राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा का कार्यान्वयन एक्ट, 2013

कैग रिपोर्ट का सारांश

  • भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने 29 अप्रैल, 2016 को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एक्ट (एनएफएसए) के कार्यान्वयन की तैयारी पर एक रिपोर्ट सौंपी। इस ऑडिट का उद्देश्य यह आकलन करना था कि क्या राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने: (i) पात्र परिवारों की पहचान की है और लाभार्थियों को राशन कार्ड जारी किया है, (ii) एक्ट को लागू करने के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा तैयार किया है, (iii) मौजूदा लक्षित सार्वजनिक वितरण योजना (टीपीडीएस) के संबंध में सुधार करना शुरू किया है और (iv) एक कारगर शिकायत निवारण प्रणाली और निगरानी तंत्र की स्थापना की है। इस ऑडिट रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्षों में शामिल हैः
     
  • पात्र लाभार्थियों की पहचान: यह देखा गया कि वर्ष 2013 में एनएफएसए के अधिनियमित होने के बाद से मार्च 2015 तक 18 राज्यों/ केंद्र शासित प्रदेशों ने इसे लागू किया है। देश में केवल 51% लाभार्थियों की पहचान की गई है। एनएफएसए में कहा गया है कि संबंधित राज्यों को एक्ट के तहत प्राथमिक परिवारों की पहचान करने के लिए दिशा-निर्देशों को अधिसूचित करना होगा। हालांकि, कैग ने पाया कि छत्तीसगढ़, दिल्ली और झारखंड को छोड़कर बाकी के राज्यों ने लाभार्थियों की पहचान के लिए नए सिरे से कार्रवाई करने की बजाय एनएफएसए के अनुपालन के लिए पुराने राशन कार्डों (टीपीडीएस के तहत) पर फिर से स्टैम्प लगा दिए। अधिकतर राज्य एक्ट के इस प्रावधान का पालन करने में विफल रहे जिसमें यह निर्देश है कि परिवार में 18 वर्ष से अधिक उम्र की महिला के नाम से राशन कार्ड बनाए जाएं।
     
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का कार्यान्वयन: एनएफएसए राज्यों को कार्यान्वयन का काम पूरा करने के लिए एक वर्ष की समय सीमा दी गई है। केवल 11 राज्यों ने इस समय सीमा के भीतर लाभार्थियों की पहचान का काम पूरा किया है। मंत्रालय ने इस समय सीमा को तीन बार बढ़ाया है, जिसकी आखिरी समय सीमा सितंबर, 2015 थी। इसके बाद 7 राज्यों ने अक्टूबर 2015 तक लाभार्थियों को चिन्हित कर लिया।
     
  • बुनियादी ढांचा और लॉजिस्टिकः एनएफएसए के तहत राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में खाद्यान्न के स्टोरेज और मूवमेंट के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचे का अभाव पाया गया। कैग ने उल्लेख किया है कि देश में 95% खाद्यान्न रेलवे द्वारा पहुंचाया जाता है। एनएफएसए को लागू करने के बाद राज्यों में बड़ी मात्रा में खाद्यान्न पहुंचने की संभावना है जिससे इस बात का संकेत भी मिलता है कि खाद्यान्न के परिवहन के लिए अधिक रेक्स (फ्रेट वैगन का समूह) की जरूरत होगी। कैग ने कहा है कि इसके लिए 20% अधिक रेक्स की जरूरत होगी। हालांकि यह देखा गया है कि वर्ष 2010-11 से वर्ष 2014-15 के बीच रेक्स की उपलब्धता जरूरत की अपेक्षा कम हुई है (13% से 18% की कमी)।
     
  • भंडारण क्षमता के संबंध में, यह पाया गया कि राज्यों में उपलब्ध क्षमता, खाद्यान्न की आवंटित मात्रा की अपेक्षा अपर्याप्त थी। अक्टूबर 2015 में महाराष्ट्र में निर्माण के लिए मंजूर 233 गोदामों में से केवल 93 बने थे। असम में हालांकि भंडारण क्षमता राज्य के आवंटन के लिए पर्याप्त थी, लेकिन गोदाम में बहुत नमी थी जोकि भंडारण के लिए अच्छी नहीं थी। झारखंड में भी गोदामों की हालत अच्छी नहीं थी। ये गोदाम या तो बहुत दूरस्थ इलाके में थे या क्षतिगस्त हालत में थे।
     
  • खाद्यान्न की डोर स्टेप डिलिवरीः एक्ट में कहा गया है कि खाद्यान्न को राज्य डिपो से उचित मूल्य की दुकानों (एफपीएस) और लाभार्थियों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। यह देखा गया कि केवल बिहार और दिल्ली में डोर स्टेप डिलिवरी की जा रही है। महाराष्ट्र में केवल आदिवासी और सूखा प्रभावित क्षेत्रों में खाद्यान्न की डोर स्टेप डिलिवरी हो रही है, दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में ठेकेदारों के जरिये कुछ जिलों (75 में से 15) में डोर स्टेप डिलिवरी की जा रही है।
     
  • शिकायत निवारण और निगरानी तंत्र: एनएफएसए कहता है कि प्रत्येक राज्य में (i) शिकायत निवारण तंत्र, (ii) जिला शिकायत निवारण अधिकारी (डीजीआरओ), (iii) राज्य खाद्य आयोग और (iv) राज्य, जिला, ब्लॉक स्तर और उचित मूल्य की दुकानों के स्तर पर सतर्कता समितियां होनी चाहिए जिससे एक्ट के कार्यान्वयन की निगरानी की जा सके।
     
  • मार्च 2015 तक, कैग द्वारा चुने गए सभी नौ राज्यों ने एक टोल फ्री नंबर के रूप में आंतरिक शिकायत प्रणाली की शुरुआत की। निगरानी के लिए ​​नौ में से छह राज्यों में राज्य स्तरीय सतर्कता समितियों का गठन किया गया। हालांकि अधिकतर जिलों में इनका गठन नहीं किया गया। इसके अतिरिक्त राज्य सरकारों ने या तो अधिनियम के संबंध में कोई निरीक्षण कार्य किया ही नहीं या उनके द्वारा किया गया निरीक्षण कार्य अधिनियम की अपेक्षित संख्या (हर छह महीने में कम से कम एक बार) से बहुत कम रहा।

यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।