हाउसिंग फाइनांस सिक्योरिटाइजेशन मार्केट का विकास

कमिटी रिपोर्ट का सारांश

  • भारतीय रिजर्व बैंक ने मई 2019 में हाउसिंग फाइनांस सिक्योरिटाइजेशन मार्केट का विकास पर एक कमिटी (चेयर: डॉ. हर्ष वर्धन) का गठन किया था। भारत में मार्गेज सिक्योरिटाइजेशन मार्केट की मौजूदा स्थिति की समीक्षा के लिए इस कमिटी का गठन किया गया था। कमिटी ने 5 सितंबर, 2019 को आरबीआई को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
     
  • कमिटी ने हाउसिंग फाइनांस से संबंधित अनेक चुनौतियों पर गौर किया। उसने कहा कि भारत के सभी के लिए आवास के लक्ष्य को हासिल करने के लिए 2022 तक आठ से 10 करोड़ अतिरिक्त आवासीय इकाइयों की जरूरत होगी। इसकी लागत 100 से 115 लाख करोड़ रुपए होगी। आर्थिक रूप से कमजोर तबकों को होम लोन्स के लिए कर्ज देने में हाउसिंग फाइनांश कंपनियां (एचएफसीज़) मुख्य भूमिका निभाती हैं। हालांकि ऋणदाताओं के लिए होम लोन्स एक तरह से स्ट्रक्चरल एसेट लायबिलिटी मैनेजमेंट चैलेंज होता है क्योंकि होम्स लोन्स की परिपक्वता अवधि (आम तौर पर दीर्घावधि की परिपक्वता) और एचएफसीज़ के वित्त पोषण के स्रोतों की परिपक्वता अवधि (आम तौर पर अल्पावधि की परिपक्वता) के बीच तालमेल नहीं होता। इस समस्या के समाधान के लिए एचएफसीज़ होम लोन्स को पूल करती हैं ताकि इन ऋणों के सहारे से सिक्योरिटीज़ को जारी किया सके और इस तरह धन जुटाती हैं। इस प्रक्रिया को सिक्योरिटाइजेशन कहा जाता है।
     
  • सिक्योरिटाइजेशन के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क में दो प्रकार के लेनदेन शामिल होते हैं: (i) डायरेक्ट एसाइनमेंट (डीए) (ii) पास थ्रू सर्टिफिकेट्स (पीटीसी)। दोनों में लोन्स को पूल किया जाता है और फिर उसे थर्ड पार्टी को बेचा जाता है, इससे क्रेडिट से जुड़ा जोखिम ट्रांसफर हो जाता है। हालांकि पीटीसी के जरिए सिक्योरिटाइजेशन के मामले में पूल किए गए लोन को एक बिचौलिये के जरिए बेचा जाता है जिसे स्पेशल पर्पज वेहिकल के तौर पर स्थापित किया जाता है। कमिटी ने कहा कि सिक्योरिटाइजेशन मार्केट में डीए लेनदेन का वर्चस्व है (2019 में कुल लेनदेन में पीटीसी लेनदेन का हिस्सा सिर्फ एक चौथाई था)। कमिटी ने कहा कि डीए रूट के जरिए किए जाने वाले सिक्योरिटाइजेशन में कस्टमाइज्ड, द्विपक्षीय लेनदेन होता है जोकि लेनदेन के विवरण (जैसे वैल्यूएशन, पूल परफॉर्मेंस, प्रीपेमेंट) को प्राइवेट डोमेन में रखता है। यह अन्य प्रतिभागियों (जैसे म्यूचुअल फंड, बीमा और पेंशन फंड) को लेनदेन में भाग लेने से रोकता है। इसके अलावा इस लेनदेन में मानकीकरण कम है।
     
  • सिक्योरिटाइजेशन से जुड़ी एक और बड़ी चुनौती है, लेनदेन की अतिरिक्त लागत। इसका कारण कानूनी और रेगुलेटरी शर्तें, टैक्सेशन में अनिश्चितता और एकाउंटिंग स्टैडर्ड्स हैं। इन चुनौतियों के मद्देनजर समिति ने निम्नलिखित सुझाव दिए:
     
