अगस्त 2019

अगस्त 2019

इस अंक की झलकियां

2019-20 की पहली तिमाही में जीडीपी 5% की दर से बढ़ी

पिछले वर्ष की पहली तिमाही के मुकाबले 2019-20 में इसी अवधि में जीडीपी (2011-12 की स्थिर कीमत पर) 5% की दर से बढ़ी। 2018-19 की पहली तिमाही के मुकाबले बिजली और खनन को छोड़कर सभी क्षेत्रों में वृद्धि में गिरावट रही।

बिमल जालान कमिटी रिपोर्ट जारी, 1,76,051 करोड़ रुपए हस्तांतरित किए जाएंगे

कमिटी ने जोखिम बफर को बरकरार रखने और आरबीआई के कुल इकोनॉमिक कैपिटल को निश्चित दायरे में रखने का सुझाव दिया। बोर्ड ने सभी सुझावों को मंजूर किया और अधिशेष एवं शुद्ध आय को सरकार को हस्तांतरित करने का फैसला किया। 

वित्त मंत्री ने सार्वजनिक क्षेत्र के 10 बैंकों का विलय कर चार बैंक बनाने की घोषणा की

परिचालनगत कार्यकुशलता और ऋण की लागत को कम करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के 10 बैंकों का विलय किया जाएगा। कुछ सरकारी बैंकों में 55,250 करोड़ रुपए की पूंजी डालने की घोषणा भी की गई है।

संसद का बजट सत्र समाप्त, संसद ने इस महीने 13 बिल पारित किए

संसद में पारित बिल्स में उपभोक्ता संरक्षण बिल, राष्ट्रीय मेडिकल कमीशन बिल, मोटर वाहन (संशोधन) बिल, और इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी (संशोधन) बिल शामिल हैं।

लोकसभा में पांच बिल्स पारित, राज्यसभा में एक

लोकसभा में पारित बिल्स (और राज्यसभा में लंबित) में सेरोगेसी (रेगुलेशन) बिल, ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) बिल और बांध सुरक्षा बिल शामिल हैं।

जम्मू और कश्मीर का विशेष दर्जा रद्द, राज्य दो केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठित

राज्य को विशेष दर्जा देने वाला अनुच्छेद 370 संशोधित और निष्प्रभावी। राज्य विधानसभा सहित जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश और विधानसभा रहित लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश में पुनर्गठित।

कॉम्पिटीशन लॉ रिव्यू कमिटी ने प्रतिस्पर्धा एक्ट, 2002 पर रिपोर्ट सौंपी

मुख्य सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) गवर्निंग बॉडी की स्थापना, (ii) विशिष्ट विलय और अधिग्रहण के मामलों में स्वतः मंजूरियां, और (iii) अपीलों की सुनवाई के लिए राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय ट्रिब्यूनल में समर्पित खंडपीठ।

नीति आयोग ने कंपोजिट वॉटर मैनेजमेंट सूचकांक 2019 जारी किया

रिपोर्ट पिछले तीन वर्षो के दौरान मुख्य जल प्रबंधन संकेतकों पर राज्यों के प्रदर्शन की समीक्षा करती है। इस सूचकांक का उद्देश्य जल के प्रयोग और संरक्षण के क्षेत्र में राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ाना है।

कैबिनेट ने 2019-20 मौसम के लिए चीनी पर निर्यात सबसिडी को मंजूर किया

2019-20 मौसम में चीनी के लिए 10,448 रुपए प्रति मीट्रिक टन (एमटी) की निर्यात सबसिडी को मंजूरी दी गई है। 60 लाख एमटी तक चीनी पर सबसिडी देने के लिए 6,268 करोड़ रुपए के व्यय को मंजूर किया गया है।

कमिटी रक्षा खरीद प्रक्रिया की समीक्षा करेगी

कमिटी के उद्देश्यों में रक्षा खरीद प्रक्रिया, 2016 और रक्षा खरीद मैनुअल, 2009 की प्रक्रियाओं में संशोधन शामिल है ताकि अधिग्रहण में तेजी लाई जा सके और घरेलू उद्योग में अधिक भागीदारी संभव हो।

यूजीसी ने 20 संस्थानों को उत्कृष्ट संस्थान का दर्जा देने का सुझाव दिया

इन 20 संस्थानों में 10 सार्वजनिक क्षेत्र के, और शेष निजी क्षेत्र के हैं। इन संस्थानों को विदेशी विद्यार्थियों के दाखिले, फीस तय करने और विदेशी फैकेल्टी को नौकरी पर रखने के लिए अधिक स्वायत्तता मिलेगी।

कैबिनेट ने विभिन्न क्षेत्रों में एफडीआई नीति की समीक्षा के प्रस्ताव को मंजूरी दी

कोयले की बिक्री, कमर्शियल कोयला खनन और कॉन्ट्रैक्ट मैन्यूफैक्चरिंग में ऑटोमैटिक रूट के जरिए 100% एफडीआई की अनुमति दी जाएगी। सिंगल ब्रांड रीटेल्स अब ब्रिक और मोर्टार स्टोर्स खोलने से पहले ऑनलाइन रीटेल व्यापार कर सकते हैं।

 

संसद

Prachi Kaur (prachi@prsindia.org)

संसद के बजट सत्र 2019 का समापन

संसद का बजट सत्र 7 अगस्त, 2019 को समाप्त हो गया।[1]  प्रारंभ में सत्र 17 जून, 2019 से 26 जुलाई, 2019 तक होना था। बाद में इसे 7 अगस्त, 2019 तक बढ़ा दिया गया। 17वीं लोकसभा के चुनावों के बाद संसद का यह पहला सत्र था।

सत्र के दौरान 40 बिल्स पेश किए गए। इनमें व्यवसायगत सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यस्थिति संहिता, 2019, ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) बिल, 2019 और डीएनए टेक्नोलॉजी (प्रयोग और लागू होना) रेगुलेशन बिल, 2019 शामिल हैं।

संसद ने 28 बिल्स पारित किए (वित्त और विनियोग बिल्स को छोड़कर)। इस दौरान पारित बिल्स में जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन बिल, 2019, मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) बिल, 2019, उपभोक्ता संरक्षण बिल, 2019 और राष्ट्रीय मेडिकल कमीशन बिल, 2019 शामिल हैं।

बजट सत्र, 2019 के दौरान विधायी कार्यों पर अधिक विवरण के लिए कृपया देखें। सत्र के दौरान संसद के कामकाज पर अधिक विवरण के लिए कृपया देखें

 

समष्टि आर्थिक (मैक्रोइकोनॉमिक) विकास

Gayatri Mann (gayatri@prsindia.org)

2019-20 की पहली तिमाही में जीडीपी 5% की दर से बढ़ी

पिछले वर्ष की पहली तिमाही के मुकाबले 2019-20 में इसी अवधि में सकल घरेलू उत्पाद  (जीडीपी) (2011-12 की स्थिर कीमत पर) 5% की दर से बढ़ा।[2]  जीडीपी वृद्धि की तिमाही प्रवृत्ति रेखाचित्र 1 में प्रदर्शित है।

रेखाचित्र 1: जीडीपी की वृद्धि (वर्ष दर वर्ष, % में)

Sources: MOSPI; PRS.

विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों में जीडीपी वृद्धि को सकल मूल्य संवर्धन (जीवीए) में मापा जाता है। 2018-19 की पहली तिमाही के मुकाबले, 2019-20 की पहली तिमाही में सभी क्षेत्रों में संयुक्त जीवीए 7.7% से कम हो गई। बिजली और खनन को छोड़कर सभी क्षेत्रों में जीवीए की वृद्धि दर में गिरावट देखी गई। बिजली क्षेत्र में यह 6.7% से बढ़कर 8.6% और खनन क्षेत्र में 0.4% से बढ़कर 2.7% हो गई। उल्लेखनीय है कि मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में यह 2018-19 (तिमाही 1) में 12.1% से गिरकर 2019-20 (तिमाही 1) 0.6% हो गई। तालिका 1 में क्षेत्रगत जीवीए वृद्धि का विवरण पेश है।

तालिका 1: विभिन्न क्षेत्रों में सकल मूल्य संवर्धन (वर्ष दर वर्ष, % में)

क्षेत्र

तिमाही 1

2018-19

तिमाही 4

2018-19

तिमाही 1

2019-20

कृषि

5.1%

-0.1%

2.0%

खनन

0.4%

4.2%

2.7%

मैन्यूफैक्चरिंग

12.1%

3.1%

0.6%

बिजली

6.7%

4.3%

8.6%

निर्माण

9.6%

7.1%

5.7%

सेवाएं

7.1%

8.4%

6.9%

जीवीए

7.7%

5.7%

4.9%

NoteGVA is measured at base prices (2011-12).

Sources: Central Statistics Office, MOSPI; PRS.

पॉलिसी रेपो रेट 5.4% हुआ, रिवर्स रेपो रेट 5.15 %

मॉनिटरी पॉलिसी कमिटी (एमपीसी) ने 2019-20 का तीसरा द्विमासिक मौद्रिक नीतिगत वक्तव्य जारी किया।[3]  पॉलिसी रेपो रेट (जिस दर पर आरबीआई बैंकों को ऋण देता है) 5,75% से गिरकर 5.4% हो गया। एमपीसी के अन्य निर्णयों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • रिवर्स रेपो रेट (जिस दर पर आरबीआई बैंकों से उधार लेता है) 5.5% से गिकर 5.15% हो गया।
  • मार्जिनल स्टैंडिंग फेसिलिटी (जिस दर पर बैंक अतिरिक्त धन उधार ले सकते हैं) और बैंक रेट (जिस दर पर आरबीआई बिल्स ऑफ एक्सचेंज को खरीदता या रीडिस्काउंट करता है) 6% से गिरकर 5.65% हो गया।
  • एमपीसी ने मौद्रिक नीति के समायोजन के रुख को बरकरार रखने का फैसला किया।

2019-20 की पहली तिमाही में औद्योगिक उत्पादन 3.6% की दर से बढ़ा

2018-19 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के मुकाबले 2019-20 की पहली तिमाही में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) 3.6% बढ़ गया।[4]  बिजली क्षेत्र में सर्वाधिक 7.2% की बढ़ोतरी हुई, इसके बाद मैन्यूफैक्चरिंग में 3.1% और खनन में 3% की वृद्धि हुई। रेखाचित्र 2 में 2019-20 की पहली तिमाही में औद्योगिक उत्पादन (समूचा और विभिन्न क्षेत्रों में) में वर्ष दर वर्ष वृद्धि प्रदर्शित की गई है।  

रेखाचित्र 2: 2019-20 की पहली तिमाही में आईआईपी की वृद्धि (वर्ष दर वर्ष)

Sources: MOSPI; PRS.

 

गृह मामले

Roshni Sinha (roshni@prsindia.org)

जम्मू और कश्मीर का विशेष दर्जा रद्द

अनुच्छेद 370 के अंतर्गत जम्मू और कश्मीर को मिला विशेष दर्जा केंद्र सरकार द्वारा रद्द कर दिया गया।[5]  अनुच्छेद के अनुसार, जम्मू और कश्मीर के संबंध में संसद को रक्षा, विदेशी मामलों, संचार और केंद्रीय चुनावों तक कानून बनाने की शक्ति थी। हालांकि राष्ट्रपति राज्य सरकार की सहमति से दूसरे केंद्रीय कानून का विस्तार कर सकते थे।

संसद द्वारा अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी बनाने का सुझाव देते हुए एक प्रस्ताव मंजूर किया गया और कहा गया कि संविधान के सभी प्रावधान जम्मू और कश्मीर पर लागू होंगे।[6]  इस प्रस्ताव के आधार पर राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाने के लिए एक अधिसूचना जारी की।

जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन बिल, 2019 संसद में पारित

जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन बिल, 2019 को संसद में पारित कर दिया गया।[7] यह बिल जम्मू और कश्मीर राज्य को जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश में पुनर्गठित करने का प्रावधान करता है। बिल के मुख्य प्रावधानों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • जम्मू और कश्मीर का पुनर्गठन: बिल जम्मू और कश्मीर राज्य को निम्नलिखित में पुनर्गठित करता है: (i) विधानसभा के साथ जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश, और (ii) विधानसभा के बिना लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश। लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश में कारगिल और लेह जिले होंगे और जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में मौजूदा जम्मू और कश्मीर राज्य का शेष प्रदेश आएगा।
  • लेफ्टिनेंट गवर्नर: जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश को राष्ट्रपति द्वारा प्रशासित किया जाएगा। इसके लिए राष्ट्रपति लेफ्टिनेंट गवर्नर नामक एक प्रशासक की नियुक्ति करेंगे। लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश को राष्ट्रपति द्वारा प्रशासित किया जाएगा। इसके लिए भी राष्ट्रपति लेफ्टिनेंट गवर्नर नामक एक प्रशासक की नियुक्ति करेंगे।
  • जम्मू और कश्मीर की विधानसभा: बिल जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश के लिए एक विधानसभा का प्रावधान करता है। विधानसभा में कुल 107 सीटें होंगी। इनमें जम्मू और कश्मीर के पाकिस्तानी कब्जे वाले कुछ क्षेत्रों की 24 सीटें रिक्त होंगी। विधानसभा जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश के किसी हिस्से के लिए कानून बना सकती है जोकि निम्नलिखित से संबंधित हो सकते हैं: (i) पुलिस और पब्लिक ऑर्डर को छोड़कर संविधान की राज्य सूची में निर्दिष्ट कोई भी मामला, और (ii) केंद्र शासित प्रदेश पर लागू समवर्ती सूची में आने वाला कोई भी मामला। इसके अतिरिक्त संसद के पास यह शक्ति होगी कि वह जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश के किसी भी मामले के संबंध में कानून बनाए।
  • कानून का विस्तार: अनुसूची में 106 केंद्रीय कानून हैं जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित तिथि से जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश तथा लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश पर लागू किया जाएगा। इनमें आधार एक्ट, 2016, भारतीय दंड संहिता, 1860 और शिक्षा का अधिकार एक्ट, 2009 शामिल हैं। इसके अतिरिक्त यह बिल जम्मू और कश्मीर राज्य के 153 कानूनों को रद्द करता है। बिल कहता है कि 166 राज्य कानून प्रभावी बने रहेंगे और सात कानूनों को संशोधनों के साथ लागू किया जाएगा। पहले सिर्फ जम्मू और कश्मीर के स्थायी निवासियों को लैंड लीज की जा सकती थी। अब संशोधन के द्वारा यह पाबंदी हटा दी गई है।

बिल पर अधिक विवरण के लिए कृपया देखें

एनआरसी अपीलों के लिए समय सीमा बढ़ाई गई

नागरिकता (नागरिकता के पंजीकरण और राष्ट्रीय पहचान पत्र) नियम, 2003 के अंतर्गत, असम के लिए राष्ट्रीय भारतीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को तैयार किया गया है।[8] कोई भी ऐसा व्यक्ति, जिसका नाम एनआरसी में छूट गया है या गलत नाम शामिल है, तो वह नागरिक पंजीकरण स्थानीय रजिस्ट्रार को शिकायत दर्ज करा सकता है। इससे पूर्व रजिस्ट्रार के फैसले के खिलाफ 60 दिनों के भीतर विदेशी (ट्रिब्यूनल) आदेश, 1964 के अंतर्गत गठित ट्रिब्यूनल में अपील की जा सकती थी। इन नियमों को संशोधित किया गया ताकि अपील की समय सीमा को 60 दिनों से बढ़ाकर 120 दिन किया जा सके।[9] 

उल्लेखनीय है कि असम में 31 अगस्त, 2019 को एनआरसी प्रकाशित किया गया। इस सूची में 19,06,657 लोग शामिल नहीं हैं।[10]

वित्त

आरबीआई बोर्ड ने मौजूदा कैपिटल फ्रेमवर्क की समीक्षा के कमिटी के सुझाव को मंजूर किया

Anurag Vaishnav (anurag@prsindia.org)

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने केंद्र सरकार की सलाह से मौजूदा इकोनॉमिक कैपिटल फ्रेमवर्क की समीक्षा के लिए नवंबर, 2018 में एक कमिटी (चेयर: बिमल जालान) का गठन किया था।[11]  कमिटी ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है।[12]  इकोनॉमिक कैपिटल फ्रेमवर्क वह तरीका बताता है जिससे आरबीआई एक्ट, 1934 के सेक्शन 47 के अंतर्गत उपयुक्त स्तर के जोखिमों और लाभ वितरण का निर्धारण किया जा सके। कमिटी के संदर्भ की शर्तों में यह निर्धारित करना शामिल है कि क्या आरबीआई अधिशेष/घाटे में रिजर्व रख रहा है। साथ ही उपयुक्त अधिशेष वितरण नीति को प्रस्तावित करना भी इसमें शामिल है। इस संबंध में कमिटी ने निम्नलिखित सुझाव दिए:

  • केंद्रीय बैंक के इकोनॉमिक कैपिटल में उसकी रियलाइज्ड इक्विटी और रीवैल्यूएशन बैलेंस शामिल होता है। रियलाइज्ड इक्विटी में निम्नलिखित शामिल होते हैं: (i) आकस्मिकता राशि जिसमें अप्रत्याशित आकस्मिकता के लिए प्रावधान शामिल हैं, (ii) परिसंपत्ति विकास कोष, जोकि सबसिडियरीज में निवेश और आंतरिक पूंजीगत व्यय में निवेश के लिए अलग रखी गई राशि होती है, (iii) कैपिटल और रिजर्व फंड। विनिमय दर, सोने की कीमतों या ब्याज की दरों के उतार-चढ़ाव से होने वाला मुनाफा या नुकसान रीवैल्यूएशन बैंलेंस होता है।

मौजूदा अधिशेष वितरण नीति का लक्ष्य केवल कुल इकोनॉमिक कैपिटल है। कमिटी ने सुझाव दिया कि लक्ष्य में रियलाइज्ड इक्विटी भी शामिल होनी चाहिए। सीआरबी के रूप में रियलाइज्ड इक्विटी का आकार आरबीआई की बैलेंस शीट के 5.5% से 6.5% के बीच बरकरार रहना चाहिए (मौजूदा लक्ष्य: 3% से 4% के बीच है)। कुल इकोनॉमिक कैपिटल बैलेंस शीट के 20.8% से 25.4% के बीच बरकरार रहना चाहिए (मौजूदा लक्ष्य: 28.1% से 29.1% के बीच है)। 30 जून, 2018 तक केंद्रीय बैंक के लिए सीआरबी और कुल इकोनॉमिक कैपिटल बैलेंस शीट का क्रमशः 7.2% और 26.8% है।

  • अगर रियलाइज्ड इक्विटी अपेक्षित स्तर से अधिक है तो आरबीआई की पूरी शुद्ध आय सरकार को हस्तांतरित हो जाएगी। अगर यह कम है तो जोखिम प्रावधानीकरण जरूरी सीमा तक किया जाएगा और केवल शेष शुद्ध आय को हस्तांतरित किया जाएगा। इस फ्रेमवर्क की हर पांच वर्षों में समीक्षा की जा सकती है।

आरबीआई बोर्ड ने कमिटी के सभी सुझावों को मंजूर कर लिया। 2018-19 के खातों के आधार पर उपलब्ध रियलाइज्ड इक्विटी बैलेंस शीट के 6.8% पर रही। यह कमिटी द्वारा सुझाई गई सीमा से अधिक था। बोर्ड ने रियलाइज्ड इक्विटी के स्तर को बैलेंस शीट के 5.5% पर बरकरार रखने का फैसला किया और 52,637 करोड़ रुपए के जोखिम बफर को केंद्र सरकार को हस्तांतरित किया। 

संशोधित फ्रेमवर्क के अनुसार, आरबीआई का इकोनॉमिक कैपिटल (30 जून, 2019) बैलेंस शीट के 23.3% पर रहा, जोकि कमिटी द्वारा सुझाई सीमा में था। इस प्रकार बोर्ड ने 2018-19 की समूची शुद्ध आय, जोकि 1,23,414 करोड़ रुपए है, को सरकार को हस्तांतरित करने का फैसला किया।

कमिटी रिपोर्ट के पीआरएस सारांश के लिए कृपया देखें

सरकार ने कई सरकारी बैंकों के विलय, पूंजी समर्थन की घोषणा की

Anurag Vaishnav (anurag@prsindia.org)

