मुख्य बंदरगाहों पर कार्गो हैंडलिंग

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • परिवहन, पर्यटन और संस्कृति संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: डेरेक ओब्रायन) ने 21 दिसंबर, 2018 को मुख्य बंदरगाहों पर कार्गो हैंडलिंग पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:
     
  • कंटेनर ट्रैफिक: कमिटी ने सुझाव दिया कि तटीय बंदरगाहों की परिवहन क्षमता में प्रस्तावित वृद्धि को देखते हुए मौजूदा और नए बंदरगाहों को अपनी क्षमता को बढ़ाना चाहिए। तटीय परिवहन को बढ़ाने के लिए बंदरगाहों पर डेडिकेटेड बर्थ के प्रावधान पर विचार किया जाना चाहिए।
     
  • ड्राफ्ट की सीमाएं: पानी की सतह और जहाज के सबसे निचले बिंदु के बीच की वर्टिकल दूरी जहाज या नाव का ड्राफ्ट कहलाती है। कमिटी ने कहा कि भारतीय बंदरगाहों के ड्राफ्ट अपेक्षाकृत निचले हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर े निचले बिंदु के बीच का अंतर होता है। कमिटी ने कहा कि भारतीय बंदरगाहों के ड्राफ्ट अपेक्षाकृत निचले हैं और अंतरराष्निर्धारित मानदंडों से मेल नहीं खाते। भारत के अधिकतर मुख्य बंदरगाहों के न्यूनतम ड्रफ्ट 12 मीटर से कम हैं, सिवाय कुछ नए बंदरगाहों के, जिनके ड्राफ्ट 14 मीटर से अधिक के हैं। 1,000 टीईयू (20 फुट इक्विलेंट यूनिट जोकि जहाज की मालवहन क्षमता का माप है) के कंटेनरशिप के मामले में, औसत ड्राफ्ट 8.3 मीटर होता है। 11,000 टीईयू क्षमता से अधिक के जहाजों के लिए औसत ड्राफ्ट 15.5 मीटर होता है। कमिटी ने कहा कि भारतीय बंदरगाहों का ड्राफ्ट अपर्याप्त होने से लागत और समय, दोनों ज्यादा लगते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारतीय बंदरगाहों से जाने और वहां आने वाला कार्गो कोलंबो और सिंगापुर जैसे ट्रांसशिपमेंट बंदरगाहों से होकर आता-जाता है। कमिटी ने सुझाव दिया कि भारतीय बंदरगाहों के ड्राफ्ट अधिक गहराई वाले होने चाहिए, चूंकि जहाज बड़े हो रहे हैं। इसके लिए कैपिटल ड्रेजिंग में अधिक निवेश की जरूरत होगी।
     
  • टैरिफ रेगुलेशंस की भूमिका: कमिटी ने कहा कि भारत में पोर्ट सेक्टर को अनेक प्रकार की व्यवस्थाओं के कारण टैरिफ संबंधी अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ रहा है। मुख्य बंदरगाहों के अतिरिक्त दूसरे बंदरगाहों पर टैरिफ रेगुलेटेड नहीं, और उनकी सेवाओं के मूल्य बाजार और प्रतिस्पर्धा पर आधारित होते हैं। हालांकि मुख्य बंदरगाह (निजी टर्मिनल सहित) टैरिफ अथॉरिटी फॉर मेजर पोर्ट्स (टैम्प) जैसे रेगुलेटर के क्षेत्राधिकार में आते हैं। इससे मुख्य बंदरगाहों को लेवल प्लेइंग फील्ड (सभी को सफल होने के लिए निष्पक्ष और एक समान मौका) नहीं मिल पाता। मुख्य बंदरगाहों को टैरिफ संबंधी अनिश्चितताओं, जोकि टैम्प द्वारा निर्धारित होती हैं, के कारण कारोबारी मौके नहीं मिलते। कमिटी ने सुझाव दिया कि टैम्प के नियमों में विसंगतियों को दूर किया जाए जिससे जहाज निजी बंदरगाहों के बजाय मुख्य बंदरगाहों का इस्तेमाल करें। इसके अतिरिक्त टैम्प की भूमिका को नए सिरे से तय किया जाए और टैरिफ की रणनीतिक और मार्केट ओरिएंटेड प्रणाली तैयार की जाए।
     
