डीएनए के प्रस्तावित कानून में निजता की बड़ी चिंताएं

देश की संसद डीएनए तकनीक के उपयोग का नियमन करने के लिए एक कानून पारित करने वाली है। हर व्यक्ति का डीएनए अनोखा होता है, तो इसका उपयोग व्यक्ति की सुनिश्चित पहचान के लिए किया जा सकता है। वैश्विक रूप से इस तकनीक का उपयोग सुरक्षा एजेंसियां भगोड़ों और अपराध पीड़ितों की पहचान के लिए करती हैं। डीएनए जांच का उपयोग किसी व्यक्ति में कैंसर और अल्जाइमर जैसी बीमारियों की आशंका आंकने के लिए भी किया जाता है। डीएनए का उपयोग बच्चों के जैविक अभिभावक की पहचान और बच्चों का परस्पर संबंध जांचने के लिए भी किया जाता है। 

डीएनए तकनीक के इस्तेमाल से सहमति, निजता और डाटा सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े होते हैं। भारत में डीएनए तकनीक का नियमन अभी तक नहीं हुआ है। दुर्भाग्य से नया कानून निजता और मूलभूत अधिकारों से जुड़े मुख्य मुद्दों को जिस तरह से संबोधित करता है, उसमें बड़ी खामियां हैं। फौजदारी मामलों में यह कानून ताकीद करता है कि अपराध के आरोपी, दोषी, पीड़ित इत्यादि की लिखित सहमति के बाद ही उनसे डीएनए सैंपल या नमूना लिया जा सकता है। डीएनए प्रयोगशालाओं में एक बार नमूने की विवेचना के बाद उसे नेशनल डीएनए डाटा बैंक में सुरक्षित रखा जाएगा।  

प्रस्तावित कानून फौजदारी मामलों के भी पार जाता है और डीएनए के दीवानी और चिकित्सकीय उपयोग का भी नियमन करता है। यहां कई मुख्य चिंताएं उभरती हैं। जैविक माता-पिता संबंधी विवाद, चिकित्सकीय लापरवाही या किसी व्यक्ति की पहचान स्थापित करने संबंधी विवाद के मामलों में सवाल खड़े होते हैं। ऐसे मामलों में नया कानून किसी भी तरह की निजता-सुरक्षा का प्रावधान नहीं करता है। प्रस्तावित कानून अभिभावक विवाद जैसे दीवानी मामलों में जांच के लिए व्यक्ति की सहमति को जरूरी नहीं मानता। डीएनए से किसी की केवल पहचान ही स्थापित नहीं होती, शरीर और सेहत संबंधी सूचनाएं भी जाहिर हो सकती है। ऐसी सूचनाओं के जाहिर होने से निजता खंडित हो सकती है। पूर्व सहमति से ही डीएनए के दुरुपयोग से बचाव होगा। 

कानून के तहत बन रहे नेशनल डीएनए डाटा बैंक में केंद्रीय स्तर पर सूचनाएं सुरक्षित रखी जाएंगी। सभी डीएनए प्रयोगशालाओं को नेशनल डाटा बैंक के साथ सूचनाओं को साझा करना होगा। कृत्रिम गर्भाधान और गर्भवती महिलाओं के संबंध में होने वाले विवादों में भी क्या डीएनए सूचनाओं को डाटा बैंक के साथ साझा किया जाएगा? ध्यान देने की बात है, अमेरिका और ब्रिटेन में डीएनए डाटाबेस केवल फौजदारी मामलों में ही डीएनए सूचनाओं को सुरक्षित रखता है। इसके अलावा यदि दीवानी मामलों में डीएनए सूचनाओं को डाटा बैंक में सुरक्षित रखा जाएगा, तो निजता के उस मूलभूत अधिकार का उल्लंघन होगा, जिसकी गारंटी सुप्रीम कोर्ट भी देता है। अदालत ने एक तरह से कहा था कि कानून के लागू होने के बाद ही निजता के अधिकार का प्रश्न उठेगा, देखना पड़ेगा कि निजता कायम रखने की कीमत क्या है। किसी की निजता को उजागर करते हुए उसके अनुपात में समाज को उसका व्यापक लाभ भी स्पष्ट होना चाहिए। इससे निजता का भी उल्लंघन होगा। 

एक सवाल यह भी कि क्या यह कानून मेडिकल के क्षेत्र में भी डीएनए जांच का नियमन करना चाहता है? देश में बहुत सारी ऐसी प्रयोगशालाएं हैं, जो कैंसर, मधुमेह और अन्य बीमारियों के होने की आशंकाओं की जांच करती हैं। कानून यह भी नहीं बताता कि किसी का डीएनए डाटा कैसे रखा जाएगा, कब तक रखा जाएगा, किस-किस से साझा किया जाएगा, उसे कब मिटाया जाएगा। क्या इसे स्वास्थ्य बीमा करने वालों के साथ साझा किया जाएगा?

प्रस्तावित कानून में कई कमियां हैं, अनेक सांसदों ने इसका विरोध किया है। विधेयक को संसद के पटल पर रखते हुए केंद्रीय मंत्री हर्षवद्र्धन ने कहा है कि यह कानून अपराधियों, पीड़ितों, मृतकों और गुमशुदा की पहचान के लिए डीएनए जांच का नियमन करेगा। हालांकि यह कानून लक्ष्य से परे भी जाता दिखता है। विशेषज्ञों की मदद से इस पर व्यापक सलाह मशविरा हो। यह तभी संभव है, जब यह विधेयक संसदीय समिति को सौंप दिया जाए, वरना डीएनए तकनीक के उपयोग के प्रभावी नियमन का मौका हम गंवा देंगे। 

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)