दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश 

  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यावरण एवं वन संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: आनंद शर्मा) ने 7 अगस्त, 2018 को ‘दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण’ पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं :
     
  • वायु प्रदूषण कम करने के उपाय: पिछले तीन वर्षों के दौरान पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने PM25 और PM10 (वायु प्रदूषकों) के स्तर को कम करने के लिए अनेक उपाय किए हैं। इन उपायों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) दिल्ली में 1 अप्रैल, 2018 से BS-VI फ्यूल स्टैंडर्ड्स को लागू करना, (ii) वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम को शुरू करना, (iii) पांच औद्योगिक क्षेत्रों के लिए SO2 और NO2 के स्टैंडर्ड्स को संशोधित करना, और (iv) छह क्षेत्रों को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के राज्यों और पंजाब में पराली (कटाई के बाद फसलों का बचा हिस्सा) जलाने से संबंधित निर्देश जारी करना। इस समस्या पर काबू पाने के लिए दिल्ली सरकार ने अनेक कदम उठाए हैं जिनमें शहर में बड़े पैमाने पर पौधरोपण करना भी शामिल है।
     
  • कमिटी ने मंत्रालय और दिल्ली सरकार के प्रयासों को मान्यता दी। साथ ही सुझाव दिया कि इन प्रयासों के अतिरिक्त एक व्यापक निरीक्षण प्रणाली तैयार की जानी चाहिए जिससे इलाके में राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (नेशनल एम्बियेंट एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड्स) का अनुपालन सुनिश्चित हो। इससे दिल्लीवासियों के स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण का नकारात्मक असर भी कम होगा।
     
  • पराली को जलाना: कमिटी ने कहा कि हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने पराली जलाने पर लगे कानूनी प्रतिबंध को अच्छी तरह से लागू नहीं किया है। इससे इलाके में वायु प्रदूषण की स्थिति बदतर हुई है। उसने सुझाव दिया कि पर्यावरण मंत्रालय को कृषि मंत्रालय के साथ काम करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश की सरकारें पराली जलाने से संबंधित दिशानिर्देशों और कानूनी प्रावधानों को लागू कर रही हैं।
     
  • कमिटी ने सुझाव दिया कि इन राज्यों में किसानों को ऐसे व्यावहारिक उपाय सुझाए जाएं जिससे वे पराली जलाने की बजाय उसका दूसरा उपयोग करें। इसके लिए किसानों को तकनीकी और वैज्ञानिक समाधान, साथ ही वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए जिससे वे पराली जलाने से बचें।
     
  • सड़कों पर धूल: दिल्ली और एनसीआर में वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण सड़कों की धूल है। कमिटी ने कहा कि इस क्षेत्र की संबंधित राज्य सरकारों ने सड़कों से धूल को कम करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए। कमिटी के अनुसार, मंत्रालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि राज्य सरकारें सड़कों की धूल पर काबू पाने/धूल और दूसरे उत्सर्जनों के रीसस्पेंशन के लिए सभी बिंदुओं पर कार्रवाई कर रही हैं। इसके अतिरिक्त कमिटी ने कहा कि कच्ची सड़कों/गलियों के कारण धूल की समस्या बढ़ती है, इसीलिए कच्ची सड़कों को जल्द से जल्द पक्का किया जाना चाहिए। इस संबंध में नागरिक संस्थाओं को सड़कों के रखरखाव के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
     
  • निर्माण संबंधी गतिविधियां: इलाके में वायु प्रदूषण का एक और बड़ा कारण निर्माण गतिविधियों के कारण पैदा होने वाला प्रदूषण है। कमिटी ने कहा कि निर्माण गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने से समाज के गरीब और कमजोर तबकों पर असर पड़ेगा क्योंकि उनमें से अनेक को इन्हीं कार्यों से रोजाना की दिहाड़ी मिलती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि निर्माण संबंधी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने की बजाय केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन हो, इसके लिए कदम उठाए जाने चाहिए। साथ ही विश्वस्तरीय उत्तम कार्य पद्धतियों को अपनाया जाना चाहिए। उसने यह सुझाव भी दिया कि इलाके में निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट नियमों (कंस्ट्रक्शन एंड डेमोलिशन वेस्ट रूल्स) को लागू किया जाना चाहिए।
     
  • कचरा भराव क्षेत्र: कमिटी ने कहा कि दिल्ली सरकार की म्यूनिसिपल ठोस कचरे को उपचारित करने की मौजूदा क्षमता अपेक्षा से 46% कम है। यह अनप्रोसेस्ड म्यूनिसिपल कचरा पर्यावरण और क्षेत्र की इकोलॉजी के लिए खतरा है। उसने सुझाव दिया कि म्यूनिसिपल ठोस कचरे को उपचारित करने की क्षमता को बढ़ाने की तत्काल जरूरत है। दिल्ली सरकार की नई वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट्स को लगाने और मौजूदा प्लांट्स की प्रोसेसिंग क्षमता को बढ़ाने की योजनाओं को जल्दी लागू किया जाना चाहिए।
     
  • स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण का असर: वायु प्रदूषण के कारण सांस संबंधी संक्रमण, दिल की बीमारियां, फेफड़ों का कैंसर, सांस लेने में कठिनाई और दमा जैसी अनेक बीमारियां होती हैं और स्वास्थ्य बिगड़ता है। कमिटी ने कहा कि इस संबंध में पर्यावरण तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालयों को संयुक्त रूप से तत्काल उपाय और बचाव कार्य करने चाहिए।       

 

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