भारतीय रेलवे में बिजलीकरण परियोजनाएं

 कैग रिपोर्ट का सारांश 

  • भारतीय नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने 21 जुलाई, 2017 को भारतीय रेलवे की बिजलीकरण परियोजनाएं (2013-14 और 2015-16 के बीच) पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। भारतीय रेलवे में ट्रेनें डीजल या इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव्स से खींची जाती हैं। 2015-16 में ऊर्जा/ईंधन पर 23,699 करोड़ रुपए का कुल व्यय किया गया। इसमें से 56% डीजल और 44% बिजली पर खर्च किया गया। 31 मार्च, 2016 तक रेलवे के 42% रूट लेंथ (66,687 रूट लेंथ) का बिजलीकरण कर दिया गया। इस ऑडिट में परियोजना के कार्यान्वयन एवं प्रबंधन और परियोजना के बाद बिजलीकृत लाइनों के उपयोग का आकलन किया गया। ऑडिट रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
     
  • योजना बनाना : वर्तमान में, बिजलीकरण पर विचार किए बिना ही नई रेलवे लाइनों की योजना बनाई जाती है। इसमें बिजलीकरण को बाद में जोड़ा जाता है। कैग ने सुझाव दिया कि सभी नई लाइन परियोजनाओं की योजना बनाते समय बिजलीकृत और दूसरे रूट्स, दोनों पर विचार किया जाना चाहिए।
     
  • बिजलीकरण का गतिक्रम : बिजलीकरण का गतिक्रम 2011-12 में 1,165 रूट किलोमीटर (आरकेएम) से बढ़कर 2015-16 में 1,730 रूट किलोमीटर हो गया (48% की वृद्धि)। हालांकि परियोजना की योजना तैयार करने से लेकर बिजलीकरण प्रक्रिया के कार्यान्वयन तक, हर चरण में विलंब पाया गया।
     
  • परियोजना में विलंब : यह टिप्पणी की गई कि विलंब होने से समय और लागत, दोनों के लिहाज से परियोजनाओं की पूंजीगत लागत में बढ़ोतरी हुई। कई परियोजनाओं की लागत में 2% से लेकर 77% तक की वृद्धि हुई। परियोजना समय पर पूरी न होने की वजह से अनुमानित बचत भी नहीं की जा सकी। ऐसे विलंब से 21 परियोजनाओं में 3,006 करोड़ रुपए की अनुमानित बचत नहीं की जा सकी। कैग ने सुझाव दिया कि परियोजना के बेहतर निरीक्षण से इस विलंब को रोका जा सकता है। इसके अतिरिक्त परियोजना की टीमों को एक निश्चित समय सीमा में फैसले लेने के लिए सशक्त किया जाना चाहिए।
     
  • टेंडर की प्रक्रिया : यह पाया गया कि केंद्रीय रेलवे विद्युतीकरण संगठन (कोर) और रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) को बिजलीकरण का काम सौंपने में रेलवे बोर्ड को क्रमशः 337 दिन और 202 दिन लगते हैं। ये दोनों बिजलीकरण की कार्यान्वयन एजेंसियां हैं। वार्षिक वर्क्स प्रोग्राम में परियोजना के शामिल होने के बाद विस्तृत अनुमान की मंजूरी के लिए कोर को 35 महीने तक का समय लगता है और आरवीएनएल को 18 महीने तक का समय। यह टिप्पणी भी की गई कि परियोजना को समय पर पूरा करने के उद्देश्य को ध्यान में रखे बिना ही टेंडर प्रोसेस किए गए। कैग ने सुझाव दिया कि ई-टेंडर निकालने और टेंडर के मूल्यांकन की विभिन्न गतिविधियों को साथ-साथ चलाया जाए। इसके अतिरिक्त टेंडर की प्रक्रिया से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों के लिए समय सीमा निर्धारित की जानी चाहिए ताकि एक उचित समय में टेंडर के मूल्यांकन का काम पूरा हो सके।
     
  • तत्परता बरतना (ड्यू डेलिजेंस) : टेंडर मंजूर करते समय कोर ने कंपनियों के कार्य अनुभव और टर्नओवर की जांच की लेकिन उनकी वित्तीय सुदृढ़ता का आकलन नहीं किया। इसके साथ ही इस बात का आकलन भी नहीं किया गया कि कंपनी के काम के बोझ का कितना असर उसकी काम पूरा करने की क्षमता पड़ने वाला है। कोर और आरवीएनएल ने बोली लगाने वालों के पूर्व प्रदर्शन का आकलन भी नहीं किया और उसके बिना ही बोलियों का मूल्यांकन किया। कैग ने सुझाव दिया कि कॉन्ट्रैक्टरों के आकलन में निम्नलिखित का मूल्यांकन शामिल है : (i) तकनीकी संसाधन (पर्सनल, मशीनरी), (ii) कार्य अनुभव, (iii) पूर्व प्रदर्शन, (iv) टर्नओवर, और (v) वित्तीय संसाधन (कार्यगत पूंजी सहित)।
     
  • परियोजनाओं को एक्सटेंशन : यह गौर किया गया कि परियोजनाओं के लिए कॉन्ट्रैक्टरों को नियमित एक्सटेंशन दिए गए। ऑडिट में जिन 481 कॉन्ट्रैक्ट्स की समीक्षा की गई, उनमें से 419 (87%) को एक्सटेंशन दिए गए। कोर और आरवीएनएल द्वारा विभिन्न कॉन्ट्रैक्टरों को 2,086 एक्सटेंशन दिए गए। इसके अतिरिक्त इन एजेंसियों ने 69% एक्सटेंशनों को मंजूर करने के कारण भी नहीं बताए। कैग ने एक्सटेंशन के कुछ कारणों को इस प्रकार चिन्हित किया है : (i) मैटीरियल का उपलब्ध न होना, (ii) मैटीरियल मिलने में देरी, (iii) पर्याप्त मैनपावर का तैनात न होना, और (iv) काम के स्कोप में परिवर्तन।
     
  • कॉन्ट्रैक्ट बनाते समय यह तय किया जाता है कि कॉन्ट्रैक्ट के कुछ विशिष्ट प्रावधानों का उल्लंघन करने पर परिनिर्धारित नुकसान (लिक्विडेटेड डैमेज) का दावा किया जा सकता है। कैग ने सुझाव दिया कि रेलवे को उपलब्ध इस विकल्प को कारगर तरीके से लागू किया जाना चाहिए ताकि समय पर परियोजना के कार्यान्वयन को सुनिश्चित किया जा सके। इसके अतिरिक्त परियोजना को समय से पहले पूरा करने पर टेंडर प्रक्रिया में इन्सेंटिव भी दिए जा सकते हैं।
     
  • परियोजना के बाद उपयोग : यह पाया गया कि रेलवे लाइनों के बिजलीकृत सेक्शनों का उपयोग कई बार उतना नहीं किया गया, जितना अपेक्षित था। 12 बिजलीकृत सेक्शनों में से केवल 59% ट्रेनों को इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन के साथ दौड़ाया गया। इसके परिणामस्वरूप 14 परियोजनाओं से 404 करोड़ रुपए की बचत नहीं की जा सकी। कैग ने सुझाव दिया कि इलेक्ट्रिक ट्रेनों के बिजलीकृत रूटों के प्रयोग का निरीक्षण किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त अपरिहार्य कारणों को छोड़कर ऐसे रूटों पर डीजल ट्रेनों की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

 

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