बहुक्षेत्रीय विकास कार्यक्रम/प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम का कार्यान्वयन

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश 

  • सामाजिक न्याय एवं सशक्तीकरण संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: रमेश बैंस) ने 9 अगस्त, 2018 को बहुक्षेत्रीय विकास कार्यक्रम/प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम का कार्यान्वयन पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। बहुक्षेत्रीय विकास कार्यक्रम (एमएसडीपी) (जिसे प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम के तौर पर पुनर्गठित करके नया नाम दिया गया) एक केंद्रीय प्रायोजित योजना है जिसे 2008-09 में शुरू किया गया था। यह योजना सामाजिक-आर्थिक बुनियादी संरचनाओं के निर्माण, मूलभूत जरूरतों की उपलब्धता एवं अन्य उपायों के जरिए अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों का अधिक विकास करने का प्रयास करती है। अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र ऐसे चिन्हित क्षेत्र होते हैं जहां कम से कम 25% अल्पसंख्यक, जैसे मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी रहते हैं।
     
  • गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले अल्पसंख्यक परिवार: कमिटी ने कहा कि सामाजिक न्याय एवं सशक्तीकरण मंत्रालय अल्पसंख्यक समुदायों के कल्याण के लिए उत्तरदायी है। हालांकि उसके पास गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों की कुल संख्या का विवरण नहीं है। मंत्रालय ने कमिटी को यह जानकारी दी थी कि नीति आयोग इस विषय पर काम कर रहा है, चूंकि सामाजिक-आर्थिक जनगणना का काम उसके पास लंबित है। कमिटी ने मंत्रालय को सुझाव दिया कि वह नीति आयोग से इन आंकड़ों को हासिल करे। इससे यह सुनिश्चित होगा कि स्वास्थ्य, शिक्षा और दक्षता विकास के लिए सृजित परिसंपत्तियां उनकी जरूरतों के अनुसार तैयार की जाएं।

योजना का कार्यान्वयन

  • योजना का समूचा कार्यान्वयन: कमिटी ने कहा कि हालांकि मंत्रालय ने इस योजना में संशोधन किया, फिर भी अल्पसंख्यकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। अल्पसंख्यक क्षेत्रों में बुनियादी जरूरतों/इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव ही रहा। कमिटी ने सुझाव दिया कि मंत्रालय को संबंधित राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों और अन्य मंत्रालयों के साथ समन्वय स्थापित करना चाहिए ताकि समय पर इन अधूरे प्रॉजेक्ट्स को पूरा किया जा सके और योजना के उचित कार्यान्वयन के लिए प्रयास किए जा सकें।
     
  • लाभार्थियों के आंकड़े: कमिटी ने कहा कि योजना के अंतर्गत प्रॉजेक्ट्स के जरिए लाभान्वित होने वाले परिवारों की संख्या के समुदाय आधारित आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। इन आंकड़ों के अभाव में मंत्रालय अल्पसंख्यकों पर योजना के असर का आकलन नहीं कर सकता। कमिटी ने 2008-09 से आंकड़ों को अपडेट करने का अनुरोध किया।
     
  • आवास: कमिटी ने कहा कि इंदिरा विकास योजना (आईएवाई) के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में पक्के घर बनाना, 11वीं और 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान एमएसडीपी के प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों में से एक था। हालांकि योजना की अवधि में अनेक राज्यों में आईएवाई के अंतर्गत कोई यूनिट्स मंजूर नहीं की गई थीं (इन राज्यों में केरल, असम, जम्मू एवं कश्मीर और अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह शामिल हैं)। कमिटी ने यह भी कहा कि पेयजल आपूर्ति और पक्के मकान से संबंधित प्रॉजेक्ट्स को पुनर्गठित एमएसडीपी में शामिल नहीं किया गया, इसके बावजूद कि अल्पसंख्यक क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए आवास एक बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर होता है। यह सुझाव दिया गया कि आईएवाई और पेयजल आपूर्ति के अंतर्गत आने वाले प्रॉजेक्ट्स को एमएसडीपी के प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों की सूची में शामिल किया जाए।  
     
  • शिक्षा संबंधी प्रॉजेक्ट्स: कमिटी ने कहा कि 11वीं और 12वीं योजनाओं के दौरान शिक्षा संबंधी अनेक प्रॉजेक्ट्स को मंजूर किया गया था लेकिन वे पूरे नहीं हुए। कमिटी ने कहा कि मंत्रालय को इन लंबित प्रॉजेक्ट्स को बिना देरी किए पूरा करने के प्रयास करने चाहिए। उसने कहा कि कमिटी को शिक्षा संबंधी प्रॉजेक्ट्स के लाभार्थियों का समुदाय आधारित विवरण प्रदान किया जाए।
     
  • स्वास्थ्य संबंधी प्रॉजेक्ट्स: जहां तक कि स्वास्थ्य संबंधी प्रॉजेक्ट्स का विषय है, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसीज़), स्वास्थ्य उपकेंद्रों और पीएचसीज़ में लेबर रूम्स बनाने का काम मंत्रालय करता है। 11वीं और 12वीं योजना अवधि के दौरान मंजूर किए गए 4,393 यूनिट्स/प्रॉजेक्ट्स में से सिर्फ 2,432 प्रॉजेक्ट्स/यूनिट्स पूरे हुए। कमिटी ने इस बात पर जोर दिया कि किसी क्षेत्र के विकास के बुनियादी संकेतकों में से एक लोगों का स्वास्थ्य है। उसने सुझाव दिया कि प्रॉजेक्ट्स को पूरा करने के लिए मंत्रालय को स्वास्थ्य मंत्रालय और राज्य सरकारों के साथ मिलकर कदम उठाने चाहिए।
     
  • फंड्स का कम उपयोग: कमिटी ने कहा कि योजना के अंतर्गत राज्यों ने फंड्स का पूरा उपयोग नहीं किया, जिसके निम्नलिखित कारण थे: (i) कुछ प्रॉजेक्ट्स को विकसित करने में लगने वाला लंबा समय, (ii) जमीन उपलब्ध न होना, (iii) लागत का बढ़ना, और (iv) राज्यों द्वारा प्रवर्तन एजेंसियों को फंड्स हस्तांतरित करने में देरी। उसने सुझाव दिया कि मंत्रालय को राज्य सरकारों और अन्य मंत्रालयों के साथ मिलकर विभिन्न स्तरों पर इन समस्याओं को हल करना चाहिए ताकि फंड्स का पूर्ण उपयोग सुनिश्चित हो।
     
  • योजनाओं का निरीक्षण: कमिटी ने कहा कि अनेक निरीक्षणात्मक प्रणालियों के बावजूद एमएसडीपी का असर अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में कम ही दिखाई देता है। उसने कहा कि योजना के अंतर्गत विभिन्न राज्यों में प्रॉजेक्ट्स के निरीक्षण का काम स्वतंत्र निरीक्षकों द्वारा वर्ष में एक बार किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त इन रिपोर्ट्स को योजना की वेबसाइट पर अपलोड किया जाना चाहिए।

 

अस्वीकरणः प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) के नाम उल्लेख के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती हैt.