भारतीय भाषा (अच्छा हो कि दक्षिण भारतीय भाषा), और (ii) हिंदी, अंग्रेजी और गैर हिंदी भाषी राज्यों में क्षेत्रीय भाषा। एनईपी में सुझाव दिया गया है कि इन तीन भाषाओं को राज्यों और विद्यार्थियों की पसंद पर आधारित होना चाहिए। हालांकि तीन में से दो भाषाओं को भारत की देशीय भाषा होना चाहिए। इसके अतिरिक्त संस्कृत को शिक्षा के सभी स्तरों पर विकल्प के तौर पर पेश किया जाना चाहिए।
     
  • विद्यार्थियों का मूल्यांकन: कमिटी ने कहा था कि सेकेंडरी स्कूल की परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं की मौजूदा प्रकृति ने कोचिंग की संस्कृति को बढ़ावा दिया है जिसका असर विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ा है। उसने कहा कि इन परीक्षाओं की मौजूदा प्रणाली में सुधार किया जाए। बोर्ड की परीक्षाओं को केवल मूल अवधारणाओं की जांच करनी चाहिए और इसमें अनेक विषयों को शामिल किया जाना चाहिए। इसके लिए विद्यार्थी अपने विषय चुन सकते हैं और उनके पास किसी एक वर्ष में दो बार परीक्षाएं देने का विकल्प होगा। स्कूलों में विद्यार्थियों की प्रगति का मूल्यांकन करने के लिए कक्षा तीन, पांच और आठ में परीक्षाएं ली जाएंगी। कक्षा तीन में मूलभूत साक्षरता और अंक ज्ञान की परीक्षा ली जाएगी और उसके परिणाम को केवल स्कूली शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। इसके अतिरिक्त एमएचआरडी के अंतर्गत राष्ट्रीय मूल्यांकन केंद्र की स्थापना की जाएगी जोकि विद्यार्थियों के मूल्यांकन के लिए मानक निर्धारण इकाई होगा। 
     
  • शिक्षकों का प्रशिक्षण और प्रबंधन: शिक्षकों के प्रशिक्षण के मौजूदा बीएड प्रोग्राम के स्थान पर चार वर्ष का एकीकृत बीएड प्रोग्राम होगा जिसमें उच्च क्वालिटी का कंटेट, पेडेगॉगी और व्यावहारिक प्रशिक्षण शामिल होगा। इसके अतिरिक्त शिक्षकों से यह अपेक्षा की जाएगी कि वे हर वर्ष न्यूनतम 50 घंटे निरंतर पेशेवर विकास का प्रशिक्षण प्राप्त करें। राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षण परिषद एनसीईआरटी के सहयोग से शिक्षकों की शिक्षा का राष्ट्रीय करिकुलम फ्रेमवर्क तैयार करेगा। शिक्षकों से शिक्षण के अतिरिक्त प्रशासनिक कार्य नहीं कराए जाएंगे और उनके बहुत अधिक तबादले नहीं किए जाएंगे (विशेष परिस्थितियों में राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित तबादलों को छोड़कर)।
     
  • स्कूलों में सुशासन: कमिटी ने कहा था कि देश के प्रत्येक क्षेत्र में प्राइमरी स्कूलों को शुरू करने से शिक्षा तक सबकी पहुंच बनी है। लेकिन इससे ऐसे स्कूलों की संख्या भी बढ़ी है जहां विद्यार्थी बहुत कम संख्या में मौजूद हैं (2016-17 में प्राथमिक शिक्षाओं में विद्यार्थियों की औसत संख्या 14 थी)। स्कूलों के छोटे आकार के कारण उन्हें चलाना मुश्किल होता है, खासकर आर्थिक रूप से क्योंकि तब शिक्षकों की नियुक्ति और फिजिकल रिसोर्सेज़ जैसे लाइब्रेरी की किताबों, स्पोर्ट्स के सामान को जुटाने में ज्यादा खर्च होता है। एनईपी ने सुझाव दिया है कि कई स्कूलों को मिलाकर एक स्कूल परिसर बनाया जाए। स्कूल परिसर में सेकेंडरी स्कूल और 5-10 किलोमीटर के दायरे में आने वाले स्कूल और आंगनवाड़ियां शामिल होंगी। इससे निम्नलिखित सुनिश्चित होगा: (i) स्कूल परिसर में सभी विषयों के लिए शिक्षकों की पर्याप्त संख्या, (ii) पर्याप्त भौतिक संसाधन (जैसे लाइब्रेरी की किताबों, स्पोर्ट्स का सामान), और (iii) स्कूलों के लिए सुशासन।
     
