भारत में पुलिस सुधार

एक झलक

सरकारी व्यय का लगभग 3% हिस्सा पुलिस पर

  • राज्य पुलिस पर कानून एवं व्यवस्था तथा अपराधों की जांच करने की जिम्मेदारी होती है, जबकि केंद्रीय बल खुफिया और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े विषयों (जैसे उग्रवाद) में उनकी सहायता करते हैं। केंद्र और राज्य सरकार के बजट का 3% हिस्सा पुलिस पर खर्च होता है।

राज्य बलों में 24% रिक्तियां; केंद्रीय बलों में 7%

Sources: Bureau of Police Research and Development; PRS.

पुलिस बल पर अत्यधिक बोझ

  • जनवरी 2016 में राज्य पुलिस बलों में 24% रिक्तियां थीं (लगभग 5.5 लाख रिक्तियां)। हालांकि 2016 में हर एक लाख व्यक्ति पर पुलिसकर्मियों की स्वीकृत संख्या 181 थी, उनकी वास्तविक संख्या 137 थी। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र के मानक के अनुसार एक लाख व्यक्तियों पर 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए।
  • राज्य पुलिस बलों में 86% कॉन्स्टेबल हैं। अपने सेवा काल में कॉन्स्टेबलों की आम तौर पर एक बार पदोन्नति होती है और सामान्यतः वे हेड कॉन्स्टेबल के पद पर ही रिटायर होते हैं। इससे वे अच्छा प्रदर्शन करने को प्रोत्साहित नहीं हो पाते।

आधुनिकीकरण के लिए फंड्स का उपयोग (%)

Sources: Bureau of Police Research and Development; PRS.

  • पिछले दशक (2005-2015) में प्रति एक लाख जनसंख्या पर अपराध दर में 28% की वृद्धि हुई है। हालांकि अपराध साबित होने की दर कम है। 2015 में भारतीय दंड संहिता, 1860 के तहत पंजीकृत 47% मामलों में अपराध साबित हुए थे। विधि आयोग ने गौर किया है कि इसके पीछे एक मुख्य कारण अच्छी तरह से जांच न होना है।

पुलिस इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार

  • कैग के ऑडिट में राज्य पुलिस बलों में हथियारों की कमी पाई गई है। जैसे राजस्थान और पश्चिम बंगाल के पुलिस बलों में अपेक्षित हथियारों में क्रमशः 75% और 71% की कमी है।
  • ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ने यह टिप्पणी भी की है कि राज्य पुलिस बलों के अपेक्षित वाहनों (2,35,339 वाहनों) के स्टॉक में 30.5% स्टॉक का अभाव है।
  • हालांकि इंफ्रास्ट्रक्चर के आधुनिकीकरण के लिए दिए जाने वाले फंड्स का आम तौर पर पूरा उपयोग नहीं किया जाता है। उदाहरण के लिए 2015-16 में केवल 14% फंड्स का राज्यों द्वारा उपयोग किया गया था।

पुलिस को जवाबदेह बनाना

  • पुलिस के पास अपराधों की जांच करने, कानूनों का प्रवर्तन करने और राज्य में कानून एवं व्यवस्था की स्थिति बहाल रखने की शक्ति होती है। इस शक्ति का उपयोग वैध उद्देश्य के लिए हो, यह सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न देशों ने सुरक्षात्मक उपाय किए हैं जैसे राजनीतिक कार्यकारिणी के प्रति पुलिस को जवाबदेह बनाना और स्वतंत्र निरीक्षण अथॉरिटीज़ की स्थापना करना।
  • भारत में, राजनीतिक कार्यकारिणी (यानी मंत्रीगण) में पुलिस बलों के अधीक्षण और नियंत्रण की शक्ति है ताकि उनकी जवाबदेही को सुनिश्चित किया जा सके। हालांकि दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने टिप्पणी की थी कि इस शक्ति का दुरुपयोग किया जाता है और मंत्रीगण व्यक्तिगत एवं राजनीतिक कारणों के लिए पुलिस बलों का उपयोग करते हैं। इसलिए विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि राजनीतिक कार्यकारिणी की शक्तियों का दायरा कानून के तहत सीमित किया जाना चाहिए।

परिचय

संविधान के तहत, पुलिस राज्य द्वारा अभिशासित विषय है।[1]  इसलिए 29 राज्यों में से प्रत्येक के अपने पुलिस बल हैं। राज्यों की सहायता के लिए केंद्र को भी पुलिस बलों के रखरखाव की अनुमति दी गई है ताकि कानून और व्यवस्था की स्थिति सुनिश्चित की जा सके।[2] इसलिए केंद्र विशेष कार्यों, जैसे खुफिया सूचनाएं एकत्र करना, जांच, अनुसंधान एवं रिकॉर्ड कीपिंग, और प्रशिक्षण के लिए सात केंद्रीय पुलिस बलों और कुछ अन्य पुलिस संगठनों का रखरखाव करता है। 

पुलिस बलों का मुख्य कार्य कानूनों को बरकरार रखना एवं उनका प्रवर्तन करना, अपराधों की जांच करना और देश के लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। भारत जैसे विशाल और बड़ी जनसंख्या वाले देश में पुलिस बलों को कर्मियों, हथियारों, फोरेंसिक, संचार औऱ परिवहन के साधनों से अच्छी तरह से लैस होना चाहिए ताकि वे अपनी भूमिका कुशलतापूर्वक निभा सकें। इसके अतिरिक्त उन्हें पेशेवर तरीके से जिम्मेदारियों को निभाने के लिए कार्य संबंधी स्वतंत्रता और कार्य की संतोषजनक स्थितियां (जैसे कार्य के रेगुलेटेड घंटे और पदोन्नति के अवसर) प्राप्त होनी चाहिए, जबकि खराब प्रदर्शन या शक्ति के दुरुपयोग के लिए उन्हें जवाबदेह माना जाना चाहिए।[3] 

इस रिपोर्ट में भारत में पुलिस संगठन की झलक प्रदान की गई है और उन मुख्य मुद्दों पर प्रकाश डाला गया है जो उनके कामकाज को प्रभावित करते हैं। उल्लेखनीय है कि गृह मामलों से संबंधित स्टैंडिंग कमिटी केंद्रीय और राज्य पुलिस बलों के संगठन और कामकाज से जुड़े दो विषयों की जांच भी कर रही है: (i) “पुलिस सुधारों को लागू करने के लिए रोडमैप, और (ii) “केंद्रीय और पुलिस बल/संगठन[4] 

केंद्र और राज्य की जिम्मेदारियां

संविधान केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति का विधायी और कार्यकारी विभाजन करता है। पुलिस के संबंध में केंद्र और राज्यों द्वारा रेगुलेट किए जाने वाले कुछ प्रमुख विषयों को रेखाचित्र 2 में प्रदर्शित किया गया है।[5]

राज्य और केंद्रीय पुलिस बलों की जिम्मेदारियां भिन्न-भिन्न हैं। राज्य पुलिस बल मुख्य रूप से स्थानीय विषयों जैसे अपराध को रोकने और उनकी जांच करने, तथा कानून एवं व्यवस्था बहाल रखने का काम करते हैं। हालांकि वे आंतरिक सुरक्षा की अधिक गहन चुनौतियों की स्थिति (जैसे आतंकवादी घटनाएं या उग्रवादी हिंसा) में सबसे पहले प्रतिक्रिया देते हैं, लेकिन केंद्रीय बलों को ऐसे संघर्षों से निपटने की विशेषज्ञता प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए स्थानीय पुलिस की तुलना में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल को जान-माल को न्यूनतम नुकसान पहुंचाए बिना बड़े पैमाने पर भड़के दंगों को काबू करने का प्रशिक्षण मिला होता है। इसके अतिरिक्त केंद्रीय बल सीमा सुरक्षा करने में सुरक्षा बलों की सहायता करते हैं। 

केंद्र सात केंद्र शासित प्रदेशों की पुलिस व्यवस्था के लिए जिम्मेदार होता है। वह राज्य पुलिस बलों को खुफिया और वित्तीय सहयोग भी प्रदान करता है।

बॉक्स 1: भारत में अपराध

2015 में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो ने संज्ञेय अपराधों की 73 लाख से अधिक शिकायतें दर्ज कीं। संज्ञेय अपराध ऐसे अपेक्षाकृत गंभीर अपराध होते हैं जिनके लिए पुलिस अधिकारियों को जांच के लिए मेजिस्ट्रेट से वारंट लेने की जरूरत नहीं होती, जैसे हत्या और बलात्कार। 2005 से 2015 के बीच, संज्ञेय अपराधों के लिए अपराध दर (यानी अपराध प्रति लाख व्यक्ति) में 28% तक की वृद्धि हुई। इस दौरान यह 456 शिकायत प्रति लाख व्यक्ति से बढ़कर 582 शिकायत प्रति लाख व्यक्ति हो गई। ऐसा मुख्य रूप से एल्कोहल- निषेध से जुड़े अपराधों, चोरी, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध और धोखाधड़ी की घटनाओं के बढ़ने के कारण हुआ।

भारतीय दंड संहिता, 1860 और कुछ विशेष कानूनों के तहत विभिन्न प्रकार के अपराधों के लिए अपराध दर (प्रति लाख जनसंख्या)

नोट: महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों (जैसे पति या उसके संबंधियों द्वारा की गई क्रूरता, महिलाओं के शील को भंग करना) की दर की गणना महिलाओं की प्रति लाख जनसंख्या के आधार पर की जाती है।

Sources: National Crime Records Bureau; PRS.

पुलिस के संगठन और कार्यों की झलक

राज्य पुलिस बल

विभिन्न राज्यों के पुलिस बलों को उनके राज्य के कानूनों और रेगुलेशनों द्वारा अभिशासित किया जाता है। कुछ राज्यों में केंद्रीय कानून, पुलिस ऐक्ट, 1861 के आधार पर कानून बनाए गए हैं।[6] राज्यों के अपने पुलिस मैनुअल भी होते हैं जिनमें इस बात का विवरण होता है कि राज्य पुलिस का संगठन किस प्रकार किया जाए, उनकी भूमिकाएं और जिम्मेदारियां क्या हैं, किन रिकॉर्डों का रखरखाव किया जाना चाहिए, इत्यादि।

पदानुक्रम और संगठन

सामान्यतः राज्य पुलिस बलों की दो शाखाएं होती हैं: सिविल और सशस्त्र पुलिस। सिविल पुलिस रोजमर्रा के कानून और व्यवस्था को बहाल करने और अपराध को काबू करने के लिए जिम्मेदार होती है। सशस्त्र पुलिस को रिजर्व में रखा जाता है, जब तक कि दंगे जैसी स्थितियों में अतिरिक्त सहयोग की जरूरत न हो। इस खंड में हम चर्चा करेंगे कि देश में किस प्रकार सिविल पुलिस का संगठन किया जाता है।

मुख्य रूप से सिविल पुलिस बल रेखाचित्र 2 में प्रदर्शित पदानुक्रम की संरचना का पालन करते हैं। प्रभावी पुलिस व्यवस्था के लिए प्रत्येक राज्य को विभिन्न फील्ड यूनिट्स में विभाजित किया जाता है: जोन्स, रेंजेज़, डिस्ट्रिक्ट, सब-डिविजन्स या सर्किल्स, पुलिस स्टेशंस और आउटपोस्ट्स। उदाहरण के लिए एक राज्य में दो या उससे अधिक जोन्स होंगे, प्रत्येक जोन में दो या उससे अधिक रेंजेज़ होंगी, और रेंजेज़ को इसी प्रकार अन्य फील्ड यूनिट्स में उप-विभाजित किया जाएगा। इस सेटअप की मुख्य फील्ड यूनिट्स पुलिस डिस्ट्रिक्ट और पुलिस स्टेशन होते हैं।[7]  

रेखाचित्र 2: राज्य पुलिस का पदानुक्रम

Sources: Bureau of Police Research and Development; Commonwealth Human Rights Initiative; PRS.

