भारतीय रिजर्व बैंक का इकोनॉमिक कैपिटल फ्रेमवर्क

कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने केंद्र सरकार की सलाह से मौजूदा इकोनॉमिक कैपिटल फ्रेमवर्क की समीक्षा के लिए नवंबर, 2018 में एक कमिटी (चेयर: बिमल जालान) का गठन किया था। मौजूदा इकोनॉमिक कैपिटल फ्रेमवर्क को 2014-15 में विकसित किया गया था और 2015-16 में यह प्रारंभ हुआ था। इकोनॉमिक कैपिटल फ्रेमवर्क वह तरीका बताता है जिससे आरबीआई एक्ट, 1934 के सेक्शन 47 के अंतर्गत उपयुक्त स्तर के जोखिमों और लाभ वितरण का निर्धारण किया जा सके। इस प्रावधान के अंतर्गत केंद्रीय बैंक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह बुरे और संशयग्रस्त ऋणों, परिसंपत्तियों के ह्रास और कर्मचारियों के योगदान के बाद बचे हुए लाभ को केंद्र सरकार को हस्तांतरित करे।
     
  • कमिटी के संदर्भ की शर्तों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) अन्य केंद्रीय बैंकों की तुलना में आरबीआई के लिए मौजूदा प्रावधानों और रिजर्व्स की समीक्षा, (ii) उपयुक्त जोखिम मूल्यांकन का तरीका और जोखिम प्रावधानीकरण का स्तर सुझाना, (iii) यह निर्धारित करना कि क्या आरबीआई अधिशेष/घाटे में रिजर्व रख रहा है, और (iv) उपयुक्त अधिशेष वितरण नीति को प्रस्तावित करना। कमिटी के मुख्य सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
     
  • अंतरराष्ट्रीय प्रथा: कमिटी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर केंद्रीय बैंकों के लिए कोई रिस्क कैपिटल फ्रेमवर्क नहीं है। विभिन्न केंद्रीय बैंक अलग-अलग किस्म के रिस्क मैनेजमेंट फ्रेमवर्क विकसित करते और उसे अपनाते हैं जोकि उनकी विशिष्ट स्थितियों और जरूरतों पर निर्भर करता है। हालांकि कमिटी का यह विचार था कि आरबीआई की वित्तीय लोच को दूसरे केंद्रीय बैंकों के स्तर से ऊपर बरकरार रखा जाना चाहिए जैसा कि सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक के केंद्रीय बैंक से अपेक्षा की जाती है।
     
  • यह कहा गया कि आरबीआई का केंद्रीय बैंकिंग इकोनॉमिक कैपिटल, उसकी बैंलेंस शीट के 26.8% पर, केंद्रीय बैंकों में पांचवें स्थान पर है। केंद्रीय बैंक के इकोनॉमिक कैपिटल में उसकी पूंजी, रिजर्व, जोखिम के प्रावधान और रीइवैल्यूएशन बैंलेस शामिल होते हैं। विनिमय दर, सोने की कीमतों या ब्याज की दरों के उतार-चढ़ाव से होने वाला मुनाफा या नुकसान रीवैल्यूएशन बैंलेंस होता है। उल्लेखनीय है कि रीवैल्यूएशन बैलेंस आरबीआई के इकोनॉमिक कैपिटल के मुख्य घटक हैं (73%)।
     
  • जोखिम का मूल्यांक: केंद्रीय बैंक को विभिन्न प्रकार के जोखिम उठाने पड़ते हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) करंसी, सोने या ब्याज दरों के उतार-चढ़ाव से होने वाले बाजार संबंधी जोखिम, (ii) ऋण संबंधी जोखिम, (iii) विभिन्न कानूनी क्षेत्राधिकार में मल्टीकरंसी पोर्टफोलियो प्रबंधन से उत्पन्न होने वाले परिचालन संबंधी जोखिम, और (iv) आकस्मिक जोखिम (मौद्रिक और आर्थिक स्थिरता संबंधी जोखिम)।
     
