भारत में वनों की स्थिति

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश 

  • विज्ञान एवं तकनीक, पर्यावरण एवं वन संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: आनंद शर्मा) ने 12 फरवरी, 2019 को भारत में वनों की स्थिति पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:
     
  • वन की परिभाषा: कमिटी ने राष्ट्रीय वन मसौदा नीति 2018 की समीक्षा की। जन प्रतिक्रियाओं के लिए अप्रैल 2018 में इस मसौदे को जारी किया गया था। कमिटी ने कहा कि मसौदा नीति में वन शब्द की परिभाषा नहीं दी गई है और मंत्रालय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रदत्त परिभाषा का ही इस्तेमाल करता है। न्यायालय ने वन की परिभाषा देते हुए कहा था कि इस परिभाषा में वन (संरक्षण) एक्ट, 1980 के अंतर्गत वैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त सभी वन शामिल हैं। कमिटी के अनुसार, कुछ स्टेकहोल्डर्स ने चिंता जताई है कि इस परिभाषा में ऐसे इकोसिस्टम्स शामिल नहीं हैं जिनमें जंगलों जैसी विशेषताएं नहीं हैं, जैसे दलदली भूमि (वेटलैंड्स) या घास के मैदान (ग्रासलैंड्स्)। इसलिए यह सुझाव दिया गया कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफ) को वन की व्यापक और स्पष्ट परिभाषा देनी चाहिए।
     
  • वन क्षेत्र: कमिटी ने उत्तर पूर्वी राज्यों में वन क्षेत्र में गिरावट के प्रति चिंता जताई जहां के 65.34% भौगोलिक क्षेत्र में वन मौजूद हैं, जबकि देश में औसत वन क्षेत्र 21.54% है। कमिटी ने सुझाव दिया कि संबंधित राज्य सरकारों और एमओईएफ को यह सुनिश्चित करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाने चाहिए कि इन राज्यों में वन क्षेत्रों में गिरावट को जल्द से जल्द रोका जाए।
     
  • कमिटी ने कहा कि एमओईएफ ने जंगलों में पेड़ों की अवैध कटाई को नियंत्रित करने के लिए कोई कार्रवाई योजना तैयार नहीं की। उसने कहा कि एमओईएफ को देश के विभिन्न भागों में पेड़ों की अवैध कटाई पर संज्ञान लेना चाहिए और इस खतरे से निपटने के लिए राज्य सरकारों के सहयोग से कार्य योजना तैयार करनी चाहिए।
     
  • वनों की कटाई: कमिटी ने कहा कि राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम के लिए बजट आबंटन पर्याप्त नहीं है। इससे पिछले कुछ वर्षों के दौरान वनीकरण के वार्षिक लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सका है। कमिटी ने सुझाव दिया कि एमओईएफ को सुनिश्चित करना चाहिए कि राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम के लिए पर्याप्त आबंटन किया जाए और इस कार्यक्रम के अंतर्गत लक्ष्यों को हासिल किया जा सके। इसके अतिरिक्त कमिटी ने कहा कि कार्यक्रम का फंडिंग पैटर्न 2015-16 में बदल गया। पहले यह 100% केंद्रीय प्रायोजित योजना थी, जो बाद में केंद्र और राज्य के बीच 60-40 की शेयरिंग स्कीम बन गई। इसलिए कमिटी ने सुझाव दिया कि संबंधित राज्य सरकारों को कार्यक्रम की सफलता को सुनिश्चित करने के लिए बदले हुए फंडिंग पैटर्न में अपना हिस्सा देना चाहिए।
     
  • वनीकरण का मूल्यांकन: कमिटी ने कहा कि 2008 में भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) ने राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम का मध्यावधि मूल्यांकन किया था और कहा था कि यह कार्यक्रम सफलतापूर्वक लागू किया जा रहा है। कमिटी ने कहा कि आईसीएफआरई के मूल्यांकन को लगभग दस वर्ष हो चुके हैं। इसलिए यह सुझाव दिया गया कि एमओईएफ को राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम और हरित भारत अभियान के असर का मूल्यांकन करने के लिए एक अध्ययन करना चाहिए। इससे वन क्षेत्र पर उनके वास्तविक असर का पता चलेगा और उसी के अनुसार इस संबंध में रणनीतियां बनाई जा सकेंगी।
     
  • कमिटी ने कहा कि एमओईएफ ने वनीकरण के लिए देश में कुल उपलब्ध भूमि को निर्धारित करने के लिए कोई फील्ड सर्वे नहीं किया है। उसने सुझाव दिया कि इस संबंध में जल्द से जल्द जरूरी कार्रवाई की जानी चाहिए जिससे राज्य सरकारें वनीकरण के लिए जरूरी रणनीतियां बना सकें।
     
  • शोषण की आशंका: कमिटी के अनुसार, लोगों की यह राय है कि मसौदा नीति वनों के व्यावसायीकरण पर बल देती है और आदिवासियों, आदिवासी समुदायों और पारंपरिक वनवासियों के स्वामित्व को सीमित करती है। इस संबंध में भी चिंता जताई गई थी कि मसौदा नीति का उद्देश्य ग्राम सभाओं के वन प्रबंधन के अधिकार को समाप्त करना और इस अधिकार को केंद्र के नियंत्रण वाले प्रस्तावित निगमों को सौंपना है। कमिटी ने महसूस किया कि अगर मसौदा नीति में वनों के प्रबंधन में निजी भागीदारी के मॉडल पर बहुत अधिक बल दिया गया तो वन क्षेत्रों का नुकसान हो सकता है। उसने सुझाव दिया कि स्टेकहोल्डर्स के सलाह-मशविरे से ऐसे सुरक्षात्मक उपाय किए जाने चाहिए जिससे निजी कंपनियों द्वारा वनों का अत्यधिक दोहन न हो।

 

अस्वीकरणः प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।