पुलिस डिस्ट्रिक्ट वह क्षेत्र होता है जिसकी घोषणा राज्य सरकार द्वारा की जाती है। यह पुलिस प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण निरीक्षणात्मक और कार्यात्मक इकाई है क्योंकि जिला के ऑफिसर इन चार्ज (यानी सुपरिटेडेंट ऑफ पुलिस या एसपी) के पास पुलिस बल के आंतरिक प्रबंधन से जुड़े मामलों और कानून एवं व्यवस्था संबंधी कर्तव्यों का पालन करने की परिचालनगत स्वतंत्रता होती है।7 

रेखाचित्र 3: राज्य पुलिस की संख्या में वृद्धि (1951-2011)

नोट : प्रति लाख जनसंख्या पर पुलिस की संख्या को गिनने के लिए संबंधित वर्ष में पुलिसकर्मियों की संख्या व जनसंख्या के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है।

Sources: Bureau of Police Research and Development; Commonwealth Human Rights Initiative; PRS.

पुलिस स्टेशन पुलिस के कामकाज की बुनियादी इकाई होता है (जिसका प्रमुख इंस्पेक्टर या सब इंस्पेक्टर होता है)। इसके निम्नलिखित कार्य होते हैं: (i) अपराधों को रजिस्टर करना, (ii) स्थानीय पेट्रोलिंग, (iii) जांच, (iv) कानून और व्यवस्था से जुड़ी विभिन्न स्थितियों से निपटना (जैसे प्रदर्शन और हड़ताल), (v) खुफिया सूचनाएं एकत्र करना, और (vi) अपने क्षेत्राधिकार में आने वाले क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करना। एक पुलिस स्टेशन में पेट्रोलिंग और चौकसी के लिए अनेक पुलिस आउटपोस्ट्स हो सकते हैं। सामान्यतः आवश्यकता होने पर राज्य सरकार राज्य पुलिस बल के प्रमुख (यानी डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस या डीजीपी) की सलाह से जिले की जनसंख्या, क्षेत्र, अपराध की स्थिति और काम के दबाव के आधार पर जिले में जितने चाहे, पुलिस आउटपोस्ट्स बना सकती है।

जनवरी 2016 तक पुलिसकर्मियों की स्वीकृत संख्या 22,80,691 थी।[8] उल्लेखनीय है कि इनमें बड़ा हिस्सा कॉन्स्टेबलरी का है (यानी 86% हेड कॉन्स्टेबल और कॉन्स्टेबल हैं), 13% अपर सबऑर्डिनेट रैंक (यानी इंस्पेक्टर से एसिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर तक) और 1% ऑफिसर रैंक (डीजीपी से डेप्युटी एसपी तक) वाले हैं। पिछले छह दशकों में राज्य पुलिस बलों की कुल संख्या काफी हद तक बढ़ी है। जैसा कि रेखाचित्र 3 में प्रदर्शित है, 1951 से 2001 के बीच पुलिस की संख्या 130 प्रति लाख जनसंख्या से बढ़कर 141 प्रति लाख जनसंख्या हो गई। फिर 2001 से 2011 के बीच 21% बढ़कर 171 प्रति लाख जनसंख्या पर पहुंच गई।

कार्यकारिणी की देखरेख

राज्य सरकार, राज्य पुलिस बलों पर नियंत्रण रखती है और उसकी देखरेख (सुपरिटेंडेंस) करती है।[9] जिला स्तर पर जिला मेजिस्ट्रेट (डीएम) भी एसपी को निर्देश दे सकता है और पुलिस प्रशासन को सुपरवाइज कर सकता है।[10] यह जिला स्तर पर नियंत्रण की दोहरी प्रणाली कहलाता है (चूंकि यहां डीएम और एसपी, दोनों में अधिकार निहित हैं)। 

हालांकि कुछ मेट्रोपॉलिटन शहरों और शहरी क्षेत्रों में दोहरी प्रणाली की जगह पर कमीश्नरी प्रणाली लागू की गई है ताकि कानून और व्यवस्था की जटिल स्थितियों में तुरंत फैसले लिए जा सकें। जनवरी 2016 तक दिल्ली, अहमदाबाद और कोच्चि, इत्यादि 53 शहरों में यह प्रणाली लागू थी।8

तालिका 1: नियंत्रण की दोहरी प्रणाली और कमीश्नरी प्रणाली के बीच का भेद

दोहरी प्रणाली

कमीश्नरी प्रणाली (53 शहर)

·   जिला पुलिस में दोहरी कमांड संरचना का मतलब यह है कि पुलिस पर नियंत्रण और निर्देश का अधिकार एसपी (जिला पुलिस प्रमुख) और जिला मेजिस्ट्रेट (कार्यकारिणी), दोनों को है।  

 

·   डीएम और पुलिस में शक्तियों का पृथक्करण (सेपेरेशन ऑफ पावर्स) है। जैसे डीएम गिरफ्तारी का वारंट और लाइसेंस जारी कर सकता है और पुलिस अपराध की जांच और गिरफ्तारी कर सकती है। जिला स्तर पर पुलिस के अधिकार कम होते हैं और वे डीएम के प्रति जवाबदेह हो जाते हैं।

·   एसपी को एडीशनल/एसिस्टेंट/डेप्युटी एसपीज़, इंस्पेक्टर और कॉन्स्टेबलरी एसिस्ट करते हैं।

·   एकीकृत कमांड संरचना के साथ शहर में पुलिस बल का एकमात्र प्रमुख कमीश्नर ऑफ पुलिस (डेप्युटी इंस्पेक्टर जनरल का रैंक या उससे उच्च अधिकारी) होता है। वह कानून और व्यवस्था के मामलों में तुरंत कार्रवाई करने की अनुमति देता है।

·   पुलिस व्यवस्था और मेजिस्ट्रेसी की शक्तियां कमीश्नर में निहित होती हैं। उसकी राज्य सरकार और राज्य पुलिस प्रमुख को सीधी जवाबदेही होती है। स्थानीय प्रशासन के प्रति उसकी जवाबदेही कम होती है।

·   स्पेशल/ज्वाइंट/एडीशनल/डेप्युटी कमीश्नर इत्यादि कमीश्नर को एसिस्ट करते हैं। इंस्पेक्टर के बाद की रैंक संरचना उसी तरह होती है।

Sources: Bureau of Police Research and Development; PRS.

भर्ती और प्रशिक्षण

राज्य पुलिस बलों में प्रत्यक्ष भर्ती तीन स्तरों पर होती है: (i) कॉन्स्टेबल, (ii) सब इंस्पेक्टर, और (iii) एसिस्टेंट या डेप्युटी एसपी।3  राज्य सरकारें कॉन्स्टेबल, सब-इंस्पेक्टर और डेप्युटी एसपीज़ के पद पर पुलिसकर्मियों की प्रत्यक्ष भर्ती के लिए जिम्मेदार होती हैं। केंद्र सरकार एसिस्टेंट एसपी के पद के लिए भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारियों की भर्ती करती है। आईपीएस, विधान के तहत सृजित अखिल भारतीय सेवा है।[11] अन्य पदों पर (तथा सब इंस्पेक्टर और एसिस्टेंट/डेप्युटी एसपीज़ के पदों पर) रिक्तियां पदोन्नतियों से भरी जा सकती हैं। 

राज्य के कई प्रशिक्षण संस्थानों में पुलिस बलों को प्रशिक्षित किया जाता है। उदाहरण के लिए राज्य में (i) अधिकारियों (यानी डेप्युटी या एसिस्टेंट एसपी और उससे उच्च पद वाले पुलिसकर्मी) को प्रशिक्षित करने के लिए एपेक्स संस्थान होते हैं, (ii) सबऑर्डिनेट रैंक और कॉन्स्टेबलरी के लिए पुलिस प्रशिक्षण स्कूल होते हैं, और (iii) पुलिस की विशिष्ट यूनिट्स जैसे ट्रैफिक, वायरलेस और मोटर वेहिकल ड्राइविंग के लिए विशेष स्कूल होते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ राष्ट्रीय प्रशिक्षण संस्थान राज्य पुलिस बलों के क्षमता निर्माण के लिए पाठ्यक्रम संचालित करते हैं (जैसे कोलकाता, हैदराबाद, चंडीगढ़, गाजियाबाद और जयपुर में केंद्रीय जासूसी प्रशिक्षण स्कूल)।7 

रेखाचित्र 4: पिछले दशक में पुलिस पर राज्यों द्वारा किया गया व्यय

 नोट : केंद्र शासित प्रदेशों के व्यय शामिल हैं।

Sources: Bureau of Police Research and Organisation; PRS 

व्यय

2015-16 में राज्यों (केंद्र शासित प्रदेशों सहित) ने राज्य पुलिस बलों पर 77,487 करोड़ रुपए का व्यय किया, जिसमें वेतन, हथियार, हाउसिंग और परिवहन पर किया जाने वाला व्यय शामिल है।8  इस व्यय में राजस्व मदों, जैसे वेतन, का बड़ा हिस्सा है क्योंकि पुलिस कार्मिक-प्रधान बल है।[12] राज्य के कुल बजट का 3% (यानी 27,20,716 करोड़ रुपए) पुलिस पर व्यय किया गया जाता है। औसतन पिछले दशक में पुलिस पर किए जाने वाले व्यय में प्रति वर्ष 15% की दर से वृद्धि हुई है, हालांकि वार्षिक वृद्धि में व्यापक उतार-चढ़ाव हुआ है (2012-13 में 4% से 2009-10 में 30% तक)।

तालिका 2: पुलिस पर राज्य-वार व्यय (राज्य बजट का % )

2% से कम

2%-5%

5% से अधिक

नाम

राज्य बजट का %

नाम

राज्य बजट का %

नाम

राज्य बजट का %

ओड़िशा

1.1%

आंध्र प्रदेश

2.1%

जम्मू और कश्मीर

5.2%

गुजरात

1.7%

केरल

2.2%

पंजाब

5.8%

कर्नाटक

1.8%

उत्तराखंड

2.7%

नागालैंड

7.2%

हिमाचल प्रदेश

1.9%

छत्तीसगढ़

2.7%

मणिपुर

8.7%

तेलंगाना

1.9%

असम

2.8%

 

 

मध्य प्रदेश

1.9%

राजस्थान

2.9%

 

 

 

 

महाराष्ट्र

3.0%

 

 

 

 

हरियाणा

3.1%

 

 

 

 

तमिलानाडु

3.1%

 

 

 

 

पश्चिम बंगाल

3.4%

 

 

 

 

उत्तर प्रदेश

3.4%

 

 

 

 

बिहार

4.0%

 

 

 

 

मेघालय

4.2%

 

 

 

 

सिक्किम

4.8%

 

 

 

 

मिजोरम

4.8%

 

 

 

 

त्रिपुरा

4.9%

 

 

नोट: केंद्र शासित प्रदेशों के आंकड़े शामिल नहीं हैं।

Sources: Bureau of Police Research and Development; PRS.

