नियोक्ताओं द्वारा पीएफ, ईएसआई और टीडीएस की कटौती और जमा के विर्निदिष्ट प्रावधानों का अनुपालन

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • श्रम संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: किरीट सोमैय्या) ने 7 फरवरी, 2019 को नियोक्ताओं द्वारा ‘पीएफ, ईएसआई और (इनकम टैक्स आदि के) टीडीएस की कटौती और जमा के विनिर्दिष्ट प्रावधानों के अनुपालन पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:
     
  • कटौतियां: कमिटी को मंत्रालय द्वारा यह सूचना दी गई थी कि कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान एक्ट, 1952 के अंतर्गत नियोक्ता को यह अधिकार है कि वह कर्मचारी के वेतन से भविष्य निधि योगदान की कटौती करे और उसे फंड में जमा कराए। हालांकि कमिटी ने कहा कि ऐसे भी मामले हुए हैं जब नियोक्ता ने कर्मचारी के वेतन से कटौती तो की लेकिन ईपीएफओ में उसे जमा नहीं कराया। इससे वेतन से कानूनन कटौती होने के बावजूद कर्मचारी को नुकसान उठाना पड़ा। इसलिए यह सुझाव दिया गया कि मंत्रालय को कर्मचारियों के हितों की रक्षा करते हुए एक्ट में उपयुक्त संशोधनों पर विचार करना चाहिए।
     
  • डीफॉल्ट की अधिसूचना: कमिटी ने कहा कि नियोक्ता पीएफ कटौती के संबंध में हर महीने ईपीएफओ में चालान और रिटर्न को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से फाइल करते हैं। बदले में ईपीएफओ कर्मचारी को एक एसएमएस भेजता है जिसमें उसके नियोक्ता द्वारा प्रेषित की गई राशि की जानकारी होती है। कमिटी को मंत्रालय द्वारा यह सूचना दी गई थी कि ईपीएफओ एक ऐसी व्यवस्था करने जा रहा है जिसमें कर्मचारी को एसएमएस के जरिए नियोक्ता द्वारा योगदान की राशि जमा न कराने के बारे में भी बताया जाएगा। कमिटी ने कहा कि यह व्यवस्था जल्द से जल्द की जानी चाहिए। उसने इस बात भी जोर दिया कि पीएफ योगदान जमा न कराने के संबंध में शिकायत दर्ज करने की जिम्मेदारी सिर्फ कर्मचारी की नहीं होनी चाहिए। ईपीएफओ को नियोक्ता से भी जानकारी हासिल करनी चाहिए जिन्हें इस राशि की कटौती के लिए अधिकृत किया गया है।
     
  • स्पेशल रिजर्व फंड: कमिटी को श्रम और रोजगार मंत्रालय द्वारा स्पेशल रिजर्व फंड (एसआरएफ) की सूचना दी गई थी, जो मंत्रालय द्वारा मेनटेन किया जाता है। एसआरएफ उस स्थिति में कर्मचारियों या उनके नॉमिनी की मदद करने वाला राहत फंड है, जब नियोक्ता पीएफ फंड में उसका योगदान जमा नहीं कराता। कमिटी को सूचना दी गई थी कि कर्मचारी को इस फंड से सिर्फ उसकी योगदान राशि दी जाती है जिसमें ब्याज भी जुड़ा होता है। यह राशि सिर्फ उतनी ही होती है जितनी नियोक्ता ने जमा न कराई हो। यह उन सभी कर्मचारियों पर लागू होता है जिन्होंने सेवानिवृत्ति, मृत्यु या कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 1952 के अंतर्गत उल्लिखित अन्य स्थितियों में संस्थान (इस्टैबलिशमेंट) को छोड़ा है। कमिटी ने कहा कि 2014-15 से 2017-18 के दौरान एसआरएफ के अंतर्गत लाभार्थियों की संख्या कम बनी रही। उसने सुझाव दिया कि एसआरएफ के अंतर्गत सहायता हासिल करने की प्रक्रिया को जल्द से जल्द प्रभावी बनाया जाए ताकि कर्मचारियों को किसी भी प्रकार के वित्तीय नुकसान से सुरक्षित रखा जा सके।
     
  • स्रोत पर टैक्स कटौती (टीडीएस): कमिटी को केंद्रीय कराधान बोर्ड (सीबीडीटी) द्वारा सूचित किया गया था कि उसने उन कर्मचारियों की मदद करने के लिए कुछ कदम उठाए हैं जिनकी टैक्स कटौतियों को नियोक्ता ने जमा नहीं कराया है। उसने एक सर्कुलर के हवाले से कहा कि एसेसिंग ऑफिसर संबंधित दस्तावेजों को सत्यापित करके और इनडेमिनिटी (क्षतिपूर्ति) बॉन्ड (कुछ मामलों में) को हासिल करके कर्मचारियों की 1,00,000 रुपए तक की टैक्स डिमांड को कम कर सकता है। कमिटी ने वित्त मंत्रालय से कहा कि उसे कर्मचारियों के हितों को देखते हुए एक लाख रुपए की सीमा को बढ़ाने पर विचार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त उसने कहा कि इनडेमिनिटी (क्षतिपूर्ति) बॉन्ड की शर्त को समीक्षा की जा सकती है ताकि जिन कर्मचारियों के वेतन से टीडीएस पहले ही कट गया है, उन्हें राहत मिले।
     
  • सीबीडीटी ने कमिटी को एक दूसरे सर्कुलर की भी जानकारी दी जिसमें उसने अपने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि उस स्थिति में कर्मचारियों से कोई टैक्स डिमांड न की जाए जिन स्थितियों में नियोक्ता ने टैक्स कटौती की है लेकिन उसे सरकार के पास जमा नहीं कराया है। हालांकि कमिटी के अनुसार सीबीडीटी ने स्वीकार किया कि यह राशि नियोक्ता नहीं, बल्कि सिर्फ कर्मचारी के नाम से रिकवरेबल बनी रहती है। कमिटी ने कहा कि सर्कुलर सिर्फ स्पष्टीकरण के लिए है और आईटी एक्ट, 1961 के संबंधित संवैधानिक प्रावधान पर पुनर्विचार किए जाने की जरूरत है ताकि एसेसिंग ऑफिसर्स जबदस्ती टैक्स की वसूली न करें।

 

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