कॉम्पिटीशन लॉ रिव्यू कमिटी की रिपोर्ट

रिपोर्ट का सारांश

  • कॉम्पिटीशन लॉ रिव्यू कमिटी (चेयर: इंजेती श्रीनिवास) ने 26 जुलाई, 2019 को कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमें कॉम्पिटीशन एक्ट, 2002 में संशोधनों का सुझाव रखा गया है। प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने, प्रतिस्पर्धा विरोधी कार्यों को रोकने और उपभोक्ता अधिकारों के संरक्षण के लिए एक्ट में भारतीय कॉम्पिटीशन कमीशन (सीसीआई) की स्थापना का प्रावधान है।
     
  • गवर्निंग बॉडी: कमिटी ने सुझाव दिया कि सीसीआई की जवाबदेही को बढ़ाने के लिए एक गवर्निंग बॉडी बनाई जानी चाहिए और इसके लिए एक्ट में संशोधन किया जाना चाहिए। गवर्निंग बॉडी में एक चेयरपर्सन, छह पूर्णकालिक सदस्य और छह अल्पकालिक सदस्य होने चाहिए। गवर्निंग बॉडी अर्ध विधायी कार्य करेगी, नीतिगत फैसलों के संबंध में सुझाव देगी और निरीक्षणात्मक भूमिका निभाएगी।
     
  • जांच: एक्ट के अंतर्गत महानिदेशक (डीजी) एक्ट के उल्लंघनों की जांच करते हैं। कमिटी ने कहा कि डीजी की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है और वह प्रत्यक्ष रूप से उनके प्रति जवाबदेह होता है। प्रशासनिक कार्यकुशलता में सुधार के लिए कमिटी ने सुझाव दिया कि डीजी के कार्यालय को सीसीआई में समाहित कर दिया जाए।
     
  • अपीलीय अथॉरिटी: कमिटी ने कहा कि एक्ट के अंतर्गत सीसीआई के आदेशों के खिलाफ अपील की सुनवाई राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय ट्रिब्यूनल द्वारा की जाती है। एक्ट में यह अपेक्षा की गई है कि इन अपीलों का निस्तारण छह महीने की अवधि में हो जाना चाहिए। हालांकि कमिटी ने कहा कि ट्रिब्यूनल पर बहुत अधिक मामलों का दबाव है। इसलिए यह सुझाव दिया गया कि एक्ट के अंतर्गत सुनवाई के लिए एक समर्पित खंडपीठ बनाई जाए।
     
  • सेटलमेंट्स और कमिटमेंट्स: कमिटी ने कहा कि यूरोपीय संघ जैसे कुछ न्यायिक क्षेत्रों में एंटीट्रस्ट विवादों से जुड़े पक्षों को राहत दे दी जाती है। ये राहत सेटलमेंट्स और कमिटमेंट्स के रूप में होती है। सेटलमेंट्स आम तौर पर कार्टेल्स को उपलब्ध होते हैं और इनमें विवाद से जुड़े पक्षों से अपराध की स्वीकृति की अपेक्षा की जाती है। कमिटमेंट्स कार्टेल्स के अतिरिक्त सभी दूसरे मामलों पर लागू होते हैं और इनमें अपराध की स्वीकृति की जरूरत नहीं होती।
     
  • कमिटी ने कहा कि विवादों को जल्द से जल्द हल करने के लिए यह व्यवस्था की जानी चाहिए। उसने सुझाव दिया कि सीसीआई को सशक्त करने के लिए एक्ट में संशोधन किया जाना चाहिए ताकि कुछ किस्म के प्रतिस्पर्धा विरोधी समझौतों (जैसे एक्सक्लूसिव सप्लाई के समझौते) और प्रभुत्व के दुरुपयोग के लिए सेटलमेंट्स और कमिटमेंट्स का इस्तेमाल किया जा सके।
     
  • ग्रीन चैनल अधिसूचना: एक्ट के अंतर्गत एक विशिष्ट सीमा से अधिक वाले कॉम्बिनेशंस के लिए सीसीआई की मंजूरी की जरूरत होती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि विलय और अधिग्रहण वाले ऐसे मामलों के लिए, जिनसे प्रतिस्पर्धा पर कोई बड़ा असर नहीं होने वाला, सीसीआई की ऑटोमैटिक मंजूरी हेतु एक ‘ग्रीन चैनल’ रूट होना चाहिए। इनमें इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता के अंतर्गत आने वाले कॉम्बिनेशंस के मामले भी शामिल हो सकते हैं।
     