बॉक्स 2: आंतरिक सुरक्षा की स्थिति की झलक

साउथ एशिया टेरेरिज्म पोर्टल ने 2016 में कहा था कि उस वर्ष भारत में आतंकवाद और उग्रवाद से जुड़ी घटनाओं में 898 लोग मारे गए थे। इनमें से 48% हत्याएं वामपंथी चरणपंथी हमलों, 30% जम्मू एवं कश्मीर में हुई हिंसा और 18% पूर्वोत्तर में उग्रवाद के कारण हुईं। 2005 से 2016 के बीच चरमपंथी हिंसा के कारण होने वाली हत्याओं में 11% की दर से गिरावट हुई। यह 2005 में 3,259 से गिरकर 2016 में 898 हो गई। सामान्यतः आंतरिक सुरक्षा की ऐसी चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्रीय पुलिस बलों को बुलाया जाता है।

वर्ष

जम्मू और कश्मीर

उत्तर पूर्व में उग्रवाद

वामपंथी चरमपंथ

चरमपंथी हिंसा के कारण अन्य मौतें

कुल

2005

1,739

717

717

86

3,259

2006

1,116

637

737

280

2,770

2007

777

1,036

650

152

2,615

2008

541

1,051

648

356

2,596

2009

375

852

997

7

2,231

2010

375

322

1,180

25

1,902

2011

183

246

602

42

1,073

2012

117

316

367

3

803

2013

181

252

421

30

884

2014

193

465

314

4

976

2015

174

273

251

24

722

2016

267

165

433

33

898

Sources: South Asia Terrorism Portal; PRS.

केंद्रीय पुलिस बल

विभिन्न केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल और अर्धसैनिक बल केंद्र सरकार के अंतर्गत आते हैं। इनमें से चार भारत की सीमाओं की रक्षा करते हैं, और तीन विशेष कार्य करते हैं। ये निम्न हैं:

असम राइफल्स (एआर): म्यांमार से लगी भारतीय सीमाओं की रक्षा करता है।[13]  

सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ):  पाकिस्तान और बांग्लादेश से लगी भारतीय सीमाओं की रक्षा करता है।.

भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल (आईटीबीपी): चीन से लगी सीमा की रक्षा करता है।

सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी):  नेपाल और भूटान से लगी भारतीय सीमाओं की रक्षा करता है। 

केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ):  महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर इंस्टॉलेशनों, जैसे हवाई अड्डों, परमाणु ऊर्जा संयंत्रों, रक्षा उत्पादन इकाइयों और तेल क्षेत्रों की सुरक्षा करता है। 

केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ)कानून एवं व्यवस्था, जवाबी कार्रवाई, नक्सल और सांप्रदायिक हिंसा विरोधी अभियानों के लिए तैनात किए जाते हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी): आतंकवाद और विमान अपहरण की घटनाओं में जवाबी कार्रवाई करने तथा बंधकों को छुड़ाने के अभियानों में विशेषज्ञता प्राप्त। इसके अतिरिक्त यह बल वीआईपी सुरक्षा तथा महत्वपूर्ण अवसरों पर सुरक्षा प्रदान करने का काम करता है।

उल्लेखनीय है कि सीमाओं की सुरक्षा करने वाले बलों को कभी-कभी उग्रवादियों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करने और आंतरिक सुरक्षा के काम के लिए भी तैनात किया जाता है।

रेखाचित्र 5: 2006 की तुलना में 2016 में केंद्रीय बलों की स्वीकृत संख्या

* 2006 में एनएसजी की संख्या उपलब्ध नहीं है।

SourcesBureau of Police Research and Development; PRS.

सात केंद्रीय पुलिस बलों की कुल स्वीकृत संख्या 9.7 लाख है।8इनमें से सबसे बड़े बल सीआरपीएफ (3 लाख कर्मी), बीएसएफ (2.6 लाख) और सीआईएसएफ (1.4 लाख) हैं। जैसा कि रेखाचित्र 5 में प्रदर्शित है, केंद्रीय पुलिस बलों की स्वीकृत संख्या (एनएसजी के आंकड़े उपलब्ध न होने के कारण उसे इसमें शामिल नहीं किया गया है) में पिछले दशक (2005-2016) के दौरान 37% की वृद्धि हुई है। इस अवधि में आईटीबीपी (146%) और एसएसबी (100%) में अधिकतम वृद्धि दर्ज की गई है।

केंद्रीय बलों पर व्यय में पिछले वर्षों (2005-06 से 2015-16) के दौरान औसत 15% की वार्षिक दर से वृद्धि हुई है। 2015-16 में केंद्र ने केंद्रीय पुलिस बलों पर 43,870 करोड़ रुपए खर्च किए, जिसमें सबसे अधिक हिस्सा तीन सबसे बड़े बलों को प्राप्त हुआ (सीआरपीएफ: 33%, बीएसएफ: 26% और सीआईएसएफ: 13%)।8 

केंद्र के अंतर्गत कुछ अन्य पुलिस संगठन भी आते हैं।[14] इनमें कुछ प्रमुख संगठन निम्नलिखित हैं:

खुफिया ब्यूरो (आईबी): आईबी जासूसी, उग्रवाद और आतंकवाद सहित आंतरिक सुरक्षा के सभी मामलों से जुड़ी केंद्रीय खुफिया एजेंसी है।

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई): सीबीआई दिल्ली विशेष पुलिस इस्टेबलिशमेंट एक्ट, 1946 के तहत गठित जांच एजेंसी है। यह ऐसे गंभीर अपराधों की जांच के लिए जिम्मेदार है जिसका असर पूरे भारत पर या अंतर-राज्यीय होता है, जैसे भ्रष्टाचार, वित्तीय घोटाले और गंभीर धोखाधड़ी से जुड़े अपराध तथा संगठित अपराध (जैसे कालाबाजारी और अनिवार्य वस्तुओं से जुड़ी मुनाफाखोरी)। आम तौर पर सीबीआई (i) राज्य सरकार की सहमति से केंद्र सरकार के आदेश पर, और (ii) सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के आदेश पर कोई जांच करता है।[15]

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए): एनआईए का गठन राष्ट्रीय जांच एजेंसी एक्ट, 2008 के तहत किया गया। यह एजेंसी देश की संप्रभुता, सुरक्षा और अखंडता के खिलाफ किए जाने वाले अपराधों की जांच के लिए जिम्मेदार है जोकि आठ विशेष कानूनों के तहत दंडनीय है, जैसे गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम एक्ट, 1967 और विमान अपहरण विरोधी एक्ट, 1982। एनआईए केंद्र सरकार के आदेश पर जांच कर सकती है। केंद्र सरकार या तो राज्य सरकार के आग्रह पर इस जांच का आदेश दे सकती है या स्वतः यह फैसला कर सकती है कि किसी मामले में एनआईए की जांच की आवश्यकता है अथवा नहीं।[16]

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी):  एनसीआरबी ऐसी संस्था है जो देश में अपराध संबंधी रिकॉर्ड एकत्र करती है और उनका रखरखाव करती है। यह संस्था विभिन्न राज्यों, जांच एजेंसियों, अदालतों और प्रॉसिक्यूटर्स को इन सूचनाओं को पहुंचाती है और उनके बीच समन्वय स्थापित करती है। संस्था अपराधियों के फिंगरप्रिंट रिकॉर्ड्स के लिए राष्ट्रीय स्टोरहाउस के रूप में भी काम करती है।

पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो (बीपीआरडी): बीपीआरडी को देश में पुलिस बलों की आवश्यकताओं और समस्याओं को चिन्हित करने के उद्देश्य से गठित किया गया था। ब्यूरो की जिम्मेदारियों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) पुलिस के कामकाज में विज्ञान और तकनीक के प्रयोग को बढ़ावा देना, (ii) पुलिस बलों में प्रशिक्षण की जरूरतों का निरीक्षण करना और उसमें सहयोग देना, (iii) राज्य पुलिस बलों के आधुनिकीकरण में सहयोग देना, और (iv) पुलिस उपकरणों और इंफ्रास्ट्रक्चर के संबंध में क्वालिटी स्टैंडर्ड्स विकसित करने में केंद्र का सहयोग करना।

प्रशिक्षण अकादमियां:  केंद्र सरकार के अंतर्गत आने वाली दो प्रमुख राष्ट्रीय प्रशिक्षण अकादमियां सरदार वल्लभ भाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी और उत्तर पूर्व पुलिस अकादमी हैं। हैदराबाद स्थित सरदार वल्लभ भाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी आईपीएस अधिकारियों और देश के विभिन्न पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों के प्रशिक्षकों के लिए प्रशिक्षण पाठ्यक्रम संचालित करती है। मेघालय स्थित उत्तर पूर्व पुलिस अकादमी पूर्वोत्तर राज्यों के पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षित करने का काम करती है।

कुछ मुद्दे

रेखाचित्र 6: पुलिस सुधारों की जांच करने वाले विशेषज्ञ निकाय

Source: PRS.

पिछले कुछ दशकों के दौरान विभिन्न विशेषज्ञ निकाय पुलिस संगठन और उसके कामकाज से संबंधित मुद्दों की जांच कर रहे हैं।[17] इस खंड में हम इनमें से कुछ पर चर्चा करेंगे। 

पुलिस की जवाबदेही

पुलिस बलों के पास राज्य में कानूनों को लागू करने और कानून एवं व्यवस्था की बहाली हेतु बल प्रयोग करने का अधिकार होता है। हालांकि इस अधिकार का अनेक प्रकार से दुरुपयोग किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, भारत में पुलिस के खिलाफ विभिन्न प्रकार की शिकायतें की जाती हैं, जिनमें वारंट के बिना गिरफ्तार करना, गैरकानूनी तरीके से शिनाख्त करना, यातनाएं देना और हिरासत में बलात्कार शामिल हैं।3,[18],[19]अधिकारों के ऐसे दुरुपयोग की जांच करने के लिए विभिन्न देशों ने कई सुरक्षात्मक उपाय किए हैं, जैसे राजनीतिक कार्यकारिणी के प्रति पुलिस की जवाबदेही, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के प्रति आंतरिक जवाबदेही और स्वतंत्र पुलिस पर्यवेक्षण अथॉरिटी।[20] 

राजनीतिक कार्यकारिणी के प्रति जवाबदेही बनाम कामकाज की आजादी

केंद्र और राज्य, दोनों पुलिस बल राजनीतिक कार्यकारिणी (यानी केंद्र या राज्य सरकार) के नियंत्रण में आते हैं और वह उनकी देखरेख करती हैं।9,[21]दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग (2007) ने टिप्पणी की थी कि अतीत में भी पुलिसकर्मियों को प्रभावित करने और उन्हें व्यक्तिगत या राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल करने हेतु कार्यकारिणी इस अधिकार का दुरुपयोग करती रही है।[22] इससे पुलिस के पेशेवर निर्णयों में हस्तक्षेप होता है (यानी, कानून एवं व्यवस्था की स्थिति में किस प्रकार प्रतिक्रियाएं देनी हैं या जांच किस प्रकार करनी है), परिणामस्वरूप वह पक्षपातपूर्ण कार्य करती है।20