  • स्कूल का रेगुलेशन: वर्तमान में स्कूल शिक्षा विभाग स्कूलों के गवर्नेंस और रेगुलेशन का सारा काम करता है। कमिटी ने कहा था कि इससे हितों का टकराव होता है और सत्ता का केंद्रीकरण भी होता है। उसने सुझाव दिया था कि विभाग को सिर्फ नीतियां बनाने और उसकी निगरानी करने में शामिल किया जाए, पर स्कूलों के रेगुलेशन में नहीं। प्रत्येक राज्य में एक स्वतंत्र स्कूल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी बनाई जानी चाहिए। वह सरकारी और निजी स्कूलों के लिए बुनियादी मानदंड निर्दिष्ट करेगी। स्कूलों के लिए सेल्फ रेगुलेशन या एक्रेडिटेशन प्रणाली बनाई जाएगी। 

उच्च शिक्षा

  • जीईआर को बढ़ाना: एनईपी का उद्देश्य उच्च शिक्षा में सकल दाखिला अनुपात को 2035 तक 50% तक करना है (2018 में 26.3%)। संस्थानों को ओपन डिस्टेंस लर्निंग और ऑनलाइन प्रोग्राम्स चलाने का विकल्प दिया जाएगा ताकि उच्च शिक्षा तक लोगों की पहुंच बढ़े और इससे देश में जीईआर में सुधार होगा।
     
  • संस्थानों का पुनर्गठन: सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को तीन श्रेणियों में पुनर्गठित किया जाएगा: (i) अनुसंधान विश्वविद्यालय, जिनका अनुसंधान और शिक्षण पर समान रूप से ध्यान होगा, (ii) शिक्षण विश्वविद्यालय जो शिक्षण पर ध्यान केंद्रित करेंगे, और (iii) डिग्री देने वाले कॉलेज जिनका मुख्य ध्यान अंडरग्रैजुएट शिक्षण पर होगा। ऐसे सभी संस्थान धीरे धीरे शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय स्वायत्तता की ओर बढ़ेंगे। सभी एचईआईज़ अंततः 3,000 या उससे अधिक विद्यार्थियों वाले बड़े मल्टीडिस्पलिनरी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में तब्दील हो जाएंगे। 2030 तक प्रत्येक जिले में, या उसके निकट एक बड़ा मल्टीडिस्पलिनरी एचईआई होना चाहिए।
     
  • मल्टीडिस्पलिनरी शिक्षा: सभी एचईआईज़ के करिकुला को मल्टीडिस्पलिनरी यानी बहुअनुशासिक बनाया जाना चाहिए ताकि ह्यूमैनिटीज़ और आर्ट्स को साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और गणित से जोड़ा जा सके। अंडरग्रैजुएट डिग्री को अधिक फ्लेक्सिबल बनाया जाएगा जिसमें उपयुक्त सर्टिफिकेशन के साथ मल्टीपल एग्जिट ऑप्शंस होंगे। उदाहरण के लिए विद्यार्थियों को पढ़ाई पूरी करने के एक साल बाद एक सर्टिफिकेट मिलेगा, दो साल बाद डिप्लोमा, तीन साल बाद बैचलर्स डिग्री और चार साल पूरा करने के बाद बैचलर्स के साथ रिसर्च डिग्री मिलेगी। इसके अतिरिक्त विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से अर्जित एकैडमिक क्रेडिट्स को डिजिटली स्टोर करने के लिए एकैडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट बनाया जाएगा ताकि क्रेडिट्स के आधार पर डिग्रियां दी जा सकें। एचईआईज़ के पास मास्टर्स प्रोग्राम को डिजाइन करने की फ्लेक्सिबिलिटी होगी। एमफिल प्रोग्राम को बंद कर दिया जाएगा।
     