  • वर्तमान में बाजार संबंधी जोखिम का आकलन स्ट्रेस्ड वैल्यू एट रिस्क पद्धति (स्ट्रेस्ड मार्केट की स्थिति के दौरान जोखिम) के आधार पर किया जाता है। कमिटी ने सुझाव दिया कि बाजार संबंधी जोखिम के आकलन के लिए स्ट्रेस्ड कंडीशंस (97.5% से 99% के बीच के कॉन्फिडेंस लेवल के साथ) के अंतर्गत एक्सपेक्टेड शॉर्टफॉल (ईएस) पद्धति को अपनाया जाए। 99% कॉन्फिडेंस लेवल पर ईएस का अर्थ वह संभावित नुकसान है जिसके लिए कोई 99% आश्वस्त (कॉन्फिडेंट) हो सकता है।  
     
  • संशोधित इकोनॉमिक कैपिटल फ्रेमवर्क: रियलाइज्ड इक्विटी आरबीआई के इकोनॉमिक कैपिटल का एक घटक होता है जिसमें उसकी पूंजी, रिजर्व फंड और जोखिम संबंधी प्रावधान शामिल होते हैं। जोखिम संबंधी प्रावधानों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) आकस्मिकता राशि, जिसमें सिक्योरिटीज़ के ह्रास या मौद्रिक/विनिमय दर संबंधी नीतिगत जोखिमों से उत्पन्न होने वाली अप्रत्याशित आकस्मिकता के लिए प्रावधान शामिल हैं, और (ii) परिसंपत्ति विकास कोष, जोकि सबसिडियरीज़ में निवेश और आंतरिक पूंजीगत व्यय में निवेश के लिए अलग रखी गई राशि होती है। मौद्रिक, राजकोषीय स्थिरता, ऋण और परिचालनगत जोखिमों को कवर करने के लिए आर्थिक पूंजी से जोखिम प्रावधानीकरण को आकस्मिक जोखिम बफर (सीआरबी) कहा जाता है।
     
  • कमिटी ने सुझाव दिया कि आरबीआई की बैलेंस शीट में रियलाइज्ड इक्विटी और रीवैल्यूएशन बैलेंस के बीच फर्क किया जाना चाहिए क्योंकि रीवैल्यूएशन बैलेंस बहुत अस्थिर होता है। इसके अतिरिक्त उसने सुझाव दिया कि आरबीआई को अपने जोखिम बफर के अंग के रूप में रीवैल्यूएशन बैलेंस को भी शामिल करना चाहिए। हालांकि उनकी अस्थिरता को देखते हुए इन बैलेंस को लिमिटेड पर्पज रिस्क बफर्स के तौर पर सिर्फ बाजार जोखिमों के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
     
  • अधिशेष वितरण नीति: मौजूदा अधिशेष वितरण नीति का लक्ष्य केवल कुल इकोनॉमिक कैपिटल है। कमिटी ने सुझाव दिया कि लक्ष्य में रियलाइज्ड इक्विटी भी शामिल होनी चाहिए। सीआरबी के रूप में रियलाइज्ड इक्विटी का आकार आरबीआई की बैलेंस शीट के 5.5% से 6.5% के बीच बरकरार रहना चाहिए (मौजूदा लक्ष्य: 3% से 4% के बीच है)। कुल इकोनॉमिक कैपिटल बैलेंस शीट को 20.8% से 25.4% के बीच बरकरार रहना चाहिए (मौजूदा लक्ष्य: 28.1% से 29.1% के बीच है)। 30 जून, 2018 तक केंद्रीय बैंक के लिए सीआरबी और कुल इकोनॉमिक कैपिटल बैलेंस शीट क्रमशः 7.2% और 26.8% है।
     
  • अगर रियलाइज्ड इक्विटी अपेक्षित स्तर से अधिक है तो आरबीआई की पूरी शुद्ध आय सरकार को हस्तांतरित हो जाएगी। अगर यह कम है तो जोखिम प्रावधानीकरण जरूरी सीमा तक किया जाएगा और केवल शेष शुद्ध आय को हस्तांतरित किया जाएगा। इस फ्रेमवर्क की हर पांच वर्षों में समीक्षा की जा सकती है।   

 

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