कृषि ऋण की समीक्षा पर रिपोर्ट

रिपोर्ट का सारांश

  • कृषि ऋण की समीक्षा करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने एक वर्किंग ग्रुप का गठन किया था। ग्रुप ने 13 सितंबर, 2019 को अपनी रिपोर्ट जारी की है। ग्रुप को निम्नलिखित की जांच करनी थी: (i) संस्थागत ऋण तक पहुंच, (ii) ऋण प्राप्त करने और समावेश में सहजता, और (iii) राज्य की वित्तीय स्थिति और ऋण व्यवस्था पर कर्ज माफी का असर। वर्किंग ग्रुप के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
     
  • अल्पावधि के फसल ऋणों का हिस्सा बढ़ा: वर्किंग ग्रुप ने कहा कि अल्पकालिक फसल ऋणों के लिए ब्याज सब्वेंशन स्कीम ने कृषि ऋण में ऐसे ऋणों की हिस्सेदारी 2000 में 51% से बढ़ाकर 2018 में 75% कर दी है। इस योजना ने दीर्घकालिक निवेश पर अल्पकालिक उत्पादन ऋण को प्रोत्साहित किया है, जो क्षेत्र की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। वर्किंग ग्रुप ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों को अपना पूंजीगत व्यय बढ़ाने की जरूरत है जो कृषि में निवेश ऋण की मांग को प्रोत्साहित करेगा। यह भी सुझाव दिया गया कि बैंकों को ब्याज सब्सिडी के दुरुपयोग को रोकने के लिए केवल किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से योजना के अंतर्गत फसल ऋण प्रदान करना चाहिए।
     
  • ऋण माफी: वर्किंग ग्रुप ने पाया कि 2014-15 के बाद से, 10 राज्यों ने 2.4 लाख करोड़ रुपये की ऋण माफी की घोषणा की है (2016-17 के सकल घरेलू उत्पाद का 1.4%), वह भी, ज्यादातर चुनावों के आस-पास। यह कहा गया है कि ऋण माफी कृषि संकट के अंतर्निहित कारणों का हल नहीं करती और ऋण संस्कृति को नष्ट करती है इससे मध्यम और दीर्घावधि में किसानों के हित को नुकसान हो सकता है। यह भी कहा गया कि ऋण माफी कृषि में उत्पादक निवेश के लिए उपलब्ध फाइनांशियल स्पेस को कम करती है। वर्किंग ग्रुप ने सुझाव दिया कि: (i) ऋण माफी से बचा जाना चाहिए, और (ii) केंद्र और राज्य सरकारों को कृषि की समग्र व्यवहार्यता और स्थिरता में सुधार के लिए कृषि नीतियों और इनपुट सबसिडी की समग्र समीक्षा करनी चाहिए।
     
  • संबद्ध गतिविधियों के लिए ऋण: वर्किंग ग्रुप ने कहा कि संबद्ध गतिविधियों (मवेशी, वानिकी और मत्स्य) को कुल कृषि ऋणों का सिर्फ 10% प्राप्त होता है जबकि वह कृषि उत्पादन में 40% का योगदान देती हैं। यह कहा गया कि इन गतिविधियों में संलग्न किसानों की उचित परिभाषा न होने के कारण ऐसा हो सकता है, चूंकि जनगणना किसानों को उनकी जोत के आधार पर भी पारिभाषित करती है। परिणामस्वरूप बैंक ऐसे किसानों को ऋण देने के लिए भूमि रिकॉर्ड्स की मांग करते हैं। इसके अतिरिक्त बैंकों के पास संबद्ध गतिविधियों के लिए ऋण देने हेतु प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग की तरह कोई विशिष्ट निर्देश भी नहीं है। वर्किंग ग्रुप ने सुझाव दिया कि संबद्ध गतिविधियों के लिए अलग से लेंडिंग टार्गेट होने चाहिए और बैंकों को दो लाख रुपए तक के ऋण देने के लिए भूमि रिकॉर्ड्स की मांग नहीं करनी चाहिए।
     
