एयरलाइन कंपनियों के कर्मचारियों और चालक दल के सदस्यों हेतु सुरक्षा एवं सामाजिक संरक्षण संबंधी उपाय

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश 

  • श्रम संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: डॉ. किरीट सोमैय्या) ने 28 दिसंबर, 2018 को हवाई कर्मचारियों की सुरक्षा एवं सामाजिक संरक्षण पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट का नाम है- ‘शेड्यूल्ड/नॉन-शेड्यूल्ड/टेस्ट फ्लाइंग एयर ऑपेटर/मेनटेनेंस रीपेयर एंड ओवरहॉल (एमआरओ) कंपनियां- उनके श्रमिकों/कर्मचारियों के लिए सुरक्षा एवं सामाजिक संरक्षण उपाय, विशेष रूप से हवाई जहाज के चालक दल के सदस्यों के संदर्भ में’। यह रिपोर्ट नॉन-शेड्यूल्ड निजी विमानों के दुर्घटनाग्रस्त होने के कुछ मामलों पर केंद्रित है। कमिटी ने ऐसी नॉन-शेड्यूल्ड निजी हवाई सेवाओं को रेगुलेट करने के लिए कुछ सुझाव दिए हैं। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:
     
  • नॉन-शेड्यूल्ड ऑपरेटर: शेड्यूल्ड हवाई परिवहन सेवा वह होती है जोकि हमेशा दो या दो से अधिक तयशुदा स्थानों पर उड़ान भरती है। वह पब्लिश किए गए टाइम टेबल के अनुसार चलाई जाती है या नियमित रूप से उड़ाई जाती है। उन विमान सेवाओं को आम यात्रियों के लिए चालू होना चाहिए। शेड्यूल्ड ऑपरेटरों को नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) से एयर ऑपरेटर सर्टिफिकेट दिया जाता है। नॉन-शेड्यूल्ड हवाई परिवहन सेवा यात्रियों, डाक और वस्तुओं के लिए चलाई जाती है। इनमें चार्टर फ्लाइट्स और हेलीकॉप्टर शामिल होते हैं।
     
  • कमिटी ने कहा कि नागरिक उड्डयन क्षेत्र के विकास तथा हवाई यातायात और यात्रियों के बढ़ने से नॉन-शेड्यूल्ड निजी विमानों/हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। इस समय नॉन-शेड्यूल्ड ऑपरेटरों के पास 400 विमान हैं। हालांकि नॉन-शेड्यूल्ड निजी विमानों की दुर्घटनाओं की संख्या में भी बढ़ोतरी हो रही है। इसलिए कमिटी ने सुझाव दिया कि इनके लिए रेगुलेटरी व्यवस्था की जरूरत है। कमिटी ने यह भी कहा कि इन हवाई जहाजों की दुर्घटनाओं में अनेक यात्री, कर्मचारी और जमीन पर आम नागरिक मारे गए हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि नागरिक उड्डयन मंत्रालय, डीजीसीए और श्रम मंत्रालय को: (i) सुरक्षा संबंधी मौजूदा दिशानिर्देशों (पायलट, क्रू और ग्राउंड स्टाफ के लिए) और उनके क्रियान्वयन की समीक्षा करनी चाहिए, और (ii) ऐसे नॉन-शेड्यूल्ड विमानों के कर्मचारियों के सामाजिक संरक्षण और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए रेगुलेटरी व्यवस्था की जानी चाहिए।
     
  • हवाई दुर्घटनाएं: कमिटी ने कहा कि कई बार हवाई दुर्घटनाओं और लोगों की मृत्यु के बाद जरूरी कार्रवाई की गई है। अगर उड़ान भरने की अनुमति देने से पहले अथॉरिटीज़ ने सुरक्षा संबंधी मानंदडों की जांच की होती तो इन दुर्घटनाओं को रोका जा सकता था। कमिटी ने सुझाव दिया कि डीजीसीए को हवाई दुर्घटनाओं को रोकने के लिए ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए ताकि किसी ऑपरेटर द्वारा सुरक्षा मानदंडों की अवहेलना की सूचना मिलने पर यथा समय कड़ी कार्रवाई की जा सके।
     
  • श्रम कानूनों के अंतर्गत कवरेज: हवाई दुर्घटना के एक मामले पर कमिटी ने कहा कि मृत पायलट्स और टेक्नीशियंस के नाम सिर्फ इसलिए तय नहीं किए जा सके, क्योंकि वर्क साइट पर मस्टर रोल और वेज (वेतन संबंधी) रजिस्टर ही नहीं रखे जाते थे। कमिटी ने कहा कि श्रम और रोजगार मंत्रालय को ऐसी सभी कंपनियों का निरीक्षण करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मस्टर रोल और वेज रजिस्टर मौजूद हों। इसके अतिरिक्त श्रम कानूनों (जैसे कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान एक्ट, 1952) के उल्लंघन की जांच करनी चाहिए।
     
  • वेतन: कमिटी ने कहा कि कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान एक्ट, 1952 के अंतर्गत, 15,000 रुपए से कम प्रति माह वेतन पाने वाले कर्मचारी ही कर्मचारी भविष्य निधि योजना के लाभ के लिए हकदार हैं। चूंकि इंजीनियरों, क्रू सदस्यों, केबिन क्रू और ग्राउंड स्टाफ का वेतन 15,000 रुपए से अधिक होता है, उनमें से अधिकतर कर्मचारी इस योजना के दायरे से बाहर होते हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि श्रम और रोजगार मंत्रालय तथा कर्मचारी भविष्य निधि संगठन को मौजूदा वेतन सीमा को बढ़ाने के लिए कदम उठाने चाहिए ताकि अधिक से अधिक कर्मचारियों को इसके दायरे में लाया जा सके।
     
  • मुआवजा: कमिटी ने कहा कि एयरक्राफ्ट एसिडेंट इनवेस्टिगेशन ब्यूरो (एएआईबी) की प्रारंभिक या अंतिम रिपोर्ट पर किसी पीड़ित व्यक्ति का मुआवजा निर्भर करता है। हालांकि यह अस्पष्ट है कि जांच पूरी होने या रिपोर्ट सौंपे जाने के लिए क्या कोई समय सीमा निश्चित है। कमिटी ने सुझाव दिया कि एएआईबी द्वारा हवाई दुर्घटनाओं की जांच के लिए दिशानिर्देश बनाए जाएं। रिपोर्ट एक वर्ष के भीतर सौंपी जाए। समय सीमा बढ़ाने के उपयुक्त कारण बताए जाने के बाद ही उस समय सीमा को बढ़ाया जाए।
     
  • कमिटी ने यह भी कहा कि एफआईआर करने में देरी होने के कारण भी कर्मचारियों के सामाजिक लाभों को निपटाने में देरी हो सकती है। यह कहा गया कि एयरक्राफ्ट एक्ट, 1934 में एफआईआर दायर करने से जुड़े प्रावधान नहीं हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि एक्ट में जरूरी प्रावधान किए जाएं जिससे हवाई दुर्घटनाओं की एफआईआर कम से कम समय में फाइल की जा सकें।

 

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