पुलिस को कामकाज के संबंध में अधिक आजादी देने के लिए विभिन्न विशेषज्ञों ने यह सुझाव दिया कि पुलिस बलों पर राजनैतिक कार्यकारिणी के अधिकारों को सीमित किया जाए।[23] दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने सुझाव दिया कि यह अधिकार पेशेवर कुशलता को बढ़ावा देने और यह सुनिश्चित करने तक सीमित किया जाना चाहिए कि पुलिस कानून के अनुरूप कार्य कर रही है।22दूसरी ओर, राष्ट्रीय पुलिस आयोग (1977-81) ने सुझाव दिया कि कानून में अधीक्षण (सुपरिंटेंडेंट) को इस प्रकार पारिभाषित किया जाए कि उसमें कानून की उचित प्रक्रिया में दखल देने या कामकाज संबंधी निर्णयों को प्रभावित करने या पुलिसकर्मियों के तबादले, भर्तियों इत्यादि को गैर कानूनी तरीके से प्रभावित करने वाले निर्देश शामिल न हों।[24] सर्वोच्च न्यायालय ने भी 2006 में इस संबंध में राज्यों और केंद्र को निर्देश जारी किए थे।[25]

प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश

1996 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी जिनमें पुलिस द्वारा अपने अधिकारों के दुरुपयोग के अनेक मामले सामने आए थे और यह आरोप लगाया गया था कि पुलिसकर्मी राजनैतिक रूप से पक्षपातपूर्ण तरीके से अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं। 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने एक निर्णय में केंद्र एवं राज्यों को पुलिस के कामकाज के लिए दिशानिर्देश तय करने, पुलिस के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने, तैनाती और तबादलों का फैसला लेने और पुलिस के दुर्व्यवहार की शिकायतें दर्ज करने के लिए प्राधिकरणों के गठन का आदेश दिया। न्यायालय ने यह भी अनिवार्य किया कि मुख्य पुलिस अधिकारियो को मनमाने तबादलों और तैनातियों का शिकार न होना पड़े, इसलिए उनकी सेवा की न्यूनतम अवधि तय की जाए। 

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और उसके कार्यान्वयन का सारांश परिशिष्ट में दिया गया है।

Sources: Unstarred Question No. 1975, Rajya Sabha, December 16, 2015; Unstarred Question 2420, Lok Sabha, August 4, 2015; Prakash Singh vs Union of India; PRS.[26]

शिकायत के लिए स्वतंत्र अथॉरिटी

दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग और सर्वोच्च न्यायालय ने गौर किया कि पुलिस दुर्व्यवहार के मामलों में जांच के लिए एक स्वतंत्र शिकायत अथॉरिटी होनी चाहिए।22,25चूंकि राजनीतिक कार्यकारिणी और आंतरिक पुलिस पर्यवेक्षण अथॉरिटी द्वारा कानून प्रवर्तन अथॉरिटीज के साथ पक्षपात किया जा सकता है, और संभव है कि स्वतंत्र और निर्णायक फैसला न लिया जा सके।20 

उदाहरण के लिए युनाइटेड किंगडम में पुलिस कंडक्ट पर एक स्वतंत्र कार्यालय है जिसके डायरेक्टर जनरल की नियुक्ति क्राउन द्वारा की जाती है और छह अन्य सदस्यों की नियुक्ति कार्यकारिणी और मौजूदा सदस्यों द्वारा की जाती है। इसका गठन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों की जांच करने के लिए किया गया है।[27] दूसरा उदाहरण न्यूयार्क सिटी पुलिस का है, जिसके सिविलियन कंप्लेन रिव्यू बोर्ड में स्थानीय सरकारी निकायों और पुलिस कमीश्नर द्वारा आम नागरिक नियुक्त किए जाते हैं और ये पुलिस दुर्व्यवहार के मामलों की जांच करते हैं।[28]

भारत में विभिन्न प्रकार के दुर्व्यवहारों की जांच करने के लिए कुछ स्वतंत्र अथॉरिटीज हैं। उदाहरण के लिए मानवाधिकार हनन के मामलों में राष्ट्रीय या राज्य मानवाधिकार आयोग से संपर्क किया जा सकता है, या भ्रष्टाचार की शिकायत के लिए लोकायुक्त से संपर्क किया जा सकता है।[29]  

फिर भी, दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने टिप्पणी की कि ऐसी स्वतंत्र पर्यवेक्षक अथॉरिटीज की कमी है, जो सभी प्रकार के पुलिस दुर्व्यवहारों से निपटने में विशेषज्ञता प्राप्त हो, और जिस तक पहुंच आसान हो।22इसके मद्देनजर मॉडल पुलिस एक्ट, 2006, जिसका मसौदा पुलिस एक्ट ड्राफ्टिंग कमिटी (2005) ने तैयार किया था, और सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों (2006) के अंतर्गत राज्यों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे राज्य एवं जिला स्तर पर शिकायत अथॉरिटीज का गठन करेंगे।[30] 

मॉडल पुलिस एक्ट, 2006

केंद्र सरकार ने नए मॉडल पुलिस कानून का मसौदा तैयार करने के लिए 2005 में पुलिस एक्ट ड्राफ्टिंग कमिटी (चेयर : सोली सोराबजी) बनाई। 1861 के पुलिस एक्ट की जगह यह नया कानून लाया जाना था। 2006 में कमिटी ने मॉडल पुलिस एक्ट सौंपा जिसे उसी साल सभी राज्यों में सर्कुलेट किया गया। 17 राज्यों ने (असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, मेघालय, मिजोरम, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तराखंड) इस नए मॉडल कानून के मद्देनजर नए कानून पारित किए या मौजूदा कानूनों में संशोधन कर लिया। मॉडल पुलिस एक्ट की मुख्य विशेषताएं परिशिष्ट में प्रस्तुत की गई हैं।

Sources: Model Police Act, 2006; Unstarred Question No. 1451, Lok Sabha, May 3, 2016; PRS.

मॉडल पुलिस एक्ट के तहत राज्य अथॉरिटी में पांच सदस्यों होने चाहिए: उच्च न्यायालय का एक सेवानिवृत्त जज, किसी दूसरे राज्य के कैडर का डीजीपी रैंक का सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी, दूसरे राज्य का लोक प्रशासन में अनुभव प्राप्त सेवानिवृत्त अधिकारी, नागरिक समाज का सदस्य और 10 वर्ष का अनुभव प्राप्त न्यायिक अधिकारी या वकील या लीगल एकैडमिक। इस एक्ट में यह भी कहा गया है कि जिला स्तरीय अथॉरिटीज में सेवानिवृत्त जज, पुलिस अधिकारी, प्रैक्टिसिंग वकील इत्यादि शामिल होने चाहिए।     

उल्लेखनीय है कि अगस्त 2016 तक 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (तेलंगाना को छोड़कर) में से दो राज्यों ने पुलिस शिकायत अथॉरिटीज के गठन से संबंधित कानून नहीं बनाए थे या अधिसूचनाएं जारी नहीं की थीं (जम्मू एवं कश्मीर और उत्तर प्रदेश)।[31]  बाकी के राज्यों में से कुछ ने राज्य अथॉरिटी का गठन नहीं किया है और कुछ ने जिला स्तरीय अथॉरिटीज का। नीति आयोग की एक रिपोर्ट यह भी प्रदर्शित करती है कि इन अथॉरिटीज की संरचना मॉडल पुलिस एक्ट, 2006 और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार नहीं की गई है।31उदाहरण के लिए बिहार और गुजरात की जिला स्तरीय अथॉरिटीज में सिर्फ सरकारी और पुलिस अधिकार हैं।31इसके अतिरिक्त कई राज्यों की अथॉरिटीज के पास बाध्यकारी सुझाव जारी करने का अधिकार नहीं है।31

रिक्त पद और पुलिसकर्मियों पर काम का अत्यधिक बोझ

वर्तमान में राज्य पुलिस बलों और कुछ केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में रिक्तियां हैं। जनवरी 2016 तक, भारत में राज्य पुलिस बलों में कर्मियों की कुल स्वीकृत संख्या 22,80,691 है और 24% रिक्तियां (यानी 5,49,025 रिक्तियां) हैं।82009 से राज्य पुलिस बलों में 24%-25% रिक्तियां हैं।[32] 2016 में जिन राज्यों में सबसे ज्यादा रिक्तियां थीं, उनमें उत्तर प्रदेश (50%), कर्नाटक (36%), पश्चिम बंगाल (33%), गुजरात (32%) और हरियाणा (31%) शामिल हैं (देखें परिशिष्ट की तालिका 5)।

इसी वर्ष सात केंद्रीय पुलिस बलों में कर्मियों की कुल स्वीकृत संख्या 9,68,233 थी।8इनमें 7% पद (यानी 63,556 पद) रिक्त थे। सशस्त्र सीमा बल (18%), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (10%), भारत तिब्बत सीमा पुलिस (9%) एवं राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (8%) में अपेक्षाकृत अधिक रिक्तियां थीं। 2007 से केंद्रीय पुलिस बलों में 6%-14% रिक्तियां रही हैं।32

तालिका 3: केंद्रीय सशस्त्र बलों में कर्मियों की संख्या और रिक्तियां (1 जनवरी, 2016 तक)

 

स्वीकृत संख्या

वास्तविक

रिक्तियां

रिक्तियों का %

केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल

3,08,862

2,94,496

14,366

5%

सीमा सुरक्षा बल

2,56,831

2,48,811

8,020

3%

केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल

1,42,250

1,27,638

14,612

10%

सशस्त्र सीमा बल

94,065

76,768

17,297

18%

भारत तिब्बत सीमा पुलिस

89,430

81,814

7,616

9%

असम राइफल्स

66,411

65,647

764

1%

राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड

10,384

9,503

881

8%

भारत

9,68,233

9,04,677

63,556

7%

Sources: Data on Police Organisations 2016, Bureau of Police Research and Development; PRS.

