भारतीय वायुसेना में पूंजी अधिग्रहण 

कैग की रिपोर्ट का सारांश 

  • भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने 13 फरवरी, 2019 को भारतीय वायुसेना में पूंजी अधिग्रहण का प्रदर्शन ऑडिट जारी किया। ऑडिट ने 2012-13 और 2017-18 के दौरान पूंजी अधिग्रहण के लगभग 95,000 करोड़ रुपए मूल्य वाले 11 अनुबंधों की जांच की। अधिग्रहण प्रक्रिया में व्यवस्थागत मुद्दों की जांच के अतिरिक्त कैग ने फ्रांस सरकार और अंतर-सरकारी समझौते के जरिए 36 मध्यम बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमानों (एमएमआरसीए) की खरीद प्रक्रिया की भी जांच की। कैग के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
     
  • योजना और टेंडर की प्रक्रिया: एयर एसेट्स के अधिग्रहण (खरीद) की प्रक्रिया से पहले यूजर रिक्वायरमेंट तैयार किया जाता है। इसे एयर स्टाफ क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट्स (एएसक्यूआर) कहा जाता है। कैग ने कहा कि एएसक्यूआर बनाना रक्षा खरीद प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है, चूंकि इसमें क्वालिटी, मूल्य और प्रतिस्पर्धा को निर्धारित किया जाता है। कैग ने 2007 में सुझाव दिया था कि एएसक्यूआर को फंक्शनल मानदंडों के लिहाज से लिखा जाना चाहिए जिन्हें मापा जा सके। हालांकि यह कहा गया कि फंक्शनल मानदंडों का प्रयोग करने की बजाय भारतीय वायुसेना (आईएएफ) ने एसक्यूआरज़ को बहुत विस्तृत और तकनीकी विवरण वाला बनाया। इससे यह हालत हुई कि कोई भी वेंडर एएसक्यूआर को पूरा नहीं कर पाया। इसके अतिरिक्त खरीद प्रक्रिया के दौरान एएसक्यूआर को बार-बार बदला गया। इस संबंध में कैग ने फिर से अपने सुझाव को दोहराया कि एएसक्यूआर को फंक्शनल मानदंडों के लिहाज से तैयार किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त उसने सुझाव दिया कि जिन सिस्टम्स पर विचार किया जा रहा है, उसका ज्ञान रखने वाले तकनीकी विशेषज्ञों को खरीद प्रक्रिया में शामिल किया जा सकता है।
     
  • प्रस्ताव पेश करने का अनुरोध: प्रस्ताव हेतु अनुरोध (आरएफपी) जारी करके विभिन्न वेंडरों से प्रस्ताव मांगे जाते हैं। वेंडर टेक्निकल और कमर्शियल बोलियां लगाकर आरएफपी पर अपने जवाब देते हैं। कैग ने कहा कि यह प्रक्रिया बहुत अधिक प्रतिस्पर्धात्मक नहीं होती। जितनी कंपनियों को बोली लगाने के लिए आमंत्रित किया जाता है, उससे भी कम संख्या में वेंडर आरएफपी का जवाब देते हैं। इसके अनेक कारण हैं, जैसे अधिग्रहण प्रक्रिया में विलंब और एएसक्यूआर का बहुत बारीकी से पारिभाषित होना। कैग ने सुझाव दिया कि रक्षा मंत्रालय को नॉन स्ट्रैटेजिक आइटम्स (जैसे बेसिक ट्रेनर एयरक्राफ्ट और वेदर रडार) की खरीद के लिए ओपन कम्पिटीटिव टेंडरिंग की संभावना तलाशनी चाहिए।  
     
  • टेक्निकल मूल्यांकन: कैग ने खरीद के अलग-अलग मामलों में टेक्निकल मूल्यांकन में असंगतियों पर गौर किया। जैसे डोपलर वेदर रडार्स और अटैक हेलीकॉप्टरों के कई मामलों में अगर वेंडर सभी एएसक्यूआर मानदंडों पर खरे नहीं उतरे, तो उनकी बोली को नामंजूर कर दिया गया। लेकिन एमएमआरसीए और हेवी लिफ्ट हेलीकॉप्टरों के मामलों में महत्वपूर्ण एएसक्यूआर पर खरे न उतरने के बावजूद बोलियों को टेक्निकली क्वाफाई कर दिया गया।
     
  • कमर्शियल मूल्यांकन: कीमतों पर बोली लगाने और अंतिम चरण के कॉन्ट्रैक्ट पर सौदेबाजी करने के लिए कॉन्ट्रैक्ट नेगोसिएशन कमिटी (सीएनसी) का गठन किया जाता है। सीएनसी से अपेक्षा की जाती है कि वह कीमत की बोली से पहले एक बेंचमार्क कीमत का आकलन करेगी जिसे विभिन्न बोलियों के आकलन के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। कैग ने कहा कि आठ मामलों में बेंचमार्क कीमत, बोली की कीमत से अलग थी। यह कहा गया कि लगातार ऑफ-द मार्क प्राइजिंग से यह स्पष्ट होता है कि बाजार मूल्य का आकलन नहीं किया जा सका।
     
  • संगठनात्मक समस्याएं: कैग ने कहा कि जटिल और बहुस्तरीय मंजूरी प्रक्रिया के कारण अधिग्रहण में विलंब हुआ। अनुबंध पर हस्ताक्षर की शुरुआती प्रक्रिया से होकर किसी भी खरीद मामले को 11 चरणों से गुजरना होता है। कैग ने कहा कि मौजूदा प्रणाली आईएएफ की परिचालनगत तैयारी से शायद ही मेल खाती है। कैग ने सुझाव दिया कि रक्षा मंत्रालय पूरी खरीद प्रक्रिया में संरचनात्मक सुधार कर सकता है।
     
  • एमएमआरसीए का अधिग्रहण: कैग ने एमएमआरसीए की खरीद प्रक्रिया की समीक्षा की। उनसे गौर किया कि आईएएफ ने अगस्त 2000 में 126 मिराज 2000 II एयरक्राफ्ट की खरीद का प्रस्ताव पेश किया था। 2004 में इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया गया और 2007 में यह फैसला लिया गया कि डेसॉल्ट एविएशन से 126 रफाल एयरक्राफ्ट खरीदे जाएंगे। हालांकि डेसॉल्ट से कमर्शियल सौदेबाजी पूरी नहीं हुई थी। 2015 में फ्रेंच सरकार के साथ एक अंतरसरकारी समझौते (आईजीए) के जरिए 36 रफाल एयरक्राफ्ट खरीदने का फैसला लिया गया। इन दोनों सौदों की तुलना करते हुए कैग ने कहा कि 2015 का सौदा, 2007 के सौदे से 2.86 प्रतिशत कम कीमत पर किया गया था। इसके अतिरिक्त कैग ने कहा कि 2007 के सौदे में फ्रांस सरकार की एक बैंक गारंटी शामिल थी। इसका अर्थ यह था कि वेंडर की तरफ से डीफॉल्ट करने पर फ्रांस सरकार भुगतान करेगी। हालांकि 2015 के सौदे में बैंक गारंटी शामिल नही थी। 

 

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