स्ट्रेस्ड थर्मल पावर प्रॉजेक्ट्स की समस्या को दूर करने के लिए हाई लेवल एम्पावर्ड कमिटी

रिपोर्ट का सारांश

  • हाई लेवल एम्पावर्ड कमिटी (चेयर: पी.के.सिन्हा, कैबिनेट सेक्रेटरी) ने 12 नवंबर, 2018 को स्ट्रेस्ड थर्मल पावर प्रॉजेक्ट्स की समस्या का निवारण पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। कोयला आधारित पावर प्लांट्स विभिन्न कारणों से अपना ऋण नहीं चुका पाते। इन कारणों में कोयले की आपूर्ति से जुड़ी समस्याएं, डिस्कॉम्स द्वारा बिजली उत्पादकों को भुगतान न करना, रेगुलेटरी समस्याएं, प्रमोटर्स द्वारा इक्विटी न डालना, और कार्यान्वयन से संबंधित समस्याएं शामिल हैं। वित्तीय सेवा विभाग ने कोयला आधारित 34 थर्मल पावर प्लांट्स की सूची दी है, जिन्हें मार्च 2017 में ऊर्जा मंत्रालय ने स्ट्रेस्ड घोषित किया था। इसके बाद केंद्र सरकार ने स्ट्रेस्ड थर्मल पावर प्रॉजेक्ट्स की समस्या को दूर करने के लिए 29 जुलाई, 2018 को एक हाई लेवल एम्पावर्ड कमिटी (एचएलईसी) का गठन किया। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं :
     
  • कोयला आबंटन/सप्लाई: एचएलईसी ने कहा कि बहुत से पावर प्लांट्स फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट्स (कोयला और पावर प्लांट के बीच एग्रीमेंट, जिसे कोल लिंकेज भी कहते हैं) तो करते हैं लेकिन उनके पास मध्यम अवधि/दीर्घ अवधि के पावर परचेज़ एग्रीमेंट्स (पावर प्लांट और डिस्कॉम के बीच एग्रीमेंट, जिसे पीपीए भी कहते हैं) नहीं होते। दीर्घ अवधि/मध्यम अवधि के पीपीए न होने के कारण ये प्लांट ऑपरेट नहीं कर पाते क्योंकि इन कोल लिंकेज को अल्प अवधि के पीपीएज़ के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कमिटी ने सुझाव दिया कि इन कोल लिंकेज को अल्प अवधि के पीपीएज़ के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति दी जा सकती है। इसके अतिरिक्त बिजली को पारदर्शी बोली प्रक्रिया के जरिए डे अहेड मार्केट (इलेक्ट्रिसिटी ट्रेडिंग मार्केट) में भी बेचा जा सकता है। इससे बिजली की सप्लाई को बढ़ाने और कीमतों को कम करने में मदद मिलेगी।
     
  • डिस्कॉम्स द्वारा भुगतान करने में देरी: एचएलईसी के अनुसार, स्ट्रेस के मुख्य कारणों में से एक यह है कि डिस्कॉम्स पावर प्लांट्स को समय पर भुगतान नहीं करते। इससे उनकी लिक्विडिटी प्रभावित होती है। वे अपना ऋण नहीं चुका पाते और प्लांट को ऑपरेट करने में समस्याएं आती हैं। वर्तमान में पावर प्लांट्स ऐसे डिस्कॉम्स से अपने पीपीएज़ को रद्द नहीं कर सकते। न एक्सचेंज पर और न अल्प अवधि के पीपीएज़ के जरिए बिजली बेच सकते हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि अगर डिस्कॉम द्वारा भुगतान नहीं किया जाता तो पावर प्लांट को पीपीए को रद्द करने का अधिकार होना चाहिए। इसके अतिरिक्त उन्हें यह सुविधा होनी चाहिए कि अधिकतम दो वर्षों तक या जब तक दूसरा खरीदार न मिल जाए (इनमें से जो पहले हो), वे तब तक अल्प अवधि के पीपीएज़ के लिए कोल लिंकेज का इस्तेमाल कर सकें।
     
