राज्यों की वित्तीय स्थिति : 2018-19

इस रिपोर्ट में 29 में से 26 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली शामिल हैं। इन राज्यों में भारत की 99% जनसंख्या रहती है और इनका बजट सभी राज्यों के बजट का 98% है। जिन राज्यों को इस रिपोर्ट में शामिल नहीं किया गया है, वे हैं अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और मेघालय, चूंकि हमें उन राज्यों का पिछले आठ वर्षों (2011-12 से 2018-19) का विस्तृत बजट दस्तावेज उपलब्ध नहीं हुआ।

रिपोर्ट में दर्ज चार्ट्स में राज्यों के लिए निम्नलिखित संक्षिप्त नामों का इस्तेमाल किया गया है।

राज्य

संक्षिप्त

राज्य

संक्षिप्त

राज्य

संक्षिप्त

आंध्र प्रदेश

AP

जम्मू एवं कश्मीर

JK

पंजाब

PB

असम

AS

झारखंड

JH

राजस्थान

RJ

बिहार

BR

कर्नाटक

KA

सिक्किम

SK

छत्तीसगढ़

CG

केरल

KL

तमिलनाडु

TN

दिल्ली

DL

मध्य प्रदेश

MP

तेलंगाना

TS

गोवा

GA

महाराष्ट्र

MH

त्रिपुरा

TR

गुजरात

GJ

मिजोरम

MZ

उत्तराखंड

UK

हरियाणा

HR

नागालैंड

NL

उत्तर प्रदेश

UP

हिमाचल प्रदेश

HP

ओड़िशा

OD

पश्चिम बंगाल

WB

एक झलक

2018-19 में राज्यों द्वारा केंद्र सरकार की तुलना में 72% अधिक व्यय करने की उम्मीद है जोकि 2014-15 (13वें वित्त आयोग का अंतिम वर्ष) के मुकाबले काफी अधिक है। इस दौरान राज्यों ने 46% का व्यय किया था। इसलिए नागरिकों को प्रभावित करने वाला अधिकतर व्यय राज्य स्तर पर निर्धारित होता है। इस बीच जीएसटी के लागू होने के बाद प्राप्तियों से संबंधित फैसले केंद्र के स्तर पर केंद्रीकृत हो रहे हैं। इस रिपोर्ट में हम उन हालिया घटनाक्रमों पर चर्चा कर रहे हैं जो राज्यों की वित्तीय स्थितियों को प्रभावित करते हैं, साथ ही पिछले आठ वर्षों की प्रवृत्तियों पर भी विचार कर रहे हैं।

  • जीएसटी ने प्राप्तियों पर राज्यों की फ्लेक्सिबिलिटी को कम किया: 2018-19 में राज्यों के राजस्व में केंद्रीय हस्तांतरण का अनुमान 48% है। जीएसटी के लागू होने के बाद (जीएसटी परिषद द्वारा निर्धारित टैक्स की दरें) राज्यों के राजस्व पर उनकी स्वायत्तता 17% और कम होने की उम्मीद है। इस प्रकार अपने राजस्व पर राज्यों की फैसला लेने की शक्ति 35% रह जाएगी (देखें पेज 2-3)। हालांकि अनेक राज्यों के राजस्व में बढ़ोतरी हुई है, चूंकि केंद्र ने जीएसटी में शामिल होने वाले टैक्सों पर पांच वर्ष के लिए 14% की वार्षिक वृद्धि की गारंटी दी है।

रेखाचित्र 1: जीएसटी के लागू होने से अपने राजस्व पर राज्यों की स्वायत्तता कम होने की उम्मीद है (2018-19)

  • जीएसटी में पेट्रोलियम उत्पादों के राजस्व का नुकसान: यह जीएसटी परिषद तय करेगी कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में कब शामिल किया जाए। वर्तमान में टैक्स दरें ऊंची हैं (25 राज्यों में 20% से अधिक सेल्स टैक्स और पेट्रोलियम पर लगभग 24% एक्साइज ड्यूटी), लेकिन इन दरों के कम होने की संभावना और इनपुट क्रेडिट टैक्स की उपलब्धता को देखते हुए, जब ये उत्पाद जीएसटी के दायरे में आ जाएंगे तब अनेक राज्यों को राजस्व का बड़ा नुकसान होगा (देखें पेज 3-4)।

रेखाचित्र 2: राज्यों द्वारा पेट्रोल और डीजल पर वसूला जाने वाले सेल्स टैक्स/वैट की दरें (1 नवंबर, 2018 तक)

  • 15वां वित्त आयोग: जब 15वां वित्त आयोग उन मानदंडों का सुझाव देगा, जिनके आधार पर 2020-25 की अवधि के लिए राज्यों को केंद्रीय करों का हस्तांतरण किया जाएगा तो वह 1971 की बजाय 2011 के जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करेगा। इससे जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में काम करने वाले राज्यों का हिस्सा कम हो जाएगा। हालांकि उन राज्यों को जनसंख्या वृद्धि में गिरावट हेतु दिए जाने वाले इनसेंटिव्स के जरिए इस कमी को दूर किया जा सकता है। आयोग ने राजस्व घाटा अनुदानों की जरूरत की भी समीक्षा की। इसका असर उन राज्यों पर पड़ता है जोकि अपने राजस्व व्यय के वित्त पोषण के लिए उन पर निर्भर रहते हैं (देखें पेज 4 से 7)।
  • 7वें वित्त आयोग का असर: 7वें वेतन आयोग द्वारा केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में बढ़ोतरी के बाद कुछ राज्यों ने भी अपने कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि की। इससे 2017-18 में उन राज्यों के राजस्व व्यय में 25% की वृद्धि हुई और उनके राजकोषीय संतुलन पर असर हुआ। अगर अन्य राज्य भी ऐसा करते हैं तो उनके व्यय में भी वृद्धि दर्ज की जाएगी (देखें पेज 7-8)।
  • कृषि संकट का असर: आठ राज्यों ने कृषि संकट के बाद कर्ज माफी की घोषणा की जो कि 1,77,241 करोड़ रुपए के बराबर है। कर्ज माफी के कारण इन राज्यों की उधारियों बढ़ सकती हैं। इसके अतिरिक्त कई चीनी मिलों में गन्ना किसानों का बकाया बाकी है, जिसके कारण चीनी क्षेत्र संकट में है। अगर राज्य कोई राहत पैकेज तैयार करते हैं तो इससे राज्यों पर राजकोषीय दबाव बढ़ेगा (देखें पेज 8-9)।

राज्यों की वित्तीय स्थितियों पर थीम्स विकसित करना

जीएसटी के लागू होने के बाद राज्यों की अपने राजस्व पर 65% की सीमित फ्लेक्सिबिलिटी होगी

राज्य राजस्व के लिए मुख्य रूप से दो स्रोतों पर निर्भर करते हैं- अपने राजस्व पर और केंद्रीय हस्तांतरणों पर। राज्य अपने आप राजस्व अर्जित करते हैं, जबकि केंद्रीय हस्तांतरणों में केंद्रीय करों के हस्तांतरण से होने वाली प्राप्तियां और सहायतानुदान शामिल होते हैं। 2018-19 में राज्यों को स्वयं अपने स्रोतों से 52% राजस्व प्राप्तियां होने का अनुमान है, जबकि 48% राजस्व केंद्र के हस्तांतरणों से प्राप्त होने की उम्मीद है। चूंकि केंद्रीय हस्तांतरण राज्यों के क्षेत्राधिकार से बाहर का विषय हैं, इसलिए राज्यों पास अपने राजस्व के एक बड़े हिस्से के संबंध में फैसले लेने का अधिकार नहीं है।

अब राज्यों द्वारा वसूले जाने वाले अनेक अप्रत्यक्ष करों का स्थान जीएसटी ने ले लिया है। पहले जहां ये सभी टैक्स राज्यों के नियंत्रण में थे, जीएसटी दरों को अब जीएसटी परिषद द्वारा तय किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि वस्तु एवं सेवाओं पर टैक्स की दरों के संबंध में फैसले लेने के लिए राज्यों के पास सीमित फ्लेक्सिबिलिटी है। इसलिए राजस्व के लिए जीएसटी प्राप्तियों पर अधिक निर्भरता से राज्यों की स्वायत्तता कम होती है, चूंकि ये प्राप्तियां जीएसटी परिषद द्वारा निर्धारित की गई टैक्स दरों पर निर्भर करती हैं। हालांकि जीएसटी राज्यों की फ्लेक्सिबिलिटी को सीमित करता है, पांच वर्षो के लिए इस कर राजस्व में 14% वार्षिक वृद्धि की केंद्र की गारंटी से राज्यों का राजस्व बढ़ा है। वृद्धि 14% से कम होने पर, राज्यों को केंद्र से मुआवजा मिलेगा। 2018-19 में 15 राज्यों को मुआवजा प्राप्त होने की उम्मीद है (बॉक्स 1)।

राज्य के जीएसटी राजस्व को तीन घटकों में वर्गीकृत किया जा सकता है: (i) राज्यों का अपना जीएसटी राजस्व, (ii) केंद्र के जीएसटी राजस्व का हस्तांतरण, और (iii) मुआवजा, अगर कोई है। पहला घटक राज्य के अपने राजस्व के अंतर्गत आता है, जबकि बाकी के दोनों केंद्रीय हस्तांतरणों का हिस्सा हैं। अनुमान है कि 2018-19 में राज्यों को  केंद्रीय हस्तांतरणों से 48% राजस्व प्राप्त होगा। जीएसटी के लागू होने के बाद अपने राजस्व पर राज्यों की स्वायत्तता के अतिरिक्त 17% कम होने की उम्मीद है। राज्यों के जीएसटी राजस्व से यह राजस्व प्राप्त होने का अनुमान है (जीएसटी काउंसिल द्वारा दरें तय की जाएंगी)। इस प्रकार राज्य 65% राजस्व के बारे में स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं ले पाएंगे।  

ये आंकड़े विभिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न हैं (रेखाचित्र 3)। इन स्रोतों पर जिन राज्यों की निर्भरता 85% से अधिक है, वे हैं बिहार, जम्मू एवं कश्मीर और उत्तर पूर्वी राज्य (असम को छोड़कर)। हालांकि ऐसा इसलिए है क्योंकि राज्य केंद्रीय हस्तांतरणों पर अत्यधिक निर्भर हैं। जीएसटी पर अधिक निर्भरता के कारण जिन राज्यों की फ्लेक्सिबिलिटी तुलनात्मक रूप अधिक सीमित हुई है, उनमें दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र और पंजाब शामिल हैं। जैसे महाराष्ट्र का अपने 26% राजस्व पर सीमित नियंत्रण है जोकि उसे केंद्रीय हस्तांतरणों से प्राप्त होता है। जीएसटी के साथ अतिरिक्त 32% राजस्व पर उसका नियंत्रण सीमित हो जाएगा, और कुल मिलाकर यह आंकड़ा 58% हो जाता है।  

रेखाचित्र 3: जीएसटी लागू होने के बाद अपने राजस्व पर राज्यों की स्वायतत्ता सीमित होने की उम्मीद (2018-19)

 नोट: राज्यों को एसजीएसटी तथा आईजीएसटी राजस्व में 50% हिस्सेदारी से अपना जीएसटी राजस्व प्राप्त होता है। शेष आईजीएसटी राजस्व तथा सीजीएसटी की वसूली से प्राप्त राजस्व को केंद्र सरकार द्वारा हस्तांतरित किया जाता है, जैसा कि 14वें वित्त आयोग ने सुझाव दिया है।   

Sources: State Budget Documents; PRS.