  • ऋण के स्रोत: वर्किंग ग्रुप ने कहा कि 2016-17 में किसान परिवारों ने अपनी 72% ऋण जरूरतों को संस्थागत स्रोतों और 28% को गैर संस्थागत स्रोतों, जैसे संबंधियों और साहूकारों से पूरा किया। ग्रुप ने कहा कि गैर संस्थागत स्रोतों पर निर्भरता के मुख्य कारण निम्नलिखित हो सकते हैं: (i) भूमिहीन मजदूरों, काश्तकारों और बटाईदारों के पास जमानत का न होना, (ii) खराब क्रेडिट रेटिंग, और (iii) ऐसी खेती करना जोकि व्यावसायिक रूप से लाभप्रद नहीं।
     
  • भूमि सुधार: वर्किंग ग्रुप ने कहा कि जमीन के उचित लीजिंग फ्रेमवर्क और रिकॉर्ड्स के अभाव में भूमिहीन मजदूरों, बटाईदारों, काश्तकारों और मौखिक पट्टाधारियों (ओरल लीजीज़) (ऐसे पट्टे लेने वाले लोग जिनका लिखित रिकॉर्ड नहीं होता) को संस्थागत ऋण लेने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त बेदखली के भय से वे कृषि भूमि में निवेश नहीं करते जिसके कारण अधिक उपज नहीं होती। ग्रुप ने केंद्र सरकार को यह सुझाव दिया कि वह राज्यों को भूमि रिकॉर्ड्स के डिजिटलीकरण और अपडेशन की प्रक्रिया को समय पर पूरा करने को कहे। जिन राज्यों के लैंड लीजिंग फ्रेमवर्क में बहुत अधिक रेगुलेशंस हैं, उन राज्यों को मॉडल लैंड लीजिंग एक्ट और आंध्र प्रदेश लैंड लाइंसेंस्ड कल्टीवेटर्स एक्ट, 2011 पर आधारित सुधारों को अपनाना चाहिए।
     
  • वर्किंग ग्रुप ने कहा कि बहुत से राज्यों ने मॉडल एक्ट्स जैसे सुधार नहीं किए हैं। इसका कारण यह हो सकता है कि विचार-विमर्श के दौरान राज्यों द्वारा व्यक्त चिंताओं पर सर्वसम्मति कायम नहीं हुई। वर्किंग ग्रुप ने सुझाव दिया कि सर्वसम्मति कायम करने के लिए केंद्र सरकार को जीएसटी परिषद की तरह एक परिसंघ बनाना चाहिए ताकि कृषि सुधारों पर सुझाव दिए जा सकें और उन्हें लागू किया जा सके।
     
  • छोटे और सीमांत किसानों को ऋण: वर्किंग ग्रुप ने कहा कि छोटे और सीमांत किसानों के पास 86% कृषि जोत हैं और कुल खेतिहर क्षेत्र में उनकी हिस्सेदारी 47% है (2015-16)। हालांकि ऐसे केवल 41% किसानों को बैंकों द्वारा कवर किया जा सकता है। यह सुझाव दिया गया कि छोटे और सीमांत किसानों के लिए लेंडिंग टार्गेट को दो वर्षों में 8% से बढ़ाकर 10% किया जाना चाहिए।
     
  • ऋण में क्षेत्रीय भिन्नताएं: वर्किंग ग्रुप के अनुसार, कुछ राज्यों को अपनी कृषि जीडीपी के अनुपात में अधिक ऋण मिल रहा है जोकि इस बात का संकेत हो सकता है कि यह ऋण गैर कृषि उद्देश्यों के लिए लिया जा रहा है। इसके विपरीत देश के मध्य, पूर्वी और उत्तर पूर्वी क्षेत्रों में स्थित राज्यों में ऋण जीडीपी अनुपात निम्न है। ग्रुप ने सुझाव दिया कि प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग के नियमों की समीक्षा की जानी चाहिए और इन क्षेत्रों में ऋण में सुधार हेतु उपयुक्त उपाय किए जाने चाहिए।

 

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