भारतनेट के कार्यान्वयन की प्रगति

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयरपर्सन: अनुराग सिंह ठाकुर) ने 7 अगस्त, 2018 को ‘भारतनेट के कार्यान्वयन की प्रगति’ पर रिपोर्ट सौंपी। 2011 में भारतनेट प्रॉजेक्ट की शुरुआत की गई थी, जिसका उद्देश्य 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर के जरिए कनेक्टिविटी प्रदान करना है। कमिटी ने इस प्रॉजेक्ट की समीक्षा की थी। उसके मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:
     
  • चरण-1 का कार्यान्वयन: भारतनेट के चरण-1 के अंतर्गत एक लाख ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर से कनेक्ट करने का लक्ष्य रखा गया था। हालांकि कमिटी ने कहा कि योजना और डिजाइन अपर्याप्त होने के अतिरिक्त तैयारी के अभाव में तीन साल तक (2014 तक) यह प्रॉजेक्ट शुरू नहीं हो पाया। योजना, डिजाइनिंग, खरीद से संबंधित विभिन्न कमियों और राज्यों की भागीदारी न होने के कारण इस प्रॉजेक्ट को 2014 के बाद लागू किया जा सका। कमिटी ने कहा कि एक लाख ग्राम पंचायतों को कनेक्ट करने का लक्ष्य 28 दिसंबर, 2017 को पूरा हो गया है।
     
  • लास्ट-माइल कनेक्टिविटी: कमिटी ने कहा कि जुलाई 2017 तक लास्ट-माइल कनेक्टिविटी (घर-घर तक कनेक्टिविटी पहुंचाना) भारतनेट के दायरे में नहीं आती थी। चूंकि 1 मई, 2017 तक 1,09,099 ग्राम पंचायतें सर्विस रेडी हो गई थीं, कमिटी ने कहा कि अब इन ग्राम पंचायतों में लास्ट-माइल कनेक्टिविटी पहुंचाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त कमिटी ने सांसद आदर्श ग्राम योजना के अंतर्गत वाई-फाई हॉटस्पॉट्स लगाने की जरूरत पर बल दिया। कमिटी ने सुझाव दिया कि वाई-फाई हॉटस्पॉट्स लगाने के दौरान ग्राम स्तर के उद्यमियों को भागीदार बनाने पर भी जोर दिया जाना चाहिए रोजगार सृजन हो सके।
     
  • चरण-2 का कार्यान्वयन: भारतनेट के चरण-2 के अंतर्गत मार्च 2019 तक शेष 1,50,000 ग्राम पंचायतों को कवर करने का लक्ष्य रखा गया है। कमिटी ने सुझाव दिया कि चरण-2 के लक्ष्यों को समय पर पूरा करने के प्रयास किए जाने चाहिए। इसके अतिरिक्त कमिटी ने यह भी कहा कि चरण-2 में रोजगार सृजन पर ध्यान दिया जाना चाहिए, विशेष रूप से जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर पूर्वी राज्यों में।
     
  • राज्यों की भागीदारी: कमिटी ने कहा कि राज्यों की भागीदारी न होने के कारण चरण-1 की प्रगति धीमी थी और इंफ्रास्ट्रक्चर का पूरा उपयोग नहीं किया गया था। इस समस्या को हल करने के लिए एक संशोधित रणनीति अपनाई गई। इसके अंतर्गत आठ राज्यों की ग्राम पंचायतों को कनेक्टिविटी देने के लिए राज्य सरकारों ने अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसमें राज्य सरकारों ने ऑप्टिकल फाइबर और रेडियो लगाने का काम किया। कमिटी ने कहा कि ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जिसमें किसी एक राज्य की बेहतर कार्य प्रणाली को दूसरे राज्यों के साथ साझा किया जा सके।
     
  • केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम (सीपीएसयूज़) : कमिटी ने कहा कि प्रॉजेक्ट के चरण-1 को तीन सीपीएसयूज़ (भारत संचार निगम लिमिटेड, रेलटेल और पावर ग्रिड कोऑपरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) को आबंटित किया गया था। ऑप्टिकल फाइबर टेक्नोलॉजी में विशेषज्ञता प्राप्त होने के बावजूद इन सीपीएसयूज़ का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा। इसमें चरण-1 में लक्ष्य पूरा करने में विलंब शामिल है। कमिटी ने सुझाव दिया कि इस संबंध में कड़े कदम उठाए जाने चाहिए जैसे इन लक्ष्यों को पूरा करने में असफल रहने पर सीपीएसयूज़ पर दंड लगाया जाना चाहिए।
     
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी: कमिटी ने कहा कि चरण-2 में निजी क्षेत्र की भागीदारी अधिक है। इसके अंतर्गत बिहार और पंजाब में निजी क्षेत्र द्वारा दो प्रॉजेक्ट्स चलाए जाएंगे। कमिटी ने सुझाव दिया कि प्रॉजेक्ट्स को समय पर पूरा करने में निजी क्षेत्र द्वारा लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त उनके साथ किए जाने वाले समझौतों में दंड के उपनियम शामिल होने चाहिए।
     
  • राइट ऑफ वे (आरओडब्ल्यू) से संबंधित मुद्दे: कमिटी के अनुसार, भारतीय टेलीग्राफ राइट ऑफ वे रूल्स, 2016 को यह सुनिश्चित करने के लिए तैयार किया गया था कि जमीन से नीचे और ऊपर के इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए आरओडब्ल्यू की अनुमति मिल सके। हालांकि 1 मई, 2018 तक विभिन्न एजेंसियों में आरओडब्ल्यू के 296 मामले लंबित हैं जिनसे 1,241 ग्राम पंचायतों पर प्रभावित हुई हैं। इस संबंध में कमिटी ने सुझाव दिया कि प्रॉजेक्टस को आसानी से लागू किया जा सके, इसके लिए सिंग विंडो क्लीयरेंस सिस्टम होना चाहिए।
     
  • भारतनेट चरण-3: भारतनेट के चरण-3 में नेटवर्क की अपग्रेडिंग शामिल है ताकि भविष्य की जरूरतों को पूरा किया जा सके। हालांकि कमिटी ने कहा कि केंद्रीय कैबिनेट ने चरण-3 को मंजूरी नहीं दी है। चरण-3 के स्वरूप को देखते हुए कमिटी ने सुझाव दिया कि सभी जरूरी योजना और कार्यान्वयन रणनीति को पहले से तैयार किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त यह सुझाव भी दिया गया कि टेलीकम्यूनिकेशन विभाग को जल्द से जल्द संबंधित अथॉरिटी की मंजूरी हासिल करने के लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए।               

 

अस्वीकरणः प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।