उर्वरक सब्सिडी की प्रणाली

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • रसायन एवं उर्वरक संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: सुश्री के. कनिमोझी) ने 17 मार्च, 2020 को ‘उर्वरक सब्सिडी की प्रणाली’ विषय अपनी रिपोर्ट सौंपी। केंद्र सरकार उर्वरकों के मैन्यूफैक्चरर्स और आयातकों को सब्सिडी प्रदान करती है ताकि किसान सस्ती कीमतों पर उर्वरक खरीद सकें। कमिटी के प्रमुख निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
     
  • सब्सिडी नीति में परिवर्तन: कमिटी ने कहा कि उर्वरक सब्सिडी ने कृषि उत्पादकता में इजाफा किया जोकि देश की बड़ी आबादी की खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी था। हालांकि इसका नकारात्मक असर भी हुआ, जैसे उर्वरकों का बहुत अधिक इस्तेमाल किया गया, उसका असंतुलित इस्तेमाल हुआ और भूक्षरण हुआ। कमिटी ने कहा कि सरकार सब्सिडी की व्यवस्था और उस प्रणाली पर विचार कर रही है जोकि इस नीति में सुधार कर सके। इस संबंध में नीति आयोग ने विभिन्न हितधारकों को मसौदा रिपोर्ट दी है।
     
  • कमिटी ने कहा कि मौजूदा उर्वरक सब्सिडी नीति में बहुत अधिक परिवर्तन करने से देश की खाद्य सुरक्षा पर काफी असर होगा। उसने निम्नलिखित सुझाव दिए: (i) ऐसा कोई भी कठोर परिवर्तन करने से पहले गहन अध्ययन किया जाना चाहिए और सभी हितधारकों के साथ व्यापक सलाह-मशविरा किया जाना चाहिए (संबंधित केंद्रीय और राज्य सरकार के विभागों, उर्वरक उद्योग और किसान तथा उनके संगठनों सहित), (ii) जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लिया जाना चाहिए, (iii) छोटे और सीमांत किसानों के हितों को ध्यान में रखा जाना चाहिए, और (iv) सर्वोत्तम अंतरराष्ट्रीय पद्धतियों का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया जाना चाहिए। उसने यह सुझाव भी दिया कि उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल पर किसानों की जानकारी और उनकी जागरूकता को इस नीति का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए।
     
  • किसानों को प्रत्यक्ष सब्सिडी: कमिटी ने कहा कि उर्वरक बनाने वाले बहुत से संयंत्र पुरानी तकनीक और प्रणाली का प्रयोग कर रहे हैं, और उनकी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं हो रहा। सरकार उच्च सब्सिडी देकर उनकी अक्षमता की कीमत चुका रही है। कमिटी ने सुझाव दिया कि कंपनियों को अपने अनुसार उर्वरकों को बनाने, सप्लाई करने और बेचने के लिए स्वतंत्र कर दिया जाना चाहिए। किसानों को विभिन्न ब्रांड्स से अपनी पसंद के उर्वरक को खरीदने की छूट होनी चाहिए और सब्सिडी को उनके बैंक खातों में सीधे भेजा जाना चाहिए। इस प्रणाली से मैन्यूफैक्चरर्स को लागत प्रभावी तरीके से उर्वरक बनाने और खरीदने का मौका मिलेगा और इस प्रक्रिया में अक्षम संयंत्र बाहर हो जाएंगे। उसने यह सुझाव भी दिया कि सरकार को ऐसी प्रणाली अपनाने के लिए एक स्पष्ट और सुदृढ़ रोडमैप तैयार करना चाहिए जहां किसानों को सीधे सब्सिडी मिले और उर्वरकों की मैन्यूफैक्चरिंग और आयात को बाजार की शक्तियों से मुक्त किया जाए।
     
  • बकाया सब्सिडी चुकाने में देरी: कमिटी ने कहा कि कंपनियों को लंबे समय से सब्सिडी न चुकाने के कारण हर साल देनदारियां बढ़ रही हैं। 2017-18 के अंत में, 19,363 करोड़ रुपए की लागत वाले 2,688 सब्सिडी बिल्स निपटान के लिए लंबित थे। 2018-19 के अंत में 30,244 करोड़ रुपए की लागत वाले 9,223 बिल्स लंबित थे। कमिटी ने कहा कि अपर्याप्त बजट आबंटन के कारण धनराशि की कमी निपटान में विलंब का मुख्य कारण है। कमिटी ने सुझाव दिया कि उर्वरक विभाग को वित्त मंत्रालय को सब्सिडी हेतु जरूरी राशि के बारे में सटीक जानकारी देनी चाहिए और इस उद्देश्य के लिए पर्याप्त बजट आबंटन के संबंध में अवगत कराना चाहिए।
     
  • कमिटी ने कहा कि सरकार उर्वरक मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों को उन सब्सिडी बिल्स पर बैंक से लोन लेने की अनुमति देती है जिनका भुगतान नहीं किया गया है। इस प्रकार कंपनियां अपनी वित्तीय समस्याओं को दूर कर सकती हैं। सरकार इन लोन्स पर चुकाए जाने वाले ब्याज की लागत का वहन करती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि ब्याज भुगतान पर खर्च न करना पड़े, इसके लिए वित्त मंत्रालय से लंबित देय चुकाने हेतु एक बार में अतिरिक्त बजट आबंटन की मांग की जा सकती है।
     
  • कमिटी ने कहा कि अक्सर सब्सिडी के भुगतान में देरी के कारण लंबित राशि बहुत अधिक होती है और कई मामलों में यह विलंब काफी लंबी अवधि का होता है। नीतिगत दिशानिर्देशों के अनुसार, उर्वरक कंपनियों द्वारा सौंपे गए दावों को सात दिनों में निपटाया जाना चाहिए। कमिटी ने सुझाव दिया कि उर्वरक विभाग को एक ऐसी प्रणाली विकसित करनी चाहिए जिसके अंतर्गत दावे की राशि के एक निश्चित अनुपात (जैसे 75%) को लंबी चौड़ी जांच किए बिना इस अवधि में स्वतः चुका दिया जाए। शेष राशि का भुगतान भी सभी दस्तावेज प्रस्तुत करने के आधार पर एक निश्चित समय सीमा में कर दिया जाना चाहिए।
     
  • सब्सिडी पर व्य: कमिटी ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में उर्वरक सब्सिडी पर सरकार का व्यय बढ़ा है। उसने कहा कि हालांकि सब्सिडी देना जरूरी है, यह भी सरकार की जिम्मेदारी है कि वह दाम बढ़ाए बिना नए तरीके अपनाकर व्यय को नियंत्रित करे। कमिटी ने सुझाव दिया कि सरकार सब्सिडी पर व्यय को कम करने के लिए सभी संभव कदम उठाए, जैसे: (i) उर्वरक मैन्यूफैक्चरिंग संयंत्रों का आधुनिकीकरण, (ii)  मैन्यूफैक्चरिंग की सर्वोत्तम पद्धतियों और बिजली के सख्त नियमों को अपनाना, और (iii) मैन्यूफैक्चरिंग तकनीक को निरंतर अपग्रेड करने के लिए मजबूत अनुसंधान और विकास आधार को विकसित करना ताकि मैन्यूफैक्चरिंग की लागत को कम किया जा सके।

 

 

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