त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम

कैग की ऑडिट रिपोर्ट का सारांश

  • भारतीय नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने 8 जनवरी, 2019 को त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम का प्रदर्शन लेखा (परफॉरमेंस ऑडिट) जारी किया। त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (एआईबीपी) को 1996 में केंद्रीय सहायता कार्यक्रम के तौर पर शुरू किया गया था और वर्तमान में इसे जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय द्वारा लागू किया जाता है। एआईबीपी को उन सिंचाई परियोजनाओं के कार्यान्वयन में तेजी लाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था जिन्हें पूरा करना राज्यों की क्षमता से बाहर हो चुका है। मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:
     
  • परियोजनाओं को शामिल करने में अनियमितता: एआईबीपी में बताया गया है कि उसके दायरे में आने वाली परियोजनाओं और योजनाओं की पात्रता के क्या मानदंड हैं, जैसे परियोजना की लागत, उसकी निर्धारित समय अवधि और निर्माण का चरण। अपनी रिपोर्ट में कैग ने कहा कि 2008-17 (इस अवधि का ऑडिट किया गया) के दौरान 201 प्रमुख, मध्यम सिंचाई (एमएमआई) परियोजनाओं में से 30 परियोजनाएं इन मानदंडों का उल्लंघन करती हैं। ऑडिट में पाया गया कि लघु सिंचाई (एमआई) योजनाओं में से भी 41 मामलों में मानदंडों का उल्लंघन किया गया। इन अनियमितताओं से लगभग 3,718 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।
     
  • लाभ लागत अनुपात: किसी परियोजना की आर्थिक लाभप्रदता निर्धारित करने के लिए लाभ लागत अनुपात (बीसीआर) अनिवार्य होता है। किसी सिंचाई परियोजना की वार्षिक लागत और उससे प्राप्त होने वाले वार्षिक लाभ के बीच का अनुपात बीसीआर कहलाता है। कैग ने कहा कि नौ राज्यों की 28 एमएमआई परियोजनाओं और 10 राज्यों की 82 एमआई परियोजनाओं में बीसीआर की गणना करने के लिए एक समान मानदंडों का प्रयोग नहीं किया गया। पर्याप्त सर्वेक्षण नहीं किए गए और जल उपलब्धता का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं किया गया। अन्य कमियों के साथ, इन कारणों से भी बीसीआर की गणना में गलतियां हुईं। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह अनुपात गणना के मुकाबले कम था जिसके कारण डिजाइन में परिवर्तन किया गया और लागत अनुमानों में संशोधन किया गया। कैग ने एक उपाय यह सुझाया कि परियोजनाओं के बीसीआर की नियमित रूप से समीक्षा की जाए और वह वास्तविक पूर्वानुमानों पर आधारित हो।
     
  • धनराशि जारी करने में देरी: 2007-17 के दौरान जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय ने 115 एमएमआई परियोजनाओं के लिए 19,184 करोड़ रुपए और सभी एमआई परियोजनाओं के लिए 12,809 करोड़ रुपए जारी किए। कैग की रिपोर्ट के अनुसार कई परियोजनाओं को पर्याप्त धनराशि नहीं जारी की गई जिससे 1,251 करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान हुआ। ऑडिट में यह भी कहा गया कि राज्यों द्वारा प्रस्ताव सौंपे जाने में देरी और राज्य सरकारों को जारी धनराशि के लैप्स हो जाने का कारण ऐसा हुआ। इसके अतिरिक्त रिपोर्ट में कहा गया कि जल संसाधन मंत्रालय को 2,187 करोड़ रुपए की धनराशि के युटिलाइजेशन सर्टिफिकेट्स नहीं सौंपे गए। कैग ने सुझाव दिया कि राज्य सरकारों को काम की पर्याप्त जांच करने और जवाबदेही की प्रणाली विकसित करने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
     
  • धनराशि का दुरुपयोग: परियोजना रिपोर्ट्स की जांच के दौरान पाया गया कि अनुदानों का दुरुपयोग किया गया और उन्हें ऐसी जगहों पर खर्च किया गया, जोकि एआईबीपी में स्वीकृत नहीं हैं। कैग की रिपोर्ट में कहा गया कि 13 राज्यों में कुल 1,578 करोड़ रुपए का दुरुपयोग किया गया जिसके परिणामस्वरूप परियोजनाओं को समय पर पूरा करने के लिए जरूरी धनराशि की कमी हुई। रिपोर्ट में बैंक खातों में धनराशि जमा करने और धोखाधड़ी से खर्च करने जैसी वित्तीय अनियमितताओं को भी उजागर किया गया।
     
  • निवारक उपायों का अभाव: एआईबीपी के दिशानिर्देशों के अनुसार समय पर परियोजना को पूरा न करने पर अनुदान को ऋण मान लिया जाता है जिसे बाद में राज्य सरकार से वसूला जाता है। अपने ऑडिट में कैग ने पाया कि जल संसाधन मंत्रालय ने 105 परियोजनाओं के मामले में इस प्रावधान का इस्तेमाल नहीं किया। इन परियोजनाओं में एक साल से लेकर 18 साल की देरी हुई है। चूंकि कार्यक्रम का यह प्रावधान परियोजनाओं के समय पर पूरा न होने के निवारक के तौर पर तैयार किया गया था, इसलिए इस रवैये से यह प्रावधान कमजोर हुआ।
     
  • लागत में बढ़ोतरी: परियोजना को लागू करने में देरी, काम का अकुशल प्रबंधन तथा परियोजनाओं के दायरे में परिवर्तन से 84 परियोजनाओं की लागत 40,943 करोड़ रुपए से बढ़कार 1,20,772 करोड़ रुपए हो गई। कैग ने पाया कि लागत में बढ़ोतरी निम्नलिखित कारणों से हुई: (i) भूमि अधिग्रहण में देरी, (ii) भूमि अधिग्रहण एक्ट के हिसाब से पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन करने में देरी, और (iii) ठेकेदारों के साथ अनुचित तरह से पक्षपात करना। कैग ने कहा कि कई स्थितियों में विलंब को टाला जा सकता था और यह भी कि केंद्रीय एवं राज्य स्तरीय संस्थाओं ने पर्याप्त निगरानी नहीं की। कैग ने सुझाव दिया कि जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय को राज्य एवं केंद्रीय स्तर पर प्रदर्शन की नियमित समीक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए और परियोजनाओं को पूरा करने के प्रयासों को तेज करना चाहिए।

 

 

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