जुलाई 2017 में जीएसटी को लागू किया गया। फिर 2018-19 में पहली बार बजट पेश किया गया। इसके बाद से विभिन्न राज्यों के बजट दस्तावेजों में जीएसटी घटक अलग-अलग तरीके से दर्ज किए गए हैं, खास तौर से मुआवजे जुड़े। उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों ने मुआवजे को अपने कर राजस्व में शामिल किया है, जबकि बिहार और कर्नाटक जैसे राज्यों ने केंद्रीय अनुदानों में इसे प्रदर्शित किया है। समरूपता के लिए हमने मुआवजे को केंद्रीय अनुदानों में शामिल किया है और इस प्रकार कुछ राज्यों के स्वयं कर राजस्व और केंद्रीय अनुदानों को समायोजित किया है।

मौजूदा संरचना में पेट्रोलियम उत्पादों पर जीएसटी वसूलने से राजस्व का बड़ा नुकसान हो सकता है

वर्तमान में पेट्रोल और डीजल जीएसटी संरचना में शामिल नहीं हैं। इसके बजाय वे एक्साइज ड्यूटी, जिसे केंद्र द्वारा वसूला जाता है, और सेल्स टैक्स/वैल्यू एडेड टैक्स (वैट), जिसे राज्यों द्वारा वसूला जाता है, के अधीन हैं। इसके अतिरिक्त कुछ राज्य अतिरिक्त सरचार्ज/सेस भी वसूलते हैं। पेट्रोलियम उत्पाद अन्य वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन या सप्लाई के लिए इनपुट्स के रूप में भी इस्तेमाल किए जाते हैं। जीएसटी में उन्हें शामिल न करने से टैक्सों की कैसकेडिंग (कर के ऊपर कर) होती है। जीएसटी काउंसिल के लिए उस तारीख का सुझाव देना अनिवार्य है जब से ये उत्पाद जीएसटी के अंतर्गत आएंगे। हालांकि इससे टैक्सों की कैसकेडिंग का मसला सुलझ जाएगा, पर राज्यों के राजस्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। अगर यह माना जाए कि पेट्रोल और डीजल पर सेस सहित 28% की उच्चतम दर से टैक्स वसूला जाता है और कोई अतिरिक्त वसूली नहीं की जाती, तो एसजीएसटी और सीजीएसटी, दोनों 14% की दर से वसूली जाएंगी, बिना किसी अतिरिक्त सेस के।    

मौजूदा परिदृश्य में 27 में से 25 राज्य पेट्रोल पर 20% या उससे अधिक सेल्स टैक्स/वैट वसूलते हैं (रेखाचित्र 4)। 14% की दर से एसजीएसटी की वसूली के साथ, सात राज्यों में पेट्रोल पर मौजूदा टैक्स दर आधी या उससे भी कम हो जाएगी। इससे उनके राजस्व में भी कमी होगी। उदाहरण के लिए वर्तमान में महाराष्ट्र प्रति लीटर पेट्रोल पर 36% की दर से वैट वसूलता है। लेकिन जीएसटी की मौजूदा दर के हिसाब से देखा जाए तो वह 14% एसजीएसटी की ही वसूली करेगा, जोकि मौजूदा दर से 22 परसेंट प्वाइंट कम है। डीजल के मामले में, 11 राज्यों में यह कटौती 5%-12% के बीच होगी। परिणामस्वरूप राज्यों को अपने कर राजस्व में बड़ी कटौती का सामना करना पड़ेगा।    

रेखाचित्र 4: पेट्रोल और डीजल पर राज्यों द्वारा वसूले जाने वाले सेल्स टैक्स/वैट की दर (1 नवंबर, 2018 तक)

नोट: महाराष्ट्र के लिए प्रदर्शित दरें मुंबई-ठाणे क्षेत्र तथा शेष राज्य द्वारा वसूली जाने वाली दरों का औसत हैं।

Sources: Petroleum Planning and Analysis Cell, Ministry of Petroleum and Natural Gas; PRS.

सेल्स टैक्स के अतिरिक्त राज्यों को पेट्रोलियम उत्पादों के टैक्सेशन पर एक्साइज ड्यूटी प्राप्त होती है। वित्त आयोग के सुझावों के अनुसार, केंद्र द्वारा अर्जित 42% एक्साइज ड्यूटी राज्यों को हस्तांतरित की जाती है। वर्तमान में पेट्रोल और डीजल पर क्रमश: 9.98 रुपए प्रति लीटर और 5.83 रुपए प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी वसूली जाती है।[1]  उल्लेखनीय है कि इसमें 8 रुपए प्रति लीटर का सड़क और इंफ्रास्ट्रक्टर सेस[*] शामिल नहीं है जिसका राजस्व राज्यों के साथ शेयर नहीं किया जाता। एक्साइज ड्यूटी की ये दरें, जोकि पेट्रोल और डीजल के लिए तेल कंपनियों द्वारा चुकाई जाने वाली बेस वैल्यू पर कैलकुलेट की जाती हैं[†], क्रमशः 24% और 12% हैं। इसलिए अगर पेट्रोल और डीजल पर जीएसटी वसूली जाती है, तो केंद्र को 14% सीजीएसटी प्राप्त होगी जोकि पेट्रोल के मामले में मौजूदा दर से दस परसेंट प्वाइंट कम है। डीजल के मामले में यह बढ़ोतरी दो परसेंट प्वाइंट होगी। इससे पेट्रोलियम उत्पादों से अर्जित केंद्रीय कर राजस्व कम हो जाएगा जिसे राज्यों के बीच बांटा जाता है। इससे प्रत्येक राज्यों के हस्तांतरणों पर असर होगा।

इसके अतिरिक्त जब पेट्रोलियम उत्पाद जीएसटी के अंतर्गत आएंगे, इन उत्पादों की सप्लाई पर इनपुट टैक्स क्रेडिट की अनुमति दी जाएगी। सप्लायर्स ने व्यापार के लिए (उपभोग के लिए नहीं) जिन इनपुट्स के लिए टैक्स चुकाया है, उसी पर उन्हें इनपुट टैक्स क्रेडिट दिया जाता है। वर्तमान में पेट्रोलियम उत्पादों को इनपुट्स के तौर पर इस्तेमाल करने वाले सप्लायर्स (जैसे बिजली उत्पादित करने के लिए डीजल का इस्तेमाल करने वाले ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर्स या उद्योग), इनपुट टैक्स क्रेडिट के लाभ का दावा नहीं कर पा रहे। परिणाम के तौर पर सरकार को उन टैक्सों को रीफंड नहीं करना पड़ता, जिन्हें सप्लायर्स ने अपने व्यवसाय में पेट्रोलियम उत्पादों के इस्तेमाल हेतु चुकाया है। जब इन उत्पादों पर जीएसटी वसूली जाएगी, तब टैक्सपेयर्स इनपुट टैक्स क्रेडिट पाने के पात्र होंगे जिससे सरकार का घाटा बढ़ सकता है।

15वें वित्त आयोग द्वारा 2011 की जनगणना के प्रयोग से कुछ राज्यों के हस्तांतरण में परिवर्तन संभव

वित्त आयोग कर राजस्व के केंद्रीय पूल में राज्यों का हिस्सा निर्धारित करने के लिए मानदंड सुझाता है। 15वां वित्त आयोग 2020 से 2025 की अवधि के लिए अपने सुझाव देगा।[2] आयोग के संदर्भ की शर्तें (टीओआर) सुझावों के लिए 2011 के जनगणना के आंकड़ों के इस्तेमाल को अनिवार्य करती हैं। टीओआर में यह भी शामिल है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या वृद्धि की प्रतिस्थापन दर (रिप्लेसमेंट रेट) की दिशा में प्रगति की है, उन राज्यों को प्रदर्शन आधारित राहत प्रस्तावित करते हुए पुरस्कृत किया जाए।

2015 से 2020 की अवधि के लिए सुझाव देते हुए 14वें वित्त आयोग ने जनसंख्या के मानदंड को 17.5% वेटेज दिया था। इसके लिए आयोग ने 1971 की जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल किया था जैसा कि उसके टीओआर में उल्लिखित था।[3] टीओआर में यह भी कहा गया था कि आयोग 1971 के बाद जनसांख्यिकीय परिवर्तनों पर ध्यान दे सकता है। जनसंख्या संबंधी मानदंड के इस्तेमाल हेतु आंकड़ों के संबंध में 14वें वित्त आयोग ने कहा था कि हालांकि जिन तिथि के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जा रहा है, वह अनुचित है लेकिन टीओआर ने 1971 की जनगणना के प्रयोग की सीमा निश्चित की है और वह उसे मानने के लिए बाध्य है।32018-19 में केंद्रीय करों और ड्यूटी की शुद्ध प्राप्तियों में राज्यों की हिस्सेदारी 7,68,413 करोड़ रुपए अनुमानित है। 14वें वित्त आयोग के अनुसार इसे राज्यों को आबंटित किया जाएगा।

2011 की जनगणना के इस्तेमाल से क्या असर होगा, इसे समझने के लिए आयोग के हस्तांतरण के फॉर्मूला में जनसंख्या के आंकड़ों को बदलकर राज्यों के संशोधित हिस्से की गणना की गई है। विश्लेषण में फॉर्मूले के बाकी सभी मानदंड, उनके आंकड़े और उनका वेटेज वैसे ही इस्तेमाल किए गए हैं। अगर 14वां वित्त आयोग 1971 की बजाय 2011 के आंकड़ों का इस्तेमाल करता तो संशोधित मानदंड 2018-19 में राज्यों के हस्तांतरणों पर संभावित प्रभावों का संकेत देते। रेखाचित्र 5 में बताया गया है कि अगर 14वां वित्त आयोग 2011 की जनगणना का इस्तेमाल करता तो 2018-19 में राज्यों की अनुमानित हस्तांतरण प्राप्तियों (राजस्व का प्रतिशत) में क्या बदलाव होते।

रेखाचित्र 5: 14वें वित्त आयोग द्वारा 2011 के जनगणना आंकड़ों का प्रयोग करने पर 2018-19 की अनुमानित हस्तांतरण प्राप्तियों (राजस्व का प्रतिशत) में बदलाव

नोट: पिछले वित्तीय वर्षों में 2018-19 हेतु किए गए समायोजनों को इस गणना में शामिल नहीं किया गया है। इसमें दिल्ली को शामिल नहीं किया गया है, चूंकि राज्यों को हस्तांतरित करों की शुद्ध प्राप्तियों में उसकी कोई हिस्सेदारी नहीं है।

Sources: Union Budget Documents; State Budget Documents; Census 2011; Report of the 14th Finance Commission; PRS.

कुछ राज्यों की प्राप्तियों में अन्य की तुलना में अधिक परिवर्तन होगा। जबकि तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश की प्राप्तियों में गिरावट होगी, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार में बढ़ोतरी। उत्तर प्रदेश के लिए 2018-19 के अनुमानित राजस्व में 0.5% (1,810 करोड़ रुपए), राजस्थान के लिए 0.9% (1,364 करोड़ रुपए) और बिहार के लिए 0.8% (1,329 करोड़ रुपए) की वृद्धि होगी। दूसरी तरफ प्राप्तियों में कटौती से तमिलनाडु के राजस्व में 1.2% (2,051 करोड़ रुपए), केरल में 1.5% (1,513 करोड़ रुपए) और आंध्र प्रदेश में 0.8% (1,276 करोड़ रुपए) की कमी होगी।

15वें वित्त आयोग द्वारा 2011 की जनगणना के इस्तेमाल के साथ, करों के केंद्रीय पूल में राज्यों की हिस्सेदारी में भी वैसे ही परिवर्तन हो सकता है, जैसा 2018-19 के लिए अनुमानित है। (रेखाचित्र 5)। इससे जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में कार्य करने वाले राज्यों का हिस्सा कम हो सकता है। चूंकि इन्हीं प्रयासों के कारण 1971 के बाद से देश की कुल जनसंख्या में उन राज्यों का हिस्सा कम हुआ है। इससे तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों की हस्तांतरण प्राप्तियों में तुलनात्मक कमी हो सकती है। उल्लेखनीय है कि हमने इस विश्लेषण में प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन जैसे कारकों को शामिल नहीं किया है जिन्हें 15वां वित्त आयोग जनसंख्या नियंत्रण हेतु ऐसे राज्यों को प्रस्तावित कर सकता है। 2011 की जनगणना के इस्तेमाल के कारण इन राज्यों के हस्तांतरण में जो कटौती होगी, इन प्रोत्साहनों से उन्हें पूरा किया जा सकता है, जैसा कि ऊपर प्रदर्शित है।

15वें वित्त आयोग द्वारा राजस्व घाटा अनुदान को समाप्त करने से कुछ राज्यों पर असर हो सकता है