  • रेगुलेटरी संरचना: भारत में उच्च शिक्षा के रेगुलेटरी ढांचे में कायापलट की जाएगी ताकि यह सुनिश्चित हो कि अलग, स्वतंत्र निकाय रेगुलेशन, एक्रेडिटेशन, वित्त पोषण और शिक्षण मानदंडों को बनाने जैसे कार्य करें। इससे हितों का टकराव कम होगा और सत्ता का केंद्रीकरण खत्म होगा। यह सुनिश्चित करने के लिए भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (एचईसीआई) की स्थापना की जाएगी जिसमें चार स्वतंत्र वर्टिकल होंगे: (i) राष्ट्रीय उच्च शिक्षा रेगुलेटरी परिषद, जोकि सिंगल रेगुलेटर होगी (इसमें शिक्षकों की शिक्षा शामिल होगी, पर कानूनी और मेडिकल शिक्षा शामिल नहीं होंगी), (ii) संस्थानों का एक्रेडिटेशन करने के लिए राष्ट्रीय एक्रेडिटेशन परिषद, (iii) उच्च शिक्षण संस्थानों के वित्त पोषण के लिए उच्च शिक्षा अनुदान परिषद, और (iv) उच्च शिक्षा के करिकुलम का फ्रेमवर्क और लर्निंग लेवल्स को तय करने के लिए सामान्य शिक्षा परिषद। इन चारों के बीच विवाद होने पर एचईसीआई के अंतर्गत विशेषज्ञों का एक निकाय उसे हल करेगा।
     
  • अनुसंधान में सुधार: कमिटी ने कहा कि भारत में अनुसंधान और नवाचार में सुधार पर जीडीपी का केवल 0.69% निवेश किया जाता है, जबकि यूएसए में यह 2.8%, दक्षिण कोरिया में 4.2% और इज़राइल में जीडीपी का 4.3% है। एनईपी ने सुझाव दिया कि भारत में उच्च स्तर के अनुसंधान को वित्त पोषित करने और सुविधाजनक बनाने के लिए एक स्वतंत्र नेशनल रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना की जाए। वर्तमान में अनुसंधान को वित्त पोषित करने वाले विशेष संस्थान जैसे विज्ञान और तकनीक विभाग, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद स्वतंत्र प्रॉजेक्ट्स की मदद करते करेंगे। फाउंडेशन डुप्लिकेशन से बचने के लिए इन एजेंसियों के साथ सहयोग करेगा।
     
  • विदेशी विश्वविद्यालय: उच्च प्रदर्शन वाले विदेशी विश्वविद्यालयों को दूसरे देशों में कैंपस बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इसी प्रकार चुनींदा प्रमुख ग्लोबल विश्वविद्यालयों को भारत में संचालन की अनुमति दी जाएगी। विदेशी विश्वविद्यालयों के प्रवेश को सुविधाजनक बनाने के लिए एक कानूनी फ्रेमवर्क बनाया जाएगा। इन विश्वविद्यालयों को देश में स्वायत्त संस्थानों के अनुरूप रेगुलेटरी और गवर्नेंस के नियमों में छूट दी जाएगी।
     