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) से संबधित अनेक उपायों की घोषणा की। इसमें चार बैंकों के विलय से चार बैंक बनाना शामिल है ताकि ऋण देने के उनके स्तर और क्षमता को बढ़ाया जा सके।[13]  जिन बैंकों का विलय किया गया, उनमें निम्नलिखित शामिल हैं:

  • पंजाब नेशनल बैंक, ऑरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और यूनिइटेड बैंक ऑफ इंडिया को मिलाकर एक बैंक बनाया जाएगा और इनमें पंजाब नेशनल बैंक एंकर बैंक (बड़ा बैंक जिसमें बाकी के बैंकों को मिला दिया जाएगा) होगा। परिणामस्वरूप अस्तित्व में आने वाला बैंक देश में दूसरा सबसे बड़ा पीएसबी होगा जिसका कुल कारोबार 17.94 लाख करोड़ रुपए होगा।
  • केनरा बैंक (एंकर बैंक) और सिंडिकेट बैंक का विलय एक बैंक में किया जाएगा। यह बैंक चौथा सबसे बड़ा पीएसबी होगा (कुल कारोबार 15.2 लाख करोड़ रुपए)।
  • यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (एंकर बैंक), आंध्र बैंक और कॉरपोरेशन बैंक का विलय एक बैंक में हो जाएगा और यह बैंक पांचवां सबसे बड़ा पीएसबी होगा (कुल कारोबार 14.59 लाख करोड़ रुपए)।
  • इंडियन बैंक (एंकर बैंक) और इलाहाबाद बैंक का विलय हो जाएगा, और यह सातवां सबसे बड़ा पीएसबी होगा (कुल 8.08 लाख करोड़ रुपए का कारोबार)।

मंत्री ने 10 पीएसबीज़ में 55,250 करोड़ रुपए की पूंजी डालने की घोषणा भी की। इसमें पंजाब नेशनल बैंक में 16,000 करोड़ रुपए, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में 11,700 करोड़ रुपए, और बैंक ऑफ बड़ौदा में 7,000 करोड़ रुपए शामिल हैं।

चिट फंड्स (संशोधन) बिल लोकसभा में पेश

Anurag Vaishnav (anurag@prsindia.org)

चिट फंड्स (संशोधन) बिल, 2019 को लोकसभा में पेश किया गया।[14]  बिल चिट फंड्स एक्ट, 1982 में संशोधन का प्रयास करता है। बिल की मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • चिट फंड का नाम: एक्ट ऐसे विभिन्न नाम विनिर्दिष्ट करता है जिनका इस्तेमाल चिट फंड के लिए किया जा सकता है। इनमें चिट, चिट फंड और कुरी शामिल है। बिल इस सूची में ‘मैत्री फंड’ (फ्रेटरनिटी फंड) और आवर्ती बचत और प्रत्यय संस्था’ (रोटेटिंग सेविंग्स एंड क्रेडिट इंस्टीट्यूशन) को जोड़ता है।
  • वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सबस्क्राइबरों की उपस्थिति: एक्ट विनिर्दिष्ट करता है कि कम से कम दो सबस्क्राइबरों की उपस्थिति में चिट निकाली जाएगी। बिल इन सबस्क्राइबरों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उपस्थित होने की अनुमति देने का प्रयास करता है।
  • फोरमैन का कमीशन: एक्ट के अंतर्गत चिट फंड को चलाने की जिम्मेदारी ‘फोरमैन’ की है। वह चिट की कुल राशि का अधिकतम 5% कमीशन के तौर पर पाने के लिए अधिकृत है। बिल इस कमीशन को बढ़ाकर 7% करने का प्रयास करता है। इसके अतिरिक्त बिल सबस्क्राइबर्स के क्रेडिट बैलेंस पर फोरमैन के वैध अधिकार की अनुमति देता है।
  • चिट्स की एग्रेगेट राशि: एक्ट के अंतर्गत चिट्स फर्म्स, संगठन या व्यक्तियों द्वारा चलाए जा सकते हैं। एक्ट चिट् फंड्स की अधिकतम राशि को विनिर्दिष्ट करता है जिन्हें जमा किया जा सकता है। ये सीमाएं हैं: (i) व्यक्तियों द्वारा चलाए जाने वाले चिट्स तथा चार से कम पार्टनर्स वाली फर्म या संगठन में प्रत्येक व्यक्ति द्वारा चलाए जाने वाले चिट्स के लिए एक लाख रुपए, और (ii) चार या उससे अधिक पार्टनर्स वाली फर्म्स के लिए छह लाख रुपए। बिल इस सीमा को क्रमशः तीन लाख रुपए और 18 लाख रुपए करता है।
  • एक्ट का एप्लीकेशन: वर्तमान में एक्ट निम्न पर लागू नहीं होता: (i) एक्ट लागू होने से पहले शुरू किए गए किसी चिट पर, और (ii) किसी ऐसे चिट (या एक ही फोरमैन द्वारा चलाए जाने वाले कई चिट्स) पर जिसकी राशि 100 रुपए से कम है। बिल 100 रुपए की सीमा को हटाता है और राज्य सरकार को आधार राशि तय करने की अनुमति देता है जिससे अधिक की रकम होने पर एक्ट के प्रावधान लागू होंगे।

बिल पर अधिक विवरण के लिए कृपया देखें

ऑफशोर रूपी मार्केट्स पर गठित टास्क फोर्स ने रिपोर्ट सौंपी

Anurag Vaishnav (anurag@prsindia.org)

ऑफशोर रूपी पर गठित टास्क फोर्स ने अपनी रिपोर्ट सौंपी।[15],[16]  इसे आरबीआई ने फरवरी 2019 को गठित किया था ताकि ऑफशोर रूपी मार्केट्स से संबंधित मुद्दों, रूपी एक्सचेंज रेट पर उसके असर की समीक्षा की जा सके और उपयुक्त नीतिगत उपायों का सुझाव दिया जा सके।[17] 

ऑफशोर मार्केट्स भागीदारों को नॉन-कन्वर्टिबल करंसी में व्यापार करने का मौका देता है और इस प्रकार वे घरेलू अथॉरिटीज़ के दायरे के बाहर व्यापार करते हैं। आरबीआई की नीति का उद्देश्य गैर निवासियों को घरेलू बाजार में आने के लिए प्रोत्साहित करना है। हालांकि हाल के वर्षों में ऑफशोर रूपी मार्केट्स में तेजी से वृद्धि हुई है जिसका मुद्रा स्थिरता पर असर हुआ है। टास्क फोर्स के मुख्य सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • वर्तमान में ऑफशोर मार्केट में कारोबार सुबह 9 से शाम पांच बजे तक होता है।[18] टास्क फोर्स ने कहा कि घरेलू बाजार उस समय बंद होता है, जब कुछ विशेष क्षेत्रों, जैसे यूएसए में अधिकतर प्रयोक्ता काम करते हैं। इससे ऑफशोर मार्केट्स में उनका जाना स्वाभाविक है। उसने सुझाव दिया कि ऑनशोर मार्केट को काम के घंटों को बढ़ाया जाए ताकि ऑफशोर मार्केट की फ्लेक्सिबिलिटी की बराबरी की जा सके और गैर निवासी ऑनशोर मार्केट में आने को प्रोत्साहित हों।
  • टास्क फोर्स ने सुझाव दिया कि ऐसे उपाय किए जाने चाहिए ताकि गैर निवासी ऑनशोर मार्केट में विदेशी मुद्रा को हेज करने को प्रोत्साहित हों, जैसे (i) एक केंद्रीय क्लियरिंग और सेटेलमेंट तंत्र स्थापित करना, (ii) वित्तीय बाजारों में केंद्रीयकृत केवाईसी की जरूरत, और (iii) भारत में कर क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्रों के बीच अंतराल को कम करना।
  • जोखिमों को स्थापित करने की जरूरत के बिना प्रयोक्ताओं को ओटीसी करंसी डेरिवेटिव मार्केट (ऑफ एक्सचेंज ट्रेडिंग मार्केट, जिसमें प्रतिभागी एक दूसरे से सीधे व्यापार करते हैं) में 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक विदेशी मुद्रा लेनदेन की अनुमति।
  • भारत में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्रों में रूपी डेरिवेटिव्स (विदेशी करंसी में सेटेल्ड) को व्यापार की अनुमति।

वित्त मंत्रालय ने टैक्स डिपार्टमेंट्स में अपील की मौद्रिक सीमा को बढ़ाया

Suyash Tiwari (suyash@prsindia.org)

वित्त मंत्रालय ने सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज़ और सेंट्रल बोर्ड ऑफ इनडायरेक्ट टैक्सेज़ एंड कस्टम्स में अपील दायर करने की मौद्रिक सीमा को बढ़ा दिया है।[19],[20] अपीलीय ट्रिब्यूनल, उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालयों में अपील दायर करने के लिए ये सीमाएं लागू हैं। इसी सीमाओं को मुकदमेबाजी में सुधार के उद्देश्य से बढ़ाया गया है ताकि इन डिपार्टमेंट्स को पर्याप्त मूल्य के मुकदमे पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिले। तालिका 2 में प्रदर्शित किया गया है कि विभिन्न अपीलीय मंचों के समक्ष विभागीय अपील करने की संशोधित सीमाएं क्या हैं।

तालिका 2: विभागीय अपीलों को दायर करने की मौद्रिक सीमा (रुपए में)

अपीलीय मंच

पूर्व सीमा

संशोधित सीमा

अपीलीय ट्रिब्यूनल

20 लाख

50 लाख

उच्च न्यायालय

50 लाख

एक करोड़

सर्वोच्च न्यायालय

एक करोड़

दो करोड़

Sources:  Ministry of Finance; PRS.

सेंट्रल बोर्ड ऑफ इनडायरेक्ट टैक्सेज़ एंड कस्टम्स की स्थिति में, संशोधित सीमा केंद्रीय उत्पाद और सेवा शुल्क के संबंधित अपीलों पर लागू होगी (सभी लंबित मामलों सहित)। इसके अतिरिक्त ये सीमाएं उन मामलों पर लागू नहीं होगी, जिसमें कोई कानूनी अड़चन होगी। इनमें ऐसे मामले शामिल हैं जहां: (i) किसी एक्ट या नियम के प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है, और (ii) अधिसूचना, आदेश, निर्देश, या सर्कुलर को गैर कानूनी या अधिकार क्षेत्र से बाहर माना गया है।

आरबीआई ने रेगुलेटरी सैंडबॉक्स के लिए एनेबलिंग फ्रेमवर्क जारी किया

Anurag Vaishnav (anurag@prsindia.org)

भारतीय रिजर्व बैंक ने रेगुलेटरी सैंडबॉक्स के लिए एनेबलिंग फ्रेमवर्क जारी किया।[21]  आरबीआई ने 2016 में वित्तीय तकनीकी क्षेत्र में रेगुलेटरी फ्रेमवर्क की समीक्षा के लिए अंतर-रेगुलेटरी वर्किंग ग्रुप का गठन किया था।[22]  उसने रेगुलेटरी सैंडबॉक्स के लिए फ्रेमवर्क को प्रस्तावित करने का सुझाव दिया था ताकि रेगुलेटरी दिशानिर्देश दिए जा सकें, कार्य क्षमता बढ़ाई जा सके, जोखिमों का प्रबंधन किया जा सके और उपभोक्ताओं के लिए नए अवसरों का सृजन किया जा सके।

सैंडबॉक्स एक ऐसा परिवेश प्रदान करता है जिसमें प्रतिभागियों को ग्राहकों के साथ एक नियंत्रित परिवेश में नए उत्पादों, सेवाओं या कारोबारी मॉडल का परीक्षण करने का मौका मिलता है। सैंडबॉक्स का उद्देश्य वित्तीय सेवाओं में नवाचार को पोषित करना, कार्य कुशलता को बढ़ावा देना और उपभोक्ताओं को लाभ पहुंचाना है। फ्रेमवर्क की मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • पात्रता: सैंडबॉक्स के केंद्र में फिनटेक कंपनियों में नवाचार को बढ़ावा देना होगा, जहां (क) गवर्निंग रेगुलेशंस मौजूद नहीं हैं, (ख) रेगुलेशंस खत्म करने से प्रस्तावित नवाचार को बढ़ावा मिले, या (ग) प्रस्तावित नवाचार से वित्तीय सेवा की डिलिवरी आसान होती हो।
  • इसके मद्देनजर मसौदा फ्रेमवर्क ने उत्पादों, सेवाओं और तकनीक की एक सूची चिन्हित की है जिन पर सैंडबॉक्स के अंतर्गत परीक्षण के लिए विचार किया जा सकता है। इसमें रीटेल पेमेंट, मनी ट्रांसफर सेवाएं, मोबाइल तकनीक आवेदक, डेटा एनालिटिक्स, वित्तीय सलाहकार सेवाएं, वित्तीय समावेश और साइबर सुरक्षा उत्पाद शामिल हैं।
  • फ्रेमवर्क में यह प्रावधान भी है कि फिनटेक कंपनियों को रेगुलेटरी सैंडबॉक्स में भाग लेने के लिए भारत में निगमित किया जाना चाहिए। सांविधिक तरीके से स्थापित वित्तीय संस्थान भी पात्र होंगे। इसके अतिरिक्त संस्था का न्यूनतम शुद्ध मूल्य उसकी हालिया ऑडिटेड बैलेंस शीट के अनुसार पच्चीस लाख रुपए होना चाहिए।
  • समय सीमा: सैंडबॉक्स प्रक्रिया के पांच चरण होंगे और यह 27 हफ्ते तक चलेगी। इन चरणों में उत्पाद की प्रारंभिक स्क्रीनिंग, टेस्ट डिजाइन, आवेदनों का आकलन, परीक्षण और मूल्यांकन शामिल है। प्रतिभागी कंपनियों को प्रदान छूट इस अवधि के अंत में समाप्त हो जाएगी।
  • इस कार्यान्वयन पर आरबीआई की फिनटेक यूनिट नजर रखेगी। अगर कोई संस्था अपेक्षित उद्देश्य को हासिल नहीं कर पाती या वह रेगुलेटरी शर्तों को पूरा नहीं कर पाती तो आरबीआई सैंडबॉक्स टेस्टिंग को बंद कर सकती है।

ऑन-लेंडिंग वाले एनबीएफसीज़ के बैंक ऋण प्राथमिक क्षेत्र में वर्गीकृत

Anurag Vaishnav (anurag@prsindia.org)

बैंक पंजीकृत नॉन बैंकिंग फाइनांशियल कंपनियों (एनबीएफसीज़) को कुछ विशेष क्षेत्रों में ऑन-लेंडिग हेतु ऋण देते हैं। अब इन ऋणों को प्राथमिक क्षेत्र के ऋण (प्रायॉरिटी सेक्टर लेंडिंग) के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा। भारतीय रिजर्व बैंक ने इस संबंध में दिशानिर्देश जारी किए हैं।[23]  इन क्षेत्रों में कृषि, सूक्ष्म और लघु उद्यम और आवास शामिल हैं। 

  • कृषि क्षेत्र हेतु टर्म लेंडिंग के लिए एनबीएफसी द्वारा ऑन-लेंडिंग 10 लाख रुपए प्रति उधारकर्ता की अनुमति है।
  • सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए एनबीएफसीज़ द्वारा ऑन-लेडिंग के लिए 20 लाख रुपए प्रति उधारकर्ता की अनुमति है।
  • आवास के लिए एनबीएफसीज़ द्वारा ऑन-लेंडिंग हेतु मौजूदा सीमाओं को प्राथमिक क्षेत्र में वर्गीकृत किया गया है और उसे 10 लाख रुपए से दोगुना करके 20 लाख रुपए किया गया है।

ऑन-लेंडिंग के लिए एनबीएफसीज़ को कुल बैंक ऋण की रकम बैंक के कुल प्राथमिक क्षेत्र के ऋण के 5% से अधिक नहीं होना चाहिए। ये दिशानिर्देश 31 मार्च, 2020 तक वैध हैं।

उल्लेखनीय है कि ये परिवर्तन उन एनबीएफसीज़ पर लागू नहीं हैं जो लघु वित्त संस्थान हैं (एनबीएफसी-एमएफआई)। एनबीएफसी-एमएफआई एक नॉन-डिपॉजिट नॉन बैंकिंग कंपनियां होती हैं जिनका न्यूनतम शुद्ध मूल्य 5 करोड़ रुपए होता है और उनकी 85% या उससे अधिक की परिसंपत्तियां ऋण के रूप में होती हैं जोकि कुछ शर्तों को पूरा करती हैं, जैसे 1 लाख रुपए की वार्षिक आय वाले ग्रामीण परिवारों को दिए गए ऋण और 1.6 लाख रुपए से कम वार्षिक आय वाले अर्ध-शहरी या शहरी परिवारों को दिए गए ऋण।[24]    

 

कॉरपोरेट मामले

Roshni Sinha (roshni@prsindia.org)

इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता (संशोधन) बिल, 2019 संसद में पारित

इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता (संशोधन) बिल, 2019 को राज्यसभा में पारित कर दिया गया।[25]  यह इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 में संशोधन करता है। संहिता कंपनियों और व्यक्तियों के बीच इनसॉल्वेंसी को रिज़ॉल्व करने के लिए एक समयबद्ध प्रक्रिया प्रदान करती है। बिल की मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • रेज़ोल्यूशन प्रक्रिया की शुरुआत: संहिता के अंतर्गत फाइनांशियल क्रेडिटर इनसॉल्वेंसी के रेज़ोल्यूशन की प्रक्रिया की शुरुआत करने के लिए राष्ट्रीय कंपनी कानून ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में आवेदन कर सकता है। एनसीएलटी को 14 दिनों के अंदर डीफॉल्ट का पता लगाना होगा। अपने निष्कर्षों के आधार पर एनसीएलटी आवेदन को मंजूर या नामंजूर कर सकता है। बिल कहता है कि अगर एनसीएलटी को डीफॉल्ट होने का पता नहीं चलता और वह 14 दिनों के अंदर आदेश जारी नहीं करता तो उसे लिखित में इसके कारण बताने होंगे।
  • रेज़ोल्यूशन प्रक्रिया की समय सीमा: संहिता कहती है कि इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया को 180 दिनों में पूरा होना चाहिए जिसे 90 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है। बिल कहता है कि रेज़ोल्यूशन की प्रक्रिया को 330 दिनों में पूरा होना चाहिए। इसमें रेज़ोल्यूशन प्रक्रिया की बढ़ी हुई अवधि और कानूनी कार्यवाही में लगने वाला समय भी शामिल होगा। बिल के लागू होने पर, अगर कोई मामला 330 दिनों तक लंबित है, तो बिल के अनुसार, उसे 90 दिनों में निपटाया जाना चाहिए।
  • रेज़ोल्यूशन प्लान: संहिता के अनुसार रेज़ोल्यूशन प्लान में यह सुनिश्चित होना चाहिए कि ऑपरेशनल क्रेडिटर्स को लिक्विडेशन की स्थिति में प्राप्त होने वाली राशि से अधिक राशि प्राप्त हो। बिल इसमें संशोधन करता है और प्रावधान करता है कि ऑपरेशनल क्रेडिटर्स को (i) लिक्विडेशन के अंतर्गत प्राप्त होने वाली राशि, तथा (ii) रेज़ोल्यूशन प्लान के अंतर्गत प्राप्त होने वाली राशि, अगर वह राशि वरीयता क्रम के अनुसार (लिक्विडेशन के समय) वितरित की गई है, के बीच से अधिक राशि चुकाई जाए।
  • फाइनांशियल क्रेडिटर्स के प्रतिनिधि: संहिता विनिर्दिष्ट करती है कि कुछ मामलों में, जैसे जब एक निर्दिष्ट संख्या से अधिक क्रेडिटर्स का ऋण बकाया है तो फाइनांशियल क्रेडिटर्स का अधिकृत प्रतिनिधि कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स में उनका प्रतिनिधित्व करेगा। ये प्रतिनिधि फाइनांशियल क्रेडिटर्स के निर्देशानुसार उनकी ओर से वोट करेंगे। बिल कहता है कि ये प्रतिनिधि लेनदारों के बहुमत से लिए गए निर्णय के आधार पर वोट करेंगे।