15वें वित्त आयोग के संदर्भ की शर्तों में यह जांच करना शामिल है कि क्या राज्यों को राजस्व घाटा अनुदान दिया जाना चाहिए। राजस्व घाटा सरकार की राजस्व प्राप्तियों (जैसे राज्य परिवहन और शिक्षा जैसी सेवाएं प्रदान करने से प्राप्त होने वाले कर और फीस) और राजस्व व्यय (जैसे वेतन और ब्याज भुगतान पर व्यय) का अंतर होता है। राजस्व घाटे का अर्थ यह है कि राज्यों को अपने उस आवर्ती व्यय को पूरा करने के लिए उधारियों की जरूरत है जिनसे परिसंपत्तियों का सृजन नहीं होता। हालिया वास्तविक आंकड़ों (2016-17) के अनुसार 27 में से 17 राज्यों ने राजस्व घाटा समाप्त कर दिया है और अब वे राजस्व अधिशेष राज्य हैं। राजस्व अधिशेष का अर्थ यह है कि राज्यों का राजस्व किसी वर्ष में उनकी व्यय संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। एक उच्च राजस्व अधिशेष का अर्थ यह है कि राज्य : (i) पूंजीगत परिसंपत्तियों का सृजन कर सकता है, और (ii) बकाया देनदारियों को चुका सकता है। कुछ उत्तर पूर्वी राज्यों जैसे मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम एवं जम्मू-कश्मीर जैसे पर्वतीय राज्यों में राजस्व अधिशेष अधिक है। इसका मुख्य कारण यह है कि इन राज्यों की राजस्व प्राप्तियों में केंद्रीय हस्तांतरणों का अधिक बड़ा हिस्सा है।3अन्य राज्यों में राजस्व अधिशेष का कारण उनके अपने संसाधनों में वृद्धि और राज्यों द्वारा व्यय में कमी हो सकता है।

13वें वित्त आयोग ने यह सुझाव दिया था कि राज्यों का दीर्घावधि और स्थायी लक्ष्य शून्य राजस्व घाटा बरकरार रखना होना चाहिए।[4] उसने केरल, पंजाब और पश्चिम बंगाल को 2014-15 तक अपना राजस्व घाटा समाप्त करने का सुझाव दिया था (13वें वित्त आयोग की अवधि की समाप्ति तक)। दूसरे सभी राज्यों द्वारा 2011-12 या उससे पूर्व अपना राजस्व घाटा समाप्त करने की उम्मीद थी। 14वें वित्त आयोग ने इस सुझाव को दोहराया कि राज्यों को 2019-20 तक अपने राजस्व घाटे को समाप्त करना चाहिए (14वें वित्त आयोग की अवधि की समाप्ति तक)।3उसने कहा कि सात राज्यों, जिनमें आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड तथा त्रिपुरा शामिल हैं, को 2015-16 से 2019-20 के दौरान अपनी राजस्व व्यय संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए राजस्व घाटा अनुदान की जरूरत होगी। आयोग ने यह भी कहा इन सात राज्यों के अतिरिक्त असम और पश्चिम बंगाल को दो वर्षों, केरल को तीन वर्षों और मेघालय को चार वर्षों के लिए राजस्व घाटा अनुदान की जरूरत होगी। आयोग ने इन अनुदानों को प्राप्त करने के लिए राजकोषीय क्षमता और राज्यों की व्यय संबंधी जरूरतों के अंतर तथा प्रति व्यक्ति निम्न औसत व्यय वाले राज्यों द्वारा अपने व्यय को बढ़ाने की जरूरत पर ध्यान दिया।  

2016-17 में (हालिया वर्ष जिसके लिए वास्तविक आंकड़े उपलब्ध हैं) 10 राज्यों में राजस्व घाटा दर्ज किया गया (रेखाचित्र 6)। हरियाणा ने सर्वाधिक राजस्व घाटा दर्ज किया और उसके बाद आंध्र प्रदेश, केरल और राजस्थान का स्थान आता है। राजस्व घाटे वाले अन्य राज्यों में पंजाब, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि इनमें से 10 राज्यों में केवल चार राज्यों (आंध्र प्रदेश, असम, केरल और पश्चिम बंगाल) को 14वें वित्त आयोग द्वारा राजस्व घाटा अनुदान दिया गया है।

रेखाचित्र 6: 27 में से 17 राज्यों ने राजस्व घाटा समाप्त किया (2016-17)

नोट: त्रिपुरा के लिए 2015-16 के डेटा का इस्तेमाल किया गया है, चूंकि 2016-17 के डेटा उपलब्ध नहीं थे। 2016-17 के आंकड़े इसलिए इस्तेमाल किए गए हैं क्योंकि वही नवीनतम उपलब्ध वास्तविक आंकड़े हैं।

Sources: State Budget Documents; PRS

अगर पूर्व वित्त आयोगों की तरह 15वां वित्त आयोग यह सुझाव देता है कि राज्यों को अपने राजस्व घाटे को समाप्त करना चाहिए, लेकिन वह राजस्व घाटा अनुदानों को निर्दिष्ट नहीं करता तो राज्यों के राजस्व घाटे पर प्रभाव पड़ेगा। इन राज्यों में पंजाब, केरल, पश्चिम बंगाल और हरियाणा शामिल हैं। राजस्व घाटा अनुदान को समाप्त करने से इन राज्यों की उधारियां बढ़ सकती हैं। इसके अतिरिक्त राजस्व व्यय के लिए सबसे पहले उधारियों का इस्तेमाल किया जाएगा, और बदले में इन राज्यों के पूंजीगत व्यय पर असर होगा।

वेतन और पेंशन भुगतान से व्यय संबंधी दबाव बढ़ा है

7वें वेतन आयोग ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों के वेतन और पेंशन तथा अन्य भत्तों में संशोधन का सुझाव दिया था।[5] इसके बाद बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने वेतन आयोग को लागू किया और 2017-18 के वित्तीय वर्ष से भुगतान किए गए।[6] असम, उड़ीसा, राजस्थान और नागालैंड जैसे राज्यों ने अपने खुद के वेतन आयोग नियमों के आधार पर अपने मेहनताने में समय-समय पर संशोधन किया और 2017-18 में वेतन संशोधन को लागू किया।6गुजरात ने अगस्त 2016 से और कर्नाटक ने 2018-19 से अपने वेतन संशोधनों को लागू किया।

2017-18 से वेतन आयोग के सुझावों को लागू करने वाले राज्यों में 2016-17 के दौरान और 2017-18 के संशोधित अनुमानों में वेतन और पेंशन संबंधी व्यय में 27.5% की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि उसी अवधि के दौरान सभी 24 राज्यों में इसमें 22% की औसत वृद्धि देखी गई (दिल्ली, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के आंकड़े उपलब्ध नहीं)। हालांकि इस वर्ष दर वर्ष वृद्धि में बकाया शामिल हो सकता है और इसीलिए यह अनुमान अधिक (ओवरस्टेटेड) हो सकता है (रेखाचित्र 7)।

रेखाचित्र 7: वेतन आयोग के निर्णयों को लागू करने वाले चुनींदा राज्यों में वेतन और पेंशन में वृद्धि

नोट: वेतन संशोधन वाले वर्षों में वृद्धि का अनुमान अधिक हो सकता है क्योंकि भुगतान में बकाया भी शामिल है। परिणामस्वरूप आगामी वर्षों में वृद्धि दर अधिक अनुमानित हो सकती है (जोकि असम और बिहार के मामलों में नकारात्मक हो सकती है)।

कर्नाटक ने 2018-19 से अपने वेतन संशोधनों को लागू किया और ग्राफ उसी के हिसाब से डेटा लेबल्स का संकेत देता है। दूसरे सभी राज्यों (गुजरात को छोड़कर) ने 2017-18 से वेतन संशोधनों को लागू किया। 2015-16 और 2016-17 के लिए नागालैंड के डेटा उपलब्ध नहीं थे। आरई संशोधित अनुमान हैं और बीई बजट अनुमान।

Sources: RBI State of State Finances, State Budget Documents; PRS.

वेतन और पेंशन पर किए गया व्यय राजस्व व्यय का एक हिस्सा होता है। कुछ राज्यों द्वारा वेतन आयोग के सुझावों को लागू करने के कारण 2016-17 के बीच और 2017-18 के संशोधित अनुमानों में राजस्व व्यय के उनके आबंटनों में जबरदस्त वृद्धि हुई। वेतन आयोग को लागू करने वाले 10 राज्यों (कर्नाटक को छोड़कर) का राजस्व व्यय 2015-16 और 2016-17 में 15% बढ़ गया। हालांकि 2016-17 के बीच और 2017-18 के संशोधित अनुमानों में राजस्व व्यय 25% बढ़ गया (रेखाचित्र 8)।

रेखाचित्र 8: वेतन आयोग के सुझावों को लागू करने वाले राज्यों के राजस्व व्यय में वृद्धि

Sources: State Budget Documents; PRS.

13 वें वित्त आयोग ने सुझाव दिया था कि राज्यों का वेतन संबंधी व्यय उनके कुल राजस्व व्यय के 35% से अधिक नहीं होना चाहिए।4असम और नागालैंड इस सीमा को पार कर चुके हैं। चूंकि वेतन और पेंशन प्रतिबद्ध देनदारियां हैं, उनमें बढ़ोतरी से भविष्य में राज्य के राजकोषीय संतुलन पर बार-बार असर पड़ेगा। 

कर्ज माफी और गन्ने का बकाया चुकाने से राज्यों की वित्तीय स्थिति प्रभावित

किसानों का कर्ज माफ करने से राज्यों पर उनके ऋण का दबाव आ जाता है। सामान्य तौर पर राज्यों द्वारा गारंटी देने पर बैंक और सहकारी संघ लाभार्थी किसानों के बकाया ऋण को माफ कर देते हैं। फिर अगले कुछ वर्षों में चरणबद्ध तरीके से बजट में कर्ज माफी की योजना के लिए प्रावधान किया जाता है ताकि कर्ज माफी की राशि का पुनर्भुगतान किया जाए और बकाया कर्ज को समाप्त किया जा सके। तालिका 1 में राज्यों द्वारा कर्ज माफी और उससे संबंधित आबंटनों का विवरण है। उल्लेखनीय है कि तेलंगाना ने अपनी कर्ज माफी योजना को पूरी तरह से लागू कर दिया है जो चार वर्ष तक चली थी।

रेखाचित्र 9: कर्ज माफी के बाद चार राज्यों का औसत राजकोषीय घाटा जीएसडीपी के 3% के अंदर है

 नोट: (i) आंध्र प्रदेश के लिए 5 वर्ष का, (ii) तेलंगाना के लिए 4 वर्ष का, (iii) तमिलनाडु के लिए 3 वर्ष का, (iv) कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब और उत्तर प्रदेश के लिए 2 वर्ष का, और (v) राजस्थान के लिए 1 वर्ष का डेटा इस्तेमाल किया गया है। किसी एक वर्ष पर कर्ज माफी का असर देखने के लिए हमने राज्य के कुल वर्षों का औसत निकाला है।

Sources: State Budget Documents; CSO, MOSPI; PRS.

तालिका 1: 2014-15 से राज्यों द्वारा घोषित कर्ज माफी का विवरण (राशि करोड़ रुपए में, कोष्ठकों में दिए गए आंकड़े जीएसडीपी के प्रतिशत के रूप में राशि का संकेत देते हैं)

राज्य

वर्ष

कर्ज माफी की राशि

आबंटन/ व्यय

लंबित राशि

आंध्र प्रदेश

2014-15

24,000 (4.6)

16,956

7,044

तेलंगाना

2014-15

17,000 (3.4)

15,167

-

तमिलनाडु

2016-17

6,041 (0.5)

4,548

1,493

उत्तर प्रदेश

2017-18

36,000 (2.7)

24,558

11,442

महाराष्ट्र

2017-18

34,000 (1.3)

25,060

8,940

पंजाब

2017-18

10,000 (2.1)

4,620

5,380

कर्नाटक

2017-18

42,200 (3.0)

14,508

27,692

राजस्थान

2018-19

8,000 (0.9)

2,000

6,000

नोट: कर्नाटक के डेटा में 2017-18 में बाद की सरकारों द्वारा घोषित कर्ज माफी तथा 2018-19 के बजट के आंकड़ों को शामिल किया गया है।

Sources: State Budget Documents; Central Statistics Office, MOSPI; RBI State of State Finances; PRS.

