जिला खनिज फाउंडेशन और प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना का कार्यान्वयन

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश 

  • कोयला और स्टील संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: प्रो. चिंतामणि मालवीय) ने 27 दिसंबर, 2018 को ‘जिला खनिज फाउंडेशन (डीएमएफ) और प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (पीएमकेकेकेवाई) का कार्यान्वयन’ पर अपनी रिपोर्ट सौंपी।
     
  • 2015 में खान और खनिज (विकास और रेगुलेशन) एक्ट, 1957 का संशोधन किया गया था ताकि राज्य सरकारें डीएमएफ का गठन कर सकें। डीएमएफ खनन से प्रभावित होने वाले जिलों के लोगों को लाभान्वित करने के लिए काम करता है। एक्ट के अंतर्गत खानों के लीज होल्डर्स से डीएमएफ फंड्स में योगदान देने की अपेक्षा की जाती है। यह योगदान उनके द्वारा चुकाई जाने वाली रॉयल्टी के एक खास प्रतिशत के बराबर होता है। केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाओं के सहयोग से डीएमएफ द्वारा मंजूर प्रॉजेक्ट्स को लागू करने के लिए 2015 में पीएमकेकेकेवाई की शुरुआत की गई।

कमिटी के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • फंड्स का आबंटन: कमिटी ने गौर किया कि पीएमकेकेकेवाई के अंतर्गत 60% डीएमएफ फंड्स को उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों, जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, स्वच्छता और पर्यावरण संबंधी प्रॉजेक्ट्स के लिए उपयोग किया जाता है। कमिटी ने कहा कि इसके परिणामस्वरूप खनन से सीधे तौर से प्रभावित न होने वाले क्षेत्रों और लोगों पर भी फंड्स को खर्च किया जा रहा है। कमिटी ने सुझाव दिया कि 60% राशि को उच्च प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों में खर्च करने की शर्त को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। इसके बजाय इस राशि को उन इलाकों में रहने वाले लोगों पर खर्च किया जाना चाहिए जोकि खनन संबंधी गतिविधियों से सीधे प्रभावित होते हों।
     
  • कार्यान्वयन: कमिटी ने कहा कि अगस्त 2018 तक डीएमएफ के अंतर्गत 21,235 करोड़ रुपए एकत्र किए गए थे। इनमें से 15,548 करोड़ रुपए मूल्य के प्रॉजेक्ट्स मंजूर किए गए थे। यह भी गौर किया गया कि मंजूर किए गए 81,624 प्रॉजेक्ट्स में से 4,888 करोड़ रुपए मूल्य के 22,026 प्रॉजेक्ट्स ही पूरे हुए। इससे प्रॉजेक्ट्स शुरू न किए जाने और धीमी गति से व्यय करने की प्रवृत्ति प्रदर्शित होती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि खनन मंत्रालय को समयबद्ध आबंटन और आबंटित राशि के उपयोग के लिए एक निरीक्षण तंत्र कायम करना चाहिए। इसके अतिरिक्त प्रॉजेक्ट्स को लागू करने में गैर जरूरी देरी होने पर जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
     
  • डीएमएफ का संघटन: कमिटी ने कहा कि अधिकतर राज्यों के डीएमएफ में जन प्रतिनिधित्व कम है, और नौकरशाहों का प्रभुत्व है। कमिटी ने सुझाव दिया कि संसद के स्थानीय सदस्य (सदस्यों) को संबंधित डीएमएफ की गवर्निंग काउंसिल का चेयरपर्सन नियुक्त किया जाना चाहिए।
     
  • सोशल ऑडिट: खनन से प्रभावित होने वाले क्षेत्रों में डीएमएफ की उपयुक्तता और कार्य क्षमता निर्धारित करने के लिए उन क्षेत्रों में बसने वाले लोगों की राय महत्वपूर्ण होती है। इससे लोगों को उन योजनाओं पर नजर रखने का मौका मिलेगा जोकि उनके विकास के लिए लागू की जा रही हैं। इससे वे लोग डीएमएफ के अंतर्गत अपने अधिकारों और एंटाइटिलमेंट्स के संबंध में भी जागरूक होंगे। कमिटी ने सुझाव दिया कि मंत्रालय डीएमएफ के सोशल ऑडिट्स को विनिर्दिष्ट कर सकता है जोकि खनन से प्रभावित क्षेत्रों के निवासियों द्वारा किया जाएगा।  
     
  • जवाबदेही: कमिटी ने कहा कि डीएमएफ के कामकाज और उनके प्रॉजेक्ट्स में पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही का अभाव है। कमिटी ने सुझाव दिया कि सभी प्रासंगिक सूचनाओं (जैसे डीएमएफ का संयोजन, जमा किए जाने वाले फंड्स, प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित क्षेत्रों की सूची, और लाभार्थियों की सूची) को सार्वजनिक स्तर पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए। कमिटी ने कहा कि मंत्रालय ने राष्ट्रीय और जिला स्तर पर डीएमएफ की सूचना देने वाले पोर्टल विकसित किए हैं। उसने सुझाव दिया कि जब तक पोर्टल पर सूचनाएं उपलब्ध न हों, तब तक उन्हें वितरित करने के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं। इसके लिए जिला एवं पंचायती स्तर के कार्यालयों में सार्वजनिक बैठकों के दौरान सूचनाओं को डिसप्ले किया जा सकता है और जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जा सकता है।
     
  • निरीक्षण की व्यवस्था: कमिटी ने गौर किया कि मंत्रालय ने पीएमकेकेकेवाई के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कोई विशिष्ट कदम नहीं उठाए हैं। यह भी गौर किया गया कि कमिटी के सुझाव देने के बाद योजना के संबंध में राज्य सरकार के साथ विचार विमर्श के लिए बैठक आयोजित की गई। कमिटी ने सुझाव दिया कि मंत्रालय को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए और राज्यों में प्रॉजेक्ट्स के उचित कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए प्रयास करने चाहिए। इसके अतिरिक्त मंत्रालय को नियमित अंतराल पर बैठकों की समीक्षा करनी चाहिए और राज्य सरकारों के साथ प्रत्येक तीन महीने में नियमित रूप से बैठक करनी चाहिए।

 

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