बिल पर अधिक विवरण के लिए कृपया देखें

कॉम्पिटीशन लॉ रिव्यू कमिटी ने रिपोर्ट सौंपी

कॉम्पिटीशन लॉ रिव्यू कमिटी (चेयर: इंजेती श्रीनिवास) ने प्रतिस्पर्धा एक्ट, 2002 में संशोधन हेतु अपनी रिपोर्ट सौंपी।[26]  एक्ट प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने, गैर प्रतिस्पर्धी कार्य पद्धतियों को रोकने और उपभोक्ता अधिकारों के संरक्षण के लिए भारतीय प्रतिस्पर्धा कमीशन (सीसीआई) की स्थापना करता है। कमिटी के मुख्य सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं

  • गवर्निंग बॉडी: कमिटी ने सुझाव दिया कि गवर्निंग बॉडी के प्रावधान के लिए एक्ट में संशोधन किए जाएं जिससे सीसीआई की जवाबदेही को बढ़ाया जा सके। गवर्निंग बॉडी में एक चेयरपर्सन, छह पूर्णकालिक सदस्य और छह अर्धकालिक सदस्य होंगे। गवर्निंग बॉडी अर्ध विधायी कार्य करेगी, नीतिगत फैसले लेगी और निरीक्षणात्मक भूमिका निभाएगी।
  • अपीलीय अथॉरिटी: कमिटी ने कहा कि एक्ट के अंतर्गत सीसीआई के आदेशों के खिलाफ राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय ट्रिब्यूनल में सुनवाई की जाती है। लेकिन यह पाया गया कि ट्रिब्यूनल के पास बहुत अधिक मामले हैं। इसलिए यह सुझाव दिया गया कि एक्ट के अंतर्गत अपीलों की सुनवाई के लिए अलग से एक खंडपीठ बनाई जाए।
  • निपटारा: कमिटी ने कहा कि यूरोपीय संघ जैसे कुछ न्यायिक क्षेत्रों में अविश्वास से संबंधित विवादों का निपटारा किया जाता है। ये उपाय निपटारे और प्रतिबद्धताओं के रूप में हो सकते हैं। निपटारे आम तौर पर कार्टेल्स के लिए उपलब्ध होते हैं और उनके लिए पक्षों की तरफ से अपराध की स्वीकृति जरूरी होती है। प्रतिबद्धताएं अन्य सभी मामलों पर लागू होती हैं और उनके लिए अपराध की स्वीकृति की जरूरत नहीं होती। कमिटी ने सुझाव दिया कि सीसीआई को सशक्त करने के लिए एक्ट में संशोधन किए जाएं ताकि प्रतिस्पर्धा विरोधी अनुबंधों (जैसे विशेष आपूर्ति का समझौता) और प्रभुत्व के दुरुपयोग जैसे मामलों में निपटारे और प्रतिबद्धता की अनुमति दी जा सके।
  • ग्रीन चैनल संबंधी अधिसूचना: एक्ट के अंतर्गत विशेष सीमा के परे कॉम्बिनेशंस के लिए सीसीआई की अनुमति की जरूरत होती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि विशेष विलय और एकीकरण के उन मामलों में सीसीआई की स्वतः अनुमति के लिए एक ग्रीन चैनल रूट होना चाहिए जहां प्रतिस्पर्धा पर कोई प्रतिकूल असर होने की बड़ी चिंता न हो। इसमें इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता के अंतर्गत आने वाले मामले शामिल हो सकते हैं। उल्लेखनीय है कि ग्रीन चैनल कॉम्बिनेशन से संबंधित अधिसूचना को जारी किया गया है।[27]
  • विलय के मूल्यांकन की समय सीमा: एक्ट के अंतर्गत अधिसूचित कॉम्बिनेशन रेगुलेशंस के लिए सीसीआई को यह प्रारंभिक सलाह देने, कि क्या कॉम्बिनेशन का प्रतिकूल असर प्रतिस्पर्धा पर पड़ेगा, के लिए 30 दिनों का समय दिया गया है।

पीआरएस रिपोर्ट के सारांश के लिए कृपया देखें

सीएसआर पर उच्च स्तरीय कमिटी ने रिपोर्ट सौंपी

कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी पर उच्च स्तरीय कमिटी (चेयर: इंजेती श्रीनिवास) ने अपनी रिपोर्ट सौंपी।[28]  कंपनी एक्ट, 2013 के अंतर्गत जिन कंपनियों का विशिष्ट शुद्ध मूल्य, कारोबार या लाभ एक सीमा से अधिक है, उन्हें अपने पिछले तीन वित्तीय वर्षों के दौरान कमाए गए औसत शुद्ध लाभ का 2% सीएसआर नीति पर खर्च करना होगा। कमिटी ने मौजूदा सीएसआर फ्रेमवर्क के संबंध में अनेक सुझाव दिए जिनमें परिचालनगत पद्धतियों पर उनकी एप्लीकेबिलिटी भी शामिल है। मुख्य सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • सीएसआर की एप्लीकेबिलिटी: वर्तमान में सिर्फ कंपनियों को सीएसआर रेगुलेशंस के अनुपालन की जरूरत होती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि सीएसआर बाध्यताओं को लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप्स और बैंकों जैसे अन्य व्यापार पर भी लागू होना चाहिए।
  • सीएसआर कमिटीज़: एक्ट के अंतर्गत सीएसआर की सभी पात्र कंपनियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे सीएसआर कमिटीज़ बनाएंगी। परिचालनगत सुविधा के लिए कमिटी ने सुझाव दिया कि 50 लाख रुपए से कम के सीएसआर फंड्स को इस शर्त से छूट दी जानी चाहिए।
  • सीएसआर गतिविधियों पर टैक्स में छूट: सीएसआर संबंधी व्यय को बढ़ावा देने के लिए सीएसआर व्यय को कंपनी की कर योग्य आय से घटाया जाना चाहिए।
  • सीएसआर इंपैक्ट स्टडीज़: कमिटी ने सुझाव दिया कि पिछले तीन वित्तीय वर्षों में पांच करोड़ रुपए से अधिक के सीएसआर फंड्स वाली कंपनियों को हर तीन साल में एक बार अपने सीएसआर प्रॉजेक्ट्स के लिए इंपैक्ट एसेसमेंट स्टडी करनी चाहिए और अपनी बोर्ड रिपोर्ट में इसका खुलासा करना चाहिए।
  • सीएसआर ऑडिट: कमिटी ने कंपनी के वित्तीय वक्तव्यों में सीएसआर व्यय के खुलासे के जरिए सीएसआर को सांविधिक वित्तीय ऑडिट के दायरे में लाने का सुझाव दिया।
  • व्यय न करने की स्थिति में जुर्माना: कमिटी ने इस संबंध में सुझाव दिया कि कंपनियों को खर्च न होने वाले सीएसआर फंड्स को अलग खाते में ट्रांसफर करना होगा और उन फंड्स को तीन से पांच वर्षों में खर्च करना होगा। ऐसा न करने पर कंपनी को जुर्माना भरना पड़ सकता है। उल्लेखनीय है कि हाल ही में पारित कंपनी एक्ट, 2019 में इन संशोधनों को शामिल किया गया है और इसके अतिरिक्त जुर्माना लगाया गया है।

डिफरेंशियल वोटिंग राइट्स वाले शेयरों की सीमा बढ़ी

कंपनी एक्ट 2013 के अंतर्गत निजी कंपनियां ऐसे शेयर जारी कर सकती हैं जिसके लाभांश/वोटिंग के रूप में अलग अधिकार हों। ये शेयर कंपनी के कुल पेड-अप इक्विटी शेयर का 26% से अधिक नहीं होने चाहिए। इन शेयरों को डिफेंशियल वोटिंग राइट्स (डीवीआर) वाले शेयर कहा जाता है। कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने एक्ट के अंतर्गत अधिसूचित नियमों में संशोधन किया है ताकि 74% तक डीवीआर जारी करने की अनुमति दी जा सके।[29]

 

वाणिज्य और उद्योग

Gayatri Mann (gayatri@prsindia.org)

राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान (संशोधन) बिल, 2019 राज्यसभा में पारित

राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान (संशोधन) बिल, 2019  को राज्यसभा में पारित कर दिया गया और बिल लोकसभा में लंबित है।[30] बिल राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान एक्ट, 2014 में संशोधन करता है जोकि अहमदाबाद स्थित राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित करता है।

  • बिल आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम और हरियाणा में चार अन्य राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थानों को राष्ट्रीय महत्व के संस्थान घोषित करने का प्रयास करता है।
  • वर्तमान में ये चारों संस्थान सोसायटी पंजीकरण एक्ट, 1860 के अंतर्गत सोसायटी के रूप में पंजीकृत हैं और इन्हें डिग्री या डिप्लोमा देने का अधिकार नहीं है। राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित होने के बाद चारों संस्थानों को डिग्री और डिप्लोमा देने की शक्ति मिल जाएगी।

बिल पर अधिक विवरण के लिए कृपया देखें

कैबिनेट ने विभिन्न क्षेत्रों में एफडीआई नीति की समीक्षा के प्रस्ताव को मंजूरी दी

केंद्रीय कैबिनेट ने विभिन्न क्षेत्रों में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) नीति में कुछ संशोधनों को मंजूरी दी है।[31]  नीति में मुख्य परिवर्तनों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • कोयला खनन: वर्तमान में ऑटोमैटिक रूट से 100% एफडीआई की निम्नलिखित में मंजूरी है: (i) बिजली, सीमेंट और लोहा एवं इस्पात संयंत्रों द्वारा कैप्टिव उपभोग के लिए कोयले और लिग्नाइट का खनन, और (ii) कोयला प्रसंस्करण (हालांकि खुले बाजार में कोयला बिक्री की अनुमति नहीं है)। कैबिनेट ने कोयले की बिक्री, कमर्शियल कोयला खनन, और संबंधित प्रसंस्करण की गतिविधियों, जैसे कोयले की धुलाई, क्रशिंग और हैंडलिंग में ऑटोमैटिक रूट से 100% एफडीआई की अनुमति दे दी है।
  • कॉन्ट्रैक्ट मैन्यूफैक्चरिंग: मौजूदा नीति में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में ऑटोमैटिक रूट से 100% एफडीआई की अनुमति है। भारत में मैन्यूफैक्चरिंग संबंधी गतिविधियां या तो निवेशक संस्था द्वारा की जाती है या कॉन्ट्रैक्ट मैन्यूफैक्चरिंग के जरिए। हालांकि एफडीआई नीति में कॉन्ट्रैक्ट मैन्यूफैक्चरिंग के लिए विशिष्ट प्रावधान नहीं हैं। इस संबंध में कॉन्ट्रैक्ट मैन्यूफैक्चरिंग के लिए ऑटोमैटिक रूट से 100% एफडीआई की अनुमति दी जाएगी।
  • सिंगल ब्रांड रीटेल ट्रेडिंग: वर्तमान में 51% से अधिक की एफडीआई वाले सिंगल ब्रांड रीटेलर्स को बेचे जाने वाले उत्पादों की 30% वैल्यू स्थानीय स्तर पर सोर्स करनी पड़ती है। इन संशोधनों के बाद भारत में की गई खरीद को स्थानीय सोर्सिंग माना जाना चाहिए, भले ही उत्पाद भारत में बेचे गए हों अथवा उनका निर्यात किया गया हो। इसके अतिरिक्त वर्तमान नीति में सभी सिंगल ब्रांड रीटेलर्स से यह अपेक्षित है कि वे ई-कॉमर्स के जरिए ट्रेडिंग शुरू करने से पहले बिक्र और मोर्टार स्टोर्स के जरिए काम करना शुरू करेंगे। इसे संशोधित किया गया है ताकि ब्रिक और मोर्टार स्टोर्स शुरू करने से पहले ऑनलाइन रीटेल ट्रेडिंग की अनुमति दी जा सके। हालांकि रीटेलर्स को अपने ऑनलाइन कामकाज को शुरू करने के दो साल के भीतर स्टोर खोलना होगा।
  • डिजिटल मीडिया: वर्तमान में न्यूज और कंरट अफेयर्स की ब्रॉडकास्टिंग करने वाले टीवी चैनलों से अप-लिंकिंग हेतु अप्रूवल रूट से 49% एफडीआई की अनुमति है। संशोधनों में डिजिटल मीडिया के जरिए न्यूज और करंट अफेयर्स की अपलोडिंग और स्ट्रीमिंग के लिए अप्रूवल रूट से 26% एफडीआई की अनुमति दी गई है।

 

रक्षा

Anurag Vaishnav (anurag@prsindia.org)

सरकार ने रक्षा खरीद प्रक्रिया की समीक्षा के लिए कमिटी के गठन को मंजूरी दी

रक्षा मंत्रालय ने रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी), 2016 और रक्षा खरीद मैन्यूअल (डीपीएम), 2009 की समीक्षा के लिए कमिटी के गठन को मंजूरी दी।[32]  कमिटी का लक्ष्य रक्षा उपकरणों की उत्तम खरीद प्रक्रिया को सुनिश्चित करने वाली प्रक्रियाओं में संशोधन करना और उन्हें श्रेणीबद्ध करना तथा मेक इन इंडिया अभियान को मजबूत करना है। कमिटी के संदर्भ की शर्तों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • डीपीपी 2016 और डीपीएम 2009 की प्रक्रियाओं को संशोधित करना, ताकि प्रक्रियागत अवरोधों को दूर किया जा सके और रक्षा अधिग्रहण में तेजी लाई जा सके।
  • डीपीपी 2016 और डीपीएम 2009 के प्रावधानों को श्रेणीबद्ध और मानकीकृत किया जा सके ताकि उपकरणों के लिए अधिक से अधिक लाइफ साइकिल सपोर्ट किया जा सके।
  • घरेलू उद्योग में अधिक भागीदारी बढ़ाने के लिए नीतियों और प्रक्रियाओं का सरलीकरण।
  • नई अवधारणाओं की जांच और उन्हें शामिल करना, जैसे लाइफ साइकिल कॉस्टिंग, प्रदर्शन आधारित लॉजिस्टिक्स और लीज कॉन्ट्रैक्टिंग।
  • मेक इन इंडिया अभियान को समर्थन देने और भारतीय स्टार्ट अप्स को बढ़ावा देने के प्रावधानों को शामिल करना।

कमिटी से अपनी रिपोर्ट छह महीने में सौंपने की अपेक्षा है।

सरकार ने सिंगल पुरुष सैन्यकर्मियों के लिए बच्चों की देखभाल हेतु अवकाश लाभ को बढ़ाया

रक्षा मंत्रालय ने सिंगल पुरुष सैन्यकर्मियों के लिए बच्चों की देखभाल हेतु अवकाश लाभ को बढ़ाने की मंजूरी दे दी है।[33]  वर्तमान में रक्षा बलों में सिर्फ महिला अधिकारियों को यह अवकाश मिलता है।

40% विकलांग बच्चे की स्थिति में छुट्टी लेने के लिए आयु सीमा 22 वर्ष थी। इस सीमा को हटा दिया गया है। इसके अतिरिक्त एक बार में ऐसा अवकाश लेने की न्यूनतम अवधि को 15 दिन की बजाय पांच दिन कर दिया गया है।

सेना मुख्यालय के पुनर्गठन को मंजूरी

रक्षा मंत्रालय ने थलसेना प्रमुख के अंतर्गत एक सतर्कता प्रकोष्ठ बनाने को मंजूरी दी है।[34] प्रकोष्ठ में तीनों सेनाओं के प्रतिनिधि शामिल होंगे (थलसेना, वायुसेवा और नौसेना, प्रत्येक के कर्नल स्तर के अधिकारी)। वर्तमान में थलसेना प्रमुख के अंतर्गत सतर्कता के लिए कोई सिंगल एजेंसी नहीं है।

इसके अतिरिक्त थलसेना के उप प्रमुख के अंतर्गत एक विशेष मानवाधिकार प्रकोष्ठ भी बनाया जाएगा जोकि मानवाधिकार से संबंधित मामलों पर ध्यान केंद्रित करेगा। इस प्रकोष्ठ के प्रमुख अवर महानिदेशक होंगे (मेजर जनरल रैंक के अधिकारी), जोकि प्रत्यक्ष रूप से थलसेना उप प्रमुख के अंतर्गत होंगे। मानवाधिकार उल्लंघन की किसी भी रिपोर्ट के लिए यह नोडल प्वाइंट होगा।

 

विधि और न्याय

उपभोक्ता संरक्षण बिल, 2019 संसद में पारित

Roshni Sinha (roshni@prsindia.org)

उपभोक्ता संरक्षण बिल, 2019 संसद में पारित हो गया।[35]  बिल उपभोक्ता संरक्षण एक्ट, 1986 का स्थान लेता है। बिल की मुख्य विशेषतओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • उपभोक्ताओं के अधिकार : बिल में उपभोक्ताओं के छह अधिकारों को स्पष्ट किया गया है जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं : (i) ऐसी वस्तुओं और सेवाओं की मार्केटिंग के खिलाफ सुरक्षा जो जीवन और संपत्ति के लिए जोखिमपरक हैं, (ii) वस्तुओं या सेवाओं की क्वालिटी, मात्रा, शक्ति, शुद्धता, मानक और मूल्य की जानकारी प्राप्त होना, (iii) प्रतिस्पर्धात्मक मूल्यों पर वस्तु और सेवा उपलब्ध होने का आश्वासन प्राप्त होना, और (iv) अनुचित या प्रतिबंधित व्यापार की स्थिति में मुआवजे की मांग करना।
  • केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण अथॉरिटी : केंद्र सरकार उपभोक्ताओं के अधिकारों को बढ़ावा देने, उनका संरक्षण करने और उन्हें लागू करने के लिए केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण अथॉरिटी (सीसीपीए) का गठन करेगी। यह अथॉरिटी उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन, अनुचित व्यापार और भ्रामक विज्ञापनों से संबंधित मामलों को रेगुलेट करेगी।
  • भ्रामक विज्ञापनों के लिए जुर्माना : सीसीपीए झूठे या भ्रामक विज्ञापन के लिए मैन्यूफैक्चरर या एन्डोर्सर पर 10 लाख रुपए तक का जुर्माना लगा सकती है। दोबारा अपराध की स्थिति में यह जुर्माना 50 लाख रुपए तक बढ़ सकता है। मैन्यूफैक्चरर को दो वर्ष तक की कैद की सजा भी हो सकती है जो हर बार अपराध करने पर पांच वर्ष तक बढ़ सकती है।
  • उपभोक्ता विवाद निवारण कमीशन (सीडीआरसी) : जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर उपभोक्ता विवाद निवारण कमीशनों (सीडीआरसीज़) का गठन किया जाएगा। एक उपभोक्ता निम्नलिखित के संबंध में आयोग में शिकायत दर्ज करा सकता है : (i) अनुचित और प्रतिबंधित तरीके का व्यापार, (ii) दोषपूर्ण वस्तु या सेवाएं, (iii) अधिक कीमत वसूलना या गलत तरीके से कीमत वसूलना, और (iv) ऐसी वस्तुओं या सेवाओं को बिक्री के लिए पेश करना, जो जीवन और सुरक्षा के लिए जोखिमपरक हो सकती हैं। अनुचित कॉन्ट्रैक्ट के खिलाफ शिकायत केवल राज्य और राष्ट्रीय सीडीआरसीज़ में फाइल की जा सकती हैं। जिला सीडीआरसी के आदेश के खिलाफ राज्य सीडीआरसी में सुनवाई की जाएगी। राज्य सीडीआरसी के आदेश के खिलाफ राष्ट्रीय सीडीआरसी में सुनवाई की जाएगी। अंतिम अपील का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को होगा।
  • उत्पाद की जिम्मेदारी (प्रोडक्ट लायबिलिटी): उत्पाद की जिम्मेदारी का अर्थ है, उत्पाद के मैन्यूफैक्चरर, सर्विस प्रोवाइडर या विक्रेता की जिम्मेदारी। यह उसकी जिम्मेदारी है कि वह किसी खराब वस्तु या दोषी सेवा के कारण होने वाले नुकसान या चोट के लिए उपभोक्ता को मुआवजा दे। मुआवजे का दावा करने के लिए उपभोक्ता को बिल में स्पष्ट खराबी या दोष से जुड़ी कम से कम एक शर्त को साबित करना होगा। इसमें किसी उत्पाद की मैन्यूफैक्चरिंग या डिजाइन में दोष, या उपभोक्ता को सेवा प्रदान करने में लापरवाही शामिल है।