तेलंगाना का औसत अनुमानित राजकोषीय घाटा उसके जीएसडीपी का 3.5% है जिसमें से 0.6% कर्ज माफी के कारण है (रेखाचित्र 9)। आंध्र प्रदेश ने पिछले पांच वर्षों में (2014-15 से 2018-19 के दौरान) इतनी ही राशि का आबंटन किया और उसका अनुमानित राजकोषीय घाटा उसके जीएसडीपी का 3.9% है जिसमें से 0.5% कर्ज माफी के कारण है। पंजाब सहित इन राज्यों को अपेक्षाकृत अधिक उधारियों की जरूरत है, जबकि कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में निम्न घाटा दर है और इसीलिए वे कर्ज माफी जैसी योजनाओं को लागू कर सकते हैं (वहां जीएसडीपी की 3% की सीमा को पार नहीं होगी)।

चूंकि राजकोषीय घाटा किसी वित्तीय वर्ष में उधारियों की जरूरत की तरफ संकेत देता है, राज्य की देनदारियों पर कर्ज माफी का असर इस बात पर निर्भर करता है कि कितने वर्षों तक कर्ज माफी दी गई। अगर कोई राज्य एक ही वर्ष में इस योजना को वित्त पोषित करता है तो उस वर्ष के राजकोषीय घाटे पर उसका बड़ा असर दिखाई देता है, जबकि योजना को कई चरणों में लागू करने वाले राज्य पर एक वर्ष में इतना असर नहीं दिखाई देता। हालांकि चरण बद्ध तरीके से इस योजना को लागू करने से राज्यों को ब्याज भुगतान के रूप में अतिरिक्त व्यय करना होगा। इसलिए किसानों की कर्ज माफी का अलग-अलग असर होता है जोकि ऋण माफी की राशि, उस योजना को लागू करने के तरीके और उस विशेष राज्य की वित्तीय स्थिति के आधार पर तय होता है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने यह पाया है कि कर्ज माफी से ऋण संस्कृति पर असर होता है क्योंकि डीफॉल्टर बढ़ते हैं और ऐसे किसान हतोत्साहित होते हैं जोकि पुनर्भुगतान कर सकते हैं या नियमित रूप से पुनर्भुगतान करते रहते हैं।[7] मंत्रालय का कहना है कि हर बार कर्ज माफी से भविष्य की मांगों को नामंजूर करना मुश्किल होता है।

कृषि क्षेत्र के एक और घटनाक्रम का असर राज्यों की वित्तीय स्थिति पर पड़ रहा है। यह है गन्ना किसानों का बकाया चुकाना। 2017-18 में गन्ना उत्पादन में 23% की वृद्धि हुई और परिणामस्वरूप 2016-17 की तुलना में चीनी का उत्पादन भी 46% बढ़ गया।[8],[9] अतिरिक्त उत्पादन से चीनी की कीमतों में जबरदस्त कमी आई और चीनी मिलों की लिक्विडिटी प्रभावित हुई। चूंकि चीनी मिलें गन्ना किसानों से सरकारी कीमतों पर गन्ना लेने को बाध्य हैं, किसानों को भुगतान करने में उनकी अक्षमता के कारण बकाया बढ़ता गया। मई 2018 तक यह बकाया राशि 23,232 करोड़ रुपए तक पहुंच गई जिसे सरकारी सहायता से पूरा किया गया (सॉफ्ट लोन और सबसिडी से)।[10]  उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, बिहार, तमिलनाडु और उत्तराखंड जैसे राज्यों ने गन्ना बिक्री के लिए राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) की घोषणा की जोकि केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत मूल्य से बहुत अधिक है।[11]  कृषि लागत एवं मूल्य आयोग ने कहा कि एसएपी ने गन्ना उद्योग में विकृतियां पैदा कर दीं, चूंकि उसे निर्धारित करने में घरेलू और विश्वस्तरीय मूल्यों तथा दूसरे संबंधित मानदंडों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया था।11ऐसी नीतियों से राज्य की वित्तीय स्थिति पर भी असर होता है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश ने 2018-19 की पहली अनुपूरक अनुदान मांगों में 2018-19 में चीनी उद्योग के लिए आबंटन को 948 करोड़ रुपए (उसके कुल आबंटन का 0.2%) से बढ़ाकर 6,483 करोड़ रुपए कर दिया (उसके कुल आबंटन का 1.4%)।

राज्यों की वित्तीय स्थिति की उभरती प्रवृत्तियां

यह खंड राज्यों की वित्तीय स्थिति और उनके व्यय, प्राप्तियों और घाटे की उन प्रवृत्तियों का विश्लेषण करेगा जोकि पिछले आठ वर्षों के दौरान उभरकर सामने आई हैं (2011-2019)।

2011 और 2019 के बीच सभी राज्यों के कुल व्यय में 15% की औसत वार्षिक वृद्धि

राज्य नागरिकों को सेवाएं प्रदान करने के लिए अपना धन खर्च करते हैं। उनमें शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सामाजिक सेवाएं, और सामाजिक सुरक्षा तथा कृषि, सिंचाई, बिजली और परिवहन जैसी आर्थिक सेवाएं शामिल होती हैं। राज्य सामान्य प्रशासनिक सेवाओं पर भी व्यय करते हैं। पिछले आठ वर्षों में राज्यों के कुल व्यय में औसत 15% की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई। 2011-12 में यह 12,47,742 करोड़ रुपए थी, जोकि 2018-19 में बढ़कर 33,18,545 करोड़ रुपए हो गई (रेखाचित्र 10)।

रेखाचित्र 10: राज्यों के कुल व्यय में 15% की औसत वृद्धि दर्ज की गई (2011-2019) (करोड़ रुपए में)

नोट: आरई संशोधित अनुमान हैं और बीई बजट अनुमान।

Sources: State Budget Documents; PRS.

पिछले आठ वर्षों में सभी राज्यों के कुल व्यय में राजस्व व्यय का बड़ा हिस्सा

राज्यों के व्यय के दो घटक होते हैं: (i) राजस्व व्यय, और (ii) पूंजीगत व्यय। राजस्व व्यय की प्रकृति आवर्ती होती है और इसमें प्रशासनिक व्यय और वेतन एवं पेंशन भुगतान शामिल होते हैं। राज्यों द्वारा ऋणों पर चुकाया जाने वाला ब्याज भी राजस्व व्यय में शामिल होता है। पूंजीगत व्यय में विभिन्न सामाजिक एवं आर्थिक सेवाओं के लिए पूंजीगत परिव्यय शामिल होता है। ऐसे पूंजीगत परिव्यय से इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण होता है, जैसे स्कूल, जलापूर्ति और स्वच्छता व्यवस्था, तथा अस्पताल।

पिछले आठ वर्षों के दौरान राज्यों ने राजस्व पर औसत 85% व्यय किया है और 15% पूंजीगत परिव्यय पर (रेखाचित्र 11)।

रेखाचित्र 11: सभी राज्यों द्वारा कुल व्यय का 85% राजस्व व्यय पर (2011-2019)

Sources: State Budget Documents; PRS.

44% राजस्व व्यय (कुल व्यय का 39%) प्रतिबद्ध देनदारियों पर

राज्यों की प्रतिबद्ध देनदारियों में मुख्य रूप से वेतन, पेंशन भुगतान और ब्याज भुगतान शामिल होते हैं। अगर प्रतिबद्ध देनदारियों पर राज्य अधिक व्यय करते हैं तो इससे दूसरे विकासपरक व्यय प्रभावित होते हैं। 2016-2019 के दौरान राज्यों ने अपना 39% बजट प्रतिबद्ध देनदारियों (वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान) पर खर्च किया (रेखाचित्र 12)। पंजाब ने प्रतिबद्ध देनदारियों पर अधिकतर खर्च किया, जिसके बाद उत्तराखंड, केरल और हिमाचल प्रदेश का स्थान आता है।

 

रेखाचित्र 12: प्रतिबद्ध देनदारियों पर व्यय (2016-2019)

नोट: दिल्ली, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के वेतन और पेंशन भुगतान से संबंधित विवरण उपलब्ध नहीं हैं।

Sources: State Budget Documents; RBI State of State Finances, PRS.

मानव एवं आर्थिक विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण और सुरक्षा एवं प्रशासन पर राज्य अपना 61% बजट खर्च करते हैं

राज्यों के व्यय तीन व्यापक श्रेणियों में वर्गीकृत होते हैं: (i) सामान्य सेवाएं जिनमें प्रशासनिक सेवा, पुलिस, ब्याज एवं पेंशन भुगतान शामिल हैं, (ii) सामाजिक सेवाएं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, जलापूर्ति और स्वच्छता, आवास, शहरी विकास और पिछड़े समुदायों के कल्याण पर किया जाना व्यय शामिल होता है, और (iii) आर्थिक सेवाएं जिनमें कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों, ग्रामीण विकास, सिंचाई, बिजली और परिवहन संबंधी इंफ्रास्ट्रक्चर पर किया जाने वाला व्यय शामिल होता है। पहली श्रेणी गैर विकासपरक व्यय कहलाती है, और दूसरी एवं तीसरी श्रेणियां विकासपरक व्यय कहलाती हैं।

2011-2019 के बीच राज्यों ने विकासपरक व्यय पर 68% और गैर विकासपरक व्यय पर 30% बजट व्यय किया। शेष 2% को सहायतानुदान और योगदान के रूप में आबंटित किया गया जिसमें स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं को प्रदत्त राशि भी शामिल है।

2011-2019 के दौरान 11 प्रमुख क्षेत्रों में सभी राज्यों के व्यय का विश्लेषण करने से संकेत मिलता है कि राज्य मानव और आर्थिक विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण, प्रशासन और अपने नागरिकों की सुरक्षा पर औसत 61% बजट व्यय करते हैं। शेष 39% में ब्याज और पेंशन, दोनों पर क्रमशः 10%-10% व्यय करते हैं।  

मानव विकास पर राज्यों का 23% बजट खर्च होता है

मानव संसाधन पर व्यय में शिक्षा, स्वास्थ्य और जलापूर्ति एवं स्वच्छता के लिए किए गए आबंटन शामिल होते हैं। इन क्षेत्रों में व्यय का उद्देश्य नागरिकों की भलाई और मानव पूंजी के निर्माण में सहायता प्रदान करना है। 2011-2019 के दौरान राज्यों ने मानव विकास पर अपना औसत 23% बजट खर्च किया (रेखाचित्र 13)। इसमें सबसे अधिक आबंटन शिक्षा (17%) के लिए किया गया, इसके बाद स्वास्थ्य (4%) और शेष 2% जलापूर्ति एवं स्वच्छता के लिए किया गया।   

 

रेखाचित्र 13: दिल्ली ने मानव विकास पर सर्वाधिक खर्च किया (2011-2019)

Sources: State Budget Documents; PRS.

आर्थिक विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर पर राज्य 32% व्यय करते हैं

आर्थिक विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण पर व्यय में कृषि, सिंचाई, शहरी एवं ग्रामीण विकास, आवास, बिजली और सड़क एवं पुलों का निर्माण शामिल होता है। इन क्षेत्रों में व्यय करने से राज्य में इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण होता है और दीर्घकाल में राज्य को इससे लाभ प्राप्त होता है। 2011 से 2019 के दौरान राज्यों ने इंफ्रास्ट्रक्चर और आर्थिक विकास पर अपने बजट का 32% हिस्सा खर्च किया (रेखाचित्र 14)। इसमें कृषि, बिजली और ग्रामीण विकास में से प्रत्येक के लिए 6% आबंटन किया गया, इसके बाद सिंचाई तथा सड़क एवं पुलों में से प्रत्येक के लिए 5% का आबंटन किया गया। शहरी विकास और आवास के लिए शेष 4% आबंटित किया गया।

रेखाचित्र 14: तेलंगाना ने आर्थिक विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर पर सर्वाधिक खर्च किया (2011-2019)

Sources: State Budget Documents; PRS.

प्रशासन और नागरिकों की सुरक्षा पर राज्यों का 6% बजट व्यय

2011-2019 के दौरान राज्यों ने पुलिस बलों पर अपना 5% और प्रशासनिक सेवाओं, जैसे जिला प्रशासन और लोक निर्माण पर 1% बजट खर्च किया (रेखाचित्र 15)।

 

रेखाचित्र 15: नागालैंड ने प्रशासन और सुरक्षा पर सर्वाधिक व्यय किया

Sources: State Budget Documents; PRS.

राज्य बजट से भी कम खर्च कर रहे हैं; हिमाचल प्रदेश अधिक खर्च कर रहा है

वित्तीय वर्ष की शुरुआत से पहले बजट पेश करते समय राज्य उस वर्ष के कुल व्यय का अनुमान लगाते हैं। छह वर्षों (2011-17) के लिए वास्तविक व्यय से बजट अनुमानों की तुलना करने पर प्रदर्शित होता है कि राज्यों ने अपने बजट का 9% कम खर्च किया। राजस्व व्यय पर औसत 7% और पूंजीगत व्यय पर 15% कम खर्च किया गया। तेलंगाना, जम्मू एवं कश्मीर और असम ने सबसे कम खर्च किया। दूसरी तरफ हिमाचल प्रदेश ने अपने बजट अनुमान से औसत 9% अधिक खर्च किया। 

रेखाचित्र 16: राज्यों ने अपने बजट का औसत 9% कम खर्च किया (2011-2017)

नोट: तेलंगाना के आंकड़े 2014-15 से हैं।

Sources: State Budget Documents; PRS.