  • व्यावसायिक शिक्षा: कमिटी ने कहा कि भारत में 2012-2017 के दौरान 19-24 वर्ष के आयु वर्ग के 5% से भी कम श्रमबल को व्यावसायिक शिक्षण प्राप्त था। यूएसए में यह दर 52%, जर्मनी में 75% और दक्षिण कोरिया में 96% है। एनईपी ने सुझाव दिया था कि सभी स्कूलों और उच्च शिक्षण संस्थानों में अगले दस वर्षों में व्यावसायिक प्रशिक्षण को चरणबद्ध तरीके से एकीकृत किया जाना चाहिए। इसके लिए एमएचआरडी के अंतर्गत व्यावासायिक शिक्षण के एकीकरण के लिए एक राष्ट्रीय कमिटी बनाई जाएगी। प्रत्येक विषय से संबंधित व्यवसाय के लिए राष्ट्रीय दक्षता क्वालिफिकेशन फ्रेमवर्क पर विस्तार से विचार किया जाएगा। एनईपी का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्कूल और उच्च शिक्षा के कम से कम 50% विद्यार्थियों को 2025 तक व्यावसायिक शिक्षा से रूबरू कराया जाना चाहिए।  

अन्य सुझाव

  • शिक्षा का वित्त पोषण: एनईपी ने शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी निवेश जीडीपी का 6% करने की प्रतिबद्धता दोहराई। उल्लेखनीय है कि पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1968 ने कहा था कि शिक्षा क्षेत्र में सरकारी व्यय जीडीपी का 6% होना चाहिए जिसे 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने भी दोहराया था। 2017-18 में भारत में शिक्षा क्षेत्र पर सरकारी निवेश जीडीपी का 4.4% था।
     
  • प्रौढ़ शिक्षा: प्रौढ़ शिक्षा के लिए राष्ट्रीय करिकुलम फ्रेमवर्क विकसित किया जाएगा ताकि निम्नलिखित पांच व्यापक क्षेत्र इसके दायरे में आ जाएं: (i) मूलभूत साक्षरता और अंक ज्ञान, (ii) महत्वपूर्ण जीवन दक्षताएं (जैसे वित्तीय और डिजिटल साक्षरता, स्वास्थ्य देखभाल और परिवार के संबंध में जागरूकता), (iii) व्यावसायिक दक्षता विकास, (iv) मूलभूत शिक्षा (मिडिल और सेकेंडरी शिक्षा के बराबर), और (v) निरंतर शिक्षा (आर्ट्स, तकनीक, खेल और संस्कृति के पाठ्यक्रमों में संलग्नता के जरिए)।
     
  • शिक्षा में तकनीक: राष्ट्रीय शिक्षा तकनीक फोरम (एनईटीएफ) की स्थापना की जाएगी ताकि तकनीक के इंडक्शन, तैनाती और उपयोग के संबंध में निर्णय लेने की सुविधा मिले। यह फोरम केंद्र और राज्य सरकारों को तकनीक संबंधी पहल से जुड़ी प्रमाण आधारित सलाह देगा।
     
  • डिजिटल शिक्षा: हाल की महामारी में देखा गया है कि जब व्यक्तिगत स्तर पर शिक्षा देना संभव न हो तो उच्च स्तरीय शिक्षा प्रदान करने के लिए वैकल्पिक तरीकों को विकसित किया जाना चाहिए। समावेशी डिजिटल शिक्षा को सुनिश्चित करने के लिए अनेक पहल की जानी चाहिए, जैसे: (i) ऑनलाइन क्लास के लिए टू वे ऑडियो और वीडियो इंटरफेस विकसित करना, (ii) कोर्सवर्क, लर्निंग गेम्स और वर्चुअल रिएलिटी के जरिए स्टिमुलेशंस की डिजिटल रेपोजिटरी बनाना, (iii) कई भाषाओं में टेलीविजन, रेडियो और मास मीडिया जैसे दूसरे चैनलों का इस्तेमाल, ताकि डिजिटल कंटेंट उन जगहों तक पहुंचे जहां डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद नहीं है, (iv) मौजूदा ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म्स पर वर्चुअल लैब्स बनाना ताकि विद्यार्थियों को भागीदारी पूर्ण प्रयोग आधारित शिक्षण प्राप्त हो सके, और (v) शिक्षकों को उच्च स्तर के ऑनलाइन कंटेंट क्रिएटर्स बनाने के लिए प्रशिक्षण प्रदान करना।  

 

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