पीआरएस बिल के सारांश के लिए कृपया देखें

उपभोक्ता मामलों के विभाग ने ई-कॉमर्स से संबंधित मसौदा दिशानिर्देश जारी किए

Suyash Tiwari (suyash@prsindia.org)

उपभोक्ता मामलों के विभाग ने उपभोक्ता संरक्षण एक्ट, 1986 के अंतर्गत उपभोक्ताओं के संरक्षण के लिए ई-कॉमर्स पर मसौदा दिशानिर्देश जारी किए हैं।[36] अनुचित व्यापार को रोकने और ई-कॉमर्स में उपभोक्ताओं के संरक्षण के लिए मसौदा दिशानिर्देश मॉडल फ्रेमवर्क के रूप में मसौदा दिशानिर्देशों को जारी किया गया है। ये दिशानिर्देश बी टू सी (बिजनेस टू कंज्यूमर) ई-कॉमर्स व्यापार पर लागू होंगे। मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • व्यापार करने की स्थितियां: ई-कॉमर्स की संस्थाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे दिशानिर्देशों की अधिसूचना की तारीख से 90 दिनों के भीतर कुछ शर्तों का पालन करें। इन शर्तों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) संस्था को भारत में कानूनी संस्था के रूप में पंजीकृत होना चाहिए, (ii) प्रमोटरों या मुख्य प्रबंधकों को पिछले पांच वर्षों के दौरान किसी अपराध में दोषी नहीं होना चाहिए, और (iii) विक्रेताओं के जरूरी विवरण, जैसे उनके व्यापार का वैध नाम, उनके द्वारा बेचे जाने वाले उत्पाद और उनसे संपर्क की जानकारी वेबसाइट पर प्रदर्शित होनी चाहिए।
  • ई-कॉमर्स संस्थाओं की जिम्मेदारियां: ई-कॉमर्स संस्थाओं को निम्नलिखित नहीं करना चाहिए: (i) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मूल्य को प्रभावित नहीं करना चाहिए और एक लेवल प्लेइंग फील्ड बरकरार रखना चाहिए, (ii) अनुचित या भ्रामक तरीके से कार्य नहीं करना चाहिए जोकि उपभोक्ताओं के फैसलों को प्रभावित कर दें, और (iii) स्वयं को उपभोक्ता के तौर पर नहीं दिखाना चाहिए और वस्तुओं और सेवाओं की क्वालिटी और विशेषताओं का गलत विवरण या समीक्षा पोस्ट नहीं करनी चाहिए।
  • ई-कॉमर्स संस्थाओं की अन्य जिम्मेदारियों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) उनमें और विक्रेताओं के बीच अनुबंध की शर्तों को प्रदर्शित करना, (ii) यह सुनिश्चित करना कि वस्तुओं और सेवाओं के विज्ञापन उनकी वास्तविक विशेषताओं से मेल खाते हों, और (iii) यह सुनिश्चित करना कि ग्राहकों की व्यक्तिगत चिन्हित करने योग्य सूचना संरक्षित है और उसका प्रयोग में कानूनी प्रावधानों का अनुपालन किया जाता है।
  • विक्रेताओं की जिम्मेदारियां: विक्रेताओं (जो ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स का विज्ञापन करते हैं या उसे बचते हैं) की जिम्मेदारियों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) उत्पादों की बिक्री से जुड़े सभी शुल्कों, जैसे डिलिवरी चार्ज और टैक्स, को प्रदर्शित करना, (ii) शिपिंग, एक्सचेंज, रिटर्न, रीफंड और वारंटी से संबंधित नीतियों को अपफ्रंट करना, और (iii) डिस्प्ले और उत्पादों की बिक्री के सांविधिक प्रावधानों का अनुपालन।
  • शिकायत निवारण: ई-कॉमर्स संस्थाओं से निम्नलिखित अपेक्षित है: (i) शिकायत निवारण प्रक्रिया और शिकायत निवारण अधिकारी के विवरणों को वेबसाइट पर पब्लिश करना, (ii) फोन, ईमेल और वेबसाइट के जरिए शिकायत दर्ज कराने की सुविधा प्रदान करना, (iii) एक महीने में शिकायतों का निवारण करना, और (iv) सरकार की शिकायत निवारण प्रक्रिया (नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन) के कन्वर्जेंस को आसान बनाना।

मसौदा दिशानिर्देश पर 16 सितंबर, 2019 तक टिप्पणियां आमंत्रित हैं।

आर्बिट्रेशन और कंसीलिएशन (संशोधन) बिल, 2019 संसद में पारित

Roshni Sinha (roshni@prsindia.org)

आर्बिट्रेशन और कंसीलिएशन (संशोधन) बिल, 2019 संसद में पारित हो गया।[37] यह बिल आर्बिट्रेशन और कंसीलिएशन एक्ट, 1996 में संशोधन करता है। एक्ट में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन से संबंधित प्रावधान हैं और यह सुलह प्रक्रिया को संचालित करने से संबंधित कानून को स्पष्ट करता है। बिल की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं :

  • भारतीय आर्बिट्रेशन परिषद: बिल आर्बिट्रेशन, मीडिएशन, कंसीलिएशन और विवाद निपटाने के दूसरे तरीकों को बढ़ावा देने के लिए एक स्वतंत्र संस्था भारतीय आर्बिट्रेशन परिषद (एसीआई) की स्थापना करने का प्रयास करता है। परिषद के कार्यों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) आर्बिट्रल संस्थानों की ग्रेडिंग के लिए नीतियां बनाना और आर्बिट्रेटर्स को एक्रेडेट करने संबंधी फैसले लेना, (ii) विवाद निवारण के सभी वैकल्पिक मामलों में एक समान पेशेवर मानदंडों की स्थापना, संचालन और रखरखाव के लिए नीतियां बनाना, और (iii) भारत और विदेशों में आर्बिट्रेशन से संबंधित फैसलों की डिपोसिटरी (भंडार) का रखरखाव करना।
  • आर्बिट्रेटर्स की नियुक्ति: 1996 के एक्ट के अंतर्गत विभिन्न पक्ष आर्बिट्रेटर्स को नियुक्त करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। किसी नियुक्ति पर मतभेद होने पर वे पक्ष सर्वोच्च न्यायालय या संबंधित उच्च न्यायालय, या उस न्यायालय द्वारा नामित व्यक्ति या संस्थान से आर्बिट्रेटर की नियुक्ति का आग्रह कर सकते हैं।
  • बिल के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय आर्बिट्रलर संस्थानों को नामित कर सकते हैं। आर्बिट्रेटर्स की नियुक्ति के लिए विभिन्न पक्ष उनसे संपर्क कर सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय कमर्शियल आर्बिट्रेशन के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नामित संस्थान नियुक्तियां करेगा। आर्बिट्रेशन के घरेलू मामलों में संबंधित उच्च न्यायालय द्वारा नामित संस्थानों द्वारा नियुक्तियां की जाएंगी। अगर कोई आर्बिट्रेशन संस्थान मौजूद न हों तो संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश आर्बिट्रेटर्स का एक पैनल बना सकते हैं जोकि आर्बिट्रेशन संस्थानों का काम करेंगे।
  • समय सीमा में राहत: 1996 के एक्ट के अंतर्गत आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनलों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे सभी कार्यवाहियों पर 12 महीने के अंदर फैसला ले लें। बिल ने अंतरराष्ट्रीय कमर्शियल आर्बिट्रेशंस में इस समय सीमा को हटा दिया है। बिल यह भी कहता है कि ट्रिब्यूनलों को अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन के मामलों को 12 महीने के भीतर निपटाने का प्रयास करना चाहिए।

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गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) संशोधन बिल, 2019 संसद में पारित

Roshni Sinha (roshni@prsindia.org)

गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) संशोधन बिल, 2019 संसद में पारित कर दिया गया।[38] यह बिल गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) एक्ट, 1967 में संशोधन करता है। एक्ट आतंकवादी गतिविधियों को काबू में करने के लिए विशेष प्रक्रियाओं का प्रावधान करता है। बिल के मुख्य प्रावधानों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • आतंकवाद कौन फैला सकता है: एक्ट के अंतर्गत केंद्र सरकार किसी संगठन को आतंकवादी संगठन निर्दिष्ट कर सकती है, अगर वह: (i) आतंकवादी कार्रवाई करता है या उसमें भाग लेता है, (ii) आतंकवादी घटना को अंजाम देने की तैयारी करता है, (iii) आतंकवाद को बढ़ावा देता है, या (iv) अन्यथा आतंकवादी गतिविधि में शामिल है। बिल सरकार को अधिकार देता है कि वह समान आधार पर व्यक्तियों को भी आतंकवादी निर्दिष्ट कर सकती है।
  • संपत्ति की जब्ती के लिए मंजूरी: एक्ट के अंतर्गत जांच अधिकारी को उन संपत्तियों को जब्त करने से पहले पुलिस महानिदेशालय से मंजूरी लेनी होती है, जो आतंकवाद से संबंधित हो सकती हैं। बिल के अनुसार, अगर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के अधिकारी द्वारा जांच की जा रही है तो ऐसी संपत्ति की जब्ती से पहले एनआईए के महानिदेशक से पूर्व मंजूरी लेनी होगी।
  • जांच: एक्ट के अंतर्गत मामलों की जांच पुलिस डेपुटी सुपरिटेंडेंट या असिस्टेंट कमीशनर या उससे ऊंचे पद के अधिकारियों द्वारा की जाएगी। बिल अतिरिक्त रूप से मामलों की जांच के लिए एनआईए के इंस्पेक्टर या उससे ऊंचे पद के अधिकारियों को अधिकृत करता है।
  • संधियों की अनुसूची में प्रविष्टि: एक्ट के अंतर्गत नौ संधियां हैं, जैसे कन्वेंशन फॉर द सप्रेशन ऑफ टेरिरिस्ट बॉम्बिंग्स (1997) और कन्वेंशन अगेंस्ट टेकिंग ऑफ होस्टेजेज़ (1979)। इन संधियों में कुछ गतिविधियां प्रतिबंधित हैं। बिल के अनुसार, इन गतिविधियों को आतंकवादी गतिविधि माना जाएगा। बिल इस सूची में एक और संधि को शामिल करता है। यह संधि है, द इंटरनेशनल कन्वेंशन फॉर सप्रेशन ऑफ एक्ट्स ऑफ न्यूक्लियर टेरिरिज्म (2005)।

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यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (संशोधन) बिल, 2019 संसद में पारित

Gayatri Mann (gayatri@prsindia.org)

यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (संशोधन) बिल, 2019 को संसद में पेश और पारित किया गया।[39]  बिल यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण एक्ट, 2012 में संशोधन करता है। यह एक्ट यौन शोषण, यौन उत्पीड़न और पोर्नोग्राफी जैसे अपराधों से बच्चों के संरक्षण का प्रयास करता है।

  • पेनेट्रेटिव यौन हमला: एक्ट के अंतर्गत अगर किसी व्यक्ति ने (i) किसी बच्चे के वेजाइना, मुंह, यूरेथ्रा या एनस में अपने पेनिस को डाला (पेनेट्रेट किया) है, या (ii) वह बच्चे से ऐसा करवाता है, या (iii) बच्चे के शरीर में कोई वस्तु डालता है तो उसे ‘पेनेट्रेटिव यौन हमला’ कहा जाता है। ऐसे अपराधों के लिए सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा भुगतनी पड़ सकती है और जुर्माना भरना पड़ सकता है। बिल इसमें न्यूनतम सजा को सात से दस वर्ष तक करता है। इसके अतिरिक्त बिल कहता है कि अगर कोई व्यक्ति 16 वर्ष से कम आयु के बच्चे पर पेनेट्रेटिव यौन हमला करता है तो उसे 20 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा भुगतनी पड़ सकती है और जुर्माना भरना पड़ सकता है।
  • गंभीर पेनेट्रेटिव यौन हमला: एक्ट कुछ एक्शंस को ‘गंभीर पेनेट्रेटिव यौन हमला’ कहता है। इसमें ऐसे मामले शामिल हैं जब पुलिस अधिकारी, सशस्त्र सेनाओं के सदस्य, या पब्लिक सर्वेंट बच्चे पर पेनेट्रेटिव यौन हमला करें। बिल गंभीर पेनेट्रेटिव यौन हमले की परिभाषा में दो आधार और जोड़ता है। इनमें (i) हमले के कारण बच्चे की मौत, और (ii) प्राकृतिक आपदा के दौरान किया गया हमला या हिंसा की अन्य समान स्थितियां शामिल है।
  • वर्तमान में गंभीर पेनेट्रेटिव यौन हमले की सजा 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास और जुर्माना है। बिल न्यूनतम कारवास को 10 वर्ष से 20 वर्ष करता है और अधिकतम सजा मृत्यु दंड है।
  • गंभीर यौन हमला: एक्ट के अंतर्गत ‘यौन हमले’ में वे एक्शंस शामिल हैं, जिनमें कोई व्यक्ति पेनेट्रेशन के बिना किसी बच्चे के वेजाइना, पेनिस, एनस या ब्रेस्ट को छूता है। ‘गंभीर यौन हमले’ में ऐसे मामले शामिल हैं, जिनमें अपराधी बच्चे का संबंधी होता है या जिनमें बच्चे के सेक्सुअल ऑर्गन्स घायल हो जाते हैं, इत्यादि। बिल गंभीर यौन हमले में दो स्थितियों को और शामिल करता है। इनमें (i) प्राकृतिक आपदा के दौरान किया गया हमला, और (ii) जल्दी यौन परिपक्वता लाने के लिए बच्चे को हारमोन या कोई दूसरा रासायनिक पदार्थ देना या दिलवाना शामिल है।

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सर्वोच्च न्यायालय (जजों की संख्या) संशोधन बिल, 2019 संसद में पारित

Roshni Sinha (roshni@prsindia.org)

सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन बिल, 2019 संसद में पारित कर दिया गया।[40]  बिल सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) एक्ट, 1956 में संशोधन करता है। एक्ट सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की अधिकतम संख्या 30 निर्धारित करता है (भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर)। बिल इस संख्या को 30 से 33 करता है।

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रिपीलिंग और संशोधन बिल, 2019 संसद में पारित

Roshni Sinha (roshni@prsindia.org)

रिपीलिंग और संशोधन बिल, 2019 संसद में पारित हो गया।[41]  बिल 68 एक्ट्स को पूरी तरह से रद्द करता है और दो अन्य कानूनों में संशोधन करता है। बिल की मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • कुछ कानूनों को पूरी तरह से रद्द करना: बिल पहली अनुसूची में सूचीबद्ध 58 कानूनों को रद्द करता है। इनमें 12 प्रिंसिपल एक्ट और 46 संशोधन एक्ट शामिल हैं। रिपील होने वाले प्रिंसिपल एक्ट्स में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) बीड़ी श्रमिक कल्याण निधि, 1976, और (ii) म्यूनिसिपल टैक्सेशन एक्ट, 1881। उल्लेखनीय है कि संशोधन एक्ट्स को रिपील करने से उन पर बहुत अधिक असर नहीं होता क्योंकि संशोधन एक्ट पहले ही प्रिंसिपल एक्टस में शामिल होते हैं।
  • कुछ कानूनों में संशोधन: बिल दो एक्ट्स में मामूली संशोधन करता है। इसमें कुछ शब्दों को बदला गया है। ये एक्ट हैं: (i) इनकम टैक्स एक्ट, 1961, और (ii) इंडियन इंस्टीट्यूट्स ऑफ मैनेजमेंट एक्ट, 2017।

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ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) बिल, 2019 लोकसभा में पारित

Roshni Sinha (roshni@prsindia.org)

ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) बिल, 2019 लोकसभा में पारित और राज्यसभा में लंबित है।[42] बिल की मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषाः बिल कहता है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति वह व्यक्ति है जिसका लिंग जन्म के समय नियत लिंग से मेल नहीं खाता। इसमें ट्रांसमेन (परा-पुरुष) और ट्रांस-विमेन (परा-स्त्री), इंटरसेक्स भिन्नताओं और जेंडर क्वीर आते हैं। इसमें सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले व्यक्ति, जैसे किन्नर, हिंजड़ा, भी शामिल हैं। इंटरसेक्स भिन्नताओं वाले व्यक्तियों की परिभाषा में ऐसे लोग शामिल हैं जो जन्म के समय अपनी मुख्य यौन विशेषताओं, बाहरी जननांगों, क्रोमोसम्स या हारमोन्स में पुरुष या महिला शरीर के आदर्श मानकों से भिन्नता का प्रदर्शन करते हैं।
  • भेदभाव पर प्रतिबंध: बिल ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से भेदभाव पर प्रतिबंध लगाता है जिसमें निम्नलिखित के संबंध में सेवा प्रदान करने से इनकार करना या अनुचित व्यवहार करना शामिल हैः (i) शिक्षा, (ii) रोजगार, (iii) स्वास्थ्य सेवा, (iv) सार्वजनिक स्तर पर उपलब्ध उत्पादों, सुविधाओं और अवसरों तक पहुंच और उसका उपभोग, (v) कहीं आने-जाने (मूवमेंट) का अधिकार (vi) किसी प्रॉपर्टी में निवास करने, उसे किराये पर लेने, स्वामित्व हासिल करने या अन्यथा उसे कब्जे में लेने का अधिकार, (vii) सार्वजनिक या निजी पद को ग्रहण करने का अवसर, और (viii) किसी सरकारी या निजी प्रतिष्ठान तक पहुंच जिसकी देखभाल या निगरानी किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति द्वारा की जाती है।
  • स्वास्थ्य सेवा: सरकार ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए कदम उठाएगी जिसमें अलग एचआईवी सर्विलेंस सेंटर, सेक्स रीअसाइनमेंट सर्जरी इत्यादि शामिल है। सरकार ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के स्वास्थ्य से जुड़े मामलों को संबोधित करने के लिए चिकित्सा पाठ्यक्रम की समीक्षा करेगी और उन्हें समग्र चिकित्सा बीमा योजनाएं प्रदान करेगी।
  • ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की आइडेंटिटी से जुड़ा सर्टिफिकेट: एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति जिला मेजिस्ट्रेट को आवेदन कर सकता है कि ट्रांसजेंडर के रूप में उसकी आइडेंटिटी से जुड़ा सर्टिफिकेट जारी किया जाए। संशोधित सर्टिफिकेट तभी हासिल किया जा सकता है, अगर उस व्यक्ति ने पुरुष या महिला के तौर पर अपना लिंग परिवर्तन करने के लिए सर्जरी कराई है।

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एनडीएमसी एक्ट के अंतर्गत अपीलीय अथॉरिटी का गठन

Roshni Sinha (roshni@prsindia.org)

केंद्र सरकार ने नई दिल्ली म्यूनिसिपल एक्ट, 1994 के अंतर्गत अपीलों पर फैसला लेने हेतु अपीलीय ट्रिब्यूनल की स्थापना की है।[43]  एक्ट नई दिल्ली म्यूनिसिपल काउंसिल की स्थापना और उसे गवर्न करता है।[44]  एक्ट के अंतर्गत काउंसिल विभिन्न मामलों पर आदेश जारी कर सकते हैं जिनमें ले आउट प्लान्स को मंजूरी देना, या काम रोकना या काम करना शामिल है। काउंसिल के कुछ फैसले (जैसे मंजूरी को रद्द करना, या किसी इमारत को तोड़ना) के खिलाफ अपीलीय अथॉरिटी में अपील की जा सकती है।

 

श्रम

कोड ऑन वेजेज़, 2019 संसद में पारित

Gayatri Mann (gayatri@prsindia.org)

कोड ऑन वेजेज़, 2019 संसद में पारित हो गया।[45]  यह कोड उन सभी रोजगार में वेतन और बोनस भुगतान को रेगुलेट करता है जहां कोई उद्योग चलाया जाता है, व्यापार किया जाता है या मैन्यूफैक्चरिंग की जाती है। कोड निम्नलिखित चार कानूनों का स्थान लेता है : (i) वेतन का भुगतान एक्ट, 1936, (ii) न्यूनतम वेतन एक्ट, 1948, (iii) बोनस का भुगतान एक्ट, 1965, और (iv) समान पारिश्रमिक एक्ट, 1976।