राज्यों द्वारा औसत कम खर्च करने की दर 2011-12 में जहां 4% थी, वहीं यह 2016-17 में बढ़कर 11% हो गई। इसका अर्थ यह है कि बजट अनुमानों और वास्तविक व्यय के आंकड़ों के बीच अंतराल बढ़ रहा है और बजटीय लक्ष्य पूरे नहीं हो रहे। हालांकि कम पूंजीगत व्यय का औसत बरकरार रहा (15%), लेकिन राजस्व व्यय में गिरावट जारी रही। 2011-12 में जहां 2% कम राजस्व व्यय किया गया, वहीं 2016-17 में यह दर बढ़कर 10% हो गई।    

कम खर्च करने का एक कारण राज्यों के राजस्व में कमी हो सकती है। 2011-12 और 2016-17 के दौरान राज्यों के राजस्व अनुमान सकारात्मक थे लेकिन उनके राजस्व में औसत 10% की कमी हुई (रेखाचित्र 17)। ऐसी स्थिति में राज्यों को अपने व्यय में कटौती करनी पड़ी और इस कमी की भरपाई अपनी प्राप्तियों से करनी पड़ी।

 

रेखाचित्र 17: राज्यों के राजस्व में औसत 10% की कमी दर्ज की गई (2011-2017)

नोट: तेलंगाना के डेटा 2014-15 से हैं।

Sources: State Budget Documents; PRS.

अधिकतर क्षेत्रों में कम खर्च किया गया; बिजली पर बजट से सबसे अधिक खर्च किया गया

2011-17 के दौरान राज्यों ने शहरी विकास पर सबसे कम खर्च किया (20%) (रेखाचित्र 18)। इसके बाद अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग के कल्याण पर 16% और ग्रामीण विकास पर 15% पर कम खर्च किया गया। दूसरी तरफ राज्यों ने बिजली के लिए 15% और सड़क एवं पुलों के निर्माण के लिए 2% कम बजट निर्धारित किया। बिजली क्षेत्र में विशेष रूप से बजटीय अनुमान की तुलना में अधिक वास्तविक व्यय दर्ज किया गया जिसका कारण यह था कि 2015-2017 के दौरान 14 राज्यों ने उदय योजना को लागू किया था (राज्यों की वित्तीय स्थिति पर उदय योजना के प्रभाव से संबंधित विवरण रेखाचित्र 32 में दिया गया है)। कम खर्च करने का अर्थ यह है कि राज्य विशिष्ट क्षेत्रों में अपने विकास संबंधी लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाएंगे।   

रेखाचित्र 18: शहरी विकास पर सबसे कम खर्च किया गया, बिजली पर बजट से अधिक खर्च (2011-2017)

Sources: State Budget Documents; PRS.

 

राज्यों को अपने व्यय को वित्त पोषित करने के लिए राजस्व कहां से प्राप्त होता है?

राज्य की प्राप्तियों को व्यापक रूप से राजस्व प्राप्तियों और पूंजीगत प्राप्तियों में वर्गीकृत किया जा सकता है। राजस्व प्राप्तियां राज्य के कुल राजस्व का संकेत देती हैं। राज्य मुख्यतया अपनी व्यय संबंधी जरूरतों के लिए दो स्रोतों पर निर्भर करते हैं, अपने राजस्व पऔर केंद्रीय हस्तांतरणों पर। राज्य स्वयं द्वारा राजस्व अर्जित करते हैं और केंद्रीय हस्तांतरणों में करों और अनुदानों के रूप में केंद्र सरकार की प्राप्तियां शामिल होती हैं। इसके अतिरिक्त राज्य अपने व्यय के वित्त पोषण के लिए उधारियों पर निर्भर करते हैं जोकि पूंजीगत प्राप्तियों का हिस्सा होता है।

बढ़ते व्यय को पूरा करने के लिए राज्यों के पास सबसे बड़ा स्रोत उनका अपना राजस्व होता है (रेखाचित्र 19)। अनुमान है कि 2018-19 में यह सभी राज्यों की कुल जीएसडीपी के 8% के बराबर होगा। हालांकि केंद्रीय हस्तांतरण पिछले कुछ वर्षों के दौरान बढ़े हैं। 2011-12 में यह 5% थे, जोकि 2018-19 में बढ़कर 7.4% हो गए।   

2014-15 में केंद्रीय हस्तांतरण के बढ़कर 5.3% होने का कारण यह हो सकता है कि राज्यों के बजट में सहायतानुदान शामिल किया गया जिसे पहले कार्यान्वयन एजेंसियों को सीधे आबंटित कर दिया जाता था। इसके बाद के वर्षों में 14वें वित्त आयोग के इस सुझाव को लागू कर दिया गया कि केंद्रीय करों में राज्यों के हिस्से को 32% से बढ़ाकर 42% कर दिया जाए। इससे 2015-16 में केंद्रीय हस्तांतरण बढ़कर जीएसडीपी का 6% हो गया।

रेखाचित्र 19: राज्यों को केंद्रीय हस्तांतरण (जीएसडीपी के प्रतिशत के रूप में) पिछले कुछ वर्षों के दौरान बढ़ा है

नोट: दिल्ली के लिए 2017-18 का और त्रिपुरा के लिए 2015-16 तक का डेटा इस्तेमाल किया गया है।

Sources: State Budget Documents; RBI State of State Finances; Central Statistics Office, MOSPI; PRS.

दूसरी ओर 2011-12 से जीएसडीपी के प्रतिशत के रूप में राज्यों के अपने राजस्व में बढ़ोतरी दर्ज नहीं की गई। अनुमान है कि 2017-18 में यह बढ़कर जीएसडीपी का 7.6% हो जाएगा और 2018-19 में 8%। दोनों वर्षों में राज्यों के स्वयं के राजस्व और केंद्रीय हस्तांतरणों में बढ़ोतरी के अनुमान के साथ राजकोषीय घाटे के कम होने की भी संभावना है। अनुमान है कि 2017-18 में राजकोषीय घाटा गिरकर जीएसडीपी का 3% और 2018-19 में 2.7% हो जाएगा। ऐसा राजकोषीय घाटे में निरंतर वृद्धि के बाद होगा, जोकि 2011-12 में 2% था और 2016-17 में 3.5%। हालांकि 2017-18 और 2018-19 के आंकड़े अनुमानित हैं और वास्तविक आंकड़े इससे अलग हो सकते हैं।

फिर भी पिछले कुछ वर्षों के दौरान राज्य अपने व्यय को वित्त पोषित करने के लिए बाहरी स्रोतों पर अधिक निर्भर हुए हैं। बाहरी स्रोत यानी केंद्रीय हस्तांतरण और उधारियां (राजकोषीय घाटा)। यह निर्भरता लगातार बढ़ी है। 2011-12 में जहां यह जीएसडीपी का 7% था, वहीं 2018-19 में बढ़कर 10.1% हो गया। 2011-12 में यह राज्यों के अपने राजस्व (जीएसडीपी का 7.9%) से कम था, लेकिन अब राज्य अपने स्वयं के राजस्व (2018-19 में यह जीएसडीपी का 8.0% है) की तुलना में उस पर अधिक निर्भर हैं। इन दो स्रोतों में से केंद्रीय हस्तांतरण अनिवार्य राशि होती है जोकि राज्यों को दी जाती है, जबकि उधारियों से व्यय संबंधी जरूरतों को पूरा करने पर ब्याज भुगतान और पुनर्भुगतान संबंधी देनदारियों को चुकाना होता है।  

 

अधिकतर राज्यों के लिए राजस्व का बड़ा स्रोत कर राजस्व; गैर कर राजस्व का हिस्सा कम

राज्य की राजस्व प्राप्तियों को चार घटकों में वर्गीकृत किया जा सकता है: (i) कर राजस्व, (ii) गैर कर राजस्व, (iii) केंद्रीय करों का हस्तांतरण, और (iv) केंद्र से सहायतानुदान। पहले दोनों राज्य के अपने राजस्व होते हैं, जबकि बाद के दोनों केंद्रीय हस्तांतरण होते हैं।

2011-12 से 2018-19 की अवधि के दौरान राज्यों को 56% प्राप्तियां अपने राजस्व से हुईं और 44% केंद्रीय हस्तांतरण रहे। हालांकि विभिन्न राज्यों के आंकड़ों में अंतर है (रेखाचित्र 20)। गुजरात, गोवा, हरियाणा, केरल, महाराष्ट्र, पंजाब और तमिलनाडु जैसे राज्यों में अपने राजस्व का योगदान अधिक है (राज्य की कुल प्राप्तियों के 70% से अधिक)। दूसरी ओर बिहार, जम्मू एवं कश्मीर और उत्तर पूर्वी राज्य अपने राजस्व की तुलना में केंद्रीय हस्तांतरणों पर अधिक निर्भर हैं।  

राज्य के अपने राजस्व में भी भिन्नताएं हैं, चूंकि कर राजस्व और गैर कर राजस्व में भी अंतर है (रेखाचित्र 21)। इसमें कर राजस्व बड़ा घटक है जिसका कुल राजस्व में 48% का योगदान है, जबकि गैर कर राजस्व का हिस्सा 8% है। वैसे अधिकतर राज्यों में गैर कर राजस्व की हिस्सेदारी कुल राजस्व के 7-14% के बीच है। गोवा इसमें अपवाद है जहां राजस्व में इसका योगदान 28% है। गोवा में यह विशेष रूप से अधिक है, चूंकि राज्य में बिजली वितरण सरकारी विभाग के जरिए होता है, जोकि अन्य राज्यों से अलग है।

रेखाचित्र 20: राज्यों की राजस्व प्राप्तियों का संघटन (2011-19)

नोट: आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के डेटा 2014-15 के बाद से हैं। दिल्ली के स्वयं कर राजस्व में हिस्सेदारी अन्य राज्यों की तुलना में अधिक है, चूंकि केंद्रीय करों के डिवाइजिबल पूल में उसकी कोई हिस्सेदारी नहीं है।

Sources: State Budget Documents; RBI State of State Finances; PRS.

राज्य के राजस्व में केंद्रीय करों और केंद्रीय अनुदानों का योगदान क्रमशः 26% और 18% होता है। हालांकि हिमाचल प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्य तुलनात्मक रूप से इन अनुदानों पर अधिक निर्भर हैं (रेखाचित्र 22)। हस्तांतरण से अलग, जोकि वित्त आयोग के मानदंडों पर संवैधानिक रूप से प्रदान किया जाता है, अधिकतर अनुदान केंद्र द्वारा आबंटित होते हैं। इन्हें व्यय की विशिष्ट प्राथमिकताओं के हिसाब से दिया जाता है, और इस प्रकार ये राज्यों को थोड़ी ही फ्लेक्सिबिलिटी और विकल्प देते हैं। केंद्रीय अनुदानों पर अधिक निर्भरता से राज्यों की अपनी स्थानीय आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं के आधार पर व्यय करने की क्षमता सीमित होती है।

 

रेखाचित्र 21: राज्य के कर राजस्व का संघटन (2011-19)

रेखाचित्र 22: राज्यों को केंद्रीय हस्तांतरणों का संघटन (2011-19)

नोट: आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लिए 2014-15 के बाद के डेटा का इस्तेमाल किया गया है; Sources: State Budget Documents; RBI State of State Finances; PRS.