  • स्टाम्प ड्यूटी और पंजीकरण की शर्तों में ढिलाई देना: केंद्र सरकार मार्गेज समर्थित सिक्योरिटाइजेशन लेनदेन को स्टाम्प ड्यूटी से छूट दे सकती है। इसके अतिरिक्त सरकार मार्गेज लोन्स को पंजीकरण से छूट दे सकती है क्योंकि वे अंडरलाइंग एसेट्स से अलग, अनिवार्य रूप से चल संपत्ति हैं।
     
  • अलग-अलग रेगुलेटरी दिशानिर्देश: मार्गेज समर्थित सिक्योरिटाइजेशन और परिसंपत्ति समर्थित सिक्योरिटाइजेशन, दोनों के लिए अलग-अलग रेगुलेशन होने चाहिए। मार्गेज समर्थित सिक्योरिटाइजेशन के लिए मिनिमम होल्डिंग पीरियड (एमएचपी) और मिनिमम रिटेंशन रिक्वायरमेंट (एमआरआर) के रेगुलेटरी नियमों में ढील दी जानी चाहिए। एमएचपी वह न्यूनतम अवधि होती है जिसमें ओरिजिनेटर (यानी लोन देने वाला मूल ऋणदाता) को अपनी परिसंपत्तियां होल्ड करनी होती हैं, ताकि उन्हें सिक्योरिटाइजेशन पूल में शामिल किया जा सके। एमआरआर एसेट पूल में ओरिजिनेटर की न्यूनतम ब्याज राशि होती है।
     
  • डीए और पीटीसी के लिए अलग-अलग रेगुलेशंस और उनके भिन्न भिन्न दिशानिर्देश होने चाहिए। सिक्योरिटाइजेशन संबंधी दिशानिर्देश केवल पीटीसी लेनदेन पर लागू होने चाहिए। डीए लेनदेन को सिक्योरिटाइजेशन नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि इसमें सिक्योरिटीज़ जारी नहीं की जातीं। इसके अतिरिक्त मॉर्गेज समर्थित सिक्योरिटाइजेशन में जारी किए गए पीटीसी को अनिवार्य रूप से सूचीबद्ध किया जाना चाहिए, यदि सिक्योरिटाइजेशन पूल 500 करोड़ रुपये से अधिक हो।
     
  • सरकार प्रायोजित बिचौलिया: हाउसिंग फाइनांस सिक्योरिटाइजेशन को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय आवास बैंक के माध्यम से एक बिचौलिया स्थापित किया जाना चाहिए। यह बाजार बनाने और स्टैंडर्ड सेटिंग के लिए जिम्मेदार होगा।
     
  • मानकीकरण: मानकीकरण में सुधार के लिए लोन ओरिजिनेशन, लोन सर्विसिंग, लोन डॉक्यूमेंटेशन और सिक्योरिटाइजेशन के लिए लोन की पात्रता के संबंध में विशिष्ट मानदंड बनाए जाने चाहिए। इसके अतिरिक्त डेटा कलेक्शन और हाउसिंग लोन से संबंधित डेटा के संग्रह के लिए स्टैंडर्ड फॉरमैट बनाए जाने चाहिए।
     
  • बैंकरप्सी रिमोटनेस (बैंकरप्सी में दूरी): वर्तमान में सिक्योरिटाइजेशन लेनदेन बैंकरप्सी रिमोट होते हैं जिसका अर्थ है कि अगर लोन्स का ओरिजिनेटर इनसॉल्वेंट और बैंकरप्ट हो जाता है तो एसेट्स का सिक्योराइज्ड पूल लिक्विडेशन की प्रक्रिया में ओरिजिनेटर की परिसंपत्तियों से बाहर निकल जाता है। कमिटी ने सुझाव दिया कि वित्तीय कंपनियों की बैंकरप्सी को हल करने वाले कानूनों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सिक्योरिटाइजेशन लेनदेन से जुड़े सभी एसेट्स बैंकरप्सी रिमोट हों। इससे यह सुनिश्चित होगा कि निवेशक सिक्योरिटाइजेशन लेनदेन में भाग लेने से हतोत्साहित न हों।   

 

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