  • कवरेज: कोड सभी कर्मचारियों पर लागू होता है। केंद्र सरकार रेलवे, खनन और तेल क्षेत्रों इत्यादि से जुड़े रोजगार के वेतन संबंधी फैसले लेगी। राज्य सरकारें अन्य रोजगारों के लिए फैसले लेंगी।
  • फ्लोर वेज: कोड के अनुसार, केंद्र सरकार श्रमिकों के जीवन स्तर को ध्यान में रखते हुए एक फ्लोर वेज नियत करेगी। इसके अतिरिक्त वह विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के लिए भिन्न-भिन्न फ्लोर वेज तय कर सकती है।
  • मिनिमम वेज का निर्धारण: कोड नियोक्ताओं को मिनिमम वेज से कम वेतन चुकाने से प्रतिबंधित करता है। मिनिमम वेज को केंद्र या राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाएगा। यह समय, या उत्पादित होने वाले पीस की संख्या इत्यादि पर आधारित होगा। केंद्र या राज्य सरकारें प्रत्येक पांच वर्षों में मिनिमम वेज की समीक्षा या उसमें संशोधन करेंगी। मिनिमम वेज निर्धारित करने के दौरान केंद्र या राज्य सरकारें निम्नलिखित कारकों पर ध्यान देंगी: (i) श्रमिकों की दक्षता और (ii) कार्य की कठिनाई।
  • सलाहकार बोर्ड: केंद्र और राज्य सरकारें अपने सलाहकार बोर्डों का गठन करेंगी। बोर्ड निम्नलिखित पहलुओं पर संबंधित सरकारों को सलाह देगा : (i) न्यूनतम वेतन का निर्धारण, और (ii) महिलाओं के लिए रोजगार अवसरों को बढ़ाना।

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मसौदा कर्मचारी प्रॉविडेंट फंड्स और विविध प्रावधान (संशोधन) बिल, 2019 जारी

Anya Bharat Ram (anya@prsindia.org)

श्रम और रोजगार मंत्रालय ने कर्मचारी प्रॉविडेंट फंड्स और विविध प्रावधान (संशोधन) बिल, 2019 का मसौदा जारी किया।[46] बिल कर्मचारी प्रॉविडेंट फंड्स और विविध प्रावधान एक्ट, 1952 में संशोधन करता है। एक्ट फैक्टरियों और दूसरे इस्टैबलिशमेंट्स के कर्मचारियों के लिए पेंशन फंड का प्रावधान करता है। मुख्य सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • बिल एक्ट में बेसिक वेजेज़ की परिभाषा में परिवर्तन करता है ताकि यह परिभाषा संसद में 2 अगस्त, 2019 को पारित कोड ऑन वेजेज़ के अनुरूप हो जाए। एक्ट में वेजेज़ में कर्मचारियों को चुकाए जाने वाले सभी मुआवजे शामिल हैं लेकिन इसमें निम्नलिखित शामिल नहीं हैं: (i) फूड कंसेशंस, (ii) डियरनेस अलाउंस, और (iii) नियोक्ता द्वारा दिए गए उपहार। बिल बेसिक पे, डियरनेस अलाउंस और रीटेनिंग अलाउंस को शामिल करने के लिए वेजेज़ की परिभाषा में परिवर्तन करता है। हालांकि इसमें निम्नलिखित शामिल नहीं हैं:(i) बोनस, (ii) आवास, (iii) कर्मचारी के पेंशन योगदान, (iv) कनवेयंस अलाउंस, (v) ओवरटाइम अलाउंस, और (vi) कमीशन इत्यादि। बिल यह शर्त रखता है कि अगर वेतन के भीतर शामिल न होने वाले भुगतानों की राशि नियोक्ता द्वारा दिए गए 50% पारिश्रमिक अधिक होती है तो उसे वेतन में शामिल किया जाएगा।  
  • वर्तमान में किसी इस्टैबलिशमेंट में एक्ट की एप्लीकेबिलिटी से संबंधित जांच शुरू करने और एक्ट के अंतर्गत किसी कर्मचारी की देय राशि को निर्धारित करने की कोई समय सीमा नहीं है। बिल जांच शुरू करने के लिए 5 वर्ष की समय सीमा प्रस्तावित करता है। इसके अतिरिक्त यह दो वर्ष की समय सीमा तय करता है जिसमें जांच समाप्त हो जानी चाहिए।
  • बिल कुछ जुर्मानों को दस गुना तक बढ़ाता है। उदाहरण के लिए फिलहाल बार-बार अपराध करने पर 25,000 रुपए तक का जुर्माना है। बिल इसे 2.5 लाख रुपए करता है। इसके अतिरिक्त बिल सुझाव देता है कि अपराधों को कंपाउंडेबल बनाया जाना चाहिए जिसमें कंपनियों के अपराध भी शामिल हैं।
  • वर्तमान में कर्मचारी प्रॉविडेंट में योगदान की दर कर्मचारी और नियोक्ता के लिए 10% से 12% है। इसके अतिरिक्त संबंधित सरकार एक विशिष्ट् समय अवधि और एक निश्चित सीमा तक मासिक आय वाले कर्मचारियों के लिए योगदान की विभिन्न दरें विनिर्दिष्ट कर सकती है। नियोक्ताओं के योगदान में कोई परिवर्तन प्रस्तावित नहीं किया गया।
  • बिल प्रस्ताव रखता है कि कर्मचारी प्रॉविडेंट फंड (ईपीएफ) सब्सक्राइबर एक्ट के अंतर्गत लाभ हासिल करने के लिए राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) को भी चुन सकते हैं। एनपीएस पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी द्वारा रेगुलेटेड स्वैच्छिक पेंशन योजना है। इसके अतिरिक्त बिल प्रस्तावित करता है कि एनपीएस सबस्क्राइबर किसी भी समय ईपीएफ से वापस होने का विकल्प भी चुन सकता है।
  • बिल एक्ट में संशोधन करता है और उन इस्टैबलिशमेंट्स को छूट देने की अनुमति देता है जिन्होंने छूट के लिए आवेदन दिया है और जो संबंधित अथॉरिटी द्वारा निर्धारित मानदंडों पर खरे उतरते हैं।

 

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण

Gayatri Mann (gayatri@prsindia.org)

राष्ट्रीय मेडिकल कमीशन बिल, 2019 संसद में पारित

राष्ट्रीय मेडिकल कमीशन बिल, 2019 को संसद में पारित कर दिया गया।[47]  बिल भारतीय मेडिकल काउंसिल एक्ट, 1956 को निरस्त करने और ऐसी मेडिकल शिक्षा प्रणाली प्रदान करने का प्रयास करता है, जो निम्नलिखित सुनिश्चित करती हों : (i) पर्याप्त और उच्च क्वालिटी वाले मेडिकल प्रोफेशनल्स की उपलब्धता, (ii) मेडिकल प्रोफेशनल्स द्वारा नवीनतम मेडिकल अनुसंधानों का उपयोग,  (iii) मेडिकल संस्थानों का नियत समय पर आकलन और (iv) एक प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली। बिल की मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं :

  • राष्ट्रीय मेडिकल कमीशन का गठन: बिल राष्ट्रीय मेडिकल कमीशन (एनएमसी) का गठन करता है। बिल के पारित होने के तीन वर्षों के भीतर राज्य सरकारों को राज्य स्तर पर राज्य मेडिकल काउंसिलों का गठन करना होगा। एनएमसी में 33 सदस्य होंगे जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा।
  • एनएमसी के सदस्यों में निम्नलिखित शामिल होंगे: (i) चेयरपर्सन (जिसे मेडिकल प्रैक्टीशनर होना चाहिए), (ii) अंडर-ग्रैजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड, पोस्ट-गैजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड के प्रेज़िडेंट, (iii) स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक, (v) भारतीय मेडिकल रिसर्च काउंसिल के महानिदेशक, और (vi) नौ सदस्य (पार्ट टाइम), जिन्हें बिल के अंतर्गत निर्धारित क्षेत्रों से पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टीशनर्स द्वारा स्वयं में से दो वर्षों के लिए चुना जाएगा।
  • राष्ट्रीय मेडिकल कमीशन के कार्य: एनएमसी के कार्यों में निम्नलिखित शामिल हैं : (i) मेडिकल संस्थानों और मेडिकल प्रोफेशनल्स को रेगुलेट करने के लिए नीतियां बनाना, (ii) स्वास्थ्य सेवा से संबंधित मानव संसाधनों और इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत का आकलन करना, (iii) यह सुनिश्चित करना कि राज्य मेडिकल काउंसिल बिल में दिए गए रेगुलेशनों का पालन कर रही हैं अथवा नहीं, (iv) बिल के अंतर्गत रेगुलेट होने वाले प्राइवेट मेडिकल संस्थानों और मानद (डीम्ड) विश्वविद्यालयों की अधिकतम 50% सीटों की फीस तय करने के लिए दिशानिर्देश बनाना।
  • स्वायत्त (ऑटोनॉमस) बोर्ड्स: बिल एनएमसी की निगरानी में स्वायत्त बोर्ड्स का गठन करता है। प्रत्येक स्वायत्त बोर्ड में प्रेज़िडेंट और चार सदस्य होंगे, जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा। ये बोर्ड हैं : (i) अंडर-ग्रैजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड और पोस्ट-गैजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड, (ii) मेडिकल एसेसमेंट और रेटिंग बोर्ड, और (iii) एथिक्स और मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड।

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सेरोगेसी (रेगुलेशन) बिल लोकसभा में पारित

सेरोगेसी (रेगुलेशन) बिल, 2019 को लोकसभा में पारित कर दिया गया और बिल राज्यसभा में लंबित है।[48]  बिल सेरोगेसी को ऐसे कार्य के रूप में पारिभाषित करता है जिसमें कोई महिला किसी इच्छुक दंपत्ति के लिए बच्चे को जन्म देती है और जन्म के बाद उस इच्छुक दंपत्ति को बच्चा सौंप देती है। बिल की मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • सरोगेसी का रेगुलेशन: बिल कमर्शियल सेरोगेसी को प्रतिबंधित करता है लेकिन निस्वार्थ (एलट्रूइस्टिक) सेरोगेसी की अनुमति देता है। निस्वार्थ सेरोगेसी में सेरोगेट माता को गर्भावस्था के दौरान दिए जाने वाले मेडिकल खर्चे और बीमा कवरेज के अतिरिक्त कोई मौद्रिक मुआवजा शामिल नहीं है। कमर्शियल सेरोगेसी में सेरोगेसी या उससे संबंधित प्रक्रियाओं के लिए बुनियादी मेडिकल खर्चे और बीमा कवरेज की सीमा से अधिक मौद्रिक लाभ या पुरस्कार (नकद या किसी वस्तु के रूप में) लेना शामिल है।
  • इच्छुक दंपत्ति के लिए योग्यता का मानदंड : इच्छुक दंपत्ति के पास समुचित अथॉरिटी द्वारा जारी ‘अनिवार्यता का प्रमाणपत्र’ और ‘योग्यता का प्रमाणपत्र’ होना चाहिए। अनिवार्यता का प्रमाणपत्र निम्नलिखित स्थितियां होने पर ही जारी किया जाएगा (i) अगर इच्छुक दंपत्ति में एक या दोनों सदस्यों की प्रामाणित इनफर्टिलिटी का सर्टिफिकेट जिला मेडिकल बोर्ड द्वारा जारी किया गया हो, (ii) मेजिस्ट्रेट की अदालत ने सेरोगेट बच्चे के पेरेंटेज और कस्टडी से संबंधित आदेश जारी किया हो, और (iii) 16 महीने की अवधि के लिए बीमा कवरेज सेरोगेट माता की प्रसव उपरांत की जटिलताओं को कवर करता हो।
  • योग्यता का प्रमाणपत्र इच्छुक दंपत्ति द्वारा निम्नलिखित शर्तें पूरी करने पर ही जारी किया जाएगा : (i) अगर वे भारतीय नागरिक हों और उन्हें विवाह किए हुए कम से कम पांच वर्ष हो गए हों, (ii) अगर उनमें से एक 23 से 50 वर्ष के बीच की महिला (पत्नी) और दूसरा 26 से 55 वर्ष का पुरुष (पति) हो, (iii) उनका कोई जीवित बच्चा (बायोलॉजिकल, गोद लिया हुआ या सेरोगेट) न हो, इसमें ऐसे बच्चे शामिल नहीं हैं जो मानसिक या शारीरिक रूप से विकलांग हैं या जीवन को जोखिम में डालने वाली या प्राणघातक बीमारी से ग्रस्त हैं, और (iv) कोई ऐसी स्थिति जिसे रेगुलेशनों द्वारा निर्धारित किया जा सकता है।
  • सेरोगेट माता के लिए योग्यता का मानदंड : समुचित अथॉरिटी से योग्यता का प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए सेरोगेट माता को निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना चाहिए : (i) उसे इच्छुक दंपत्ति का निकट संबंधी होना चाहिए, (ii) उसे विवाहित होना चाहिए और उसका अपना बच्चा होना चाहिए, (iii) उसे 25 से 35 वर्ष के बीच होना चाहिए, (iv) उसने पहले सेरोगेसी न की हो, और (v) उसके पास सेरोगेसी करने के लिए मेडिकल और मनोवैज्ञानिक फिटनेस का सर्टिफिकेट हो। इसके अतिरिक्त सेरोगेट माता सेरोगेसी के लिए अपने गैमेट्स नहीं दे सकती।

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कैबिनेट ने 75 नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना को मंजूरी दी

केंद्रीय कैबिनेट ने 2021-22 तक 75 नए सरकारी मेडिकल कॉलेजों की स्थापना को मंजूरी दी है।[49] इन मेडिकल कॉलेजों को न्यूनतम 200 बिस्तर वाले जिला अस्पतालों के साथ जोड़ा जाएगा। इस विस्तारीकरण के लिए 24,375 करोड़ रुपए की राशि मंजूर की गई है।

इससे पूर्व सरकार ने दो चरणों में 82 नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना को मंजूरी दी थी। इनमें से 39 कॉलेजों ने काम करना भी शुरू कर दिया है।

 

सड़क परिवार और राजमार्ग

Prachee Mishra (prachee@prsindia.org)

मोटर वाहन (संशोधन) बिल, 2019 संसद में पारित

मोटर वाहन (संशोधन) बिल, 2019 संसद में पारित हो गया।[50]  यह बिल सड़क सुरक्षा प्रदान करने के लिए मोटर वाहन एक्ट, 1988 में संशोधन का प्रयास करता है। यह एक्ट मोटर वाहनों से संबंधित लाइसेंस और परमिट देने, मोटर वाहनों के लिए मानक और इन प्रावधानों का उल्लंघन करने के लिए दंड का प्रावधान करता है। बिल वाहनों का रीकॉल करने, दुर्घटना की स्थिति में नेक व्यक्तियों को कानूनी प्रक्रियाओं से छूट देने, टैक्सी एग्रीगेटरों के रेगुलेशन और विभिन्न अपराधों में सजा बढ़ाने से संबंधित प्रावधान हैं। बिल की अन्य मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • सड़क दुर्घटना के पीड़ितों को मुआवजा: बिल में प्रावधान है कि केंद्र सरकार ‘गोल्डन आवर’ (स्वर्णिम घंटे) के दौरान सड़क दुर्घटना के शिकार लोगों का कैशलेस उपचार करने की एक योजना विकसित करेगी। बिल के अनुसार ‘गोल्डन आवर’ घातक चोट के बाद की एक घंटे की समयावधि होती है जब तुरंत मेडिकल देखभाल से मौत को मात देने की संभावना सबसे ज्यादा होती है। केंद्र सरकार थर्ड पार्टी इंश्योरेंस के अंतर्गत मुआवजे का दावा करने वालों को अंतरिम राहत देने के लिए एक योजना भी बना सकती है।
  • अनिवार्य बीमा: बिल में केंद्र सरकार से मोटर वाहन दुर्घटना कोष बनाने की अपेक्षा की गई है। यह कोष भारत में सड़क का प्रयोग करने वाले सभी लोगों को अनिवार्य बीमा कवर प्रदान करेगा। इसे निम्नलिखित स्थितियों के लिए उपयोग किया जाएगा: (i) गोल्डन आवर योजना के अंतर्गत सड़क दुर्घटना के शिकार लोगों का उपचार, (ii) हिट और रन मामलों में मौत का शिकार होने वाले लोगों के प्रतिनिधियों को मुआवजा देना, (iii) हिट और रन मामलों में गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को मुआवजा देना, और (iv) केंद्र सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट किए गए व्यक्तियों को मुआवजा देना। इस कोष में निम्नलिखित के माध्यम से धन जमा कराया जाएगा: (i) उस प्रकृति का भुगतान जिसे केंद्र सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, (ii) केंद्र सरकार द्वारा अनुदान या ऋण, (iii) क्षतिपूर्ति कोष में शेष राशि (हिट और रन मामलों में मुआवजा देने के लिए एक्ट के अंतर्गत गठित मौजूदा कोष), या (iv) केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित अन्य कोई स्रोत।
  • सड़क सुरक्षा बोर्ड: बिल में एक राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड का प्रावधान है जिसे केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचना के जरिए बनाया जाएगा। बोर्ड सड़क सुरक्षा एवं यातायात प्रबंधन के सभी पहलुओं पर केंद्र और राज्य सरकारों को सलाह देगा। इनमें निम्नलिखित से संबंधित सलाह शामिल हैं:: (i) मोटर वाहनों के स्टैंडर्ड, (ii) वाहनों का रजिस्ट्रेशन और लाइसेंसिंग, (iii) सड़क सुरक्षा के मानदंड, और (iv) नए वाहनों की प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देना।

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नागरिक उड्डयन

Prachee Mishra (prachee@prsindia.org)

भारतीय एयरपोर्ट इकोनॉमिक अथॉरिटी (संशोधन) बिल, 2019 संसद में पारित

भारतीय एयरपोर्ट्स इकोनॉमिक रेगुलेटरी अथॉरिटी (संशोधन) बिल, 2019 को संसद में पारित किया गया।[51]  यह बिल भारतीय एयरपोर्ट्स इकोनॉमिक रेगुलेटरी अथॉरिटी एक्ट, 2008 में संशोधन करता है। यह एक्ट भारतीय एयरपोर्ट्स इकोनॉमिक रेगुलेटरी अथॉरिटी (एयरा) की स्थापना करता है। एयरा उन सिविलियन एयरपोर्ट्स की एयरोनॉटिकल सेवाओं के लिए टैरिफ और दूसरे शुल्क को रेगुलेट करता है जिनका वार्षिक ट्रैफिक 15 लाख यात्रियों से अधिक होता है। यह अथॉरिटी इन एयरपोर्ट्स में सेवाओं के प्रदर्शन मानकों का भी निरीक्षण करती है। 

  • मुख्य एयरपोर्ट्स की परिभाषा: एक्ट के अंतर्गत मुख्य एयरपोर्ट्स में ऐसे एयरपोर्ट्स आते हैं जिनका वार्षिक यात्री ट्रैफिक 15 लाख से अधिक होता है या ऐसे एयरपोर्ट्स जिन्हें केंद्र सरकार ने अधिसूचित किया हो। बिल वार्षिक यात्री ट्रैफिक की सीमा को बढ़ाकर 35 लाख से अधिक करता है।
  • एयरा द्वारा टैरिफ तय करना : एक्ट के अंतर्गत एयरा निम्नलिखित निर्धारित करता है : (i) हर पांच वर्षों में विभिन्न एयरपोर्ट्स की एयरोनॉटिकल सेवाओं का टैरिफ, (ii) मुख्य एयरपोर्ट्स की डेवलपमेंट फीस, और (iii) पैसेंजर्स की सर्विस फीस। अथॉरिटी टैरिफ तय करने और टैरिफ संबंधी दूसरे कार्य करने, जिसमें बीच की अवधि में टैरिफ में संशोधन करना शामिल है, के लिए जरूरी सूचनाओं की मांग भी कर सकती है।
  • बिल कहता है कि एयरा निम्नलिखित निर्धारित नहीं करेगी : (i) टैरिफ, (ii) टैरिफ का स्ट्रक्चर, और (iii) कुछ मामलों में डेवलपमेंट फीस। जैसे जब टैरिफ की राशि बिड डॉक्यूमेंट (बोली लगाने वाले दस्तावेज) का हिस्सा हो जिसके आधार पर एयरपोर्ट ऑपरेशन का काम सौंपा गया हो। इन दस्तावेजों में टैरिफ को शामिल करने से पहले कनसेशनिंग अथॉरिटी को एयरा से सलाह लेनी होगी और उस टैरिफ को अधिसूचित करना होगा।

