न्यूनतम समर्थन मूल्य के माध्यम से दलहन उत्पादन को बढ़ावा एवं संबंधित नीतियां

रिपोर्ट का सारांश

  • मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. अरविंद सुब्रह्मण्यम ने ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के माध्यम से दलहन उत्पादन को बढ़ावा एवं संबंधित नीतियां’ पर अपनी रिपोर्ट 16 सितंबर, 2016 को सौंपी।
     
  • दलहन की उपलब्धता : देश में दलहन उत्पादन वर्ष 2002-03 में 11 मिलियन टन से बढ़कर वर्ष 2013-14 में 19.3 मिलियन टन हो गया। लेकिन इस दौरान आयात भी बढ़ा जोकि 2000-01 में 0.06 मिलियन टन से बढ़कर 2015-16 में 5.53 मिलियन टन हो गया। अगर दलहन की कमी को दूर करना है तो इसके घरेलू उत्पादन को बढ़ाना होगा। वर्तमान में दलहन का घरेलू उत्पादन हर वर्ष 3% की दर से बढ़ रहा है। इसे हर वर्ष 8% की दर पर लाना होगा।
     
  • दहलन की सरकारी खरीद : सरकार को एमएसपी पर मूंग, तुअर और उड़द जैसी दालों की खरीद का केंद्रित प्रयास करना चाहिए। इन दालों का बाजार मूल्य इस समय एमएसपी से भी नीचे है। खरीद बढ़ाने के लिए सरकार को भारतीय खाद्य निगम जैसी खरीद एजेंसियों और राज्य सहकारी संघों इत्यादि को अतिरिक्त 10,000 करोड़ रुपए आवंटित करने चाहिए। इसके अतिरिक्त खरीद प्रक्रियाओं का निरीक्षण किया जाना चाहिए। इसके लिए केंद्र सरकार को साप्ताहिक रिपोर्टिंग की जा सकती है और विजुअल इमेजेस के जरिए खरीद का भौतिक सत्यापन किया जा सकता है।
     
  • दलहन की खरीद के बाद उसका निस्तारण भी प्रभावी ढंग से किया जाना चाहिए क्योंकि अनाज के मुकाबले दालें जल्दी खराब होती हैं। इसलिए दलहन के संग्रहण, भंडारण और निस्तारण के लिए प्रभावी नीतियां सुनिश्चित की जानी चाहिए।
     
  • दलहन का मूल्य प्रबंधन : दलहन की कीमतों में गिरावट को रोकने के लिए व्यापारियों पर स्टॉक रखने की सीमा को समाप्त करना चाहिए और निर्यात पर लगे प्रतिबंध को हटाया जाना चाहिए। राज्य सरकारों को इस बात के लिए बढ़ावा दिया जाना चाहिए कि वे अपने कृषि उत्पाद बाजार समिति अधिनियमों से दालों को डीलिस्ट करें जिससे सरकारी मंडियों से बाहर भी दालों का कारोबार किया जा सके।
     
  • दालों के लिए एमएसपी : मुद्रास्फीति के मद्देनजर तुअर और उड़द दालों के लिए एमएसपी 60 रुपए प्रति किलो किया जाना चाहिए। रबी सत्र की दालों जैसे चना के लिए एमएसपी 40 रुपए प्रति किलो किया जाना चाहिए और इसकी घोषणा तत्काल की जानी चाहिए। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) एमएसपी के निर्धारण के लिए वर्तमान में जिन कारकों पर विचार करता है, उनमें जोखिम और बाहरी कारणों (एक्सटरनैलिटीज) को शामिल नहीं किया जाता। आयोग को अपनी मौजूदा पद्धतियों की समीक्षा करनी चाहिए और इन कारको को शामिल करना चाहिए।
     
  • अनिवार्य वस्तु एक्ट, 1955 की समीक्षा : अनिवार्य वस्तु एक्ट, 1955 कृषि उत्पादों जैसे अनाज, दालों, तिलहन, चीनी और अन्य वस्तुओं की आपूर्ति और वितरण पर नियंत्रण रखता है। लेकिन यह एक्ट उत्पादकों से इस बात की अपेक्षा करता है कि वे अपने माल को सरकारी मंडियों में बेचें जिससे कृषि मार्केटिंग फर्म हतोत्साहित होती हैं। इससे इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और क्षमता पर असर पड़ा है। मूल्यों को स्थिर रखने के लिए निजी कंपनियां स्टॉक की खरीद नहीं कर पातीं क्योंकि उनके लिए स्टॉक रखने की सीमा तय है। इस कारण कीमतों में भारी गिरावट होती है। इस सभी कारणों को देखते हुए इस एक्ट की समीक्षा की जानी चाहिए।
     
  • दालों के लिए संस्थागत व्यवस्था : सरकार को दलहन के लिए नई संस्थागत व्यवस्था करनी चाहिए। इस प्रकार के संस्थान पर सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों और निजी कंपनियों का स्वामित्व हो सकता है लेकिन दैनिक आधार पर यह किसी बोर्ड द्वारा संचालित होना चाहिए। इस संस्थान को दलहन के अतिरिक्त अन्य फसलों जैसे फल और सब्जियों की खरीद, संग्रहण और भंडारण एवं व्यापारिक गतिविधियों में संलग्न होने की अनुमति दी जाएगी।

 

अस्वीकरणः प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (“पीआरएस”) की स्वीकृति के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।