पुलिसकर्मियों पर काम का अत्यधिक दबाव है। ऐसे में पुलिस बलों में बड़ी संख्या में रिक्तियां होने से यह समस्या और बढ़ जाती है। पुलिस कर्मी अनेक प्रकार के कार्य करते हैं, जैसे: (i) अपराध को रोकना और अपराध के खिलाफ कार्रवाई करना (जैसे खुफिया सूचना एकत्र करना, पेट्रोलिंग, जांच, अदालत में गवाहों को प्रस्तुत करना), (ii) आंतरिक सुरक्षा तथा कानून एवं व्यवस्था बहाल रखना (जैसे भीड़ को नियंत्रित करना, दंगों को काबू करना, आतंकवाद विरोधी या उग्रवादी विरोधी अभियान चलाना), (iii) विविध कर्तव्यों को निभाना (जैसे यातायात प्रबंधन, आपदा बचाव और अवैध कब्जे को हटाना)। 22  प्रत्येक पुलिस अधिकारी के जिम्मे जनता का एक बड़ा भाग आता है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मानकों की तुलना में देश में प्रति लाख जनसंख्या पर पुलिसकर्मियों की संख्या कम है। संयुक्त राष्ट्र के मानकों में प्रति लाख जनसंख्या पर 222 कर्मियों का सुझाव दिया गया है। लेकिन भारत में प्रति लाख जनसंख्या पर पुलिसकर्मियों की संख्या 181 है।8,[33]अगर रिक्तियों के हिसाब से पुलिसकर्मियों की संख्या को समायोजित किया जाए तो भारत में प्रति लाख जनसंख्या पर पुलिसकर्मियों की वास्तविक संख्या 137 होती है। इसलिए एक औसत पुलिसकर्मी को काम के अत्यधिक बोझ का शिकार होना पड़ता है और लंबे घंटों तक काम करना पड़ता है जोकि उसकी कार्यकुशलता और प्रदर्शन को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।7,33 

दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने सुझाव दिया था कि पुलिस बलों पर काम के बोझ को कम करने का एक तरीका आउटसोर्सिंग करना है। इसका अर्थ यह है कि पुलिस के नॉन कोर कामों (जो काम मुख्य नहीं हैं, जैसे यातायात प्रबंधन, आपदा बचाव एवं राहत, और अदालती सम्मन जारी करना) को निजी एजेंसियों को आउटसोर्स या सरकारी विभागों को पुनर्वितरित किया जा सकता है।22  इन कामों में पुलिस व्यवस्था के किसी विशेष ज्ञान की जरूरत नहीं होती और इसलिए इन्हें दूसरी एजेंसियों द्वारा किया जा सकता है। इससे पुलिस बलों को अपने मुख्य कार्यों को करने के लिए अधिक समय और ऊर्जा हासिल होगी।

कॉन्स्टेबलों से संबंधित मुद्दे

अहर्ता (क्वॉलिफिकेशन) और प्रशिक्षण:  राज्य पुलिस बलों में 86% कॉन्स्टेबल हैं। एक कॉन्स्टेबल की जिम्मेदारी व्यापक है और सिर्फ बुनियादी कार्यों तक सीमित नहीं है। उदाहरण के लिए एक कॉन्स्टेबल से यह अपेक्षा की जाती है कि वह खुफिया सूचना एकत्र करने और चौकसी जैसे कामों में अपने विवेकाधिकार का उपयोग करेगा और महत्वपूर्ण घटनाक्रमों के संबंध में वरिष्ठ अधिकारियों को रिपोर्ट करेगा। वह जांच में सहायता करता है और जनता के लिए पहला संपर्क सूत्र होता है। इसलिए एक कॉन्स्टेबल से विश्लेषणात्मक और फैसले लेने की क्षमताओं की, तथा कुशलता, समझदारी और दृढ़ता से लोगों का सामना करने की क्षमता की अपेक्षा की जाती है।

पद्मनाभैय्या कमिटी और दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने टिप्पणी की थी कि कॉन्स्टेबलों की प्रवेश स्तर की अहर्ता (यानी अनेक राज्यों में 10वीं या 12वीं तक की शिक्षा पूरी होना) और प्रशिक्षण उनकी भूमिका के योग्य नहीं है।22  इस संबंध में एक सुझाव यह दिया गया कि सिविल पुलिस के प्रवेश की अहर्ता को बढ़ाकर 12वीं या स्नातक कर दिया जाए।22,[34]यह सुझाव भी दिया गया कि कॉन्स्टेबलों, और सामान्यतः पुलिस बलों को सॉफ्ट स्किल्स का अधिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए (जैसे संवाद, परामर्श और नेतृत्व का कौशल) क्योंकि उन्हें आम लोगों का सामना नियमित रूप से करना पड़ता है।22  

पदोन्नति और कार्य की स्थितियां: इसके अतिरिक्त दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने टिप्पणी की थी कि कॉन्स्टेबलों के लिए पदोन्नति के अवसर बहुत कम और काम करने की स्थितियां बहुत खराब हैं जिनमें सुधार की जरूरत है।22आम तौर पर भारत में कॉन्स्टेबल सिर्फ एक पदोन्नति की उम्मीद करते हैं और सामान्यतः हेड कॉन्स्टेबल के पद से सेवानिवृत्त होते हैं। इससे वे अच्छा प्रदर्शन करने को प्रोत्साहित नहीं होते। यह प्रणाली युनाइटेड किंगडम के विपरीत है जहां पुलिस अधिकारी कॉन्स्टेबल के पद से अपना करियर शुरू करते हैं और क्रमानुसार पदोन्नत होते जाते हैं।[35] इसके अतिरिक्त कई बार भारत में वरिष्ठ अधिकारी कॉन्स्टेबलों को घरेलू काम के लिए ऑडर्ली के रूप में नियुक्त कर लेते हैं जिससे उनका मनोबल गिरता है और प्रोत्साहन में कमी आती है। इससे पुलिस का उनका मुख्य काम भी प्रभावित होता है। आयोग ने सुझाव दिया कि राज्यों में ऑडर्ली की व्यवस्था का भी अंत होना चाहिए।22,[36]

आवास:  राष्ट्रीय पुलिस आयोग जैसे विशेषज्ञ निकायों द्वारा इस बात पर भी बल दिया गया है कि कॉन्स्टेबलों (और सामान्य तौर पर पुलिस बलों) की कार्यकुशलता में सुधार और दूर-दराज के क्षेत्रों में पोस्टिंग को मंजूर करने के लिए उन्हें आवास की सुविधा देना महत्वपूर्ण है।[37]क्योंकि दूर-दराज और ग्रामीण क्षेत्रों में किराए पर निजी आवास मिलना कठिन हो सकता है। मेट्रोपॉलिटन क्षेत्रों में भी किराया इतना अधिक हो सकता है कि वे किराए पर मकान ले ही न पाएं। साथ ही कई बार पुलिस स्टेशन के निकट उपयुक्त आवास उपलब्ध नहीं होता जिससे उनका कुशल कामकाज प्रभावित हो सकता है। 

अपराध की जांच 

राज्य पुलिस बलों और सीबीआई जैसी केंद्रीय पुलिस एजेंसियों का मुख्य कार्य अपराध की जांच करना है। एक बार कोई आपराधिक घटना घटित होती है तो पुलिस अधिकारियों से शिकायत दर्ज करने, सबूतों की हिफाजत करने, अभियुक्त की पहचान करने, उसके खिलाफ आरोप तय करने और उसके अभियोग के संबंध में अदालत की मदद करने, ताकि दोष साबित हो सके, की अपेक्षा की जाती है। भारत में पिछले दशक के दौरान अपराध दर 28% बढ़ गई है, और अपराधों की प्रकृति भी जटिल होती जा रही है (जैसे विभिन्न प्रकार के साइबर अपराधों और आर्थिक धोखाधड़ी का बढ़ना)।19फिर भी दोषसिद्धि की दर (हर 100 मामलों में साबित होने वाले दोष) काफी कम है। 2015 में भारतीय दंड संहिता, 1860 के तहत दर्ज किए गए अपराधों में दोषसिद्धि की दर 47% थी।19  विधि आयोग ने यह गौर किया था कि इसका एक कारण कमजोर जांच है।[38]

भारत में अपराधों की अंडर रिपोर्टिंग

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) गृह मामलों के मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली नोडल एजेंसी है जोकि भारत में अपराध से संबंधित सूचनाओं को एकत्र और वितरित करने का काम करती है। एनसीआरबी भारत में अपराध नाम से एक वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करती है और उसमें देश भर के पुलिस स्टेशनों में दर्ज एफआईआर के आधार पर अपराध को रिकॉर्ड किया जाता है। भारत में अपराध संबंधी आंकड़ों का यह अकेला सरकारी स्रोत है और इसमें अपराधों को राज्य वार और जुर्म वार (जैसे हत्या, बलात्कार, धोखाधड़ी, चोरी) रिकॉर्ड किया जाता है।

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अंतर्गत एक एक्सपर्ट कमिटी ने टिप्पणी की थी कि एनसीआरबी में विभिन्न कारणों से अपराधों की बहुत बड़ी संख्या में अंडर रिपोर्टिंग की जाती है। उदाहरण के लिए, आंकड़ों को दबाने और अपराध को कम संख्या में दर्ज करने की आशंका हो सकती है क्योंकि पुलिस जानती है कि इस सूचना के आधार पर उनके काम को आंका जाएगा। साथ ही, कई बार पीड़ित यह तय कर लेते हैं कि घटना को दर्ज न कराया जाए क्योंकि वे पुलिस के पास जाने से डरते हैं, या सोचते हैं कि अपराध गंभीर नहीं है, इत्यादि। इसके अतिरिक्त एनसीआरबी अपराध को गिनने के लिए प्रिंसिपल ऑफेंस रूल का पालन करता है। इसका अर्थ यह है कि अगर दर्ज किए गए किसी एक आपराधिक मामले (सिंगल रजिस्टर्ड क्रिमिनल केस) में बहुत से अपराध शामिल होते हैं तो एनसीआरबी सिर्फ सबसे जघन्य अपराध को ही गिनता है। उदाहरण के लिए हत्या और बलात्कार के एक मामले में, एनसीआरबी द्वारा सिर्फ हत्या (जोकि मुख्य अपराध है) को गिना जाएगा।

Sources: Report of the Committee on Crime Statistics, Ministry of Statistics and Programme Implementation, 2012; National Crime Records Bureau; PRS.

 

अपराध की जांच के लिए दक्षता और प्रशिक्षण, समय और संसाधनों और पर्याप्त फॉरेंसिक क्षमताओं तथा इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है। हालांकि विधि आयोग और दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने टिप्पणी की थी कि पुलिसकर्मियों की कमी और विभिन्न प्रकार के कार्यों के दबाव में राज्य पुलिस अधिकारी अक्सर इन जिम्मेदारियों की अवहेलना करते हैं।22,38  इसके अतिरिक्त पेशेवर जांच करने के लिए जरूरी प्रशिक्षण और विशेषज्ञता की भी उनमें कमी होती है। उनका कानूनी ज्ञान भी अपर्याप्त होता है (जैसे एडमिसिबिलिटी ऑफ एविडेंस जैसे पहलुओं पर) और उन्हें उपलब्ध फॉरेंसिक और साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर भी अनुपयुक्त और आउटडेटेड होता है। इसके मद्देनजर पुलिस बल सबूत को बचाए रखने के लिए ताकत का इस्तेमाल और यातना देने जैसे काम कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त जहां अपराध की जांच को ईमानदार और निष्पक्ष होने की जरूरत है, भारत में वह राजनैतिक या अप्रासंगिक तत्वों एवं विचारों से प्रभावित हो सकती है। इन पहलुओं के चलते, विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि राज्यों के पुलिस बलों की अपनी खुद की विशेषज्ञ जांच इकाइयां होनी चाहिए जोकि अपराधों की जांच के लिए जिम्मेदार हों।3,[39]इन इकाइयों को सामान्यतः अन्य कार्यों में नहीं लगाया जाना चाहिए।

