विभिन्न उद्योगों में जल के वाणिज्यिक दोहन का सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश 

  • जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: राजीव प्रताप रूडी) ने 9 अगस्त, 2018 को ‘विभिन्न उद्योगों में जल के वाणिज्यिक दोहन का सामाजिक-आर्थिक प्रभाव’ पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:
     
  • बोतलबंद (पैकेज्ड) पेयजल उद्योग द्वारा भूजल का दोहन: भूजल की कुल वार्षिक उपलब्धता का 6% हिस्सा (25 बिलियन क्यूबिक मीटर) घरेलू, पेयजल और औद्योगिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसमें से बोतलबंद पेयजल इकाइयां/प्लांट्स एक साल में 0.1% (13.3 मिलियन क्यूबिक मीटर) पानी निकालती हैं। केंद्रीय भूजल प्राधिकरण इन इकाइयों और प्लांट्स को भूजल निकालने की अनुमति देता है, पर उन्हें जल पुनर्भरण (रीचार्ज) की बाध्यताओं को पूरा करना होता है। कमिटी ने कहा कि ऐसे राज्यों में बड़ी संख्या में लाइसेंस दिए गए जहां पहले से ही ओवर-एक्सप्लॉटेड भूजल इकाइयां हैं (ऐसे क्षेत्र जहां भूजल निकासी प्रतिबंधित है)। तमिलनाडु की 374 इकाइयां और उत्तर प्रदेश की 111 इकाइयां क्रमशः 895 क्यूबिक मीटर प्रति दिन और 941 क्यूबिक मीटर प्रति दिन पानी निकालती हैं।
     
  • भूजल पर अति निर्भरता: कमिटी के अनुसार, जल संसाधन मंत्रालय ने इस बात का आकलन नहीं किया कि बोतलबंद पेयजल उद्योग भूजल का कितना उपयोग कर रहा है और देश के भूजल स्तर पर उसका कितना असर हो रहा है। इन उद्योगों के अतिरिक्त ग्रामीण क्षेत्रों की 85% पेयजल योजनाएं भूजल पर निर्भर हैं। 27% शहरी परिवार अपनी पानी संबंधी जरूरतों को भूजल से पूरा करते हैं। यह देखा गया है कि आम लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के सरकार के प्रयासों में बोतलबंद पेयजल इकाइयां सहयोग करती हैं।
     
  • हालांकि यह कहा गया कि मांग और आपूर्ति के बीच के अंतर को मुख्य रूप से सरकार द्वारा कम किया जाना चाहिए। इसका कारण यह बताया गया कि उपभोग के लिए जल उपलब्ध कराना सरकार की सामाजिक जिम्मेदारी है और उद्योग जगत को इस क्षेत्र के दोहन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। कमिटी ने सुझाव दिया कि बोतलबंद पेयजल उद्योग को सार्वजनिक निजी भागीदारी के आधार पर लगाया जाना चाहिए ताकि पानी के उचित उपयोग तथा मूल्य संवर्धित तरीके से सुरक्षित पानी की व्यवस्था कराने में सरकार की भूमिका सुनिश्चित हो।
     
  • भूजल के स्वामित्व की स्थिति: कमिटी ने कहा कि निजी स्वामित्व के कारण भूजल बोतलबंद पेयजल उद्योग की जरूरतों को पूरा करने वाला बड़ा स्रोत बन गया है। उसने सुझाव दिया कि भारतीय सुखाधिकार (ईज़मेंट) एक्ट, 1882 को पानी की मौजूदा और भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए संशोधित किया जाए। यह एक्ट भूजल निकासी का अधिकार प्रदान करता है।
     
  • बोतलबंद पेयजल उद्योगों की लाइसेंसिंग के मानदंड: भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) सभी बोतलबंद पेयजल प्लांट्स को कुछ मानदंडों के आधार पर लाइसेंस देता है। हालांकि एफएसएसएआई जल स्रोत की जांच नहीं करता, जिसका उपयोग प्लांट द्वारा किया जाएगा। कमिटी ने सुझाव दिया कि अगर जल स्रोतों को लाइसेंस जारी करने का अतिरिक्त मानदंड बनाया जाए तो इन उद्योगों द्वारा भूजल के अत्यधिक उपयोग की जांच करना संभव होगा। इससे यह भी सुनिश्चित होगा कि नए उद्योग मुख्य रूप से सतही जल स्रोतों पर निर्भर हैं और भूजल का इस्तेमाल केवल उन्हीं क्षेत्रों में किया जा रहा है, जहां उसकी आपूर्ति बहुतायत में है।
     
  • बोतलबंद पेयजल उद्योगों से टैक्स की वसूली: कमिटी ने कहा कि अब तक भूजल के उपयोग पर कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। यह विचार रखा गया कि हालांकि जल मुफ्त में उपलब्ध होना चाहिए लेकिन उसके वाणिज्यिक उपयोग पर उचित शुल्क लगाया जाना चाहिए। यह सुझाव दिया गया कि भूजल पर अधिक टैक्स लगाने से उद्योगों द्वारा उसका अंधाधुंध उपयोग रुकेगा। उसने उद्योगों द्वारा पानी की बर्बादी को रोकने के लिए जल (प्रदूषण का निवारण एवं नियंत्रण) सेस एक्ट, 1977 में संशोधन का सुझाव दिया।
     
  • बोतलबंद पेयजल की कीमत: कमिटी ने कहा कि बोतलबंद पेयजल उद्योग की आय और लाभ का कोई आकलन नहीं किया गया। उसने सुझाव दिया कि जल संसाधन मंत्रालय को वित्त तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालयों के साथ मिलकर यह काम करना चाहिए। इससे बोतलबंद पेयजल का उपयुक्त मूल्य निर्धारण करने वाली नीति को बनाने में मदद मिलेगी।
     
  • पानी के वाणिज्यिक उपयोग पर राष्ट्रीय नीति: अब तक पानी के वाणिज्यिक उपयोग के संबंध में कोई विशेष नीति नहीं बनाई गई है। राष्ट्रीय जल नीति, 2012 में भी पानी के वाणिज्यिक उपयोग को रेगुलेट करने से संबंधित विशेष प्रावधान नहीं हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि पानी के वाणिज्यिक उपयोग को रेगुलेट करने के लिए एक सुदृढ़ राष्ट्रीय नीति बनाई जानी चाहिए। उसमें पानी के स्रोतों और उसके उपयोग की मात्रा, उपयुक्त मूल्य निर्धारण, पानी के उपयोग से होने वाले वाणिज्यिक लाभ पर टैक्सेशन, और उद्योगों की सामाजिक एवं पर्यावरणीय बाध्यता जैसे पहलु शामिल होने चाहिए।

 

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