निर्यात पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का प्रभाव

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • वाणिज्य संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर : नरेश गुजराल) ने 12 दिसंबर, 2017 को निर्यात पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का प्रभावपर अपनी रिपोर्ट सौंपी। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) एक अप्रत्यक्ष कर है जिसमें केंद्र और राज्य के अनेक टैक्स शामिल हैं, जैसे सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स और इंट्री टैक्स। वर्तमान में इसके दो घटक हैं : (i) केंद्रीय जीएसटी और (ii) राज्य जीएसटी। इसके अतिरिक्त वस्तु एवं सेवाओं की अंतर-राज्यीय सप्लाई पर एक एकीकृत जीएसटी (आईजीएसटी) वसूला जाएगा। आईजीएसटी भारत में आयात और निर्यात पर भी लागू होगा। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं :
     
  • जीएसटी के अंतर्गत रीफंड का मैकेनिज्म : आईजीएसटी एक्ट के अंतर्गत, निर्यातक निम्नलिखित के लिए रीफंड का दावा करने के पात्र हैं: (i) निर्यात पर चुकाई जाने वाली ड्यूटी, और (ii) इस्तेमाल न किया गया इनपुट टैक्स क्रेडिट। कंप्लीट रीफंड एप्लीकेशन के प्राप्त होने की तारीख से 60 दिनों के भीतर ऐसे रीफंड का भुगतान किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त अगर 60 दिनों के भीतर पूरे रीफंड का भुगतान न किया जाए तो 6% की दर से ब्याज चुकाया जाएगा।
     
  • कमिटी ने कहा कि आईजीएसटी के अंतर्गत जुलाई, अगस्त और सितंबर 2017 के महीनों का रीफंड बकाया था। इसके अतिरिक्त कमिटी ने रीफंड के रूप में 15-20% वर्किंग कैपिटल के फंसे होने का अनुमान जताया और कहा कि इससे छोटे उद्यमों के अलावा बड़े कॉरपोरेट फर्म्स का अपेक्षित (ऑप्टिमल) कामकाज प्रभावित हो रहा है। इस संबंध में कमिटी ने सुझाव दिया कि रीफंड की राशि को बिना देर किए जारी किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त यह सुझाव दिया गया कि इनपुट टैक्स क्रेडिट के रीफंड का दावा करने के लिए सेमी ऑटोमैटिक सिस्टम की जगह पूरी तरह से ऑटोमैटिक सिस्टम लाया जाना चाहिए।
     
  • शिकायत निवारण : कमिटी ने कहा कि सीजीएसटी/आईजीएसटी एक्ट के विभिन्न प्रावधानों से जुड़े सवालों के जवाब मिलने में परेशानियां हो रही हैं, जिसमें दावों को फाइल करना और रीफंड की प्रक्रिया शामिल है। कमिटी ने सुझाव दिया कि निर्यातकों के शिकायत निवारण के लिए एक औपचारिक मैकेनिज्म होना चाहिए।
     
  • इस्तेमाल न हुए इनपुट टैक्स क्रेडिट का रीफंड : इनपुट टैक्स क्रेडिट तब जमा होता है जब इनपुट्स पर चुकाया गया टैक्स, आउटपुट टैक्स लायबिलिटी से अधिक होता है। इस क्रेडिट को अगले वित्तीय वर्ष में उपयोग के लिए चढ़ा दिया (कैरी ओवर किया) जा सकता है। इन मामलों में जीएसटी के अंतर्गत इस्तेमाल न हुए इनपुट टैक्स क्रेडिट के रीफंड की अनुमति है। कई कॉटन फैब्रिक्स और मैन मेड टेक्सटाइल्स को 5% की जीएसटी दर के अंतर्गत रखा गया था, इस शर्त के साथ कि जमा क्रेडिट का रीफंड नहीं होगा। कमिटी ने कहा कि इससे कीमत बढ़ सकती है और विश्वव्यापी बाजार की प्रतिस्पर्धा से भारतीय कपड़ा बाहर हो सकता है।
     
  • ड्यूटी ड्रॉबैक स्कीम : ड्यूटी ड्रॉबैक स्कीम के अंतर्गत, निर्यात होने वाली वस्तुओं की मैन्यूफैक्चरिंग के इनपुट्स पर कस्टम्स ड्यूटी, एक्साइज ड्यूटी और सर्विस टैक्सेज जैसे करों और शुल्कों में छूट मिलती है। जीएसटी के बाद ड्रॉबैक केवल बेसिक कस्टम ड्यूटी पर लागू होता है। कमिटी ने कहा कि कुछ वस्तुओं के लिए ड्यूटी ड्रॉबैक दर काफी हद तक कम हुई है। इनमें उन क्षेत्रों के उत्पाद शामिल हैं जहां बड़ी संख्या में श्रमिक कार्य करते हैं (लेबर इनटेंसिव सेक्टर्स)। टेक्सटाइल, चमड़ा और हस्तशिल्प इत्यादि ऐसे ही क्षेत्र हैं। कमिटी ने कहा कि एकाएक इन्सेंटिव वापस लेने से इन उद्योगों पर असर होगा और इनमें रोजगार का नुकसान होगा। इसलिए कमिटी ने सुझाव दिया कि जीएसटी से पहले लागू ड्यूटी ड्रॉबैक दरों को 30 जून 2018 तक जारी रखा जाना चाहिए या फिर तब तक जारी रखा जाना चाहिए जब तक राजस्व विभाग ड्यूटी ड्रॉबैक की संशोधित दरों को निर्धारित न कर ले।
     
  • डीम्ड निर्यात : कमिटी ने कहा कि भारत की निर्यात ओरिएंटेड यूनिट्स को सप्लाई की जाने वाली कुछ वस्तुओं के कारोबार को डीम्ड निर्यात कहा जाता है। ऐसे डीम्ड निर्यात पर ड्यूटी रीफंड मिलता है या उन्हें केंद्रीय करों से छूट मिलती है ताकि अंतरराष्ट्रीय टेंडरों में हिस्सा लेने वाली भारतीय फर्मों की प्रतिस्पर्धात्मकता में बढ़ोतरी हो सके। कमिटी ने गौर किया कि वाणिज्य विभाग ने किसी भी सप्लाई को डीम्ड निर्यात के रूप में अधिसूचित नहीं किया है। कमिटी ने सुझाव दिया कि राजस्व विभाग को डीम्ड निर्यात के रूप में क्वालिफाई होने वाली सप्लाईज के संबंध में अधिसूचना जारी करनी चाहिए और मौजूदा जीएसटी फ्रेमवर्क के अंतर्गत निर्यात संबंधी लाभ बढ़ाने चाहिए।
     
  • रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म : रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म के अंतर्गत जब एक अपंजीकृत व्यक्ति किसी पंजीकृत व्यक्ति को वस्तु या सेवाओं की सप्लाई करता है तो पंजीकृत व्यक्ति को उस सप्लाई पर जीएसटी चुकानी चाहिए। कमिटी ने कहा कि इस मैकेनिज्म के कारण निर्यातक अपंजीकृत वेंडरों, जैसे लघु उद्यमियों से खरीद करने से बचते हैं। इसके अतिरिक्त कमिटी ने कहा कि इस मैकेनिज्म से निर्यातकों के लिए ऑपरेशनल और अनुपालन संबंधी समस्याएं पैदा होती हैं, चूंकि उन्हें पहले रिवर्स चार्ज चुकाना होता है, फिर वे रीफंड का दावा करते हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म को हटा दिया जाए।

 

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