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आवास और शहरी मामले

Prachee Mishra (prachee@prsindia.org)

सार्वजनिक परिसर (अनाधिकृत कब्जा करने वालों की बेदखली) संशोधन बिल, 2019 संसद में पारित

सार्वजनिक परिसर (अनाधिकृत कब्जा करने वालों की बेदखली) संशोधन बिल, 2019 को संसद में पारित कर दिया गया।[52]  बिल सार्वजनिक परिसर (अनाधिकृत कब्जा करने वालों की बेदखली) एक्ट, 1971 में संशोधन करता है। इस एक्ट में कुछ मामलों में सार्वजनिक परिसरों से अनाधिकृत कब्जा करने वालों की बेदखली का प्रावधान है। 

  • निवास स्थान: बिल ‘निवास स्थान पर कब्जा’ को इस प्रकार पारिभाषित करता है कि इसका अर्थ किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक स्थान पर कब्जा किया जाना है जिसे उस कब्जे के लिए अधिकृत किया गया (लाइसेंस दिया गया) हो। यह लाइसेंस किसी निश्चित अवधि के लिए होना चाहिए या उस अवधि के लिए जब तक कि वह व्यक्ति पद पर बना हुआ है। इसके अतिरिक्त केंद्र, राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की सरकार या किसी संवैधानिक अथॉरिटी (जैसे संसदीय सचिवालय, या केंद्र सरकार की कोई संस्था या राज्य सरकार) द्वारा बनाए गए नियम के तहत इस कब्जे की अनुमति होनी चाहिए।
  • बेदखली का नोटिस: बिल निवास स्थान से बेदखली के लिए एक प्रक्रिया बनाने की बात कहता है। बिल में यह अपेक्षा की गई है कि अगर किसी व्यक्ति ने किसी निवास स्थान पर अनाधिकृत कब्जा किया है तो एस्टेट ऑफिसर (केंद्र सरकार का एक अधिकारी) उसे लिखित नोटिस जारी करेगा। नोटिस में उस व्यक्ति से तीन कार्य दिनों के भीतर कारण बताने की अपेक्षा की जाएगी कि उसे बेदखली का आदेश क्यों न दिया जाए। इस लिखित नोटिस को निवास स्थान के विशिष्ट हिस्से पर लगाया जाना चाहिए।
  • बेदखली का आदेश: कारण बताओ पर विचार करने और दूसरी जांच के बाद एस्टेट ऑफिसर बेदखली का आदेश देगा। अगर कोई व्यक्ति आदेश नहीं मानता तो एस्टेट ऑफिसर उसे निवास स्थान से बेदखल कर सकता है और उस स्थान को अपने कब्जे में ले सकता है। इसके लिए एस्टेट ऑफिसर उतनी ताकत का प्रयोग कर सकता है, जितनी जरूरी हो।
  • नुकसान की भरपाई: अगर निवास स्थान में अनाधिकृत कब्जा करने वाला व्यक्ति अदालत के बेदखली के आदेश को चुनौती देता है, तो उसे कब्जे की वजह से हर महीने होने वाले नुकसान की भरपाई करनी होगी

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जल शक्ति

अंतरराष्ट्रीय नदी जल विवाद (संशोधन) बिल, 2019 लोकसभा में पारित

Prachee Mishra (prachee@prsindia.org)

अंतरराज्यीय नदी जल विवाद (संशोधन) बिल, 2019 को लोकसभा में पारित कर दिया गया और बिल राज्यसभा में लंबित है।[53]  बिल अंतरराज्यीय नदी जल विवाद एक्ट, 1956 में संशोधन करता है। एक्ट राज्यों के बीच नदियों और नदी घाटियों से संबंधित विवादों में अधिनिर्णय का प्रावधान करता है। 

  • एक्ट के अंतर्गत राज्य सरकार केंद्र सरकार से आग्रह कर सकती है कि वह अंतरराज्यीय नदी विवाद को अधिनिर्णय के लिए ट्रिब्यूनल को सौंपे। अगर केंद्र सरकार को ऐसा लगता है कि बातचीत से विवाद का निवारण नहीं हो सकता तो वह शिकायत प्राप्त करने के एक साल के अंदर जल विवाद ट्रिब्यूनल स्थापित कर सकती है। बिल इस व्यवस्था को बदलने का प्रयास करता है।
  • विवाद निवारण कमिटी: बिल के अंतर्गत अगर राज्य किसी जल विवाद के संबंध में अनुरोध करता है तो केंद्र सरकार उस विवाद को सौहार्दपूर्ण तरीके से हल करने के लिए विवाद निवारण कमिटी (डीआरसी) की स्थापना कर सकती है। डीआरसी में एक अध्यक्ष और विशेषज्ञ होंगे। विशेषज्ञों को संबंधित क्षेत्रों में कम से कम 15 वर्ष का अनुभव प्राप्त होना चाहिए और उन्हें केंद्र सरकार द्वारा नामित किया जाएगा। कमिटी में उन राज्यों के एक-एक सदस्य होगा (संयुक्त सचिव स्तर का) जो विवाद का पक्ष हैं। इन सदस्यों को भी केंद्र सरकार द्वारा नामित किया जाएगा।
  • डीआरसी एक साल के अंदर विवादों को हल करने का प्रयास करेगी (इस अवधि को छह महीने तक और बढ़ाया जा सकता है) और केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। अगर डीआरसी द्वारा विवाद का निपटारा नहीं होता तो केंद्र सरकार इस मामले को अंतरराज्यीय नदी विवाद ट्रिब्यूनल को भेज सकती है। ऐसा डीआरसी की रिपोर्ट के प्राप्त होने के तीन महीने के अंदर होना चाहिए।
  • ट्रिब्यूनल: केंद्र सरकार जल विवादों पर फैसला देने के लिए अंतरराज्यीय नदी विवाद ट्रिब्यूनल की स्थापना करेगी। इस ट्रिब्यूनल की अनेक खंडपीठ हो सकती हैं। सभी मौजूदा ट्रिब्यूनलों को भंग कर दिया जाएगा और उन ट्रिब्यूनलों में निर्णय लेने के लिए जो मामले लंबित पड़े होंगे, उन्हें नए ट्रिब्यूनल में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।
  • ट्रिब्यूनल की संरचना: ट्रिब्यूनल में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और तीन न्यायिक सदस्य तथा तीन विशेषज्ञ होंगे। उन्हें सिलेक्शन कमिटी की सलाह से केंद्र सरकार द्वारा नामित किया जाएगा। ट्रिब्यूनल की खंडपीठ में एक अध्यक्ष या उपाध्यक्ष, एक न्यायिक सदस्य और एक विशेषज्ञ होंगे।

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बांध सुरक्षा बिल, 2019 लोकसभा में पारित

Prachee Mishra (prachee@prsindia.org)

बांध सुरक्षा बिल, को लोकसभा में पारित किया गया और यह राज्यसभा में लंबित है।[54] बिल देश भर में निर्दिष्ट बांधों की चौकसी, निरीक्षण, परिचालन और रखरखाव संबंधी प्रावधान करता है। बिल इन बांधों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत प्रणाली का भी प्रावधान करता है। बिल की मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • बिल किन बांधों पर लागू होता है: बिल देश के सभी निर्दिष्ट बांधों पर लागू होता है। इन बांधों में निम्नलिखित शामिल हैं : (i) 15 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले, या (ii) 10 से 15 मीटर के बीच की ऊंचाई वाले केवल वही बांध जिनके डिजाइन और स्ट्रक्चर बिल में निर्दिष्ट विशेषताओं वाले हों।
  • राष्ट्रीय बांध सुरक्षा कमिटी: बिल राष्ट्रीय बांध सुरक्षा कमिटी की स्थापना का प्रावधान करता है। कमिटी के कार्यों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) बांध सुरक्षा मानदंडों से संबंधित नीतियां एवं रेगुलेशंस बनाना तथा बांधों में टूट को रोकना, और (ii) बड़े बांधों में टूट के कारणों का विश्लेषण करना।
  • राष्ट्रीय बांध सुरक्षा अथॉरिटी: बिल राष्ट्रीय बांध सुरक्षा अथॉरिटी का प्रावधान करता है। अथॉरिटी के कार्यों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) राष्ट्रीय बांध सुरक्षा कमिटी द्वारा निर्मित नीतियों को लागू करना, और (ii) राज्य बांध सुरक्षा संगठनों (एसडीएसओज़) के बीच, और एसडीएसओ एवं उस राज्य के किसी बांध मालिक के बीच विवादों को सुलझाना।
  • राज्य बांध सुरक्षा संगठन (एसडीएसओ): बिल के अंतर्गत राज्य सरकारों द्वारा राज्य बांध सुरक्षा संगठनों (एसडीएसओज़) की स्थापना की जाएगी। राज्य में स्थित सभी विनिर्दिष्ट बांध उस राज्य के एसडीएसओ के क्षेत्राधिकार में आएंगे। हालांकि कुछ मामलों में राष्ट्रीय बांध सुरक्षा अथॉरिटी एसडीएसओ के रूप में कार्य करेगी। इन मामलों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) अगर बांध पर किसी एक राज्य का स्वामित्व है लेकिन वह दूसरे राज्य में स्थित है, (ii) अनेक राज्यों में फैला हुआ है, या (iii) उस पर केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम का स्वामित्व है। एसडीएसओज़ के कार्यों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) बांधों की निरंतर चौकसी एवं निरीक्षण करना और उनके परिचालन एवं रखरखाव पर निगरानी रखना, (ii) सभी बांधों का डेटाबेस रखना, और (iii) बांध मालिकों को सुरक्षा संबंधी सुझाव देना।
  • राज्य बांध सुरक्षा कमिटी: बिल राज्य सरकारों द्वारा राज्य बांध सुरक्षा कमिटी के गठन का प्रावधान करता है। कमिटी के कार्यों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) एसडीएसओ के कार्यों की समीक्षा करना, (ii) बांध की सुरक्षा जांच के आदेश देना, (iii) अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम, दोनों तरह के बांधों के संभावित प्रभावों का आकलन करना।
  • बांध मालिकों की बाध्यताएं: बिल में बांध मालिकों से यह अपेक्षा की गई है कि वे प्रत्येक बांध के लिए एक सुरक्षा इकाई बनाएंगे। यह इकाई निम्नलिखित स्थितियों में बांधों का निरीक्षण करेगी: (i) बारिश के मौसम से पहले और बाद में, और (ii) हर भूकंप, बाढ़ या दूसरी प्राकृतिक आपदा या संकट की आशंका के दौरान और उसके बाद।

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नीति आयोग ने कंपोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स 2019 को जारी किया

Prachi Kaur (prachi@prsindia.org)

नीति आयोग ने जल प्रबंधन घटकों पर राज्यों के प्रदर्शन की जानकारी देने हेतु कंपोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स 2019 के दूसरे संस्करण को तैयार किया है।[55] अपनी रिपोर्ट में उसने कहा है कि वर्तमान में लगभग 82 करोड़ लोग पानी का संकट झेल रहे हैं और पर्याप्त रूप से सुरक्षित जल उपलब्ध न होने के कारण प्रत्येक वर्ष लगभग दो लाख लोग मौत का शिकार हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त 2030 तक देश में जल की मांग उपलब्ध आपूर्ति से दोगुनी होने का अनुमान है जिसका अर्थ पानी का गंभीर संकट है जिससे देश की जीडीपी को 6% का नुकसान होगा।

कंपोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स के जरिए नीति आयोग ने: (i) उन राज्यों को चिन्हित किया है जो उच्च या अल्प प्रदर्शक हैं, और (ii) उन क्षेत्रों की पहचान की है जिनमें अधिक निवेश और संलग्नता की जरूरत है। सूचकांक का उद्देश्य जल प्रयोग और संरक्षण के क्षेत्र में विभिन्न राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ाना और जल हेतु राष्ट्रीय डेटा प्रबंधन प्लेटफॉर्म को विकसित करना है। रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्षों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • 2030 तक भारत की जनसंख्या 5 बिलियन से अधिक हो जाएगी। इस बढ़ती आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा का लक्ष्य हासिल करना पानी की कमी के साथ और अधिक कठिन हो जाता है। कई प्रधान फसलें पानी से संबंधित समस्याओं से प्रभावित हो रही हैं। उदाहरण के लिए, गेहूं की खेती वाले लगभग 74% क्षेत्र और चावल की खेती वाले 65% क्षेत्र पानी की भारी कमी से जूझ रहे हैं।
  • शहरों में पानी: पानी के कमी वाले दुनिया के 20 सबसे बड़े शहरों में से पांच शहर भारत में हैं। 2014 में कोई भी भारतीय शहर अपनी पूरी शहरी आबादी को 24x7 पानी की आपूर्ति नहीं कर रहे थे और भारत में केवल 35% शहरी घरों में पाइप से पानी उपलब्ध था।
  • आर्थिक जोखिम: अनुमान बताते हैं कि 2005 और 2030 के बीच औद्योगिक पानी की आवश्यकता चार गुना बढ़ जाएगी। पानी की कमी औद्योगिक कामकाज में बाधा उत्पन्न कर सकती है, जोकि राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 30% हिस्सा है।
  • जैव विविधता के जोखिम: भारत की जैव विविधता अतिरिक्त जल स्रोतों को बनाने के लिए शुरू की गई मानवीय गतिविधियों से प्रभावित होती है। इन गतिविधियों में बांध निर्माण और नदी को मोड़ना शामिल है जो जल प्रवाह, लवणता स्तर और मानसून पैटर्न में बदलाव ला सकता है।
  • कुल मिलाकर राज्य का प्रदर्शन: पिछले तीन वर्षों में लगभग 80% राज्यों ने भूजल स्रोतों में वृद्धि और पानी से संबंधित डेटा की रिपोर्टिंग जैसे जल प्रबंधन मानदंडों में सुधार प्रदर्शित किए हैं। हालांकि, 16 राज्यों (जैसे कि झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और राजस्थान) ने 50% से कम स्कोर किया। इन राज्यों में 48% जनसंख्या बसती है, यहां देश की 40% कृषि उपज है और 35% आर्थिक उत्पादन होता है।

 

शिक्षा

Gayatri Mann (gayatri@prsindia.org)

यूजीसी ने 20 संस्थानों को उत्कृष्ट संस्थानों का दर्जा देने का सुझाव दिया

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने हाल ही में 20 उच्च शिक्षण संस्थानों को उत्कृष्ट संस्थान का दर्जा देने का सुझाव दिया।[56] इन 20 संस्थानों में 10 सार्वजनिक क्षेत्र के और शेष निजी क्षेत्र के हैं। इन संस्थानों को एम्पावर्ड एक्सपर्ट कमिटी (चेयर: एन. गोपालास्वामी) के सुझावों के आधार पर चुना गया है।[57]

फरवरी 2018 यूजीसी ने 10 सार्वजनिक और 10 निजी क्षेत्र के शैक्षणिक संस्थानों को विश्व स्तरीय शिक्षण और शोध संस्थानों के रूप में उभरने, यानी उत्कृष्ट संस्थान बनाने में सक्षम बनाने के लिए एम्पावर्ड एक्सपर्ट कमिटी का गठन किया था।[58]  इन संस्थानों को विदेशी छात्रों को दाखिला देने, फीस तय करने और विदेशी फैकल्टी को नौकरी देने से संबंधित अधिक स्वायत्तता दी जाएगी। इसके अतिरिक्त प्रत्येक सार्वजनिक उच्च शिक्षण संस्थान को पांच साल की अवधि के लिए 1,000 करोड़ रुपये तक की वित्तीय सहायता मिलेगी।

उल्लेखनीय है कि यूजीसी द्वारा सुझाए गए 20 संस्थानों में से छह संस्थानों को जुलाई 2018 में उत्कृष्ट संस्थान घोषित किया गया है।[59]

कृषि

Suyash Tiwari (suyash@prsindia.org)

कैबिनेट ने 2019-20 के लिए चीनी पर निर्यात सबसिडी को मंजूर किया

केंद्रीय कैबिनेट ने 2019-20 में चीनी पर 10,448 रुपए प्रति मीट्रिक टन (एमटी) की निर्यात सबसिडी को मंजूरी दी है।[60] निर्यात सबसिडी में चीनी मिलों द्वारा हैंडलिंग सहित मार्केटिंग, अपग्रेडिंग, प्रोसेसिंग और परिवहन की लागत शामिल होगी। 60 लाख एमटी तक चीनी पर सबसिडी देने के लिए 6,268 करोड़ रुपए के व्यय को मंजूर किया गया है। चीनी के अधिशेष स्टॉक को कम करने के उद्देश्य से यह किया गया है जोकि 2019-20 के अंत में 162 लाख एमटी अनुमानित है (142 लाख एमटी के ओपनिंग स्टॉक के शुरू)।

मिलों को चुकाई जाने वाली सबसिडी की राशि सीधे गन्ना किसानों को दी जाएगी और यह मिलों पर किसानों के बकाये के तौर पर दी जाएगी। अगर कोई शेष राशि होगी तो वह मिलों को दे दी जाएगी।

सबसिडी देने के लिए 6,268 करोड़ रुपए का व्यय मंजूर किया गया है।

2018-19 के लिए प्रमुख फसलों के उत्पादन का चौथा अग्रिम अनुमान जारी

कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने 2018-19 के लिए प्रमुख खाद्यान्नों और कमर्शियल फसलों के उत्पादन के चौथे अग्रिम अनुमान जारी किए।[61] तालिका 3 2017-18 के अंतिम अनुमानों की तुलना 2018-19 के चौथे अग्रिम अनुमानों से करती है। मुख्य झलकियां निम्नलिखित हैं:

  • 2018-19 में खाद्यान्न उत्पादन 2017-18 के अंतिम अनुमान की तुलना में समान स्तर पर रहने का अनुमान है। खाद्यान्न में अनाज के उत्पादन में 2018-19 में 0.8% की मामूली वृद्धि का अनुमान है, जबकि दालों के उत्पादन में 7.9% की गिरावट का अनुमान है।
  • 2017-18 के अंतिम अनुमानों की तुलना में 2018-19 में चावल और गेहूं का उत्पादन क्रमशः 3.2% और 2.3% बढ़ने का अनुमान है। मोटे अनाज के उत्पादन में 8.6% गिरावट का अनुमान है।
  • 2017-18 की तुलना में 2018-19 में तिलहन के उत्पाद में 2.5% की वृद्धि का अनुमान है। जबकि सोयाबीन के उत्पादन में 26% की वृद्धि का अनुमान है, मूंगफली के उत्पादन में 28% की गिरावट अनुमानित है।
  • 2018-19 में कपास के उत्पादन में 12.5% की गिरावट का अनुमान है। इस वर्ष गन्ने का उत्पादन 5.3% बढ़कर 400.2 मिलियन टन होने का अनुमान है।

तालिका 3: 2018-19 के लिए उत्पादन का चौथा अग्रिम अनुमान (मिलियन टन में)

फसल

अंतिम 2017-18

2018-19

चौथा अग्रिम अनुमान

2017-18 में % परिवर्तन

खाद्यान्न(क+ख)

285.0

285.0

0.0%

क. अनाज

259.6

261.6

0.8%

चावल

112.8

116.4

3.2%

गेहूं

99.9

102.2

2.3%

मोटा अनाज

47.0

43.0

-8.6%

ख. दालें

25.4

23.4

-7.9%

तूर

4.3

3.6

-16.3%

चना

11.4

10.1

-11.0%

तिलहन

31.5

32.3

2.5%

सोयाबीन

10.9

13.8

26.1%

मूंगफली

9.3

6.7

-27.6%

कपास*

32.8

28.7

-12.5%

चीनी

379.9

400.2

5.3%

*million bales of 170 kg each.

SourcesDirectorate of Economics and Statistics, Ministry of Agriculture and Farmers Welfare; PRS.

