वित्तीय समावेश के लिए राष्ट्रीय कार्यनीति

रिपोर्ट का सारांश

  • भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 10 जनवरी, 2020 को वित्तीय समावेश के लिए राष्ट्रीय कार्यनीति 2019-24 जारी की। रिपोर्ट भारत में वित्तीय समावेश की नीतियों के दृष्टिकोण और लक्ष्यों को निर्धारित करती है। इस कार्यनीति को आरबीआई ने केंद्र सरकार और वित्तीय क्षेत्र के रेगुलेटरों (सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया, इंश्योरेंस रेगुलेटर एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया और पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया) के इनपुट्स से तैयार किया है।
     
  • रिपोर्ट वित्तीय समावेश को ऐसी प्रक्रिया के रूप में परिभाषित करती है जोकि वित्तीय सेवाओं की उपलब्धता और सस्ती दरों पर कमजोर तथा निम्न आय वर्ग वाले समूहों को यथा समय एवं पर्याप्त ऋण सुनिश्चित करे। समूचे आर्थिक उत्पादन को बढ़ावा देने, गरीबी और आय असमानता को कम करने और लिंग समानता एवं महिला सशक्तीकरण को बढ़ाने में वित्तीय समावेश का बहुत असर होता है।
     
  • अन्य देशों से प्रेरणा: आरबीआई ने कहा कि 2018 के मध्य में 35 से अधिक देशों में राष्ट्रीय वित्तीय समावेश कार्यनीति मौजूद थी। इनमें चीन, ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हैं। इन देशों में कुछ समान थीम्स में निम्नलिखित शामिल हैं: (iलक्ष्य आधारित दृष्टिकोण का पालन (विशिष्ट क्षेत्रों को लक्षित करते हुए), (iiभुगतान प्रणाली के लिए अपेक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूती देना, (iiiमजबूत रेगुलेटरी फ्रेमवर्क, (ivलास्ट मिनट कनेक्टिविटी और वित्तीय साक्षरता पर जोर, (vइनोवेशन और तकनीक का इस्तेमाल, और (viवित्तीय समावेश की दिशा में हुई प्रगति का समय-समय पर निरीक्षण और मूल्यांकन।
     
  • वित्तीय समावेश हेतु उठाए गए कदमआरबीआई ने कहा कि देश में वित्तीय समावेश के लिए कई कदम उठाए गए हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (iप्रधानमंत्री जन धन योजना (पीएमजेडीवाई), जिसके अंतर्गत 89,257 करोड़ रुपए की जमा से 34 करोड़ खाते खोले गए हैं (जनवरी, 2019 तक), (ii) दुर्घटना में मृत्यु या विकलांगता कवर देने के लिए प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना और सबस्क्राइबिंग बैंक एकाउंट होल्डर्स को पेंशन कवर देने के लिए अटल पेंशन योजना जैसी योजनाएं। 
     
  • इसके अतिरिक्त यह कहा कि आरबीआई ने भिन्न बैंकिंग लाइसेंस जारी करके वित्तीय समावेश का मॉडल अपनाया है और सितंबर 2018 में भारतीय पोस्ट पेमेंट बैंक शुरू किया गया है। इन दोनों उपायों से लास्ट माइल कनेक्टिविटी के अंतराल को भरने में मदद मिली है। हालांकि कुछ महत्वपूर्ण अंतराल वित्तीय समावेश के लिए बाधक बने रहेंगे, जैसे (iअपर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर (ग्रामीण इलाकों के कुछ हिस्सों, हिमालय और पूर्वोत्तर के सुदूर क्षेत्रों में), (ii) ग्रामीण इलाकों में टेली और इंटरनेट कनेक्टिविटी की खराब स्थिति, (iii) सामाजिक-सांस्कृतिक बाधक, और (ivपेमेंट प्रॉडक्ट स्पेस में मार्केट प्लेयर्स की कमी।
     
  • वित्तीय समावेश के रणनीतिक उद्देश्यआरबीआई ने वित्तीय समावेश की राष्ट्रीय कार्यनीति के छह रणनीतिक उद्देश्यों को चिन्हित किया: (iवित्तीय सेवाओं तक सार्वभौमिक पहुंच, (iiवित्तीय सेवाओं का बेसिक बुके प्रदान करना, (iiiजीविकोपार्जन और दक्षता विकास तक पहुंच, (iv) वित्तीय साक्षरता और शिक्षा, (v) ग्राहक संरक्षण और शिकायत निवारण, और (vi) प्रभावशाली समन्वय। इस दृष्टिकोण को हासिल करने के लिए उसने कई माइलस्टोन्स चिन्हित किए जैसे: (क) 2020 तक पांच किलोमीटर के दायरे में आने वाले प्रत्येक गांव (या पहाड़ी क्षेत्रों में 500 गांवों वाला पुरवा या हैमलेट) को बैंकिंग की सुविधा प्रदान करना, (ख) डिजिटल वित्तीय सेवाओं को मजबूत करना ताकि मार्च 2022 तक कैशलेस सोसायटी बनाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा सके, और (ग) यह सुनिश्चित करना कि मार्च 2024 तक मोबाइल डिवाइस के जरिए प्रत्येक वयस्क को वित्तीय सेवा प्रदाता उपलब्ध हो जाए।  
     
  • वित्तीय सेवाओं तक सार्वभौमिक पहुंच के संबंध में आरबीआई ने कहा कि पीएमजेडीवाई जैसी योजनाओं ने वित्तीय समावेश हेतु अपेक्षित बैंकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया। अब बीमा और पेंशन सेवाओं तक पहुंच में सुधार करने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। उसने सुझाव दिया कि पीएमजेडीवाई के अंतर्गत नामांकन करने वाले प्रत्येक इच्छुक और पात्र वयस्क को मार्च 2020 तक बीमा या पेंशन योजना के अंतर्गत नामांकन करना चाहिए। इसी प्रकार वित्तीय साक्षरता और शिक्षा के लिए लक्षित समूहों (बच्चों, उद्यमियों, वरिष्ठ नागरिकों) के लिए विशेष मॉड्यूल्स को राष्ट्रीय वित्तीय समावेश केंद्र के जरिए विकसित किया जाना चाहिए और वित्तीय साक्षरता केंद्रों को विस्तृत बनाया जाना चाहिए ताकि मार्च, 2024 तक वह देश के प्रत्येक ब्लॉक में उपलब्ध हो।
     
  • वित्तीय समावेश का मापदंड: आरबीआई ने सुझाव दिया कि वित्तीय समावेश को तीन मुख्य संकेतकों के आधार पर मापा जाना चाहिए। इनमें निम्नलिखित के मापदंड शामिल हैं: (i) उपलब्धता को मापना, जैसे आबादी विशेष के लिए बैंक की शाखाओं या एटीएम की संख्या, (ii) उपयोग को मापना, जैसे बचत खाते, बीमा या पेंशन पॉलिसी वाले वयस्कों का प्रतिशत, और (iii) सेवाओं की गुणवत्ता को मापना, जैसे शिकायत निवारण (प्राप्त होने और निपटाई जाने वाली शिकायतों की संख्या के जरिए)। इसके अतिरिक्त उसने वित्तीय समावेश के मौजूदा अवरोधों का मूल्यांकन करने के लिए सर्वे करने का सुझाव दिया (जैसे डिजिटल सेवाओं के इस्तेमाल के दौरान आने वाली समस्याएं, उपभोक्ता अधिकारों की जानकारी और सेवा प्रदाता का रवैया)।

 

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