सीमा सड़क संगठन के अंतर्गत बारहमासी सड़क कनेक्टिविटी का प्रावधान

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश 

  • रक्षा संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयरपर्सन: कलराज मिश्र) ने 11 फरवरी, 2019 को सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) तथा अन्य एजेसियों के अंतर्गत सामरिक क्षेत्रों तथा एप्रोच सड़कों सहित अंतरराष्ट्रीय सीमाओं तक बारहमासी सड़क कनेक्टिविटी का प्रावधान-एक मूल्यांकन पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:
     
  • बीआरओ का खराब प्रदर्शन: कमिटी ने गौर किया कि 2007-08 से बीआरओ ने निर्माण के विभिन्न लक्ष्यों को पूरा नहीं किया है। इन लक्ष्यों को पूरा करने में असफल रहने के बावजूद बाद के वर्षों में अधिक बड़े लक्ष्य निर्धारित किए गए, जिससे प्रदर्शन और खराब हुआ। इन लक्ष्यों को विभिन्न कारणों से हासिल नहीं किया जा सका, जैसे दुर्गम स्थल, कार्य करने की सीमित अवधि और कच्चे माल की कमी।
     
  • भारत-चीन सीमा सड़क (आईसीबीआरज़): कमिटी ने कहा कि सरकार ने 3,812 किलोमीटर लंबी 73 सड़कों को चिन्हित किया था, जिन्हें भारत-चीन सीमा पर बनाया जाना था। इनमें से बीआरओ को 61 सड़कें बनानी थीं। इन सड़कों को 2012 में पूरा होना था। 61 में से 28 सड़कें बन चुकी हैं और बाकी निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं। 2022 तक इन्हें पूरा होना है। कमिटी ने कहा कि बीआरओ को इन सड़कों को 2022 की बजाय 2020 तक पूरा करने की संभावनाएं तलाशनी चाहिए।
     
  • अधिकार सौंपना: कमिटी ने कहा कि बीआरओ फील्ड में कार्य करने की स्थिति में नहीं था क्योंकि उसके पास पर्याप्त अधिकार नहीं थे और कई मामलों के लिए उसे रक्षा मंत्रालय से संपर्क करना पड़ता था। चीफ इंजीनियरों को फील्ड लेवल पर काम करवाने के लिए पर्याप्त अधिकार नहीं थे। हालांकि अब बीआरओ को अधिक वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार मिल गए हैं। फील्ड लेवल पर चीफ इंजीनियर 10 करोड़ की बजाय अब 50 करोड़ रुपए तक खर्च कर सकते हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि रक्षा मंत्रालय को इस संबंध में आकलन करना चाहिए कि अधिक अधिकार प्राप्त होने के बाद प्रॉजेक्ट्स के कार्यान्वयन में कितना अंतर आया है।
     
  • एम्पावर्ड कमिटियां: कमिटी ने कहा कि बीआरओ और राज्य सरकारों के बीच एम्पावर्ड कमिटियां (ईसीज़) बनाई गई हैं ताकि भूमि अधिग्रहण और वन मंजूरियों जैसे मसलों को सुलझाया जा सके। यह कहा गया कि जिन राज्यों में बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण के मामले लंबित हैं, जैसे जम्मू और कश्मीर, वहां 2015 से ईसीज़ की सिर्फ एक बार बैठक हुई है। कमिटी ने सुझाव दिया कि एम्पावर्ड कमिटियों को प्रभावी बनाने के लिए विशिष्ट कदम उठाए जाने चाहिए जिससे वे सीमा सड़कों से संबंधित मुद्दों में अधिक सक्रिय भूमिका निभाएं।
     
  • प्रॉजेक्ट्स में देरी: कमिटी ने कहा कि भूमि अधिग्रहण से जुड़ी समस्याओं के कारण सड़कों, पुलों और सुरंगों के निर्माण में बहुत देरी होती है। इनमें भूमि अधिग्रहण के लिए संयुक्त सर्वेक्षण में देरी, भूमि अधिग्रहण के भुगतान का संवितरण न होना और अतिरिक्त मुआवजे की मांग शामिल हैं। कमिटी ने कहा कि विभिन्न अदालतों में मुआवजे के 593 मामले लंबित हैं और सुझाव दिया कि रक्षा मंत्रालय को इन मामलों को अदालतों के बाहर सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए।
     
  • इसके अतिरिक्त कमिटी ने कहा कि वन्य जीव मंजूरियों में औसत 3-7 वर्ष का समय लगता है, इसके बावजूद कि फास्ट ट्रैक प्रक्रियाएं काम कर रही हैं। उसने सुझाव दिया कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को इन प्रक्रियाओं में तेजी लाने की संभावनाएं तलाशनी चाहिए। इसके अतिरिक्त कमिटी ने कहा कि विभिन्न राज्य सरकारों के पास वन मंजूरियों के 29 मामले अब भी लंबित हैं। उसने सुझाव दिया कि एम्पावर्ड कमिटियों को इन मामलों को जल्द से जल्द निपटाना चाहिए।
     
  • उपकरणों की कमी: कमिटी ने कहा कि 2016-17 में बीआरओ के पास अधिकृत संख्या से कम निर्माण उपकरण उपलब्ध थे। स्टोन क्रशर्स और टिपर्स जैसे उपकरण अधिकृत संख्या से क्रमशः 40% और 50% कम थे। इसके अतिरिक्त कमिटी ने कहा कि बीआरओ स्थानीय उपकरणों का प्रयोग कर रहा था, चूंकि वह ऐसे दुर्गम स्थानों पर काम करते हैं जहां अत्याधुनिक उपकरणों का उपयोग करना व्यावहारिक नहीं है। कमिटी ने सुझाव दिया कि निर्माण के लिए अत्याधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल किया जा सकता है ताकि प्रॉजेक्ट्स को जल्द पूरा किया जा सके।
     
  • मैनपावर की कमी: कमिटी ने कहा कि दुर्गम इलाकों और अपने परिवार के लिए सुविधाओं की कमी जैसी समस्याओं के कारण लोग बीआरओ में काम करना पसंद नहीं करते। कमिटी ने सुझाव दिया कि अगर सीमा क्षेत्रों में बीआरओ तैनातियों के साथ कुछ इन्सेंटिव पैकेज दिए जाएं तो प्रतिभाशाली युवा इस ओर आकर्षित होंगे।

                                  

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