  • बंदरगाहों का कुशल कामकाज: कमिटी ने कहा कि भारतीय बंदरगाहों पर उत्पादकता कम है और शिप टर्नअराउंड टाइम बहुत अधिक लगता है। इसके निम्नलिखित कारण हैं: (i) मशीनीकरण का स्तर निम्न है और ड्राफ्ट पर्याप्त नहीं हैं, (ii) विभिन्न प्रकार के कार्गो की हैंडलिंग क्षमता विषम है, और (iii) समुद्र क्षेत्र से कनेक्टिविटी के लिए पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। इससे व्यापार की लागत बढ़ती है और भारतीय बंदरगाह कम प्रतिस्पर्धात्मक बनते हैं। अधिकतर मुख्य बंदरगाहों पर अधिक टर्नअराउंट टाइम लगता है, उनकी उपयोगिता का स्तर निम्न है और बहुत ही कम बंदरगाहों में केप-साइज जहाजों (बड़े आकार के बल्क करियर) को हैंडिल करने की क्षमता है।
     
  • इसकी तुलना में कम बड़े बंदरगाह (जिनका रेगुलेशन टैम्प नहीं करती) ज्यादा अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसे बंदरगाह टर्नअराउंड को कम करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर में भी निवेश कर रहे हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि भारत को व्यापार बढ़ाने के लिए अपने मुख्य बंदरगाहों पर केप हैंडलिंग क्षमता को विकसित करना चाहिए।
     
  • नए कंटेनर टर्मिनल: कमिटी ने कहा कि अधिक बंदरगाहों का अर्थ यह नहीं कि अधिक कार्गो भी आएगा। किसी देश का व्यापार उसकी नीतियों का मूर्त रूप तथा अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य के प्रति उसके खुलेपन का सबूत होता है। बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए बंदरगाह की क्षमता को बढ़ाना ही एक मूल्य संवर्धित तरीका है। कमिटी ने सुझाव दिया कि बंदरगाह की क्षमता बढ़ाने के लिए सरकारी निवेश जरूरी है, साथ ही यह भी सावधानी से सोचा जाना चाहिए कि मुख्य और दूसरे बंदरगाहों में से किसमें निवेश किया जाए। नए और छोटे बंदरगाहों में निवेश से बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं क्योंकि वे तटीय और अंतर्देशीय जलमार्ग, दोनों में सेवाएं प्रदान करते हैं। एक बंदरगाह के विकास की कीमत पर दूसरे निकटवर्ती बंदरगाह का विकास नहीं किया जाना चाहिए।
     
  • कमिटी ने यह सुझाव भी दिया कि सड़क परिवहन को प्राथमिकता देने के बजाय ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास और विस्तार पर ध्यान केंद्रित करने के प्रयास किए जाने चाहिए जोकि जल परिवहन को अधिक आकर्षक बनाए। समुद्र तट क्षेत्र में कार्गो की कनेक्टिविटी के लिए परिवहन के साधन के तौर पर तटीय क्षेत्र और अंतर्देशीय जलमार्गों पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, तथा रेल मंत्रालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बंदरगाहों की कनेक्टिविटी से जुड़े सभी प्रॉजेक्ट्स को उच्च प्राथमिकता दी जाए। अंतर मोडल कनेक्टिविटी के प्रॉजेक्ट्स को निर्धारित समय में पूरा होना चाहिए ताकि बंदरगाहों का कामकाज व्यावहारिक और लाभपरक बने।

 

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