  • पीपीएज़ की उपलब्धता: अधिकतर क्षमता के स्ट्रेस्ड होने के मुख्य कारणों में से एक यह है कि दीर्घ/ मध्यम अवधि के पीपीएज़ की संख्या सीमित है। इसके अतिरिक्त दीर्घ/मध्यम अवधि में बिजली की खरीद के लिए डिस्कॉम्स बहुत कम बोली लगाते हैं, जिसका कारण उनसे जुड़ी निर्धारित लागत है। कोल लिंकेज (शक्ति) के आबंटन की नई नीति के अंतर्गत एक से अधिक राज्य के लिए नोडल एजेंसी (विद्युत वित्त निगम) मांग का एकत्रण करेगी। कमिटी ने सुझाव दिया कि शक्ति नीति में परिवर्तन किया जा सकता है ताकि नोडल एजेंसी मध्यम अवधि (तीन से पांच वर्ष) के लिए थोक बिजली की खरीद के लिए नीलामी प्रक्रिया शुरू करे। इसके बाद एजेंसी डिस्कॉम्स को बिजली दे सकती है।
     
  • अधिसूचित कीमत पर लिंकेज: वर्तमान में शक्ति नीति के अंतर्गत नीलामी की प्रक्रिया के जरिए कोल लिंकेज दिए जाते हैं। बिजली उत्पादक को पहले लिंकेज के लिए और फिर पीपीए की खरीद के लिए बोली लगानी पड़ती है। इससे बिजली उत्पादक अनिश्चितता और जोखिम का शिकार हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त लिंकेज और पीपीए, दोनों की नीलामी के समय बाजार की और आर्थिक स्थितियां फर्क हो सकती हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि कोयला उत्पादन में वृद्धि के लिए कोयला उत्पादक पीपीए की खरीद के लिए सिर्फ एक बार बोली लगाएं। फिर इसके बाद नीलामी के बिना अधिसूचित कीमत पर लिंकेज दिए जा सकते हैं।
     
  • पुराने और अक्षम प्लांट्स: पिछले छह वर्षों में 110 गिगावॉट की उत्पादन क्षमता जोड़ी गई है जिसमें से 100 गिगावॉट की क्षमता कोयला आधारित प्लांट्स से प्राप्त हुई है। हालांकि मांग उसी गति से नहीं बढ़ी है। परिणामस्वरूप उपलब्ध क्षमता मांग से अधिक है और पीक समय में बिजली की कमी 2012-13 में 8.7% से घटकर 2017-18 में 0.7% हो गई है। इस प्रकार बड़ी मात्रा में बिजली का उपयोग नहीं हो पाता है। इसके अतिरिक्त ऐसे अनेक पुराने प्लांट्स हैं जो पर्यावरण के नियमों का पालन नहीं करते। इन प्लांट्स में कोयले का इस्तेमाल, नए और अधिक सक्षम प्लांट्स की तुलना में अधिक होता है। कमिटी ने सुझाव दिया कि ऊर्जा की मांग को देखते हुए पुराने और प्रदूषण फैलाने वाले संयंत्रों को रिटायर किया जा सकता है।
     
  • रेगुलेटरी समस्याएं: कमिटी ने कहा कि डिस्कॉम्स के समय पर भुगतान न करने के कारण बिजली उत्पादकों को काम जारी रखना मुश्किल होता है। रेगुलेटर्स को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बिजली क्षेत्र का कामकाज सतत बना रहा है। कमिटी ने यह सुझाव दिया कि ऊर्जा मंत्रालय द्वारा रेगुलेटर को डिस्कॉम्स के भुगतानों पर निगरानी रखने और उपयुक्त रेगुलेशंस बनाने की सलाह दी जा सकती है। हाई लेवल एम्पावर्ड कमिटी ने यह भी कहा कि रेगुलेटर्स अक्सर बिजली उत्पादकों से देर से मिलने वाले भुगतान पर सरचार्ज न लगाने को कहते हैं। इससे भी उत्पादकों के लिए काम जारी रखना मुश्किल होता है। कमिटी ने सुझाव दिया कि मंत्रालय रेगुलेटर्स के साथ मिलकर काम कर सकता है ताकि यह सुनिश्चित हो कि देर से भुगतान करने पर सरचार्ज अनिवार्य रूप से चुकाया जाए।

 

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