  • नियंत्रण को निर्धारित करने के लिए मैटिरियल इंफ्लूएंस: एक्ट कुछ खास तरीकों के जरिए बनने वाले कॉम्बिनेशंस को रेगुलेट करता है जैसे दो उद्यमों का विलय या एकीकरण, या शेयरों, वोटिंग राइट्स या उद्यम पर नियंत्रण के जरिए बनने वाले कॉम्बिनेशंस। लेकिन एक्ट में यह स्पष्ट नहीं है कि किस प्रकार के राइट्स को नियंत्रण कहा जाएगा। कमिटी ने सुझाव दिया कि नियंत्रण को निर्धारित करने के लिए एक मैटीरियल इंफ्लूएंस स्टैंटर्ड को शुरू किया जाए। कमिटी ने यह भी कहा कि मैटीरियल इंफ्लूएंसको रेगुलेशन के जरिए अधिसूचित किया जा सकता है।
     
  • विलय के आकलन की समय सीमा: एक्ट के अंतर्गत अधिसूचित कॉम्बिनेशन के रेगुलेशन में इस बात की अपेक्षा की गई है कि सीसीआई 30 दिनों के अंदर यह बताए कि क्या प्रतिस्पर्धा पर कॉम्बिनेशन का प्रतिकूल असर पड़ेगा। कमिटी ने सुझाव दिया कि सभी कॉम्बिनेशंस (ग्रीन चैनल कॉम्बिनेशन को छोड़कर) के लिए इस समय सीमा को तय करने के लिए एक्ट में संशोधन किया जाए। इसके अतिरिक्त एक्ट के अंतर्गत कॉम्बिनेशंस 210 दिनों के बाद ही अधिसूचित किए जा सकते हैं। कमिटी ने यह सुझाव दिया कि इस प्रक्रिया को निश्चित और पारदर्शी बनाने के लिए 210 दिनों की समय सीमा की सभी अनुमत छूटों को एक्ट में कोडिफाई किया जाना चाहिए।
     
  • हब और स्पोक कार्टेल्स: कमिटी ने कहा कि एक्ट में ऐसे कार्टेल्स को लक्षित नहीं किया गया है जिनमें थर्ड पार्टी (हब) दो या उससे अधिक प्रतिस्पर्धियों (स्पोक्स) के बीच संवेदनशील सूचना को साझा करके उनके साथ सांठ-गांठ करती है। उसने एक्ट में ऐसे संशोधनों का सुझाव दिया ताकि ऐसे हब्स की जवाबदेही तय की जा सके।
     
  • जुर्माना: कमिटी ने कहा कि एक्ट के अंतर्गत जुर्माने की रिकवरी दर बहुत कम है क्योंकि सीसीआई के बहुत से आदेशों को अदालतों में चुनौती मिल जाती है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि जुर्माना गैर अनुपातिक और बहुत अधिक महसूस होता है। इसलिए कमिटी ने सुझाव दिया कि सीसीआई को एक्ट के अंतर्गत जुर्माना लगाने और उसके कैलकुलेशन के संबंध में दिशानिर्देश जारी करने का जनादेश मिलना चाहिए।
     
  • डील वैल्यू की सीमा: कमिटी ने कहा कि कुछ कॉम्बिनेशंस, जिनमें डिजिटल मार्केट के अंग के रूप में लेनदेन होता है, परिसंपत्तियों की परंपरागत सीमाओं का पालन नहीं करते लेकिन प्रतिस्पर्धा पर उनका भी असर हो सकता है। उसने सुझाव दिया कि ऐसे कॉम्बिनेशंस के लिए मौजूदा सीमा के अतिरिक्त डील वैल्यू की सीमा को भी प्रस्तावित किया जाए।
     
  • कुछ परिभाषाओं में परिवर्तन: कमिटी ने क्रेताओं के कार्टेल को शामिल करने के लिए कार्टेल्स की परिभाषा में संशोधन का सुझाव दिया। इसके अतिरिक्त उसने सुझाव दिया कि सरकारी विभागों या एजेंसियों को शामिल करने के लिए एक्ट में उपभोक्ता की परिभाषा में संशोधन किया जाए। कमिटी ने यह भी कहा कि (कॉम्बिनेशन को निर्धारित करने के लिए) टर्नओवर की परिभाषा में संशोधन किया जाए ताकि इंट्रा ग्रुप सेल्स, अप्रत्यक्ष करों और व्यापार संबंधी छूट को इसमें से हटाया जा सके।

 

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