सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में रिक्त पदों को भरने में असामान्य विलंब

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश 

  • कार्मिक, लोक शिकायत तथा विधि एवं न्याय पर गठित स्टैंडिंग कमिटी ने 6 दिसंबर, 2016 को ‘सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में रिक्त पदों को भरने में असामान्य विलंब’ पर अपनी रिपोर्ट सौंपी।
     
  • नियुक्तियों में कार्यकारिणी की भूमिका : न्यायिक नियुक्तियां कार्यकारिणी और न्यायपालिका का संयुक्त दायित्व हैं, और उनमें से कोई भी निकाय एक दूसरे से श्रेष्ठ नहीं है। संविधान में प्रावधान है कि राष्ट्रपति द्वारा न्यायपालिका की ‘सहमति’ नहीं, ‘परामर्श’ से नियुक्तियां की जाएंगी। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संविधान की वर्तमान व्याख्या, जिसमें न्यायपालिका की सहमति की अपेक्षा की जाती है, को पूर्णतया बदला जा सकता है।
     
  • मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (एमओपी) को अंतिम रूप देना : एमओपी को अंतिम रूप देने के संबंध में कार्यकारिणी और न्यायपालिका के बीच सहमति न होने के कारण उच्च न्यायालयों में रिक्त पदों को भरने में विलंब हुआ है। एमओपी को अंतिम रूप दिया जाना चाहिए और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की जल्द से जल्द समीक्षा की जानी चाहिए। संशोधित एमओपी में तीन अनिवार्य शर्तें शामिल होनी चाहिए: पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और वस्तुनिष्ठता। इसमें अधीनस्थ न्यायालयों से उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया को भी शामिल किया जाना चाहिए। इस दौरान न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया को मौजूदा व्यवस्था के अनुसार जारी रहना चाहिए जिससे न्यायालयों के कार्य संचालन पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
     
  • रिक्त पदों को भरने की समयावधि का अनुपालन : न्यायपालिका और कार्यकारिणी द्वारा सेकेंड जजेज केस और एमओपी में तय की गई समयावधि का अनुपालन नहीं किया जाता है। इससे परिणामस्वरूप रिक्त पदों को भरने में असामान्य विलंब हुआ है। साथ ही साथ, हालांकि मौजूदा एमओपी में उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए समयावधि दी गई है, लेकिन उसमें सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के लिए उसी के समान समायवधि नहीं प्रदान की गई है।
     
  • एमओपी में सभी उच्च न्यायालयों में नियुक्तियों की समयावधि स्पष्ट होनी चाहिए और सभी संवैधानिक प्राधिकारियों को उसका अनुपालन करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जब कोई न्यायाधीश सेवानिवृत्त होता है, तो उसी के समानांतर नई नियुक्ति की जानी चाहिए।
     
  • नियुक्तियों में पारदर्शिता : उच्च न्यायालयो में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित विभिन्न पहलुओं को सार्वजनिक किया जाना चाहिए, जैसे : (i) योग्यता के मानदंड, (ii) चयन का तरीका और संबंधित मानदंड, (iii) मेरिट के मूल्यांकन का तरीका, (iv) विचार के लिए योग्य उम्मीदवार, और (v) रिक्तियों की संख्या। हालांकि नामों की अंतिम सूची को तब तक गोपनीय रखा जा सकता है, जब तक कि यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती।
     
  • जिस उम्मीदवार का नाम कॉलेजियम (सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठ न्यायाधीश की सदस्यता वाले) या सरकार द्वारा नामंजूर कर दिया गया हो, उसे कारण सहित इसकी सूचना दी जानी चाहिए। अगर कारण नहीं बताया जाएगा तो यह प्राकृतिक न्याय (नेचुरल जस्टिस) के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा।
     
  • नामों की सूची तय करना : न्यायालय के सभी न्यायाधीशों और बार एसोसिएशन की सलाह से उम्मीदवारों की सूची बनाई जानी चाहिए। इन सभी नामों को उच्च न्यायालय के कॉलेजियम के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए जोकि सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम और सरकार को नामों की अंतिम सूची सौंपेगा। न्यायालयों की रजिस्ट्री की एक इकाई न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए योग्य व्यक्तियों से संबंधित कंप्यूटरीकृत डेटाबेस का रखरखाव कर सकती है।
     
  • राष्ट्रीय सुरक्षा और जनहित : सरकार ने ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ और ‘व्यापक जनहित’ के आधार पर कॉलेजियम के नियुक्तियों के सुझावों को रद्द करने का प्रस्ताव रखा है। संशोधित एमओपी में इन पारिभाषिक शब्दों को नियुक्तियों के मानदंडों के रूप में भी प्रस्तावित किया गया है। अगर सरकार इन आधारों पर किसी उम्मीदवार के नाम को नामंजूर करती है तो यह उसे वीटो की शक्ति देने के समान होगा जोकि संवैधानिक अधिदेश के विपरीत होगा। इसलिए उनके दायरे में आने वाले ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ और ‘व्यापक जनहित’ जैसे पारिभाषिक शब्दों को स्पष्ट किया जाना चाहिए।
     
  • संवैधानिक खंडपीठों का संघटन : 1950 से सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या 7 से बढ़ाकर 15 कर दी गई है। इसलिए कम से कम 11 न्यायाधीशों को संवैधानिक संशोधनों की वैधता से जुड़े मामलों की सुनवाई करनी चाहिए। संविधान की व्याख्या से जुड़े मामलों की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय के कम से कम सात न्यायाधीशों की खंडपीठ द्वारा की जानी चाहिए।
     
  • लंबित मामलों के लिए तदर्थ न्यायाधीश : उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों द्वारा तदर्थ न्यायाधीशों के रूप में सेवानिवृत्त न्यायधीशों की नियुक्ति की जा सकती है ताकि लंबित मामलों की बढ़ती संख्या की समस्या से निपटा जा सके। ऐसी नियुक्तियां न्यायालयों की स्वीकृत क्षमता के अतिरिक्त होनी चाहिए।
     
  • सेवानिवृत्ति की आयु में वृद्धि : सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाकर 67 वर्ष और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की आयु 65 वर्ष की जा सकती है। यह जीवन प्रत्याशा (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) में वृद्धि पर आधारित है और अंतरराष्ट्रीय पद्धति के अनुरूप है।
     
  • न्यूनतम कार्यकाल : उच्च न्यायालयों के अधिकतर मुख्य न्यायाधीशों का कार्यकाल बहुत छोटा, लगभग एक वर्ष होता है। विधि विभाग उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों का न्यूनतम कार्यकाल निर्धारित कर सकता है।

 

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