लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ कराने पर ड्राफ्ट रिपोर्ट

लॉ कमीशन की रिपोर्ट का सारांश

  • भारतीय लॉ कमीशन (चेयर: जस्टिस बी.एस.चौहान) ने 30 अगस्त, 2018 को लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ कराने पर अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट में चुनाव एक साथ कराने से संबंधित कानूनी एवं संवैधानिक पहलुओं की जांच की गई है। ड्राफ्ट के मुख्य सुझाव निम्नलिखित हैं:
     
  • चुनाव एक साथ कराना: कमीशन ने कहा कि संविधान की मौजूदा संरचना के अंतर्गत लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ नहीं कराए जा सकते। ऐसा करने के लिए जनप्रतिनिधित्व एक्ट, 1951 और लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के कार्य संचालन नियमों (रूल्स ऑफ प्रोसीजर्स) में उपयुक्त संशोधन करना पड़ सकता है। कमीशन ने यह सुझाव भी दिया कि कम से कम 50% राज्यों को संवैधानिक संशोधनों को मंजूर करना होगा।
     
  • कमिटी ने कहा कि चुनाव एक साथ कराने से निम्नलिखित होगा: (i) सरकारी धन बचेगा, (ii) प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा बलों पर दबाव कम होगा, (iii) सरकारी नीतियों का यथा समय कार्यान्वयन सुनिश्चित होगा, और (iv) यह सुनिश्चित होगा कि प्रशासनिक मशीनरी चुनाव संबंधी गतिविधियों की बजाय विकास के कामों में लगी है।
     
  • चुनावों के सिंक्रोनाइजेशन के लिए फ्रेमवर्क: कमीशन ने भारत में चुनावों के सिंक्रोनाइजेशन यानी समकालीनता के लिए तीन विकल्प सुझाए।
     
  • विकल्प 1: कमीशन ने कुछ राज्यों में चुनाव के समय को आगे बढ़ाने या पोस्टपोन करने का सुझाव दिया जिससे सभी राज्य विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव एक साथ 2019 में कराए जा सकें। उसने सुझाव दिया कि 2019 में लोकसभा चुनावों के साथ-साथ पांच राज्यों (आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, ओड़िशा, सिक्किम और तेलंगाना) में चुनाव होने निश्चित हैं। कमीशन ने अन्य राज्य विधानसभाओं के चुनावों के समय में निम्नलिखित बदलाव करने का सुझाव दिया:
     
  • लोकसभा चुनावों से पहले विधानसभा चुनाव: चार राज्यों (छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मिजोरम और राजस्थान) में चुनाव 2018 के अंत में और जनवरी 2019 में होने निश्चित हैं। लोकसभा चुनावों के साथ सिंक्रोनाइज करने के लिए संविधान में संशोधन करके इन विधानसभाओं के कार्यकाल को बढ़ाया जा सकता है।
     
  • लोकसभा चुनावों के तत्काल बाद निश्चित विधानसभा चुनाव: अगर राजनैतिक सर्वसम्मति हो तो चार विधानसभाओं (हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र और दिल्ली) के चुनाव लोकसभा चुनावों के साथ कराए जा सकते हैं। इसके लिए राज्य स्वेच्छा से अपनी विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर सकते हैं या ऐसा कानून के जरिए किया जा सकता है।
     
  • शेष राज्यों में विधानसभा चुनाव: शेष 16 राज्यों और पुद्दुचेरी में चुनाव 2021 के अंत तक कराए जा सकते हैं। इन विधानसभाओं का कार्यकाल 30 महीने हो सकता है या जून 2024 तक (जो भी पहले हो)। इसके लिए संवैधानिक संशोधन की जरूरत होगी, चूंकि विभिन्न विधानसभाओं का कार्यकाल या तो कम करना होगा या उसे बढ़ाना होगा।
     
  • इसलिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव 2024 में एक साथ कराए जा सकते हैं।
     
  • विकल्प 2: अगर राज्य विधानसभा चुनाव 2019 और 2021 में होते हैं, जैसा कि ऊपर कहा गया है, तो चुनाव पांच सालों में सिर्फ दो बार कराने की जरूरत होगी।
     
  • विकल्प 3: अगर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ नहीं कराए जा सकते, तो कमीशन ने सुझाव दिया कि किसी कैलेंडर वर्ष में होने वाले सभी चुनावों को एक साथ कराया जा सकता है। इन चुनावों का समय सभी संबंधित राज्य विधानसभाओं और लोकसभा (अगर वह पहले भंग हो जाती है) के अनुकूल होना चाहिए। इस विकल्प के लिए भी संविधान और जनप्रतिनिधित्व एक्ट, 1951 में संशोधन करने की जरूरत होगी।
     
  • अविश्वास प्रस्ताव: कमीशन ने कहा कि अगर किन्हीं परिस्थितियों में अविश्वास प्रस्ताव पास हो जाता है तो लोकसभा/राज्य विधानसभा का कार्यकाल कम हो जाएगा। उसनेअविश्वास प्रस्ताव के स्थान पर अविश्वास का रचनात्मक मत लाने का सुझाव दिया जिसके लिए उपयुक्त संशोधन करने होंगे। अविश्वास के रचनात्मक मत में सरकार को केवल तभी हटाया जा सकता है, जब किसी दूसरी सरकार पर विश्वास हो। कमीशन ने सदन/विधानसभा के कार्यकाल के दौरान ऐसे प्रस्तावों की संख्या सीमित करने का भी सुझाव दिया।
     
  • त्रिशंकु सदन/विधानसभा: अगर किसी राजनीतिक दल को सरकार बनाने के लिए बहुमत नहीं मिलता तो त्रिशंकु सदन/विधानसभा की स्थिति बन सकती है। ऐसा न हो, इसके लिए कमीशन ने सुझाव दिया कि राष्ट्रपति/राज्यपाल को सबसे बड़े राजनीतिक दल को अपने चुनाव पूर्व या पश्चात गठबंधन के साथ सरकार बनाने का अवसर देना चाहिए। अगर तब भी सरकार नहीं बनती तो इस गतिरोध को समाप्त करने के लिए सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाई जा सकती है। अगर यह बैठक सफल नहीं होती तो मध्यावधि चुनाव कराए जा सकते हैं। कमीशन ने सुझाव दिया कि मध्यावधि चुनाव के बाद बनी नई लोकसभा/विधानसभा को केवल शेष कार्यकाल के लिए गठित किया जाना चाहिए, न कि पूरे पांच वर्षों के लिए। इसके लिए उपयुक्त संशोधन किए जाने चाहिए।
     
  • दल बदल विरोधी कानून में संशोधन: कमीशन के अनुसार दल बदल विरोधी कानून में उपयुक्त संशोधन किए जाएं ताकि यह सुनिश्चित हो कि छह महीने के अंदर पीठासीन अधिकारी द्वारा अयोग्यता से संबंधित सभी मुद्दों (दल बदल के कारण उत्पन्न) पर फैसला ले लिया जाए।

 

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