देश में फॉरेंसिक इंफ्रास्ट्रक्चर के संबंध में, यह गौर किया जा सकता है कि वर्तमान में भारत में सात केंद्रीय फॉरेंसिक साइंस लेबोरेट्रीज़ हैं। राज्यों की 30 लेबोरेट्रीज़ हैं जबकि 50 क्षेत्रीय लेबोरेट्रीज़ और 144 जिला मोबाइल लेबोरेट्रीज़ हैं।[40] इनमें बैलेस्टिक्स, बॉडिली फ्लूएड्स, कंप्यूटर रिकॉर्ड्स, दस्तावेजों, विस्फोटकों, फिंगरप्रिंट्स, नारकोटिक्स और वॉयस आइडेंटिफिकेशन इत्यादि का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है।[41]  हालांकि विशेषज्ञ निकायों का कहना है कि इन लेबोरेट्रीज़ में फंड्स और क्वॉलिफाइड कर्मचारियों की कमी है।22  इसके अतिरिक्त, इन लेबोरेट्रीज़ में अंधाधुंध मामलों को रेफर किया जाता है जिसकी वजह से बहुत से मामले लंबित पड़े रहते हैं।22  

 

पुलिस इंफ्रास्ट्रक्चर 

आधुनिक पुलिस व्यवस्था के लिए मजबूत कम्यूनिकेशन सपोर्ट, नवीनतम तकनीक से पूर्ण या आधुनिक हथियारों, और उच्च स्तर की मोबिलिटी की जरूरत होती है। कैग और बीपीआरडी ने टिप्पणी की है कि इन मोर्चों पर अनेक कमियां मौजूद हैं।

हथियार:  कैग ने पाया है कि अनेक राज्य पुलिस बलों के पास आउटडेटेड हथियार हैं, और हथियारों की खरीद की प्रक्रिया बहुत धीमी है जिसकी वजह से हथियार एवं गोलाबारूद की कमी है।[42] राजस्थान पुलिस बल के ऑडिट (2009 से 2014) का निष्कर्ष कहता है कि राज्य की अपनी विनिर्दिष्ट आवश्यकता की तुलना में आधुनिक हथियारों की उपलब्धता में 75% की कमी है।[43]  इस ऑडिट में यह भी पाया गया था कि खरीद के बावजूद हथियारों का बड़ा अनुपात (59%) व्यर्थ पड़ा रहता है क्योंकि उसे पुलिस स्टेशनों में बांटा ही नहीं जाता। पश्चिम बंगाल और गुजरात में भी ऐसे ही ऑडिट में यह पाया गया कि वहां भी हथियारों में क्रमशः 71% और 36% की कमी है।[44] 

पुलिस वाहन:  ऑडिट्स में यह टिप्पणी की गई कि पुलिस वाहनों की सप्लाई में कमियां हैं।42अक्सर नए वाहनों को पुराने वाहनों की जगह लाया जाता है, और ड्राइवरों की कमी है। इससे पुलिस समय पर नहीं पहुंच पाती और उसकी कार्यकुशलता प्रभावित होती है। जनवरी 2015 तक राज्य पुलिस बलों में कुल 1,63,946 वाहन थे। इस प्रकार वाहनों की अपेक्षित संख्या (2,35,339 वाहन) के हिसाब से देखा जाए तो उसमें 30.5% की कमी दिखाई देती है।[45]

पुलिस टेलीकम्यूनिकेशन नेटवर्क (पोलनेट):  2002 में पोलनेट प्रॉजेक्ट की शुरुआत केंद्र सरकार द्वारा की गई थी ताकि देश के पुलिस और अर्धसैनिक बलों को सेटेलाइट कम्यूनिकेशन नेटवर्क के माध्यम से जोड़ा जा सके जोकि रेडियो कम्यूनिकेशन की मौजूदा प्रणाली से काफी तेज होगा। हालांकि ऑडिट में पाया गया कि पोलनेट कई राज्यों में काम नहीं करता।42,44,[46]  उदाहरण के लिए गुजरात पुलिस के एक ऑडिट में कहा गया है कि जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे रिमोट सबस्क्राइबर यूनिट्स और जनरेटर सेट्स के न होने की वजह से अक्टूबर 2015 से नेटवर्क काम नहीं कर रहा। ऑडिट में यह भी कहा गया कि इन उपकरणों को चलाने के लिए जरूरी रेडियो ऑपरेटर और टेक्नीशियन जैसे कुछ विशेष प्रकार के प्रशिक्षित कर्मचारियों के 40%-50% पद खाली हैं।44 

रेखाचित्र 7: आधुनिकीकरण के लिए फंड्स का उपयोग (%)

Sources: Bureau of Police Research and Development; PRS.

आधुनिकीकरण के लिए फंड्स का उपयोग न होना: केंद्र और राज्य सरकार, दोनों राज्य पुलिस बलों के आधुनिकीकरण के लिए फंड्स आबंटित करती हैं। पुलिस स्टेशनों के निर्माण और हथियारों, कम्यूनिकेशन के साधनों एवं वाहनों की खरीद में इन फंड़्स का आम तौर पर उपयोग किया जाता है ताकि पुलिस के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जा सके। हालांकि एक समस्या यह भी बनी हुई है कि फंड्स का उपयोग नहीं किया जाता।32उदाहरण के लिए 2015-16 में केंद्र और राज्यों द्वारा आधुनिकीकरण के लिए 9,203 करोड़ रुपए का आबंटन किया गया। फिर भी केवल 14% का इस्तेमाल किया गया। तालिका 10 में 2009-10 और 2015-16 के बीच फंड्स के उपयोग न होने की प्रवृत्ति को प्रदर्शित किया गया है।  

पुलिस और जनता के संबंध

अपराध और अव्यवस्था को रोकने के लिए पुलिस को आम जनता के विश्वास, सहयोग और समर्थन की जरूरत होती है। उदाहरण के लिए किसी भी अपराध की जांच के लिए पुलिसकर्मियों को इनफॉर्मर और गवाहों के रूप में आम जनता के भरोसे रहना पड़ता है। इसलिए प्रभावशाली पुलिस व्यवस्था के लिए पुलिस और जनता के बीच का संबंध महत्वपूर्ण है। दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने टिप्पणी की थी कि पुलिस और जनता के बीच का संबंध असंतोषजनक स्थिति में है क्योंकि जनता पुलिस को भ्रष्ट, अक्षम, राजनैतिक स्तर पर पक्षपातपूर्ण और गैर जिम्मेदार समझती है।22 

इस चुनौती से निपटने का एक तरीका कम्युनिटी पुलिसिंग मॉडल है। कम्युनिटी पुलिसिंग के लिए पुलिस को अपराध को रोकने और उसका पता लगाने, व्यवस्था बहाल करने और स्थानीय संघर्षों को हल करने के लिए समुदाय के साथ काम करने की जरूरत होती है ताकि लोगों को बेहतर जीवन प्राप्त हो और उनमें सुरक्षा की भावना पैदा हो। इसमें सामान्य स्थितियों में आम लोगों के साथ संवाद कायम करने के लिए पुलिस द्वारा गश्त लगाना, आपराधिक मामलों के अतिरिक्त दूसरे मामलों में पुलिस सेवा के अनुरोध पर कार्रवाई करना, समुदाय में अपराधों को रोकने का प्रयास करना और समुदाय से जमीनी स्तर पर प्रतिक्रियाएं हासिल करने के लिए व्यवस्था कायम करना शामिल है। विभिन्न राज्य कम्युनिटी पुलिसिंग के क्षेत्र में प्रयोग कर रहे हैं, जैसे केरल (जनमैत्री सुरक्षा प्रॉजेक्ट), राजस्थान (ज्वाइंट पेट्रोलिंग कमिटीज़), असम (मीरा पैबी), तमिलनाडु (फ्रेंड्स ऑफ पुलिस), पश्चिम बंगाल (कम्युनिटी पुलिसिंग प्रॉजेक्ट), आंध्र प्रदेश (मैत्री) और महाराष्ट्र (मोहल्ला कमिटीज़)।18,22 

 

भारत में कम्युनिटी पुलिसिंग के उदाहरण

केरल में जनमैत्री सुरक्षा

केरल सरकार द्वारा इस प्रॉजेक्ट की शुरुआत की गई ताकि जनता तक पुलिस की पहुंच बढ़े, उनका आपसी संवाद मजबूत हो और दोनों के बीच बेहतर समझदारी विकसित हो। उदाहरण के लिए बीट कॉन्स्टेबल से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने बीट एरिया में रहने वाले सभी परिवारों के कम से कम एक सदस्य से परिचित हों और हर हफ्ते पुलिस स्टेशन के बाहर लोगों से मिलने का प्रयास करें। इस प्रक्रिया को सहज बनाने के लिए म्युनिसिपल काउंसिलर्स, रेज़िडेंट एसोसिएशंस के प्रतिनिधियों, स्थानीय मीडिया, हाई स्कूलों और कॉलेजों, सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों इत्यादि के साथ जनमैत्री सुरक्षा कमिटीज़ भी बनाई जाती हैं।

असम में मीरा पैबी (मशाल धारी महिलाएं)

गुवाहाटी की मणिपुरी बस्ती की महिलाएं युवाओं को मादक पदार्थों का सेवन करने से रोकने का प्रयास कर रही हैं और इस प्रकार वे अपने क्षेत्र में कानून एवं व्यवस्था की स्थिति में सुधार करने में सहयोग कर रही हैं। वे मशाल लेकर बस्ती में घुसने और उससे निकलने के रास्तों पर तैनात होती हैं ताकि सूर्यास्त के बाद युवा बस्ती से बाहर न जा पाएं।

Sources: Model Police Manual, Bureau of Police Research and Development; Kerala Police Website; PRS.

