ग्रामीण/कृषि बैंकिंग और फसल बीमा

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • वित्त संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर : डॉ. एम. वीरप्पा मोइली) ने 10 अगस्त, 2016 को ‘ग्रामीण/कृषि बैंकिंग और फसल बीमा की स्थिति’ पर अपनी रिपोर्ट सौंपी।
     
  • वित्तीय क्षेत्र तक ग्रामीण परिवारों की पहुंच न होना: कमिटी ने पाया कि मौजूदा समय में 31% ग्रामीण परिवार ऋणग्रस्त हैं लेकिन केवल 17% औपचारिक क्षेत्र (जैसे बैंक या को-ऑपरेटिव सोसायटी) से ऋण लेते हैं। इसका अर्थ यह है कि ग्रामीण परिवारों का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऋण के लिए अनौपचारिक स्रोतों (जैसे साहूकारों और गैर संस्थागत स्रोतों) पर निर्भर रहता है। कमिटी ने सुझाव दिया कि कृषि क्षेत्र के लिए संस्थागत ऋण के दायरे को बढ़ाए जाने की जरूरत है, साथ ही यह सुनिश्चित किया जाना भी जरूरी है कि यह ऋण गरीब और जरूरतमंद किसानों को प्राप्त हो।
     
  • कृषि ऋण में वृद्धि: कमिटी ने पाया कि कृषि ऋण का प्रवाह वर्ष 2004-05 में 1.3 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर वर्ष 2014-15 में 8.4 लाख करोड़ रुपए हो गया। उल्लेखनीय है कि आरबीआई ने कृषि क्षेत्र के लिए संस्थागत ऋण का लक्ष्य 18% रखा है और यह वृदधि भी इस लक्ष्य से काफी कम है। इसके अतिरिक्त इसी अवधि के कुल कृषि ऋण में कृषि और संबद्ध गतिविधियों के लिए किसानों को प्रत्यक्ष रूप से दिए जाने वाले ऋणों की हिस्सेदारी कम हुई है। कमिटी ने सुझाव दिया कि किसानों को अधिक ऋण देने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) योजना का प्रयोग किया जा सकता है। केसीसी का उद्देश्य किसानों को स्मार्ट/क्रेडिट कार्ड जारी करके, उन्हें खेती और अन्य कार्यों के लिए ऋण सहयोग प्रदान करना है। संस्थागत ऋण तक किसानों की पहुंच को बढ़ाने के लिए योजना के दायरे को भी बढ़ाया जा सकता है और उसे भूमि के रिकॉर्ड, जन धन खातों और आधार नंबरों से जोड़ा जा सकता है।
     
  • प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों को ऋण (प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग): कमिटी ने कहा कि संस्थागत कृषि ऋण के लिए निर्धारित 18% के लक्ष्य में 13.5% प्रत्यक्ष और 4.5% अप्रत्यक्ष ऋण होंगे। प्रत्यक्ष ऋण में किसानों को प्रत्यक्ष रूप से दिए जाने वाले अल्पावधि और कार्यशील पूंजी ऋण शामिल हैं और अप्रत्यक्ष ऋण में एजेंसियों, कृषि सहकारी संगठनों और भंडारण या सिंचाई के लिए दिए जाने वाले ऋण, इत्यादि शामिल हैं। अप्रैल, 2015 में आरबीआई द्वारा जारी संशोधित दिशानिर्देशों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष ऋण के अंतर को समाप्त करने की बात कही गई और छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए 8% की ऋण सीमा तय की गई।
     
  • कमिटी ने सुझाव दिया कि आरबीआई को कृषि ऋण के 18% के मौजूदा लक्ष्य को बढ़ाना चाहिए। कमिटी ने कहा कि वर्तमान में कृषि ऋण का एक बड़ा हिस्सा गैर कृषि गतिविधियों जैसे लॉजिस्टिक्स, गोदामों और कोल्ड स्टोरेज में चला जाता है। कमिटी का सुझाव है कि ऋण की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष श्रेणियों को वापस लाया जाना चाहिए। साथ ही छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए ऋण सीमा को बढ़ाया जाना चाहिए और इसे अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए।
     
  • क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक: कमिटी ने कहा कि क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबीज़) की मौजूदा संरचना अच्छी तरह काम नहीं कर रही, क्योंकि उनके पास पर्याप्त संसाधन और फंड्स नहीं हैं। कमिटी ने आरआरबीज़ के लिए राष्ट्रीय स्तर की एपेक्स बॉडी गठित करने का सुझाव दिया ताकि सुदूर और दुर्गम क्षेत्रों तक ऋण सुविधाओं को पहुंचाया जा सके।
     
  • नाबार्ड: कमिटी ने सुझाव दिया कि राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) को दीर्घावधि के लिए अधिक पूंजी प्रदान की जानी चाहिए। इससे नाबार्ड सहकारी संस्थाओं को और कृषि निवेश के लिए पर्याप्त ऋण प्रदान कर सकेगा। इसके अतिरिक्त नाबार्ड को सीधे किसानों को ऋण प्रदान करने चाहिए और जहां तक संभव हो, बिचौलियों को खत्म करना चाहिए।
     
  • ऋण का संवितरण: कमिटी ने पाया कि कृषि और ग्रामीण ऋण के संवितरण में भी कई अड़चने हैं जैसे कोलेट्रल (जमानत) सिक्योरिटी, संवितरण की कठिन प्रक्रियाएं और वित्तीय जानकारियों का अभाव। कमिटी ने सुझाव दिया कि आरबीआई और नाबार्ड को ऋण के संवितरण की प्रक्रिया को सहज बनाने के उपाय करने चाहिए जिससे उन तक पहुंच संभव हो, वे सरल और यूजर फ्रेंडली बन सकें। किसानों को उपलब्ध ऋण सुविधाओं के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए।
     
  • फसल बीमा: कमिटी ने पाया कि फसल बीमा प्रणाली के साथ निम्नलिखित समस्याएं बनी हुई हैं : (i) बीमा योजनाओं के संबंध में जागरूकता न होना, (ii) बीमा योजनाओं का अपर्याप्त कवरेज, (iii) फसलों का नुकसान होने की स्थिति में इस बात का मूल्यांकन करना कि नुकसान किस हद तक हुआ है, और (iv) दावों का समय पर निपटारा। कमिटी ने सुझाव दिया कि सरकार को इस संबंध में जागरूकता फैलानी चाहिए कि किन फसलों को लगाया जाना चाहिए जिन्हें मिट्टी की गुणवत्ता, बारिश के प्रभाव इत्यादि के आधार पर उगाया जाना चाहिए। इससे अनुत्पादक ऋणों की मांग में कमी आएगी। कुछ चुने हुए क्षेत्रों की चुनी हुई फसलों का ही बीमा नहीं होना चाहिए बल्कि देश की सभी फसलों को बीमा के दायरे में लाया जाना चाहिए।
     
  • कमिटी ने यह सुझाव भी दिया कि फसलों के नुकसान के मूल्यांकन का काम पूरा होना चाहिए और मुआवजे को निर्धारित समय पर किसानों के खातों में सीधे जमा किया जाना चाहिए।

 

 

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