गैस आधारित पावर प्लांट्स में स्ट्रेस्ड/नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश 

  • ऊर्जा संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: डॉ. कंभमपति हरिबाबू) ने 4 जनवरी, 2019 को ‘गैस आधारित पावर प्लांट्स में स्ट्रेस्ड/नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स’ पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:
     
  • बिजली क्षमता का उपयोग नहीं: वर्तमान में 345 गिगावॉट की कुल स्थापित क्षमता में से 24.9 मेगावाट (7%) क्षमता गैस आधारित पावर प्लांट्स से प्राप्त होती है। लेकिन गैस की घरेलू आपूर्ति में कमी और प्रतिस्पर्धात्मक शुल्क के चलते 14.30 गिगावॉट (57%) की बिजली क्षमता का उपयोग ही नहीं हो पाता। देश में 31 अप्रयुक्त (स्ट्रैंडेड) गैस आधारित बिजली संयंत्र हैं। इनमें एक केंद्र सरकार का, छह राज्य सरकारों के और 24 निजी क्षेत्र के हैं। घरेलू गैस उत्पादन में बढ़ोतरी की उम्मीद के साथ इनमें से अधिकतर की योजना तैयार की गई थी, खास तौर से कृष्णा गोदावरी धीरूभाई 6 (केजी-डी6) फील्ड से। लेकिन मार्च 2013 से केजी डी6 में उत्पादन लगभग शून्य हो गया। कमिटी ने कहा कि चूंकि सरकार द्वारा गैस आपूर्ति के आश्वासन के आधार पर बिजली संयंत्रों की स्थापना की जाती है, इसलिए यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वे इन संयंत्रों को स्ट्रेस के उबारने में मदद करे।
     
  • इस अप्रयुक्त क्षमता में 65,000 करोड़ रुपए का निवेश किया गया जिसमें से बैंकों द्वारा 50,000 करोड़ रुपए (77%) दिए गए। कमिटी ने कहा कि चूंकि यह बड़ी सरकारी राशि है इसलिए इसे बट्टे खाते में नहीं डाला जा सकता। कमिटी ने सुझाव दिया कि सरकार को इन अप्रयुक्त बिजली संयंत्रों को अपेक्षित सहयोग देना चाहिए ताकि उन्हें स्ट्रेस से उबारा जा सके।
     
  • गैस उत्पादन: कमिटी ने कहा कि 2011-12 से 2016-17 के दौरान घरेलू गैस उत्पादन में गिरावट हुई है, सिवाय 2017-18 में कुछ वृद्धि को छोड़कर। 2014-17 के दौरान रीगैसीफाइड लीक्विफाइड नेचुरल गैस (आरएलएनजी) के आयात में 41% की बढ़ोतरी हुई। वर्तमान में देश में गैस की 50% मांग को आयायित गैस से पूरा किया जाता है। इसके अतिरिक्त बिजली परियोजनाओं को निर्धारित राशि से 70% कम गैस आबंटित की जाती है। इस कमी के कारण गैस आधारित बिजली संयंत्रों का लोड फैक्टर (या क्षमता) 2009-10 में 67% से घटकर 24% रह गई है। कमिटी ने सुझाव दिया कि पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय को प्राकृतिक गैस की उपलब्धता को देखते हुए सावधानीपूर्वक भविष्य की योजनाएं बनानी चाहिए।  
     
  • प्राकृतिक गैस का आबंटन: कमिटी ने कहा कि नीतिगत परिवर्तनों के कारण गैस आधारित पावर प्लांट्स निष्क्रिय हो जाते हैं। उदाहरण के लिए 2010 में सरकार ने दिशानिर्देश दिए थे कि घरेलू प्राकृतिक गैस के आबंटन में गैस आधारित पावर प्लांट्स को शहरी क्षेत्रों से अधिक प्राथमिकता दी जाएगी। चूंकि शहरों में घरेलू और परिवहन संबंधी जरूरतों के लिए गैस वितरण किया जाता है। लेकिन 2013 और 2014 में जारी दिशानिर्देशों के अनुसार, गैस आबंटन में शहरी वितरण प्रणाली को पावर सेक्टर से अधिक प्राथमिकता दी गई। कमिटी ने कहा कि ऐसे नीतिगत बदलाव पावर सेक्टर के लिए हानिकारक साबित हुए हैं। इससे गैस आधारित प्लांट्स अपनी ऋण बाध्यताएं पूरी नहीं कर पाए और अब वे नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) में तब्दील होने के कगार पर हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि सरकार को भविष्य में ऐसे अनिश्चित नीतिगत बदलावों से बचना चाहिए। इसके अतिरिक्त गैस आबंटन में परिवर्तन से संबंधित नीति या दिशानिर्देश को भविष्य के लिहाज से तैयार किया चाहिए और इसका असर मौजूदा उपयोगकर्ताओं पर नहीं पड़ना चाहिए।  
     
  • प्राकृतिक गैस का मूल्य निर्धारण: कमिटी ने कहा कि सरकार सभी फील्ड्स में उत्पादित होने वाली प्राकृतिक गैस के बाजार मुक्त मूल्य निर्धारण पर विचार कर रही है। कमिटी ने कहा कि गैस कम मात्रा में उपलब्ध है और इसकी मांग अधिक है, आपूर्ति कम। ऐसे में बाजार मुक्त मूल्य निर्धारण से कीमतें हद से ज्यादा बढ़ जाएंगी। हालांकि बाजार मुक्त मूल्य निर्धारण से प्राकृतिक गैस के उत्पादकों को लाभ हो सकता है लेकिन यह पावर सेक्टर के लिए हानिकारक होगा जोकि रेगुलेटेड है और जहां 50% से अधिक गैस आधारित क्षमता का पहले से उपयोग नहीं हो रहा। इसके अतिरिक्त मंत्रालय प्राथमिक आबंटन से पावर सेक्टर को हटाने का प्रस्ताव रख चुका है। कमिटी ने कहा कि पावर सेक्टर रेगुलेटेड सेक्टर है, और इस नाते उसे अन्य क्षेत्रों के मुकाबले अधिक मात्रा में घरेलू गैस का आबंटन होना चाहिए। अन्यथा वे गैस आधारित प्लांट्स भी निष्क्रिय हो जाएंगे, जो फिलहाल काम कर रहे हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि सरकार को इन दोनों प्रस्तावों पर पुनर्विचार करना चाहिए।
     
  • ग्रिड की बैलेंसिंग: कमिटी ने गौर किया कि गैस आधारित क्षमता को बिजली की अत्यधिक (पीक) मांग के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, उनके अधिक रैंप अप रेट और क्विक स्टार्ट टाइम के कारण। ये प्लांट्स बिजली की अबाधित आपूर्ति को बरकरार रखते हुए ग्रिड को बैलेंस करने में मदद कर सकते हैं, खास तौर पर जब कोयला आधारित प्लांट्स को रैंप अप में समय लगता हो और शाम को सोलर प्लांट्स बंद हो जाते हों। इसलिए यह सुझाव दिया गया कि ऐसे गैस आधारित प्लांट्स को पीकिंग प्लांट्स के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है, चूंकि अधिक मांग होने पर उन्हें तुरंत स्विच ऑन किया जा सकता है। इन प्लांट्स को पीकिंग प्लांट्स के तौर पर चलाने से अल्प मात्रा में उपलब्ध घरेलू प्राकृतिक गैस का अधिक से अधिक इस्तेमाल किया जा सकेगा।

 

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