 

परिशिष्ट

प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश

संदर्भ: 1996 में सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई। याचिका में कहा गया कि पुलिस अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करती है। इसमें कानून का प्रवर्तन न करने और ताकतवर लोगों के पक्ष में भेदभावकारी तरीके से कानून लागू करने के आरोप थे। साथ ही सामान्य नागरिकों को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखने, यातना देने, उत्पीड़ित करने इत्यादि जैसे मामलों को उठाया गया था। याचिका में कहा गया था कि अदालत एक्सपर्ट कमिटियों के सुझावों को लागू करने का निर्देश जारी करे।

निर्देश: सितंबर 2006 में अदालत ने केंद्र और राज्यों को विभिन्न निर्देश जारी किए जिसमें निम्नलिखित शामिल हैं:

  • पुलिस के कामकाज के लिए नीति निर्धारित करने, पुलिस के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि राज्य सरकार पुलिस को अनुचित तरीके से प्रभावित नहीं कर रही, प्रत्येक राज्य में राज्य सुरक्षा आयोग का गठन किया जाए।
  • प्रत्येक राज्य में एक पुलिस इस्टेबलिशमेंट बोर्ड का गठन किया जाए जोकि डेप्युटी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस से नीचे के पद के अधिकारियों की तैनातियों, स्थानांतरण और पदोन्नति का निर्धारण करें और उच्च पद के अधिकारियों के लिए राज्य सरकार को सुझाव दें।
  • पुलिसकर्मियों द्वारा गंभीर दुर्व्यवहार और शक्ति के दुरुपयोग के आरोपों की जांच के लिए राज्य और जिला स्तरों पर पुलिस शिकायत अथॉरिटीज का गठन किया जाए।
  • राज्य बलों में डीजीपी और दूसरे मुख्य पुलिस अधिकारियों (जैसे पुलिस स्टेशन और जिले के ऑफिसर इन चार्ज), और केंद्रीय बलों के चीफ्स के लिए कम से कम दो वर्षों की न्यूनतम कार्य अवधि निर्धारित करना, ताकि उन्हें मनमाने स्थानांतरणों और तैनातियों से बचाया जा सके।
  • यह सुनिश्चित किया जाए कि राज्य पुलिस के डीजीपी की नियुक्ति तीन वरिष्ठतम अधिकारियों में से की जाए जिन्हें संघीय लोक सेवा आयोग द्वारा सेवा अवधि, अच्छे रिकॉर्ड और अनुभव के आधार पर पदोन्नति के लिए चुना (एंपैनल किया) जाए।
  • कानून और व्यवस्था बहाल रखने वाली पुलिस से जांच करने वाली पुलिस को अलग किया जाए जिससे त्वरित जांच, बेहतर विशेषज्ञता और जनता के साथ अच्छे संबंध सुनिश्चित किए जा सकें।
  • केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के चीफ्स के रूप में उम्मीदवारों को चुनने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग का गठन किया जाए।

कार्यान्वयन:  नीति आयोग की एक रिपोर्ट (2016) के अनुसार, 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (इसमें तेलंगाना शामिल नहीं) में से सिर्फ दो को छोड़कर सभी में राज्य सुरक्षा आयोगों और सभी में पुलिस इस्टेबलिशमेंट बोर्डों का गठन किया गया।31जिन राज्यों में अगस्त 2016 तक राज्य सुरक्षा आयोग नहीं बनाए गए थे, वे हैं जम्मू एवं कश्मीर तथा ओड़िशा। रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य सुरक्षा आयोगों और पुलिस इस्टेबलिशमेंट बोर्डों का संघटन और शक्तियां सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों से भिन्न हैं। जैसे बिहार, गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों के राज्य सुरक्षा आयोगों में सरकारी और पुलिस अधिकारियों का प्रभुत्व है। साथ ही, इनमें से कई आयोगों के पास बाध्यकारी निर्देश जारी करने की शक्ति नहीं है।

 

 मॉडल पुलिस एक्ट, 2006

पुलिस मॉडल एक्ट, 2006 की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • संगठन और भर्ती: प्रत्येक राज्य में एक पुलिस सेवा होगी जिसका प्रमुख डीजीपी होगा। सबऑर्डिनेट रैंक्स (यानी डेप्युटी एसपी के नीचे) पर सीधी भर्तियां राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड द्वारा की जाएगी। अधिकारियों के पद के लिए भर्तियां संघीय लोक सेवा आयोग या राज्य पुलिस सेवा आयोग के जरिए की जाएंगी। 
  • जिम्मेदारियां: पुलिस सेवा की जिम्मेदारियों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) बिना पक्षपात किए कानून को लागू करना, और जीवन, स्वतंत्रता एवं मानवाधिकारों की रक्षा करना, (ii) जन व्यवस्था की सुरक्षा करना और आतंकवादियों, उग्रवादियों तथा आंतरिक सुरक्षा को खतरा पहुंचाने वाली दूसरी गतिविधियों को रोकना, (iii) सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, (iv) अपराध को रोकना और उसकी जांच करना, (v) प्राकृतिक और मानव जनित आपदाओं में मदद करना, (vi) खुफिया जानकारी एकत्र करना, इत्यादि। शहरी क्षेत्रों और अधिक अपराध वाले ग्रामीण क्षेत्रों के पुलिस स्टेशनों में जघन्य और आर्थिक अपराधों की जांच स्पेशल क्राइम इनवेस्टिगेशन यूनिट द्वारा की जाएगी जिसका प्रमुख कम से कम सब इंस्पेक्टर रैंक का अधिकारी होगा। इन यूनिट्स के अधिकारियों को सामान्यतः अन्य कार्य नहीं दिए जाएंगे।
  • जवाबदेही: राज्य सरकार पुलिस सेवा का अधीक्षण करेगी। इसमें नीतियां और दिशानिर्देश बनाना, उत्तम पुलिस व्यवस्था के मानदंड तैयार करना और यह सुनिश्चित करना शामिल है कि पुलिस अपने कर्तव्य पेशेवर तरीके से निभाए। दिशानिर्देश तैयार करने, डीजीपी के पद पर पदोन्नत करने के लिए पुलिस अधिकारियों का चयन करने, और पुलिस के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने के लिए राज्य पुलिस बोर्डों का गठन किया जाए। पुलिस के दुर्व्यवहार की शिकायत की सुनवाई के लिए राज्यों द्वारा पुलिस एकाउंटेबिलिटी कमीशंस का गठन भी किया जाए। हालांकि मुख्य पुलिस अधिकारियों (जैसे डीजीपी और पुलिस स्टेशन इनचार्ज) की न्यूनतम कार्य अवधि दो वर्ष होगी, जब तक कि उन्हें अदालत द्वारा अपराधी न घोषित किया जाए, या सेवा से निलंबित न किया जाए, इत्यादि। 
  • सेवा की शर्तें:  राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि एक पुलिस अधिकारी की ड्यूटी औसतन 8 घंटे से अधिक (अपवाद की स्थिति में, 12 घंटे) न हो। ड्यूटी के घंटों में चोट लगने, विकलांगता या मृत्यु होने पर पुलिस कर्मी को पर्याप्त बीमा कवरेज भी प्रदान किए जाएगा। एक पुलिस वेल्फेयर बोर्ड का गठन भी किया जाना चाहिए जोकि पुलिस के लिए कल्याणकारी उपाय करे, जैसे मेडिकल सुविधा, ग्रुप हाउसिंग, और अदालती कार्यवाहियों का सामना करने वाले अधिकारियो को कानूनी सहायता प्रदान करना, और उन उपायों का निरीक्षण करे।

 

 तालिका 4: 2015 में संज्ञेय अपराधों के मामले और दर

राज्य/केंद्र शासित प्रदेश

भारतीय दंड संहिता

विशेष और स्थानीय कानून

मामले

प्रति एक लाख जनसंख्या पर अपराध

मामले

प्रति एक लाख जनसंख्या पर अपराध

आंध्र प्रदेश

1,10,693

215.6

15,755

30.7

अरुणाचल प्रदेश

2,968

227.8

181

13.9

असम

1,03,616

321.8

3,849

12

बिहार

1,76,973

171.6

18,439

17.9

छत्तीसगढ़

56,692

220.9

2,45,223

955.6

गोवा

3,074

156.4

1,482

75.4

गुजरात

1,26,935

203.6

3,07,108

492.7

हरियाणा

84,466

310.4

47,523

174.6

हिमाचल प्रदेश

14,007

198.5

3,214

45.5

जम्मू और कश्मीर

23,583

191.2

1,727

14

झारखंड

45,050

135.1

7,861

23.6

कर्नाटक

1,38,847

224

32,019

51.7

केरल

2,57,074

723.2

3,96,334

1115

मध्य प्रदेश

2,68,614

348.3

90,046

116.8

महाराष्ट्र

2,75,414

231.2

1,47,766

124

मणिपुर

3,847

149.5

1,004

39

मेघालय

4,079

148.2

327

11.9

मिजोरम

2,228

211.2

347

32.9

नागालैंड

1,302

55.1

629

26.6

ओड़िशा

83,360

197.3

19,848

47

पंजाब

37,983

131.2

22,253

76.9

राजस्थान

1,98,080

273.9

64,096

88.6

सिक्किम

766

119.3

184

28.7

तमिलनाडु

1,87,558

271.2

2,54,604

368.2

तेलंगाना

1,06,282

290.7

16,496

45.1

त्रिपुरा

4,692

123.5

172

4.5

उत्तर प्रदेश

2,41,920

112.1

25,49,421

1181.2

उत्तराखंड

10,248

97.2

88,618

840.5

पश्चिम बंगाल

1,79,501

193

26,777

28.8

अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह

862

157.9

2,197

402.4

चंडीगढ़

3,248

186.5

1,865

107.1

दादरा और नगर हवेली

269

64.4

34

8.1

दमन और दीव

302

94.1

17

5.3

दिल्ली

1,91,377

916.8

8,599

41.2

लक्षद्वीप

50

62.5

15

18.8

पुद्दूचेरी

3,440

209.1

669

40.7

भारत

29,49,400

234.2

43,76,699

347.6

Sources: National Crime Records Bureau, 2015; PRS.

 

 तालिका 5: राज्य पुलिस बलों की संख्या और रिक्तियां (1 जनवरी, 2016 तक)

राज्य

स्वीकृत

वास्तविक

रिक्तियां

रिक्तियों का %

आंध्र प्रदेश

59,174

49,587

9,587

16%

अरुणाचल प्रदेश

12,764

10,923

1,841

14%

असम

53,400

45,484

7,916

15%

बिहार

1,23,277

93,798

29,479

24%

छत्तीसगढ़

65,749

55,330

10,419

16%

गोवा

8,313

6,745

1,568

19%

गुजरात

1,03,047

70,491

32,556

32%

हरियाणा

61,691

42,386

19,305

31%

हिमाचल प्रदेश

16,637

14,178

2,459

15%

जम्मू और कश्मीर

80,110

69,978

10,132

13%

झारखंड

76,692

56,189

20,503

27%

कर्नाटक

1,10,210

70,934

39,276

36%

केरल

60,502

53,881

6,621

11%

मध्य प्रदेश

1,09,495

86,759

22,736

21%

महाराष्ट्र

1,91,143

1,76,044

15,099

8%

मणिपुर

32,078

25,146

6,932

22%

मेघालय

15,020

12,548

2,472

16%

मिजोरम

11,263

8,435

2,828

25%

नागालैंड

21,574

22,264

(690)

-3%

ओड़िशा

66,184

55,441

10,743

16%

पंजाब

78,967

69,751

9,216

12%

राजस्थान

1,04,209

89,346

14,863

14%

सिक्किम

6,081

4,565

1,516

25%

तमिलनाडु

1,36,002

1,09,948

26,054

19%

तेलंगाना

64,489

47,428

17,061

26%

त्रिपुरा

27,448

24,018

3,430

12%

उत्तर प्रदेश

3,63,785

1,81,827

1,81,958

50%

उत्तराखंड

21,155

19,991

1,164

6%

पश्चिम बंगाल

1,01,482

67,852

33,630

33%

अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह

4,468

3,912

556

12%

चंडीगढ़

6,721

5,869

852

13%

दादरा और नगर हवेली

310

334

(24)

-8%

दमन और दीव

535

390

145

27%

दिल्ली

82,242

76,348

5,894

7%

लक्षद्वीप

435

369

66

15%

पुद्दूचेरी

4,039

3,177

862

21%

भारत

22,80,691

17,31,666

5,49,025

24%

नोट 1 :  राज्य पुलिस में सिविल और सशस्त्र पुलिस दोनों शामिल होती है। नोट 2 : नागालैंड, दादरा और नगर हवेली में पुलिसकर्मियों की अतिरिक्त संख्या है, जिसका संकेत कोष्ठकों में दिया गया है। 

Sources: Data on Police Organisations 2016, Bureau of Police Research and Development; PRS.