15 राज्यों में जीएसडीपी की तुलना में स्वयं कर राजस्व तेजी से बढ़ा; स्वयं कर-जीएसडीपी अनुपात की तुलना

जैसे कि पहले कहा गया है, 2018-19 के दौरान राज्यों के लिए स्वयं कर राजस्व, राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत रहा (कुल राजस्व का 48%)। राज्य की स्वयं कर राजस्व अर्जित करने की क्षमता का असर उसके राजस्व पर पड़ता है। सामान्य तौर पर स्वयं कर राजस्व में निम्नलिखित प्राप्तियां शामिल होती हैं : (i) वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), (ii) सेल्स टैक्स/वैल्यू एडेड टैक्स (वैट), (iii) स्टेट एक्साइज, (iv) स्टाम्प और रजिस्ट्रेशन फीस, (v) बिजली पर टैक्स और ड्यूटीज़, और (vi) अन्य टैक्सों और ड्यूटीज़ सहित भू राजस्व।

स्वयं कर-जीएसडीपी अनुपात से इस बात का मूल्यांकन होता है कि राज्य अपनी अर्थव्यवस्था के लिए कर अर्जित करने में कितना सक्षम है। उच्च अनुपात संकेत देता है कि राज्य में आर्थिक गतिविधियों के लिए कर अर्जित करने की बेहतर क्षमता है। 2011-12 से 2018-19 के दौरान राज्यों का औसत स्वयं कर-जीएसडीपी अनुपात 6.6% था (रेखाचित्र 23)। पूर्वोत्तर राज्यों का औसत इस अनुपात से बहुत कम है।

रेखाचित्र 23: पूर्वोत्तर राज्यों का स्वयं कर-जीएसडीपी अनुपात 6.6% के औसत अनुपात से बहुत कम है (2011-19)

नोट: आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लिए 2014-15 के बाद के डेटा का इस्तेमाल किया गया है, दिल्ली के लिए 2017-18 तक का और त्रिपुरा के लिए 2015-16 तक का डेटा इस्तेमाल किया गया है।

Sources: State Budget Documents; RBI State of State Finances; Central Statistics Office, MOSPI; PRS.

2011-10 के दौरान राज्यों का स्वयं कर राजस्व औसत 12% की दर से बढ़ा। हालांकि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की वृद्धि दर तुलनात्मक रूप से अधिक, क्रमशः 21% और 25% रही, जम्मू एवं कश्मीर, गुजरात और तमिलनाडु में तुलनात्मक रूप से निम्न वृद्धि दर दर्ज की गई।

2011-19 के दौरान 27 में 15 राज्यों की स्वयं कर राजस्व की वृद्धि दर जीएसडीपी की वृद्धि दर से अधिक रही (रेखाचित्र 24)। जीएसडीपी और स्वयं कर राजस्व की वृद्धि दर के बीच तुलना से पता चलता है कि अर्थव्यवस्था की वृद्धि के साथ राज्यों की स्वयं कर राजस्व अर्जित करने की क्षमता में किस प्रकार बदलाव हो रहा है। जिन राज्यों में स्वयं कर राजस्व की वृद्धि दर जीएसडीपी के मुकाबले अधिक है, वे आने वाले वर्षों में स्वयं कर-जीएसडीपी अनुपात, यानी अपनी कर अर्जित करने की क्षमता को बढ़ा सकेंगे। इसके विपरीत जिन राज्यों में जीएसडीपी अनुपात की दर अधिक है और स्वयं कर राजस्व की दर उससे कम, उनके अनुपात में गिरावट होगी।

रेखाचित्र 24: 15 राज्यों में जीएसडीपी के मुकाबले स्वयं कर राजस्व की वृद्धि दर अधिक (2011-19)

नोट: आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के डेटा 2014-15 से हैं। दिल्ली के 2018-19 के और त्रिपुरा के 2016-17 के जीएसडीपी डेटा उपलब्ध नहीं हैं।

Sources: State Budget Documents; RBI State of State Finances; Central Statistics Office, MOSPI; PRS.

उच्च वृद्धि दर वाले राज्यों में, आंध्र प्रदेश, झारखंड, तेलंगाना और उत्तराखंड का स्वयं कर राजस्व, उनकी जीएसडीपी की वृद्धि दर के मुकाबले 1.5-2 गुना बढ़ा। इससे भविष्य में उनके स्वयं कर-जीएसडीपी अनुपात में सुधार हो सकता है। उल्लेखनीय है कि जहां आंध्र प्रदेश और तेलंगाना पहले से ही इस अनुपात के औसत के करीब या उससे ऊपर हैं, झारखंड और उत्तराखंड के मामले में यह अनुपात बढ़कर औसत के करीब पहुंच जाएगा। वर्तमान में इन राज्यों में यह अनुपात क्रमशः 5.6% और 5.5% है।

दूसरी तरफ मध्य प्रदेश और त्रिपुरा में जीएसडीपी की वृद्धि दर के मुकाबले स्वयं कर राजस्व की वृद्धि दर 50-75% कम है। इससे उनके स्वयं कर-जीएसडीपी अनुपात में गिरावट हो सकती है। मध्य प्रदेश में 7.2% के साथ यह अनुपात औसत से कुछ अधिक है, जबकि त्रिपुरा में यह 4.2% के साथ काफी कम है।

जीएसटी के साथ कुछ राज्यों के राजस्व में स्वयं कर प्राप्तियों की हिस्सेदारी में बदलाव संभव

ऐसी अनेक वस्तुएं और सेवाएं हैं जिन पर पहले राज्यों या केंद्र द्वारा कर वसूला जाता था, लेकिन अब वे इन दोनों द्वारा वसूले जाने वाले जीएसटी के अधीन हैं। इससे पूर्व राज्य अपने क्षेत्राधिकार में वस्तुओं और सेवाओं की बिक्री से कर राजस्व प्राप्त करते थे। वर्तमान में जीएसटी द्वारा वसूले जाने वाले राजस्व को केंद्र और उस गंतव्य राज्य के बीच समान रूप से बांटा जाता है जहां विक्रेताओं द्वारा वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति की जाती है।

कर संरचना में परिवर्तन के परिणाम के तौर पर कुछ राज्यों के राजस्व में स्वयं कर प्राप्तियों की हिस्सेदारियों में बदलाव आ सकता है। रेखाचित्र 25 में केवल उन्हीं राज्यों को शामिल किया गया है जिनमें जीएसटी के घटक, जैसे मुआवजा, राज्य बजट में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। इन राज्यों के राजस्व में स्वयं कर प्राप्तियों के अनुपात के 43% (2015-17) से 40% (2018-19 बजट अनुमान) होने का अनुमान है। जहां तमिलनाडु के लिए इस अनुपात के बढ़ने का अनुमान है, दूसरे सभी राज्यों में स्वयं कर राजस्व अनुपात में क्रमशः गिरावट का अनुमान है। बिहार[‡], गुजरात, जम्मू एवं कश्मीर और कर्नाटक जैसे राज्यों में इनमें करीब पांच प्रतिशत की गिरावट हो सकती है।

रेखाचित्र 25: जीएसटी के बाद कुछ राज्यों के राजस्व में स्वयं कर प्राप्तियों की हिस्सेदारियों में बदलाव संभव

नोट: राज्यों के स्वयं कर राजस्व में जीएसटी मुआवजा अनुदान शामिल होता है। यहां उन अनुदानों को हटाकर स्वयं कर राजस्व को समायोजित किया गया है। इन राज्यों में आंध्र प्रदेश, गुजरात, जम्मू एवं कश्मीर, सिक्किम, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश शामिल हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लिए 2014-15 के बाद के डेटा का इस्तेमाल किया गया है।

Sources: State Budget Documents; PRS.

बॉक्स 1: जीएसटी के बाद राजस्व के नुकसान के लिए राज्यों को मुआवजे की उम्मीद

तालिका 2: 2018-19 में राज्यों को जीएसटी मुआवजा अनुदान की उम्मीद

राज्य

मुआवजा (करोड़ रुपए में)

राजस्व के प्रतिशत के रूप में मुआवजा

आंध्र प्रदेश

2,000

1.3 %

असम

1,000

1.4 %

बिहार

3,698

2.3 %

गुजरात

10,296

7.3 %

जम्मू एवं कश्मीर

3,175

4.9 %

कर्नाटक

10,800

6.5 %

मध्य प्रदेश

2,600

1.7 %

ओड़िशा

4,074

4.1 %

राजस्थान

4,500

3.0 %

सिक्किम

111

1.8 %

तमिलनाडु

1,698

1.0 %

तेलंगाना

1,500

1.2 %

त्रिपुरा

147

1.0 %

उत्तर प्रदेश

5,942

1.7 %

पश्चिम बंगाल

9,876

6.7 %

वस्तु एवं सेवा कर (राज्यों को मुआवजा) एक्ट, 2017 प्रावधान करता है कि जीएसटी के लागू होने के बाद राजस्व के नुकसान के लिए राज्यों को मुआवजा दिया जाएगा। 27 में से 15 राज्यों के 2018-19 के बजट दस्तावेजों में मुआवजा अनुदानों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

एक्ट के अनुसार राज्य जिस तारीख से राज्य जीएसटी एक्ट को लागू करेंगे, तब से पांच वर्ष की अवधि के लिए उन्हें मुआवजा दिया जाएगा। इसका अर्थ यह है कि इस मुआवजे को प्राप्त करने वाले राज्यों के पास राजस्व के नुकसान की भरपाई के लिए केवल उतनी ही अवधि होगी, और इस दौरान वे इस अंतर को अन्य राजस्वों की मदद से दूर करेंगे। गुजरात, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के सिलसिले में यह अंतर बहुत अधिक है (उनकी राजस्व प्राप्तियों का 6-7.5%)। जब पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के अंतर्गत लाया जाएगा, तब यह अंतर और बढ़ेगा (अधिक जानकारी के लिए रेखाचित्र 4 देखें)।

नोट: बजट में मुआवजा अनुदानों को एक समान रूप से दर्ज न करने के कारण संभव है कि ऐसे दूसरे राज्य भी हों जिन्हें इन अनुदानों की जरूरत हो।

Sources: State Budget Documents; PRS.

13 राज्यों में जीएसडीपी की तुलना में गैर कर राजस्व तेजी से बढ़ा; विभिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न वृद्धि दर

2011-19 के दौरान राज्यों के राजस्व में स्वयं गैर कर राजस्व का हिस्सा 8% रहा। राज्य विभिन्न स्रोतों से गैर कर राजस्व अर्जित करते हैं जैसे राज्यों द्वारा प्रदत्त ऋणों से अर्जित ब्याज, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों से लाभांश, खनिज उत्खनन के लिए लाइसेंसिंग फीस और वानिकी से संबंधित फीस, इत्यादि।

हालांकि राज्यों के स्वयं गैर कर राजस्व की औसत वृद्धि दर 12% रही है, इसका मुख्य कारण यह है कि कुछ राज्यों की वृद्धि दर अधिक रही है, जैसे पंजाब, केरल और बिहार की वृद्धि दर क्रमशः 33%, 28% और 26% है (रेखाचित्र 26)। इसके अतिरिक्त 13 राज्यों की वृद्धि दर उनकी जीएसडीपी की वृद्धि दर से अधिक है। आंध्र प्रदेश और सिक्किम में निम्न ब्याज प्राप्तियों और लॉटरी के कारण गैर कर राजस्व में 10% की दर से गिरावट हुई।  

रेखाचित्र 26: राज्यों का स्वयं कर राजस्व 12% की दर से बढ़ा, विभिन्न राज्यों की दर भिन्न-भिन्न (2011-19)

नोट: आंध्र प्रदेश और सिक्किम में नकारात्मक वृद्धि दर का कारण यह है कि 2015-16 में उनके गैर कर राजस्व में जबरदस्त गिरावट हुई। आंध्र प्रदेश में ब्याज प्राप्तियों के गिरने के कारण गैर कर राजस्व में भी गिरावट हुई। सिक्किम में ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि राज्य लॉटरियों से प्राप्त होने वाले राजस्व में गिरावट हुई। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का डेटा 2014-15 से है। दिल्ली का 2018-19 और त्रिपुरा का 2016-17 का जीएसडीपी डेटा उपलब्ध नहीं है।

Sources: State Budget Documents; RBI State of State Finances; Central Statistics Office, MOSPI; PRS.

