अनुचित तरीके से मुकदमा चलाना (न्याय की हत्या): कानूनी उपाय

लॉ कमीशन की रिपोर्ट का सारांश

  • लॉ कमीशन ऑफ इंडिया (चेयर: जस्टिस बी.एस.चौहान) ने 30 अगस्त, 2018 को अनुचित तरीके से मुकदमा चलाना (न्याय की हत्या): कानूनी उपायपर अपनी रिपोर्ट सौंपी। 2016 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक आदेश में लॉ कमीशन से कहा था कि वह अनुचित तरीके से मुकदमा चलाने के संबंध में कानूनी उपायों की जांच करे। कमीशन ने कहा कि वर्तमान में ऐसा कोई कानूनी ढांचा नहीं है जो उन लोगों को राहत प्रदान करे, जिनके खिलाफ अनुचित तरीके से मुकदमा चलाया गया। कमीशन के मुख्य सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:
     
  • कानूनी रूपरेखा: कमीशन ने कहा कि न्यायालय की गलती के परिणामस्वरूप अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ अनुचित तरीके से मुकदमा चलाया जाता है तो उस व्यक्ति को मुआवजा मिलना चाहिए। इसके लिए कमीशन ने आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) में संशोधन का सुझाव दिया। न्यायालय की गलती का अर्थ है अनुचित तरीके से दुर्भावनापूर्ण मुकदमा चलाना, भले ही उसका परिणाम दोष सिद्धि हो या गलत तरीके से कैद में रखना।
     
  • कॉज ऑफ एक्शन: मुआवजे का दावा करते समय वादी (क्लेमेंट) के लिए कॉज ऑफ एक्शन (कारण) यह होगा कि उसके खिलाफ किसी मामले में अनुचित तरीके से मुकदमा चलाया गया था जोकि उसकी रिहाई के साथ समाप्त हुआ। अनुचित तरीके से मुकदमा चलाने में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) दुर्भावनापूर्ण तरीके से मुकदमा चलाना, यानी अगर किसी व्यक्ति ने वादी के खिलाफ मामला दायर किया है, बिना इस विश्वास के, कि उसने यह अपराध किया है, और (ii) अच्छे उद्देश्य के बिना मुकदमा चलाना, यानी जब कोई वादी के खिलाफ लापरवाही से मामला दायर करता है।
     
  • मुआवजे का दावा कौन कर सकता है: अनुचित तरीके से मुकदमा चलाने के कारण शरीर, दिमाग, प्रतिष्ठा और संपत्ति के नुकसान के लिए मुआवजे का दावा किया जा सकता है। यह दावा आरोपी व्यक्ति, या उसके द्वारा अधिकृत एजेंट, या उसके वारिसों या कानूनी प्रतिनिधि (उसकी मृत्यु के बाद) द्वारा दायर किया जा सकता है।
     
  • विशेष अदालतें: कमीशन ने कहा कि वादी के हित को ध्यान में रखते हुए मुआवजे के दावे को जल्द से जल्द निपटाया जाना चाहिए। इसलिए कमीशन ने मुआवजे के दावों पर फैसला लेने के लिए प्रत्येक जिले में विशेष अदालतों को स्थापित करने का सुझाव दिया।
     
  • कानूनी कार्यवाही की प्रकृति: मामले के त्वरित निपटारे के लिए जैसी भी प्रक्रिया निर्धारित की जाएगी, विशेष अदालत उसका अनुपालन करेगी। इसके अतिरिक्त यह आरोपी की जिम्मेदारी होगी कि वह अपने दुराचरण को साबित करे जिसके आधार पर उसके खिलाफ अनुचित तरीके से मुकदमा चलाया गया है। दावे पर फैसला संभावनाओं के संतुलन के आधार पर किया जाएगा, यानी जिस पक्ष का दावा सही प्रतीत होगा, उसके पक्ष में फैसला सुनाया जाएगा।
     
  • मुआवजा: कमीशन ने कहा कि मौजूदा स्थिति में मौद्रिक मुआवजे को निर्धारित करना संभव नहीं होगा। उसने सुझाव दिया कि सीआरपीसी में संशोधन किए जाएं ताकि उन मार्गदर्शक सिद्धांतों को संहिता में शामिल किया जा सके, जिनके आधार पर अदालतें मुआवजे की राशि तय कर सकें। इनमें अपराध की गंभीरता, सजा की कठोरता, सजा की अवधि, स्वास्थ्य को नुकसान, प्रतिष्ठा की क्षति और अवसर गंवाना शामिल है।
     
  • इसके अतिरिक्त कमीशन ने सुझाव दिया कि कानून के अंतर्गत मुआवजे में आर्थिक (मौद्रिक) और गैर आर्थिक सहायता (जैसे काउंसिलिंग सेवाएं और व्यावसायिक दक्षता विकास), दोनों शामिल होनी चाहिए। उसने बल दिया कि गैर आर्थिक सहायता में उन अयोग्यताओं (डिस्कवालिफिकेशंस) को हटाने का प्रावधान भी होना चाहिए जो मुकदमेबाजी (या सजा) से जुड़ी होती हैं। इनमें ऐसी डिस्कवालिफिकेशंस शामिल हैं जो व्यक्ति की रोजगार तलाशने और शैक्षणिक संस्थाओं में दाखिला पाने की संभावनाओं को प्रभावित करती हैं।  
     
  • कमीशन ने सुझाव दिया कि जिन मामलों में वादी को तत्काल सहायता की जरूरत हो, कानून के अंतर्गत उन मामलों में अंतरिम मुआवजे के भुगतान का प्रावधान होना चाहिए।   

 

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