तालिका 6: पुलिस पर राज्य-वार व्यय (2015-16) (करोड़ रुपए में)

राज्य

राज्य के लिए कुल बजट

पुलिस के लिए बजट

पुलिस पर व्यय

राज्य बजट में पुलिस व्यय का %

आंध्र प्रदेश

1,13,049

3,511

2,389

2.1%

अरुणाचल प्रदेश

69,407

उपलब्ध नहीं

उपलब्ध नहीं

-

असम

66,142

3,291

1,844

2.8%

बिहार

1,32,849

5,787

5,360

4.0%

छत्तीसगढ़

68,572

2,500

1,872

2.7%

गोवा

उपलब्ध नहीं

379

350

-

गुजरात

1,39,139

3,365

2,356

1.7%

हरियाणा

89,235

2,861

2,729

3.1%

हिमाचल प्रदेश

31,316

736

599

1.9%

जम्मू और कश्मीर

77,000

4,172

4,005

5.2%

झारखंड

उपलब्ध नहीं

3,047

2,827

-

कर्नाटक

1,42,534

3,280

2,557

1.8%

केरल

1,18,891

3,268

2,590

2.2%

मध्य प्रदेश

1,56,475

4,266

3,016

1.9%

महाराष्ट्र

2,43,026

11,146

7,232

3.0%

मणिपुर

9,652

1,128

839

8.7%

मेघालय

9,733

602

411

4.2%

मिजोरम

7,757

496

374

4.8%

नागालैंड

11,754

1,002

851

7.2%

ओड़िशा

2,39,753

2,761

2,617

1.1%

पंजाब

79,314

4,678

4,597

5.8%

राजस्थान

1,41,232

4,173

4,120

2.9%

सिक्किम

5,821

279

279

4.8%

तमिलनाडु

1,79,552

5,484

5,544

3.1%

तेलंगाना

1,31,034

4,818

2,521

1.9%

त्रिपुरा

12,993

1,046

634

4.9%

उत्तर प्रदेश

3,02,687

13,765

10,387

3.4%

उत्तराखंड

32,694

1,207

879

2.7%

पश्चिम बंगाल

1,09,103

5,284

3,708

3.4%

भारत

27,20,716

98,329

77,487

2.8%

Sources: Data on Police Organisations 2016, Bureau of Police Research and Development; PRS.

 

[1] Entry 2, List II, Schedule 7, Constitution of India, 1950.

[2] Entry 2 and 2A, List I, Schedule 7, Constitution of India, 1950.

[3]Public Order, Second Administrative Reforms Commission, 2007, http://arc.gov.in/5th%20REPORT.pdf; Police Organisation in India, Commonwealth Human Rights Initiative, 2015, http://www.humanrightsinitiative.org/download/1456400058Final%20Police%20Org%20in%20India%202016.pdf; Prakash Singh vs Union of India, Supreme Court, Writ Petition (Civil) No. 310 of 1996, November 8, 2010; Building SMART Police in India: Background into the needed Police Force Reforms, NITI Aayog, 2016, http://www.niti.gov.in/writereaddata/files/document_publication/Strengthening-Police-Force.pdf.

[4]Committee on Home Affairs, Subjects selected by Standing Committees, PRS Legislative Research, Last visited August 17, 2016, http://www.prsindia.org/parliamenttrack/parliamentary-committees/subjects-selected-by-standing-committees-3451/.

[5] States: Entries 1,2 and 4 of List II, Schedule 7, Constitution of India, 1950; Centre: Article 355 and Entries 2,2A,5,8,65,70 and 80, List I, Schedule 7, Constitution of India, 1950; Concurrent: Entries 1 and 2, List III, Schedule 7, Constitution of India, 1950.

[6] For example, police in Uttar Pradesh, Madhya Pradesh, Manipur and Nagaland is regulated under the Police Act, 1861; Model Police Manual: Volume 1, Bureau of Police Research and Development, http://www.bprd.nic.in/WriteReadData/userfiles/file/1645442204-Volume%201.pdf; Police Organisation in India, Commonwealth Human Rights Initiative, 2015, http://www.humanrightsinitiative.org/download/1456400058Final%20Police%20Org%20in%20India%202016.pdf.

[7]Model Police Manual: Volume 1, Bureau of Police Research and Development, http://www.bprd.nic.in/WriteReadData/userfiles/file/1645442204-Volume%201.pdf.

[8]Data on Police Organisations, Bureau of Police Research and Development, 2016, http://bprd.nic.in/WriteReadData/userfiles/file/201701090303068737739DATABOOK2016FINALSMALL09-01-2017.pdf.

[9] Section 3, Police Act, 1861.

[10] Section 4, Police Act, 1861.

[11] Article 312, Constitution of India, 1950.

[12] State of State Finances, PRS Legislative Research, October 2016, http://www.prsindia.org/uploads/media/State%20Finances/State%20Finances%20Report.pdf.

[13] Note that the Assam Rifles in not a dedicated border guarding force, like the BSF, ITBP and SSBIt is structured as a counter-insurgency force but is deployed along the India-Myanmar borderThe Ministry is still finalising a dedicated border guarding force for the India-Myanmar borderSee Border Security: Capacity Building and Institutions, Standing Committee on Home Affairs, April 11, 2017, http://164.100.47.5/newcommittee/reports/EnglishCommittees/Committee%20on%20Home%20Affairs/203.pdf.

[14] Central Police Organisations, Ministry of Home Affairs, http://mha.nic.in/cpo.

[15] Frequently Asked Questions, Central Bureau of Investigation, Last visited January 12, 2017, http://cbi.nic.in/faq.php.

[16] Section 6, National Investigation Agency Act, 2008.

[17] Unstarred Question No. 2316, Lok Sabha, August 4, 2015.

[18]Model Police Manual: Volume 2, Bureau of Police Research and Development, http://www.bprd.nic.in/WriteReadData/userfiles/file/6798203243-Volume%202.pdf.

[19]Crime in India, National Crime Records Bureau, 2006-15.

[20]Handbook on Police Accountability, Oversight and Integrity, United Nations Office on Drugs and Crime, 2011, https://www.unodc.org/documents/justice-and-prison-reform/crimeprevention/PoliceAccountability_Oversight_and_Integrity_10-57991_Ebook.pdf.

[21] See Section 5, Assam Rifles Act, 2006; Section 5 of the Border Security Force Act, 1968; Section 8, Central Reserve Police Force Act, 1949.

[22]Public Order, Second Administrative Reforms Commission, 2007, http://arc.gov.in/5th%20REPORT.pdf.

[23] A New Beginning: Policing in Northern Ireland, Report of the Independent Commission on Policing for Northern Ireland, September 1999, http://cain.ulst.ac.uk/issues/police/patten/patten99.pdf.

[24] Section 30, Draft Model Police Bill recommended by the National Police Commission (1977-81), http://mha.nic.in/sites/upload_files/mha/files/pdf/mpolice_act.pdf.

[25] Prakash Singh vs Union of India, Supreme Court, Writ Petition (Civil) No. 310 of 1996, November 8, 2010.

[26]Police Organisation in India, Commonwealth Human Rights Initiative, 2015; State Security Commissions, Commonwealth Human Rights Initiative, 2014, http://www.humanrightsinitiative.org/programs/Report2014/CHRI_Report2014%20.pdf.

[27] Section 33, Part II, Chapter 5, UK Policing and Crime Act, 2017.

[28] Website of New York City Civilian Complaint Review Board, Last visited March 6, 2017, https://www1.nyc.gov/site/ccrb/about/frequently-asked-questions-faq.page.

[29] Section 12, Protection of Human Rights Act, 1993; Section 63, Lokpal and Lokayuktas Act, 2013.

[30] Sections 159 and 173, Model Police Act, 2006; Prakash Singh vs Union of India, Supreme Court, Writ Petition (Civil) No. 310 of 1996, November 8, 2010.

[31]Building SMART Police in India: Background into the needed Police Force Reforms, NITI Aayog, 2016, http://www.niti.gov.in/writereaddata/files/document_publication/Strengthening-Police-Force.pdf.

[32]Data on Police Organisations, Bureau of Police Research and Development, 2007-16.

[33] National Requirement of Manpower for 8-hour Shifts in Police Stations, Bureau of Police Research and Development, August 2014.

[34] Section 44, Draft Model Police Bill, 2015.

[35]Leadership and Standards in the Police, UK Home Affairs Committee, 2013, http://www.publications.parliament.uk/pa/cm201314/cmselect/cmhaff/67/6708.htm#a13.

[36] 169th Report: Demand for Grants (2013-14) of Ministry of Home Affairs, Standing Committee on Home Affairs, 2013, http://164.100.47.5/newcommittee/reports/EnglishCommittees/Committee%20on%20Home%20Affairs/169.pdf.

[37] First Report, National Police Commission, 1979, http://police.pondicherry.gov.in/Police%20Commission%20reports/1st%20Police%20commission.pdf.

[38]Report No. 239: Expeditious Investigation and Trial of Criminal Cases Against Influential Public Personalities, Law Commission of India, March 2012, http://lawcommissionofindia.nic.in/reports/report239.pdf.

[39]14th Report: Reforms of the Judicial Administration, Volume 2, Law Commission of India, http://lawcommissionofindia.nic.in/1-50/Report14Vol2.pdf; 154th Report: The Code of Criminal Procedure, 1973, Volume 1, Law Commission of India, http://lawcommissionofindia.nic.in/101-169/Report154Vol1.pdf; Section 99 and 122, Model Police Act, 2006; Section 26, Draft Model Police Bill, 2015.

[40] Starred Question 24, Lok Sabha, December 1, 2015.

[41] Forensic Perspective Plan 2010, Ministry of Home Affairs, http://mha.nic.in/sites/upload_files/mha/files/pdf/IFS(2010)-FinalRpt.pdf.

[42] Compendium on Performance Audit Reviews on Modernisation of Police Force, Comptroller & Auditor General, http://saiindia.gov.in/english/home/Our_Products/Other_Reports/Compendia/pulice_Force.swf.

[43] Audit Report (General and Social Audit) for the year ended 31 March 2014 for Rajasthan, Comptroller and Auditor General, http://www.cag.gov.in/sites/default/files/audit_report_files/Rajasthan_General_Social_1_2015_Chap_2.pdf.

[44] Audit Report (General and Social Sector) 2013-14 for West Bengal, Comptroller and Auditor General, http://www.cag.gov.in/sites/default/files/audit_report_files/Chapter_2_Performance_Audit_20.pdf; Audit Report on the General and Social Sector for the year ended March 2015, Comptroller and Auditor General, http://www.cag.gov.in/sites/default/files/audit_report_files/Gujarat_General_and_Social_Sector_Report_2_%202016.pdf

[45]Data on Police Organisations, Bureau of Police Research and Development, 2015, http://www.bprd.nic.in/WriteReadData/userfiles/file/201607121235174125303FinalDATABOOKSMALL2015.pdf.

[46] Audit Report (Social, Economic, Revenue and General Sectors) 2012-13 for Tripura, Comptroller and Auditor General, http://www.cag.gov.in/sites/default/files/audit_report_files/Tripura_social_economic_revenue_sector_1_2014.pdf.

 

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