सीमा पारीय इनसॉल्वेंसी पर इनसॉल्वेंसी लॉ कमिटी

रिपोर्ट का सारांश

  • इनसॉल्वेंसी लॉ कमिटी (चेयर: इंजेती श्रीनिवास) ने 16 अक्टूबर, 2018 को अपनी दूसरी रिपोर्ट कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय को सौंपी। इस रिपोर्ट में सीमा-पारीय इनसॉल्वेंसी को लेकर इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 में संशोधन का सुझाव दिया गया है। संहिता कंपनियों और व्यक्तियों की इनसॉल्वेंसी को रिज़ॉल्व करने के लिए 180 दिन की समयबद्ध प्रक्रिया का प्रावधान करती है। कमिटी ने संहिता में ड्राफ्ट ‘पार्ट जेड’ प्रस्तावित किया है जोकि यूएनसाइट्रल मॉडल लॉ ऑन क्रॉस-बॉर्डर इनसॉल्वेंसी, 1997 के विश्लेषण पर आधारित है। मॉडल कानून एक कानूनी रूपरेखा प्रदान करता है। विभिन्न देश सीमा पारीय इनसॉल्वेंसी के मुद्दों से निपटने के लिए अपने घरेलू कानून में उसका इस्तेमाल कर सकते हैं। कमिटी के मुख्य सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
     
  • एप्लीकेबिलिटी: कमिटी ने सुझाव दिया कि वर्तमान में ड्राफ्ट पार्ट जेड में सिर्फ कॉरपोरेट ऋणदाताओं को शामिल किया जाना चाहिए।
     
  • दोहरी व्यवस्थाएं: कमिटी ने कहा कि वर्तमान में कंपनी एक्ट, 2013 में विदेशी कंपनियों की इनसॉल्वेंसी से संबंधित प्रावधान भी हैं। उसने गौर किया कि जब पार्ट जेड लागू हो जाएगा, तो विदेशी कंपनियों की इनसॉल्वेंसी से निपटने के लिए दोहरी व्यवस्था हो जाएगी। उसने सुझाव दिया कि कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय को 2013 के एक्ट में ऐसे प्रावधानों पर एक अध्ययन करना चाहिए ताकि उनकी बहाली के संबंध में फैसला किया जा सके।
     
  • पारस्परिकता (रेसिप्रोसिटी): कमिटी ने सुझाव दिया कि मॉडल कानून को शुरुआत में पारस्परिकता (रेसिप्रोसिटी) के आधार पर लागू किया जा सकता है। इसे पुनर्परीक्षण के बाद डाइल्यूट किया जा सकता है। पारस्परिकता का यह मायने है कि अगर कोई देश भारत जैसे कानून का पालन करता है तो भारत की अदालत उस देश की अदालत के फैसले को मान्यता देगी और उसे लागू करेगी।
     
  • विदेशी प्रतिनिधियों की पहुंच: मॉडल कानून विदेशी इनसॉल्वेंसी प्रोफेशनल्स और विदेशी ऋणदाताओं को घरेलू अदालतों तक सीधी पहुंच बनाने की अनुमति देता है, ताकि वे किसी समस्या के समाधान के लिए कोशिश कर सकें। वर्तमान में संहिता में विदेशी ऋणदाताओं को सीधी पहुंच बनाने का अधिकार है। जहां तक विदेशी इनसॉल्वेंसी प्रोफेशनल्स की पहुंच का सवाल है, कमिटी ने सुझाव दिया कि केंद्र सरकार को मौजूदा कानूनी संरचना में व्यावहारिक व्यवस्था तैयार करने के लिए सशक्त बनाया जाना चाहिए।
     
  • सेंटर ऑफ मेन इंटरेस्ट्स (कोमी): मॉडल कानून विदेशी प्रक्रियाओं को मान्यता देने की अनुमति देता है और इस मान्यता के आधार पर राहत प्रदान करता है। अगर विदेशी प्रक्रिया, मुख्य या गैर मुख्य प्रक्रिया है तो राहत दी जा सकती है। अगर घरेलू अदालतें यह निर्धारित करती हैं कि किसी दूसरे देश में ऋणदाता का कोमी है, तो उस देश की प्रक्रियाओं को मुख्य प्रक्रियाओं के रूप में मान्यता दी जाएगी। इस प्रक्रिया से कुछ राहत स्वतः मिल जाएगी, जैसे ऋणदाता की परिसंपत्ति को लेकर विदेशी प्रतिनिधियों को अधिक अधिकार देना।
     
  • गैर मुख्य प्रक्रियाओं में घरेलू अदालत ऐसी राहत अपने विवेक के आधार पर देगी। कमिटी ने सुझाव दिया कि ऐसे संकेतकों की सूची को नियम बनाने की शक्तियों के जरिए प्रविष्ट किया जा सकता है जिसमें कोमी का घटक शामिल हो। इन कारकों में देनदारों की बुक्स और रिकॉर्ड्स की लोकेशन और फाइनांसिंग की लोकेशन शामिल हो सकती है।
     
  • सहयोग: मॉडल कानून घरेलू और विदेशी अदालतों, और घरेलू और विदेशी इनसॉल्वेंसी प्रोफेशनल्स के बीच सहयोग के लिए बुनियादी संरचना का आधार पेश करता है। यह देखते हुए कि संहिता के अंतर्गत एडजुडिकेटिंग अथॉरिटीज़ का इंफ्रास्ट्रक्चर अब भी तैयार किया जा रहा है, एडजुडिकेटिंग अथॉरिटीज़ और विदेशी अदालतों के बीच सहयोग केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित दिशानिर्देशों का विषय हो सकता है।
     
  • समवर्ती प्रक्रिया: मॉडल कानून घरेलू इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया की शुरुआत के लिए फ्रेमवर्क प्रदान करता है, जब विदेशी इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया शुरू हो चुकी हो, या इससे विपरीत स्थिति में। मॉडल कानून अदालतों के बीच सहयोग को बढ़ावा देते हुए भिन्न-भिन्न देशों में दो या उससे अधिक समवर्ती इनसॉल्वेंसी प्रक्रियाओं के बीच सहयोग का प्रावधान करता है। कमिटी ने सुझाव दिया कि ड्राफ्ट पार्ट ज़ेड में इसके संबंध में प्रावधानों को मंजूर किया जाए।
     
  • पब्लिक पॉलिसी पर विचार: पार्ट ज़ेड में प्रावधान है कि एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी संहिता के अंतर्गत कार्रवाई करने से इनकार कर सकता है, अगर वह कार्रवाई पब्लिक पॉलिसी के खिलाफ है। कमिटी ने सुझाव दिया कि जिन प्रक्रियाओं में अथॉरिटी की यह राय हो कि उसमें पब्लिक पॉलिसी का उल्लंघन शामिल हो सकता है, वहां केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया जाना चाहिए। अगर अथॉरिटी नोटिस जारी नहीं करती तो केंद्र सरकार के पास उसे सीधे लागू करने का अधिकार हो सकता है।

 

 

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