बॉक्स 2: गैर कर राजस्व अर्जित करने के लिए राज्यों द्वारा राजस्व का उपयोग

कुछ राज्य राजस्व के लिए गैर कर राजस्व पर अधिक निर्भर रहते हैं। 2018-19 में गोवा, हरियाणा, पंजाब, केरल, राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़, असम और ओड़िशा को गैर कर राजस्व के माध्यम से 10% से अधिक राजस्व प्राप्त होने की उम्मीद है।

मुख्य रूप से राज्य गैर कर राजस्व के लिए तीन स्रोतों का इस्तेमाल करते हैं:

(i)   ब्याज प्राप्तियां;

(ii)  सामान्य सेवाएं: जिसमें पुलिस और प्रशासन से प्राप्त राजस्व (जुर्माना और फीस सहित), और राज्य लॉटरियां शामिल हैं, और 

(iii)  उद्योग: खनन उद्योगों की रॉयल्टी और अन्य उद्योगों से प्राप्त राजस्व।

गोवा में गैर कर राजस्व पर अधिक निर्भरता है, चूंकि बिजली वितरण योजना के अंतर्गत बिजली की बिक्री से 66% और खनन उद्योगों से 12% गैर कर राजस्व प्राप्त होने की उम्मीद है। हरियाणा द्वारा शहरी विकास और सड़क परिवहन से 53% गैर कर राजस्व अर्जित करने की संभावना है। केरल और पंजाब को सामान्य सेवाओं से क्रमशः 84% और 71% गैर कर राजस्व प्राप्त होने की उम्मीद है। दूसरी तरफ झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा को उद्योगों से क्रमशः 78%, 73% और 69% गैर कर राजस्व प्राप्त होने की संभावना है।

14वें वित्त आयोग के सुझावों के बाद केंद्रीय हस्तांतरणों में वृद्धि

केंद्रीय हस्तांतरणों में केंद्रीय करों के हस्तांतरण से होने वाली प्रप्तियां और केंद्र के सहायतानुदान शामिल होते हैं। वित्त आयोग के सुझावों के आधार पर राज्यों को केंद्रीय करों की शुद्ध प्राप्तियां हस्तांतरित की जाती हैं। इन करों में निम्नलिखित शामिल होते हैं: (i) इनकम टैक्स, (ii) कॉरपोरेशन टैक्स, (iii) सीजीएसटी, (iv) आईजीएसटी में केंद्र की हिस्सेदारी, (v) कस्टम्स, और (vi) केंद्रीय एक्साइज ड्यूटी, इत्यादि। 14वें वित्त आयोग ने 2015-16 से 2019-20 की अवधि के लिए करों के केंद्रीय पूल में राज्यों की हिस्सेदारी को 32% से बढ़ाकर 42% कर दिया। परिणामस्वरूप के तौर पर केंद्रीय हस्तांतरणों में केंद्रीय करों का हिस्सा 2014-15 में 52% से बढ़कर 2015-16 में 61% हो गया (रेखाचित्र 27)।

रेखाचित्र 27: 14वें वित्त आयोग के सुझावों के बाद केंद्रीय हस्तांतरणों में केंद्रीय करों के हस्तांतरण की दर 61%

नोट: इसमें दिल्ली को शामिल नहीं किया गया है, चूंकि राज्यों को हस्तांतरित होने वाली शुद्ध कर प्राप्तियों में उसकी कोई हिस्सेदारी नहीं है।    

Sources: State Budget Documents; RBI State of State Finances; PRS

केंद्रीय करों के हस्तांतरण अनटाइड होते हैं, यानी राज्य यह तय कर सकते हैं कि उन्हें कैसे खर्च करना है, दूसरी ओर केंद्रीय अनुदानों की प्रकृति टाइड होती है। वे विशिष्ट योजनाओं से जुड़े होते हैं और यह तय होता है कि उन्हें किस योजना पर खर्च किया जाएगा, जिनके आधार पर राज्य कार्यान्वयन एजेंसियों को इन योजना के लिए राशि वितरित करते हैं। ऐसी योजनाओं में सर्व शिक्षा अभियान और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन आदि शामिल हैं। सहायतानुदानों में वित्त आयोग द्वारा स्थानीय निकायों और पंचायतों को दिए जाने वाले अनुदान शामिल हैं।

2014-15 से पहले तक इनमें से कुछ राशि केंद्र द्वारा कार्यान्वयन एजेंसियों को सीधे दी जाती थी, लेकिन अब इसे राज्य बजट के जरिए दिया जाता है। परिणामस्वरूप केंद्रीय हस्तांतरणों में केंद्रीय अनुदानों का अनुपात 2013-14 में 38% से बढ़कर 2014-15 में 48% हो गया।

 

हस्तांतरण बढ़ने से अधिकतर क्षेत्रों में व्यय एक निश्चित सीमा में बरकरार

14वें वित्त आयोग ने सुझाव दिया था कि राज्यों को केंद्रीय करों का अधिक बड़ा हिस्सा हस्तांतरित किया जाए। परिणामस्वरूप राज्यों के पास अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार खर्च करने की फ्लेसिबिलिटी होती है और वे तय कर पाते हैं कि केंद्र से प्राप्त होने वाली अतिरिक्त राशि को किन कार्यक्रमों के लिए इस्तेमाल किया जाए।

2015 से पहले पेश होने वाले बजट (2011 से 2014 के बीच) के साथ अगर 2015 से 2018 के बीच के वर्षों के बजट (14वें वित्त आयोग की अवधि का एक भाग) की तुलना की जाए तो यह प्रदर्शित होता है कि ग्रामीण विकास पर औसत व्यय में सबसे अधिक वृद्धि हुई (रेखाचित्र 28)। यह 2011-15 में 4.4% से बढ़कर 2015-19 में 6% हो गया। शिक्षा पर औसत व्यय में सबसे अधिक गिरावट हुई (17.3% से गिरकर 16%)। अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में व्यय अधिकतर एक निश्चित सीमा में बरकरार रहा (यानी 1% से अधिक या कम)। 14वें वित्त आयोग के बाद इन क्षेत्रों में राज्यों की व्यय संबंधी प्राथमिकताओं में परिवर्तन हेतु अनुलग्नक देखें।

रेखाचित्र 28: वित्त आयोग से पहले और बाद में मुख्य क्षेत्रों में व्यय की हिस्सेदारियों में परिवर्तन

नोट: 2017-18 के आंकड़े संशोधित अनुमान और 2018-19 के आंकड़े बजट अनुमान हैं।

Sources: State Budget Documents; PRS.

 

आवर्ती राजस्व घाटे वाले राज्यों ने 2018-19 में फिर राजस्व घाटे को प्रस्तावित किया

2018-19 में सात राज्यों ने अपने बजट में राजस्व घाटे को प्रस्तावित किया है (रेखाचित्र 29)। इनमें केरल, पंजाब, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और तमिलनाडु शामिल हैं। इसका अर्थ यह है कि इन राज्यों की उधारियों को पहले उनके राजस्व व्यय को पूरा करने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि 2016-17 में इन सात राज्यों में पहले से राजस्व घाटा था (देखें रेखाचित्र 6)। 14वें वित्त आयोग ने इनमें से सिर्फ हिमाचल प्रदेश और केरल को 2017 तक राजस्व घाटा अनुदान दिया था। इसका अर्थ यह है कि आयोग ने केरल के लिए राजस्व घाटा समाप्त करने का जो लक्ष्य रखा था, राज्य ने पहले ही उसका उल्लंघन कर दिया है।

रेखाचित्र 29: सात राज्यों ने 2018-19 में राजस्व घाटे का अनुमान लगाया है

Sources: State Budget Documents; PRS.

 

2011-19 के दौरान राज्यों का औसत राजकोषीय घाटा जीएसडीपी का 2.8%, 13 राज्य 3% की सीमा से ऊपर

अगर सरकारी व्यय प्राप्तियों से अधिक होता है तो राज्य को राजकोषीय घाटा होता है। अधिक राजकोषीय घाटे का अर्थ यह है कि वित्तीय वर्ष में अधिक उधारियों की जरूरत होगी। उधार ली गई राशि को राज्य विभिन्न उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करता है, जैसे पूंजीगत निवेश, प्रशासनिक व्यय, ब्याज भुगतान और ऋण का पुनर्भुगतान। 

2015 में 14वें वित्त आयोग ने सुझाव दिया था कि राज्य अपने राजकोषीय घाटे को अपनी जीएसडीपी के 3% की सीमा के अंतर्गत रखे। उसने यह भी कहा था कि अगर राज्य एक विशिष्ट स्तर पर अपने ऋण और ब्याज भुगतान को बरकरार रखते हैं तो राजकोषीय घाटे की सीमा को अधिकतम 3.5% की छूट दी जा सकती है। यह छूट निम्नलिखित मामलों में दी जाएगी : (i) 0.25%, अगर राज्य का ऋण-जीएसडीपी अनुपात पिछले वर्ष में 25% के भीतर था, और (ii) 0.25%, अगर राज्य का ब्याज भुगतान पिछले वर्ष की राजस्व प्राप्तियों के 10% से कम या उसके बराबर था। 

2011-12 से 2018-19 के दौरान 14 राज्यों ने वित्त आयोग द्वारा निर्धारित सीमा के भीतर अपने औसत राजकोषीय घाटे को बरकरार रखा है (रेखाचित्र 30)। इस सीमा का उल्लंघन करने वाले 13 में से 8 राज्यों ने राजकोषीय घाटे को वित्त आयोग द्वारा निर्धारित 3.5% की सशर्त सीमा के भीतर बरकरार रखा है। 3.5% की सीमा को पार करने वाले राज्यों में निम्नलिखित शामिल हैं : (i) 3.6% पर बिहार, (ii) 4.1% पर हिमाचल प्रदेश, (iii) 5.1% पर जम्मू एवं कश्मीर, (iv) 4.8% पर पंजाब, और (v) 4% पर राजस्थान।

रेखाचित्र 30: 13 राज्यों में राजकोषीय घाटा जीएसडीपी की निर्धारित 3% की सीमा से अधिक (2011-19)

नोट: तेलंगाना का डेटा 2014-15 के बाद से है। दिल्ली का 2018-19 का डेटा और त्रिपुरा का 2016-17 के बाद का डेटा उपलब्ध नहीं है। 

Sources: State Budget Documents; RBI State of State Finances; Central Statistics Office, MOSPI; PRS.

2018-19 के बजट अनुमानों के अनुसार, 15 राज्यों में राजकोषीय घाटे को जीएसडीपी के 3% की सीमा के भीतर अनुमानित किया गया है (रेखाचित्र 31)। शेष चार राज्यों का अनुमान है कि उनका राजकोषीय घाटा 3.5% की सशर्त सीमा को पार कर जाएगा। ये राज्य हैं गोवा (5.3%), हिमाचल प्रदेश, (5.2%), जम्मू एवं कश्मीर, (4.9%), और पंजाब (3.8%)। हालांकि 2011-19 के दौरान हिमाचल प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर और पंजाब का राजकोषीय घाटा औसतन अधिक था, गोवा का राजकोषीय घाटा पिछले कुछ वर्षों में अपेक्षाकृत कम था (2011-19 के दौरान जीएसडीपी का 3.3%)।

रेखाचित्र 31: 2018-19 के दौरान 15 राज्यों का राजकोषीय घाटा जीएसडीपी के 3% की सीमा में बरकरार रहने की उम्मीद

नोट: दिल्ली और त्रिपुरा के लिए 2018-19 का डेटा उपलब्ध नहीं है। रेखाचित्र में दिल्ली के लिए 2017-18 का डेटा इस्तेमाल किया गया है।

Sources: State Budget Documents; RBI State of State Finances; Central Statistics Office, MOSPI; PRS.

जिन 15 राज्यों में राजकोषीय घाटा जीएसडीपी के 3% की सीमा में बरकरार रहने की उम्मीद है, उनमें से नौ में यह घाटा 2.8% से 3% के बीच रहने का अनुमान है। इसका अर्थ यह है कि इन राज्यों के 3% की सीमा तक पहुंचने या उसके बहुत करीब रहने का अनुमान है। संभव है कि वित्त वर्ष के अंत में राजस्व की कमी या अनापेक्षित व्यय के कारण ये राज्य इस सीमा को पार कर जाएं। राजकोषीय घाटे को इस सीमा के भीतर बरकरार रखने के लिए इन राज्यों को कड़े वित्तीय अनुशासन की जरूरत होगी। 

उदय की देनदारियों ने राज्यों के राजकोषीय घाटे को औसत 1.1% बढ़ाया

नवंबर 2015 में केंद्र सरकार ने सरकारी स्वामित्व वाली बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) की वित्तीय स्थिति में सुधार करने के लिए उज्ज्वल डिस्कॉम एश्योरेंस योजना (उदय) की शुरुआत की। इस योजना से पहले मार्च 2015 तक डिस्कॉम्स पर 4 लाख करोड़ रुपए का ऋण था।[12] उदय योजना पर हस्ताक्षर करने वाले राज्यों से यह अपेक्षा की गई कि वे दो वर्षों की अवधि के लिए डिस्कॉम्स के 75% ऋण का वहन करेंगे- 50% ऋण योजना के पहले वर्ष में और 25% दूसरे वर्ष में। सरकार के स्वामित्व वाले डिस्कॉम्स से ऋण को सरकारी खाते में हस्तांतरित करने से राज्य सरकारों की देनदारियां अधिक शुद्ध तरीके से प्रदर्शित हुईं। उल्लेखनीय है कि दूसरे सरकारी उपक्रमों पर भी बड़ा ऋण हो सकता है, जैसे सड़क परिवहन निगम और सिंचाई निगम, जोकि सरकार की आकस्मिक देनदारियां हैं लेकिन ये देनदारियां राज्यों की वित्तीय स्थिति में प्रदर्शित नहीं होती हैं।

योजना में प्रावधान है कि डिस्कॉम्स के ऋण के वहन को एफआरबीएम एक्ट की सीमा के लिहाज से 2015-16 और 2016-17 के राजकोषीय घाटे में शामिल नहीं किया जाएगा। फिर भी इस योजना ने इन राज्यों के ऋण के बोझ को बढ़ा दिया। 2016-17 के अंत में उदय के कारण जिन 14 राज्यों पर बकाया देनदारियां थीं (रेखाचित्र 32), 2015-16 और 2016-17 के दौरान उनका औसत राजकोषीय घाटा जीएसडीपी का 4% था। इसमें जीएसडीपी का 1.1% राजकोषीय घाटा, उदय की देनदारियों के कारण था। इन देनदारियों के पुनर्भुगतान के अतिरिक्त राज्यों को इस योजना के अंतर्गत कुछ और व्यय भी करना पड़ता है, जैसे डिस्कॉम्स के नुकसान की भरपाई, अगर नुकसान होता है, और बकाया देनदारियों पर ब्याज भुगतान।

इन 14 राज्यों में छत्तीगढ़ और महाराष्ट्र ने उदय की देनदारियों के वितरण के बाद अपने राजकोषीय घाटे (2015-16 और 2016-17 के लिए औसत) को जीएसडीपी की निर्धारित 3% की सीमा के भीतर बरकरार रखा। छत्तीसगढ़ का राजकोषीय घाटा 1.9% रहा और महाराष्ट्र का राजकोषीय घाटा 1.6% रहा। इनमें से सिर्फ हिमाचल प्रदेश का राजकोषीय घाटा जीएसडीपी की सशर्त 3.5% की सीमा के भीतर कायम रहा। हरियाणा और राजस्थान में शेष उधारियों के कारण राजकोषीय घाटे में उदय की देनदारियों का हिस्सा राजकोषीय घाटे के लगभग बराबर या उससे अधिक था। पंजाब में दो वर्षों के दौरान औसत राजकोषीय घाटा जीएसडीपी का 8.6% था, जिसमें उदय की देनदारियों का हिस्सा 1.9% था।

रेखाचित्र 32: उदय की देनदारियों के बाद दो राज्यों का राजकोषीय घाटा जीएसडीपी की 3% की सीमा के भीतर रहा

नोट: इस रेखाचित्र में उन राज्यों के डेटा को प्रदर्शित किया गया है, जिनमें उदय के कारण मार्च 2017 के अंत तक देनदारियां बकाया थीं। वित्तीय वर्ष पर उनके प्रभाव को दिखाने के लिए दो वर्ष की अवधि में उन देनदारियों का औसत निकाला गया है।

Source: State Budget Documents; RBI State of State Finances; Central Statistics Office, MOSPI; PRS.

राज्यों की देनदारियां के जीएसडीपी के 24.4% तक पहुंचने की उम्मीद; अधिकतर निर्धारित सीमा से पार

बकाया देनदारियों का अर्थ यह है कि पिछले वर्षों के दौरान राजकोषीय घाटे को वित्त पोषित करने के कारण राज्यों ने जो ऋण लिए थे, वे अब भी उस पर बकाया हैं। अधिक देनदारी होने का मतलब यह है कि भविष्य में राज्यों पर ऋण चुकाने की अधिक बाध्यता होगी। 2017 में एफआरबीएम रिव्यू कमिटी (चेयर : एन.के.सिंह) ने केंद्र और राज्यों के राजकोषीय गर्वनेंस की स्थिति की समीक्षा की थी। कमिटी ने सुझाव दिया था कि राजकोषीय घाटे के मौजूदा तरीके (यानी वर्ष की उधारियों) की बजाय ऋण (यानी वर्ष के अंत में कुल देनदारियों) को वित्तीय नीति के मुख्य लक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जाए। कमिटी ने सुझाव दिया था कि ऋण के अनुपात का लक्ष्य जीडीपी का 60% होना चाहिए जिसमें केंद्र की सीमा 40% और राज्यों की सीमा 20% होनी चाहिए।   

2018-19 में 20 राज्यों द्वारा एफआरबीएम रिव्यू कमिटी की 20% की सीमा पार करने का अनुमान है। हालांकि राज्यों के एफआरबीएम कानून विशेष तौर से बकाया देनदारियों की सीमा निर्दिष्ट करते हैं, जिनका हमेशा कड़ाई से पालन नहीं किया जाता। कमिटी ने सुझाव दिया कि सरकार किस आधार पर उन लक्ष्यों से विचलन (डेविएट) कर सकती है, उन्हें स्पष्ट होना चाहिए और सरकार को अन्य परिस्थितियों को अधिसूचित करने की अनुमति होनी चाहिए, जैसा कि मौजूदा एफआरबीएम एक्ट्स में है।  

रेखाचित्र 33: राज्यों की बकाया देनदारियां जीएसडीपी के 24.4% पर अनुमानित (2018-19 बअ)

नोट: दिल्ली और त्रिपुरा के डेटा क्रमशः 2017-18 और 2015-16 के हैं।

Sources: State Budget Documents; RBI State of State Finances; Central Statistics Office, MOSPI; PRS.

2018-19 में जम्मू एवं कश्मीर पर सबसे अधिक देनदारी है जोकि जीएसडीपी का 50% है। इसके बाद 41% के साथ पंजाब का स्थान आता है (रेखाचित्र 33)। उल्लेखनीय है कि ऐसे भी राज्य हैं जहां 2011-19 की अवधि में सर्वाधिक राजकोषीय घाटा है, जोकि क्रमशः जीएसडीपी का 5.1% और जीएसडीपी का 4.8% है (देखें रेखाचित्र 30)। इसका अर्थ यह है कि न केवल इन राज्यों पर बड़ा ऋण है, बल्कि उनकी वार्षिक उधारियां भी ज्यादा हैं। बकाया देनदारियों के बढ़ने से आने वाले वर्षों में इन राज्यों की अपनी जरूरत के आधार पर अधिक उधार लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

राज्यों को अपनी जीएसडीपी के 2.6% की गारंटी मिली है

जैसा कि पहले चर्चा की गई है, बकाया देनदारियों में आकस्मिक प्रकृति वाली देनदारियां शामिल नहीं होतीं, जिनका कुछ मामलों में राज्यों को भुगतान करना होता है। राज्य सरकार को अपने स्वामित्व वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (एसपीएसईज़) द्वारा लिए गए ऋणों पर गारंटी दी जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इन उपक्रमों का क्रेडिट प्रोफाइल बुरा होता है और सरकारी गारंटी से उन्हें ऋण हासिल करने में आसानी होती है। हालांकि अगर ये एसपीएसई अपने ऋण को चुकाने में डीफॉल्ट करते हैं तो राज्य सरकार को वह गारंटी चुकानी होती है और उनके स्थान पर भुगतान करना होता है।  

उदाहरण के लिए उदय योजना के अंतर्गत राज्यों ने सरकारी स्वामित्व वाली बिजली वितरण कंपनियों के ऋण का वहन किया। जैसा कि पहले भी चर्चा की गई है (रेखाचित्र 32), 2015-16 और 2016-17 में जीएसडीपी में उदय की देनदारियां औसत 1.1% रहीं, और उनके कारण राज्यों को 4% का राजकोषीय घाटा हुआ। आरबीआई ने कहा कि आकस्मिक देनदारियां राज्य सरकारों को जोखिम में डालती हैं जिनके कारण उन्हें बकाया देनदारियों से जूझना पड़ता है और एसपीएसईज़ को नुकसान होता है।

2017-18 तक राज्यों पर जीएसडीपी के 2.6% के बराबर आकस्मिक देनदारियां हैं (रेखाचित्र 34)। कुछ राज्यों पर अन्य की तुलना में अधिक बड़ी गारंटियां हैं। पंजाब, राजस्थान और हरियाणा पर क्रमशः 11.4%, 6.4% और 5% के बराबर बकाया गारंटियां हैं। इसकी तुलना में नौ राज्यों पर 1% से भी कम देनदारियां हैं।

रेखाचित्र 34: कुछ राज्यों की गारंटियां अन्य की तुलना में बहुत अधिक हैं (2017-18 संअ)

नोट: दिल्ली, गोवा और त्रिपुरा के डेटा उपलब्ध नहीं हैं। छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओड़िशा, राजस्थान और तेलंगाना के लिए 2016-17 के डेटा इस्तेमाल किए गए हैं। झारखंड और उत्तर प्रदेश के लिए 2015-16 के, जबकि हरियाणा और पश्चिम बंगाल के लिए 2014-15 के डेटा इस्तेमाल किए गए हैं।  

Sources: State Budget Documents; RBI State of State Finances; Central Statistics Office, MOSPI; PRS.

 

 

अनुलग्नक

प्रस्तुत खंड में आठ वर्षों की अवधि के दौरान मुख्य क्षेत्रों पर राज्यों द्वारा किए गए व्यय का विश्लेषण किया गया है। राज्यों के व्यय की प्राथमिकताओं का आकलन करने और राज्यों को अनटाइड फंड्स के अधिक हस्तांतरण के असर को समझने के लिए व्यय की तुलना दो समयावधियों में की गई है: 14वें वित्त आयोग (2011-12 से 2014-15, यानी पांच वर्ष की अवधि में से चार वर्ष) से पूर्व और 14वें वित्त आयोग के बाद (2015-16 से 2018-19)। इस तुलना से हमें यह जानने में मदद मिलेगी कि किस प्रकार राज्यों ने फंड्स आबंटित करने में अपनी बढ़ी हुई फ्लेक्सिबिलिटी का इस्तेमाल किया है। कुछ मदों के लिए प्रति व्यक्ति व्यय की गणना की गई है ताकि यह प्रदर्शित हो कि राज्य एक दूसरे की तुलना में कैसा प्रदर्शन कर रहे हैं। हालांकि केंद्र शासित प्रदेश होने के कारण दिल्ली वित्त आयोग की हस्तांतरण प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है, हमने समग्रता सुनिश्चित करने के लिए उसे इस खंड में शामिल किया है।    

शिक्षा

2011-15 के दौरान राज्यों ने अपने बजट का 17.3% शिक्षा पर खर्च किया। इसमें योजनाओं (जैसे सर्व शिक्षा अभियान और मिड डे मील),स्कूल की इमारतों के निर्माण और रखरखाव पर किया गया व्यय, और शिक्षकों एवं दूसरे कर्मचारियों को वेतन और पेंशन का भुगतान भी शामिल है। 2015-19 के दौरान इसमें 1.3 प्रतिशत की गिरावट हुई और यह 16% हो गया।

रेखाचित्र 35: 2011-15 से 2015-19 के बीच महाराष्ट्र और उत्तराखंड ने शिक्षा पर अपने आबंटन में 2.8% की कटौती की

नोट: 2017-18 के आंकड़े संशोधित अनुमान और 2018-19 के आंकड़े बजट अनुमान हैं।

Sources: State Budget Documents; PRS.

शिक्षा पर प्रति व्यक्ति व्यय

राज्यों ने शिक्षा पर प्रति व्यक्ति (6-23 वर्ष की आयु) औसत 6,471 रुपए खर्च किए। सिक्किम ने शिक्षा पर सबसे अधिक खर्च किया, जोकि प्रति व्यक्ति 28,312 रुपए है। यह सभी राज्यों की तुलना में लगभग चार गुना है। शिक्षा पर सर्वाधिक खर्च करने वाले राज्यों में गोवा दूसरे स्थान पर रहा (25,215 रुपए प्रति व्यक्ति)। इस मद में सबसे कम खर्च करने वाले राज्यों में बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश शामिल हैं।

रेखाचित्र 36: बिहार और उत्तर प्रदेश ने शिक्षा पर निम्नतम प्रति व्यक्ति व्यय किया (रुपए में)