कॉन्ट्रैक्ट खेती को अनिवार्य वस्तु एक्ट के कुछ प्रतिबंधों से छूट दी गई

उपभोक्ता मामलों के विभाग ने कॉन्ट्रैक्ट खेती के अंतर्गत खरीदे गए कृषि उत्पाद को अनिवार्य वस्तु एक्ट, 1955 में विनिर्दिष्ट कुछ स्टॉक प्रतिबंधों से छूट दे दी है।[62]  अनिवार्य वस्तु एक्ट, 1955 कुछ विशेष वस्तुओं, जैसे कुछ खाद्य सामग्री, बीज और दवाओं के उत्पादन, आपूर्ति, वितरण और व्यापार पर नियंत्रण का प्रावधान करता है।

कॉन्ट्रैक्ट खेती के अंतर्गत क्रेता और उत्पादक के बीच फसल पूर्व समझौते के आधार पर उत्पादन किया जाता है। फसल के बाद उत्पादक क्रेता को समझौते की शर्तों और नियमों के अनुसार उत्पाद बेचता है। विभाग ने एक्ट के अंतर्गत किसी भी आदेश में विनिर्दिष्ट स्टॉक लिमिट के प्रावधान से कॉन्ट्रैक्ट खेती को छूट दी है। यह छूट उन क्रेताओं पर लागू है जोकि कॉन्ट्रैक्ट खेती से जुड़े राज्य कानूनों के अंतर्गत पंजीकृत हैं। हालांकि इन क्रेताओं द्वारा खरीदे गए उत्पाद उन अधिकतम सीमाओं के अधीन बने रहेंगे जिन्हें संबंधित राज्य कानूनों में निर्दिष्ट किया गया है।

 

ऊर्जा

Saket Surya (saket@prsindia.org)

स्ट्रेस्ड थर्मल पावर प्रॉजेक्ट्स पर उच्च स्तरीय एम्पावर्ड कमिटी के सुझाव लागू

ऊर्जा मंत्रालय ने जुलाई 2018 में स्ट्रेस्ड थर्मल पावर एसेट्स से संबंधित समस्याओं को हल करने के लिए उच्च स्तरीय एम्पावर्ड कमिटी का गठन किया था।[63] केंद्रीय कैबिनेट ने मार्च 2019 में कमिटी के कुछ सुझावों को मंजूर किया। मंत्रालय ने इन सुझावों के कार्यान्वयन संबंधी विवरण जारी किए हैं।

स्ट्रेस्ड थर्मल प्रॉजेक्ट्स की डेट सर्विसिंग

मंत्रालय ने यह सुनिश्चित करने के लिए एक प्रणाली को मंजूरी दी है कि स्ट्रेस्ड थर्मल पावर प्रॉजेक्ट्स के ऋणों को प्राथमिकता के आधार पर चुकाया जाए।[64]  यह शक्ति नीति के अंतर्गत कोल लिंकेज का प्रयोग करने वाले प्रॉजेक्ट्स पर लागू होगा। शक्ति नीति पारदर्शी तरीके से ऊर्जा क्षेत्र में कोल लिंकेज के आबंटन का प्रावधान करती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि स्ट्रेस्ड पावर प्रॉजेक्ट के डेवलपर द्वारा उत्पादन शुद्ध अधिशेष का उपयोग ऋण चुकाने के लिए किया जाए (परिचालनगत व्यय पूरा करने के बाद)।

इस व्यवस्था के अनुसार, प्रॉजेक्ट के राजस्व को ट्रस्ट एंड रिटेंशन एकाउंट (टीआरए) में जमा किया जाएगा। ऋणदाता द्वारा एक कैश फ्लो मॉनिटरिंग एजेंसी को वास्तविक नकदी प्रवाह और परियोजना की लागत को सत्यापित करने के लिए नियुक्त किया जाएगा। टीआरए के व्यय के लिए प्राथमिकता का क्रम इस प्रकार होगा: (i) वैध भुगतान, जिसमें वे कर और शुल्क शामिल हैं जो सरकारी बकाया है, (ii) ईंधन की लागत, (iii) ट्रांसमिशन की लागत, (iv) परिचालनगत और रखरखाव संबंधी व्यय, (v) ऋणदाताओं का ब्याज भुगतान, और (vi) ऋणदाताओं को मुख्य भुगतान।

अल्पावधि के कोल लिंकेज की नीलामी

मंत्रालय ने अल्पावधि के लिए शक्ति नीति के अंतर्गत कोल लिंकेज की नीलामी के लिए एक मसौदा पद्धति को जारी किया है।[65] अल्पावधि के लिंकेज की नीलामी की उद्देश्य यह है कि अल्पावधि और डे-अहेड मार्केट में जरूरतों और मांग को पूरा किया जा सके।

जिन पावर प्रॉजेक्ट्स के पास पावर पर्चेज एग्रीमेंट (पीपीए) नहीं है, वे नीलामी में हिस्सा लेने के लिए पात्र होंगे। लिंकेज की अवधि न्यूनतम तीन महीने और अधिकतम एक वर्ष होगी। यह नीलामी निरंतर अंतराल पर की जाएगी (वर्ष में कम से कम दो बार)। इन कोल लिंकेज के अंतर्गत उत्पादित बिजली को: (i) पावर एक्सचेंज के जरिए डे-अहेड मार्केट और इंट्राडे मार्केट में, और (ii) डिस्कवरी ऑफ एफिशियंट एनर्जी प्राइज (डीप) पोर्टल का प्रयोग करते हुए पारदर्शी नीलामी प्रक्रिया के जरिए अल्पावधि के लिए बेचा जाएगा। डीप पोर्टल वितरण कंपनियों द्वारा बिजली की अल्पावधि आपूर्ति की खरीद के लिए एक ई-बिडिंग और ई-रिवर्स ऑक्शन पोर्टल है।

बिजली के लिए रियल-टाइम मार्केट हेतु फ्रेमवर्क प्रस्तावित

केंद्रीय बिजली रेगुलेटरी कमीशन (सीईआरसी) ने बिजली व्यापार के लिए रियल टाइम मार्केट हेतु एक फ्रेमवर्क प्रस्तावित किया है।[66] 5 सितंबर, 2019 तक मसौदा रेगुलेशन पर टिप्पणियां आमंत्रित हैं।

वर्तमान में 25 वर्ष तक के दीर्घावधि के अनुबंधों के जरिए अधिकतर खरीद की जाती है।[67]  शेष खरीद मध्यम अवधि (पांच वर्ष तक) या अल्पावधि (डे-अहेड मार्केट) के अनुबंधों के जरिए की जाती है। सीईआरसी ने किसी अतिरिक्त इंट्राडे जरूरतों और सिस्टम असंतुलन को दूर करने के लिए कुछ व्यवस्था की है। पावर एक्सचेंज निरंतर व्यापार के आधार पर इंट्राडे एनर्जी मार्केट में काम करते हैं।67

प्रस्तावित बाजार की मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • रियल टाइम मार्केट आधे घंटे का बाजार होगा। क्रेता और विक्रेताओं के पास आधे घंटे के बाजार में प्रत्येक 15 मिनट के समय के ब्लॉक के लिए बोलियां खरीदने/बेचने का विकल्प होगा।
  • प्राइज़ डिस्कवरी एक समान कीमत के साथ दोतरफा बंद नीलामी के माध्यम से होगी। दोतरफा नीलामी में व्यापार उस मूल्य से आगे बढ़ता है जहां विक्रेता द्वारा मांगा गया और क्रेता का मूल्य मैच होता है। बंद बोली वह होती है जहां एक प्रतिभागी नीलामी प्रक्रिया के दौरान अन्य प्रतिभागियों की बोलियों के बारे में नहीं जानता है। यूनिफॉर्म प्राइज़ ऑक्शन एक मल्टी यूनिट ऑक्शन है जिसमें समरूप वस्तुओं की समान इकाइयों को एक निश्चित संख्या बेचा जाता है। एक बोली में वांछित इकाइयों की संख्या और प्रति इकाई की इच्छित कीमत, दोनों शामिल होते हैं।
  • नीलामी पर गेट क्लोजर का कॉन्सेप्ट लागू होगा। इसका अर्थ यह है कि एक निश्चित समय के बाद बोली में किसी परिवर्तन की अनुमति नहीं होगी।

ग्रिड कनेक्टेड रूफटॉप सोलर प्रोग्राम के चरण II के कार्यान्वयन के दिशानिर्देश घोषित

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने ग्रिड कनेक्टेड रूफटॉप सोलर प्रोग्राम के चरण दो के लिए परिचालनगत दिशानिर्देशों की घोषणा की।[68] 
प्रोग्राम के चरण- II का उद्देश्य 2022 तक रूफटॉप सोलर के माध्यम से 38,000 मेगावाट की क्षमता का ऊर्जा उत्पादन करना है। इसमें 4,000 मेगावाट की क्षमता को केंद्रीय वित्तीय सहायता के साथ आवासीय क्षेत्र में उत्पादित किया जाएगा। बाकी 34,000 मेगावाट सामाजिक, सरकारी, शैक्षिक, सार्वजनिक उपक्रमों और उद्योगों सहित अन्य क्षेत्रों के माध्यम से उत्पादित की जाएगी। आवासीय के अलावा अन्य क्षेत्रों के मामले में केंद्रीय वित्तीय सहायता प्रदान नहीं की जाएगी। आवासीय क्षेत्र को केंद्रीय वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी, जैसा कि तालिका 4 में वर्णित है।

तालिका 4: आवासीय क्षेत्र में रूफटॉप सोलर लगाने के लिए केंद्रीय वित्तीय सहायता

आवासीय क्षेत्र का प्रकार

केंद्रीय वित्तीय सहायता

अधिकतम 3 किलोवॉट तक क्षमता

लागत का 40%*

3 से 10 किलोवॉट क्षमता के बीच

3 किलोवॉट तक 40% और 10 किलोवॉट तक 20%

ग्रुप हाउसिंग सोसायटी/आवासीय वेल्यर एसोसिएशंस में समान सुविधा के तौर पर 500 किलोवॉच (@10 किलोवॉट बिजली प्रति मकान)

20%

Sources: Official Memorandum, Ministry of New and Renewable Energy; PRS.

Note: *Applicable Cost: For a given state/UT, lower of the benchmark cost of MNRE or lowest of the costs discovered under tenders.

वितरण कंपनियां प्रोग्राम की कार्यान्वयन एजेंसी के तौर पर कार्य करेंगी। वे विशिष्ट मापदंडों के आधार पर प्रोत्साहन के लिए पात्र होंगी।  

समुद्री ऊर्जा नवीकरणीय ऊर्जा के रूप में घोषित

समुद्री ऊर्जा में टाइडल एनर्जी, वेव एनर्जी, ओशन थर्मल एनर्जी कनवर्जन और मरीन करंट एनर्जी आती है और अब इसे नवीकरणीय ऊर्जा के रूप में मान्यता दी गई है।[69] इसी प्रकार समुद्री ऊर्जा के विभिन्न रूपों द्वारा उत्पादित ऊर्जा नॉन-सोलर रीन्यूएबल पर्चेज़ ऑब्लिगेशंस (आरपीओ) का पात्र होगी। आरपीओ कुछ संस्थाओं की बाध्यताओं को संदर्भित करता है जिन्हें नवीकरणीय स्रोतों से ऊर्जा का उपयोग करके अपनी बिजली संबंधी कुछ जरूरतों को पूरा करना होता है। 

टाइडल एनर्जी की कुल चिन्हित क्षमता लगभग 12,455 मेगावॉट है। वेव एनर्जी और ओशन थर्मल एनर्जी कनवर्जन की कुल क्षमता क्रमशः 40,000 मेगावॉट और 1,80,000 मेगावॉट है।

स्टेट रूफटॉप सोलर अट्रैक्टिव इंडेक्स (सरल) प्रारंभ

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने स्टेट रूफटॉप सोलर अट्रैक्टिव इंडेक्स (सरल) की शुरुआत की है।[70] यह रूफटॉप सोलर डिप्लॉयमेंट से संबंधित उपाय करने पर राज्यों को अंक देगा। यह राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करके रूफटॉप सोलर डिप्लॉयमेंट को प्रोत्साहित करेगा। सरल राज्य में रूफटॉप सोलर डिप्लॉयमेंट के विकास के निम्नलिखित पहलुओं का मूल्यांकन करेगा: (i) नीति ढांचे की मजबूती, (ii) कार्यान्वयन का परिवेश, (iii) निवेश का माहौल, (iv) उपभोक्ताओं के अनुभव, और (v) कारोबार करने का इकोसिस्टम।

इस महीने घोषित रैंकिंग में, कर्नाटक ने पहला स्थान हासिल किया है। तेलंगाना, गुजरात और आंध्र प्रदेश ने क्रमशः 2, 3 और 4वां स्थान हासिल किया है।

 

खनन

Saket Surya (saket@prsindia.org)

खनन का काम बंद करने के मापदंड में ढिलाई दी गई

खनिज संरक्षण और विकास नियम, 2017 खनन पट्टा धारकों को सतत खनन की पद्धतियों को इस्तेमाल करने के लिए बाध्य करता है।[71] सतत खनन तटवर्ती और अपतटीय खनिजों और ऊर्जा संसाधनों के विकास को कहते हैं जो खनन के पर्यावरणीय प्रभावों को कम करते हुए आर्थिक और सामाजिक लाभों को अधिकतम करता है। 

सतत खनन की पद्धतियों को अपनाने के लिए खनन मंत्रालय ने खनन पट्टा धारकों के लिए एक सतत विकास ढांचा निर्धारित किया है।[72]  इंडियन ब्यूरो ऑफ माइंस (आईबीएम) हर साल इस ढांचे के क्रियान्वयन के लिए पट्टे पर दी गई खदानों को एक से पांच तक के स्टार्स की रेटिंग देता है।[73] 2017 के नियमों के अनुसार, आईबीएम उन खदानों में खनन का काम बंद कर सकता है जिन्होंने अपना काम शुरू करने के दो सालों के अंदर कम से कम चार स्टार न हासिल किए हों।71

खनन मंत्रालय ने 2017 के नियमों में संशोधन किए हैं ताकि न्यूनतम रेटिंग चार स्टार से तीन स्टार की जा सके।[74] अपेक्षित रेटिंग की अवधि चार वर्ष कर दी गई है जोकि 27 फरवरी, 2017 से लागू होगी।

सामरिक खनिजों के लिए विदेशें में खनन हेतु नाल्को, एचसीएल और एमईसीएल ने एक संयुक्त उपक्रम बनाया

खनन मंत्रालय ने सार्वजनिक क्षेत्र के तीन केंद्रीय उद्यमों की भागीदारी के साथ खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (काबिल) नामक एक संयुक्त उद्यम (जेवी) की स्थापना की है। ये हैं नेशनल एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड (नाल्को), हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (एचसीएल) और मिनरल एक्सप्लोरेशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एमईसीएल)।[75] 

काबिल का उद्देश्य घरेलू बाजार के लिए सामरिक खनिजों की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करना और आयात प्रतिस्थापन की दिशा में काम करना है। सामरिक खनिज वे हैं जो किसी देश की अर्थव्यवस्था और रक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन व्यावसायिक रूप से पर्याप्त मात्रा में उस देश में उपलब्ध नहीं हैं। भारत ने लिथियम, कोबाल्ट, टिन, टंगस्टन और सेलेनियम सहित 12 ऐसे खनिजों की पहचान की है।[76]

यह जेवी वाणिज्यिक खनिजों के लिए विदेशों में सामरिक खनिजों की पहचान, अन्वेषण, विकास, खनन और प्रसंस्करण और इन खनिजों की भारत की आवश्यकता को पूरा करेगा।75 

निम्नलिखित तरीकों से खनिजों को प्राप्त किया जाएगा: (i) व्यापारिक अवसरों का निर्माण, (ii) उत्पादक देशों के साथ सरकार का सहयोग और (iii) स्रोत देशों में खनन परिसंपत्तियों की खोज में रणनीतिक अधिग्रहण या निवेश75

 

स्टील

Saket Surya (saket@prsindia.org)

इस्पात मंत्रालय द्वारा लौह और इस्पात क्षेत्र के लिए मसौदा सुरक्षा संहिता प्रकाशित

इस्पात मंत्रालय ने लौह और इस्पात क्षेत्र के लिए मसौदा सुरक्षा संहिता प्रकाशित की।[77]  सुरक्षा संहिता का उद्देश्य क्षेत्र में समान सुरक्षा मापदंड विकसित करना है। इसका लक्ष्य कार्यस्थल पर व्यवसायगत सुरक्षा के मुद्दों के बेहतर प्रबंधन की सुविधा के लिए एक बुनियादी ढांचा प्रदान करना है।

सुरक्षा संहिता में क्षेत्र के कामकाज के विभिन्न पहलु शामिल हैं, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं:

  • अग्नि सुरक्षा,
  • बिजली सुरक्षा,
  • सामग्री और उपकरणों की हैंडलिंग,
  • कटिंग और वेल्डिंग, और
  • काम की कठिन स्थितियां, जिनमें ऊंचाई पर काम करना, छोटे से स्पेस में काम करना और खुदाई शामिल है।

सुरक्षा संहिता निम्नलिखित प्रकार की संस्थाओं पर लागू होगी:

  • एकीकृत इस्पात संयंत्र: ऐसे संयंत्र जिनमें हर प्रकार की गतिविधि होती है, जैसे कच्चा माल प्राप्त करने से लेकर अंतिम उत्पाद का डिस्पैच, और बिजली संयंत्र एवं ऑक्सीजन संयंत्र जैसी सहायक सुविधाएं,
  • छोटे इस्पात संयंत्र/प्रोसेसिंग इकाइयां: इनमें भट्ठियां, स्पॉन्ज आयरन प्लांट, स्टील फाउंड्री और फॉर्ज, अलॉय प्लांट, इत्यादि शामिल हैं, और
  • लौह और इस्पात उद्योग में प्रॉजेक्ट/निर्माण गतिविधियां।

 

संस्कृति

Gayatri Mann (gayatri@prsindia.org)

जलियांवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक (संशोधन) बिल, 2019 लोकसभा में पारित

जलियांवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक (संशोधन) बिल, 2019 को लोकसभा में पारित किया गया और यह बिल राज्यसभा में लंबित है।[78]  बिल जलियांवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक एक्ट, 1951 में संशोधन करता है। 1951 का एक्ट अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल, 1919 को मारे गए और घायल लोगों की स्मृति में राष्ट्रीय स्मारक के निर्माण का प्रावधान करता है। इसके अतिरिक्त एक्ट राष्ट्रीय स्मारक के प्रबंधन के लिए एक ट्रस्ट बनाता है।

  • ट्रस्टीज़ का संयोजन: 1951 के एक्ट के अंतर्गत स्मारक के ट्रस्टीज़ में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) अध्यक्ष के रूप में प्रधानमंत्री, (ii) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष, (iii) संस्कृति मंत्री, (iv) लोकसभा में विपक्ष के नेता, (v) पंजाब के गवर्नर, (vi) पंजाब के मुख्यमंत्री, और (vii) केंद्र सरकार द्वारा नामित तीन प्रख्यात व्यक्ति। बिल इस प्रावधान में संशोधन करता है और ट्रस्टी के रूप में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष को हटाता है। इसके अतिरिक्त बिल स्पष्ट करता है कि जब लोकसभा में विपक्ष का कोई नेता नहीं होगा, तो लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को ट्रस्टी बनाया जाएगा।
  • एक्ट में यह प्रावधान किया गया है कि केंद्र सरकार द्वारा नामित तीन प्रख्यात व्यक्तियों का कार्यकाल पांच वर्ष होगा और उन्हें दोबारा नामित किया जा सकता है। बिल प्रावधान करता है कि केंद्र सरकार कोई कारण बताए बिना कार्यकाल खत्म होने से पहले नामित ट्रस्टी को हटा सकती है।

पीआरएस बिल के सारांश के लिए कृपया देखें

 

दूरसंचार

Saket Surya (saket@prsindia.org)

ट्राई ने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर श्रेणी- I के पंजीकरण के दायरे की समीक्षा पर सुझावों को आमंत्रित किया

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर श्रेणी I (आईपी-I) पंजीकरण के दायरे की समीक्षा पर एक परामर्श पत्र जारी किया है।[79]  पत्र पर 16 सितंबर, 2019 तक टिप्पणियां आमंत्रित हैं। 

इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर ऐसी संस्थाएं होती हैं जोकि टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर लगाते हैं, उन्हें मेनटेन करते हैं और उनके स्वामी होते हैं और उन्हें टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स (टीएसपी) को इन्हें लीज पर देते हैं, किराए पर देते हैं या बेचते हैं। टेलीकॉम टावर कंपनियां इस श्रेणी के अंतर्गत पंजीकृत हैं। वर्तमान में आईपी-I कंपनियों को पैसिव इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदान करने की अनुमति है।79  पैसिव इंफ्रास्ट्रक्चर शेयरिंग में टेलीकॉम नेटवर्कों के नॉन इलेक्ट्रिकल और सिविल इंजीनियरिंग इलिमेंट्स की शेयरिंग आती है। इनमें राइट ऑफ वे, टावर साइट्स, टावर्स, पोल्स, उपकरणों को रखना, पावर सप्लाई और एयर कंडीशनिंग सुविधाएं शामिल हैं।79

परामर्श पत्र इसके दायरे को बढ़ाने का प्रयास करता है और शेयरेबल एक्टिव इंफ्रास्ट्रक्चर के प्रावधान की अनुमति देता है और टीएसपी को पट्टे पर दी गई लाइनों के माध्यम से एंड-टू-एंड बैंडविड्थ प्रदान करता है। ऐसा प्रतिस्पर्धी कीमतों पर सक्रिय बुनियादी ढांचे के एलिमेंट्स को तेजी से रोलआउट करने की सुविधा देने के लिए किया गया है।79 एक्टिव इंफ्रास्ट्रक्चर शेयरिंग में इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क एलिमेंट्स की शेयरिंग आती है। इसमें बेस स्टेशन, एक्सेस नोड स्विचेज़, एंटीना, और फाइबर नेटवर्क्स की प्रबंधन प्रणाली शामिल है।79 

 

सूचना और प्रसारण

Saket Surya (saket@prsindia.org)

ट्राई ने प्रसारण और केबल सेवाओं के लिए टैरिफ संबंधी मुद्दों पर सुझावों को आमंत्रित किया

ट्राई ने प्रसारण और केबल सेवाओं के लिए टैरिफ-संबंधी मुद्दों पर एक परामर्श पत्र प्रकाशित किया है।[80],[81] पत्र पर 16 सितंबर, 2019 तक टिप्पणियां आमंत्रित हैं।

2017 में पेश किए गए फ्रेमवर्क के अनुसार, उपभोक्ता एक नेटवर्क क्षमता शुल्क (एनसीएफ) का भुगतान करते हैं, जो कनेक्शन के लिए एक निश्चित न्यूनतम शुल्क है और बदले में सौ फ्री टू एयर चैनल मिलते हैं। 80 पे चैनलों के लिए सब्सक्रिप्शन मॉडल में ब्रॉडकास्टर अपने पे चैनल की पेशकश डिस्ट्रीब्यूटेड प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स (डीपीओज़) के रूप में निम्नलिखित प्रकार से करता है: (i) एकल चैनल, जिसे अ-ला-कार्ते चैनल कहा जाता है, और (ii) चैनलों का एक समूह, जिसे बुके कहा जाता है। डीपीओ प्रसारण और केबल सेवा वितरक हैं। वे उपभोक्ताओं को सब्सक्रिप्शन के लिए चैनल की पेशकश कर सकते हैं: (i) अ-ला-कार्ते चैनल, (ii) ब्रॉडकास्टर का बुके और (iii) डीपीओ का खुद का बुके जिसमें एक या अधिक प्रसारकों के चैनल शामिल हैं।80

इस फ्रेमवर्क का उद्देश्य उपभोक्ताओं को चैनल चुनने की फ्लेक्सिबिलिटी और स्वतंत्रता देना है।80 हालांकि, ब्रॉडकास्टरों द्वारा बुके पर दिए जाने वाले भारी डिस्काउंट के कारण उपभोक्ताओं को निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ता है : (i) उपभोक्ताओं के अ-ला-कार्ते चैनलों के विकल्प पर प्रतिकूल प्रभाव, (ii) बुके के रूप में अवांछित चैनलों का थोपा जाना, और (iii) अन्य ब्रॉडकास्टरों के लिए नॉन लेवल प्लेइंग फील्ड।80

परामर्श पत्र में मुख्य रूप से बुके पर छूट, बुके में शामिल करने के लिए चैनलों की सीलिंग प्राइज, ब्रॉडकास्टरों और डीपीओ द्वारा बुके तैयार करने की आवश्यकता, एनसीएफ और दीर्घकालिक सदस्यता योजनाओं पर छूट से संबंधित मुद्दे शामिल हैं।

 

विदेशी मामले

Anya Bharat Ram (anya@prsindia.org)

प्रधानमंत्री फ्रांस दौरे पर

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस का दौरा किया। दोनों देशों ने विभिन्न क्षेत्रों में चार समझौतों पर हस्ताक्षर किए जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) कौशल विकास और व्यावसायिक प्रशिक्षण में सहयोग, (ii) सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना, (iii) समुद्री डोमेन में जागरूकता पैदा करने में सहयोग देना, और (iv)  इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना मंत्रालय तथा फ्रांस की आईटी कंपनी एटीओएस के बीच सहयोग।[82]

विदेश मंत्री ने चीन का दौरा किया

विदेश मंत्री श्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने चीन का दौरा किया। दोनों देशों ने विभिन्न क्षेत्रों में पांच समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) द्विपक्षीय संबंधों में सहयोग, (ii) खेल संबंधी प्रशासन और (iii) पारंपरिक चिकित्सा।[83]

 

पर्यावरण

Prachee Mishra (prachee@prsindia.org)

रेल मंत्रालय सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाएगा

रेल मंत्रालय ने 2 अक्टूबर, 2019 से सिंगल यूज प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है।[84]  इसके अतिरिक्त सभी रेलवे विक्रेताओं को प्लास्टिक कैरी बैग के उपयोग से बचना चाहिए। रेलवे कर्मचारियों को प्लास्टिक उत्पादों को कम करना, पुन: उपयोग और अस्वीकार करना चाहिए। आईआरसीटीसी एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पांसिबिलिटी (ईपीआर) के तौर पर प्लास्टिक की पेयजल बोतलों को लौटाने का नियम लागू करेगा। ईपीआर एक नीतिगत दृष्टिकोण है जिसके तहत निर्माता ऐसे उत्पादों के उपचार या निपटान के लिए जिम्मेदार होते हैं जो उपभोक्ताओं द्वारा उपयोगी नहीं माने जाते। इस तरह की जिम्मेदारी वित्तीय, भौतिक या दोनों प्रकार की हो सकती है। 

 

[1] Parliament session wrap, August 7, 2019, https://www.prsindia.org/sites/default/files/Session%20wrap%20Budget%20Session%202019%2017th%20LS.pdf.

[2]Press Note on Estimates of Gross Domestic Product for the First Quarter (April-June) 2019-20, Ministry of Statistics and Programme Implementation, August 30, 2019, http://www.mospi.gov.in/sites/default/files/press_release/PRESS_NOTE-Q1_2019-20-30.8.19.pdf.

[3]Third Bi-Monthly Policy Statement 2019-20, Press Release, Reserve Bank of India, August 7, 2019, https://www.rbi.org.in/Scripts/BS_PressReleaseDisplay.aspx?prid=47941.

[4]Quick Estimates of Index of Industrial Production and Use Based Index for the Month of June, 2019 (Base 2011- 12=100)”, Press Release, Ministry of Statistics and Programme Implementation, August 9, 2019, http://www.mospi.gov.in/sites/default/files/press_release/Press%20Note%20June%2719.pdf.

[5] G.S.R. 562(E), Ministry of Law and Justice, August 6, 2019, http://egazette.nic.in/WriteReadData/2019/210243.pdf

[6] Bulletin-I, Rajya Sabha, August 5, 2019, http://164.100.47.5/Bullitensessions/sessionno/249/050819.pdf, Bulletin-II, Lok Sabha, August 6, 2019, http://loksabhadocs.nic.in/bull1mk/17/I/6.08.2019.pdf

[7] The Jammu and Kashmir Reorganisation Bill, 2019, Ministry of Home Affairs, August 5, 2019, https://prsindia.org/sites/default/files/bill_files/Jammu%20and%20Kashmir%20Reorganisation%20Bill%2C%202019.pdf

[8] Citizenship (Registration of Citizenship and National Identity Card) Rules, 2003, http://www.nrcassam.nic.in/images/pdf/citizenship-rules.pdf.

[9] G.S.R. 586(E), Gazette of India, Ministry of Home Affairs, August 21, 2019, http://egazette.nic.in/WriteReadData/2019/211112.pdf. 

[10] "Publication of Final NRC on 31st August, 2019", Office of the State Coordinator, NRC, August 31, 2019, http://www.nrcassam.nic.in/pdf/English%20-Press%20Brief%2031st%20August%202019.pdf).

[11]RBI constitutes Expert Committee on Economic Capital Framework, Press Releases, Reserve Bank of India, December 26, 2018, https://www.rbi.org.in/Scripts/BS_PressReleaseDisplay.aspx?prid=45826.

[12]Reserve Bank releases the report of the Expert Committee to Review the Extant Economic Capital Framework of the RBI, Press Releases, Reserve Bank of India, August 27, 2019, https://www.rbi.org.in/Scripts/BS_PressReleaseDisplay.aspx?prid=47993.

[13] Merger of Public Sector Banks, Department of Financial Services, Ministry of Finance, August 30, 2019.

[14] The Chit Funds (Amendment) Bill, 2019, https://www.prsindia.org/sites/default/files/bill_files/Chit%20Funds%20%28Amendment%29%20Bill%2C%202019.pdf.

[15]Task Force on Offshore Rupee Markets submits report to the Governor, Press Releases, Reserve Bank of India, August 8, 2019, https://www.rbi.org.in/Scripts/BS_PressReleaseDisplay.aspx?prid=47839.

[16]Report of the Task Force on Offshore Rupee Markets, Reports, Reserve Bank of India, August 8, 2019, https://www.rbi.org.in/Scripts/PublicationReportDetails.aspx?UrlPage=&ID=937.

[17] RBI constitutes the Task Force on Offshore Rupee Markets, Press Releases, Reserve Bank of India, February 28, 2019, https://www.rbi.org.in/Scripts/BS_PressReleaseDisplay.aspx?prid=46423.

[18]Report of the Internal Working Group on Comprehensive Review of Market Timings, Draft Reports, Reserve Bank of India, July 10, 2019, https://www.rbi.org.in/Scripts/PublicationDraftReports.aspx?ID=935#C3.

[19]Monetary limits for filing of appeals by Income Tax Department further enhanced by CBDT, Press Information Bureau, Ministry of Finance, August 8, 2019.

[20] F. No. 390/Misc/116/2017-JC, Central Board of Indirect Taxes and Customs, Department of Revenue, Ministry of Finance, August 22, 2019, http://www.cbic.gov.in/resources//htdocs-cbec/instruction-220819.pdf;jsessionid=57726819F3621CE71952F11277550B91.

[21] Enabling Framework for Regulatory Sandbox, Reports, Reserve Bank of India, August 13, 2019, https://rbidocs.rbi.org.in/rdocs/PublicationReport/Pdfs/ENABLING79D8EBD31FED47A0BE21158C337123BF.PDF.

[22] RBI sets up Inter-regulatory Working Group on Fin Tech and Digital Banking, Press Releases, Reserve Bank of India, July 14, 2016, https://www.rbi.org.in/Scripts/BS_PressReleaseDisplay.aspx?prid=37493.

[23]Priority Sector Lending Lending by banks to NBFCs for On-Lending, Notifications, Reserve Bank of India, August 13, 2019, https://www.rbi.org.in/Scripts/NotificationUser.aspx?Id=11659&Mode=0.

[24]Master Circular- ‘Non-Banking Financial Company-Micro Finance Institutions’ (NBFC-MFIs) - Directions, Master Circular, Reserve Bank of India, April 20, 2016, https://www.rbi.org.in/Scripts/BS_ViewMasCirculardetails.aspx?id=9827.

[25] The Insolvency and Bankruptcy Code (Amendment) Bill, 2019, https://www.prsindia.org/sites/default/files/bill_files/Insolvency%20and%20Bankruptcy%20Code%20%28Amendment%29%20Bill%2C%202019_0.pdf.

[26] Report of the Competition Law Review Committee,, Ministry of Corporate Affairs, July 26, 2019, :http://www.mca.gov.in/Ministry/pdf/ReportCLRC_14082019.pdf. 

[27] F.No. CCI/CD/AmendComb. Regl./2019, Gazette of India, The Competition Commission of India, https://www.cci.gov.in/sites/default/files/notification/210553.pdf.

[28]Report of the High Level Committee on Corporate Social Responsibility, Ministry of Corporate Affairs, August 7, 2019, http://www.mca.gov.in/Ministry/pdf/CSRHLC_13092019.pdf.

[29] Companies (Share Capital and Debentures) Amendment Rules, 2019, http://www.mca.gov.in/Ministry/pdf/ShareCapitalRules_16082019.pdf.

[30] The National Institute of Design (Amendment) Bill, 2019, Ministry of Commerce and Industry, https://www.prsindia.org/sites/default/files/bill_files/NID%20Bill%2C%202019.pdf.

[31] Cabinet approves proposal for review of FDI policy in various sectors, Press Information Bureau, Cabinet, August 28, 2019.

[32]Raksha Mantri Shri Rajnath Singh approves a Committee to review Defence Procurement Procedure to strengthen Make in India, Press Information Bureau, Ministry of Defence, August 17, 2019.

[33]Raksha Mantri Shri Rajnath Singh approves extension of benefits of Child Care Leave to single male service personnel, Press Information Bureau, Ministry of Defence, August 10, 2019.

[34]Raksha Mantri Shri Rajnath Singh approves decisions regarding re-organisation of Army Headquarters, Press Information Bureau, Ministry of Defence, August 21, 2019.

[35] The Consumer Protection Bill, 2019, https://www.prsindia.org/sites/default/files/bill_files/Consumer%20Protection%20Act%2C%202019.pdf.

[36]Advisory to State Governments / Union Territories: Model Framework for Guidelines on e-Commerce for consumer protection, Department of Consumer Affairs, Ministry of Consumer Affairs, Food and Public Distribution, August 2, 2019, https://consumeraffairs.nic.in/sites/default/files/file-uploads/latestnews/Guidelines%20on%20e-Commerce.pdf.

[37] The Arbitration and Conciliation (Amendment) Bill, 2019, https://www.prsindia.org/sites/default/files/bill_files/Arbitration%20and%20Conciliation%20%28Amendment%29%20Act%2C%202019.pdf.

[38] The Unlawful Activities (Prevention) Amendment Bill, 2019, https://www.prsindia.org/sites/default/files/bill_files/Unlawful%20Activities%20%28Prevention%29%20Amendment%20Act%2C%202019.pdf.

[39] The Protection of Children from Sexual Offences (Amendment) Bill, 2019, Ministry of Women and Child Development, https://www.prsindia.org/sites/default/files/bill_files/Protection%20of%20Children%20from%20Sexual%20Offences%20%28A%29%20Bill%2C%202019.pdf.

[40] The Supreme Court (Number of Judges) Amendment Bill, 2019, https://www.prsindia.org/sites/default/files/bill_files/Supreme%20Court%20%28Number%20of%20Judges%29%20Amendment%20Act%2C%202019.pdf.

[41] The Repealing and Amending Bill, 2019, https://www.prsindia.org/sites/default/files/bill_files/Repealing%20and%20Amending%20Act%2C%202019.pdf.

[42] The Transgender Persons (Protection of Rights) Bill, 2019, https://www.prsindia.org/sites/default/files/bill_files/The%20Transgender%20Persons%20%28Protection%20of%20Rights%29%20Bill%2C%202019%20Bill%20Text.pdf.

[43] G.S.R. 578(E), Gazette of India, Ministry of Home Affairs, August 16, 2019, http://egazette.nic.in/WriteReadData/2019/210643.pdf.

[44] The New Delhi Municipal Council Act, 1994, https://www.ndmc.gov.in/ndmc/NDMCAct/NDMC%20ACT%201944%201.1.pdf.

[45] The Code on Wages 2019, Ministry of Labour and Employment, July 23, 2019, https://prsindia.org/sites/default/files/bill_files/Code%20on%20Wages%2C%202019.pdf

[46] Draft Employees' Provident Funds & Miscellaneous Provisions (Amendment) Bill, 2019, Ministry of Labour and Employment, August 23, 2019, https://labour.gov.in/sites/default/files/Annexure-A_B_C.pdf.

[47] The National Medical Commission Bill, 2019, Ministry of Health and Family Welfare, https://www.prsindia.org/sites/default/files/bill_files/NMC%202019%281%29.pdf.

[48] The Surrogacy (Regulation) Bill, 2019, Ministry of Health and Family Welfare, https://www.prsindia.org/sites/default/files/bill_files/Surrogacy%20%28Regulation%29%20Bill%2C%202019.pdf.

[49]Cabinet approves 75 new Medical Colleges; To add 15,700 MBBS seats, Press Information Bureau, August 28, 2019

[50] The Motor Vehicles (Amendment) Act, 2019, As notified in the Gazette, August 9, 2019, http://164.100.47.193/BillsPDFFiles/Notification/2019-154-gaz.pdf.

[51] The Airports Economic Regulatory Authority of India (Amendment) Bill, 2019, As passed by Parliament, August 6, 2019, http://164.100.47.4/BillsTexts/RSBillTexts/PassedBothHouses/XX-F_2019_RS_Eng.pdf.

[52] The Public Premises (Eviction of Unauthorised Occupants) Amendment Act, 2019, As notified in the Gazette, August 9, 2019, http://164.100.47.193/BillsPDFFiles/Notification/2019-145-gaz.pdf.

[53] The Inter-State River Water Disputes (Amendment) Bill, 2019, As passed by Lok Sabha, July 31, 2019, http://164.100.47.4/BillsTexts/LSBillTexts/PassedLoksabha/187-C_2019_LS_Eng.pdf.

[54] The Dam Safety Bill, 2019, As passed by Lok Sabha, August 2, 2019, http://164.100.47.4/BillsTexts/LSBillTexts/PassedLoksabha/190C_2019_LS_Eng.pdf.

[55] Composite Water Management Index 2019, NITI Aayog, August, 2019, https://www.niti.gov.in/sites/default/files/2019-08/CWMI-2.0-latest.pdf.

[56]20 Institution recommended for status of Institutions of Eminence Press Information Bureau, Ministry of Human Resource Development, August 2, 2019.

[57] Report of the Empowered Expert Committee, University Grants Commission, July 11 2018, https://www.ugc.ac.in/pdfnews/3275454_IoE-EEC-FinalReport11-May2018-9AM-.pdf,

[58] Notification on the constitution of the Empowered Expert Committee, University Grants Commission, February 20, 2018, https://www.ugc.ac.in/pdfnews/2796069_Notification-- -EEC--IOE.pdf.

[59]Government declares 6 educational Institutions of Eminence3 Institutions from Public Sector and 3 from Private Sector shortlisted, Ministry of Human Resource Development, Press Information Bureau, July 9, 2018.

[60] Cabinet approves Sugar export policy for evacuation of surplus stocks during sugar season 2019-20, Press Information Bureau, Cabinet Committee on Economic Affairs, August 28, 2019.

[61] Fourth Advance Estimates of Production of Foodgrains and Commercial Crops for 2018-19, Directorate of Economics and Statistics, Ministry of Agriculture and FarmersWelfare, August 19, 2019, https://eands.dacnet.nic.in/Advance_Estimate/4th%20Adv%20Estimates%202018-19%20Eng.pdf.

[62] S.O. 2826 (E), Gazette of India, Department of Consumer Affairs, Ministry of Consumer Affairs, Food and Public Distribution, August 6, 2019, http://www.egazette.nic.in/WriteReadData/2019/210264.pdf.

[63]Report of the High Level Empowered Committee

to Address the issues of Stressed Thermal Power Projects, November, 2018,  https://powermin.nic.in/sites/default/files/webform/notices/20_Nov_R1_Draft_Report_HLEC_Final_20_Nov.pdf.

[64]Office Memorandum: Mechanism to be followed to ensure that net surplus generated after meeting operating expenses are entirely used for servicing debt in the first place, Ministry of Power, August 5, 2019, https://powermin.nic.in/sites/default/files/webform/notices/Mechanism_dated_05_08_2019.pdf.

[65]Draft Methodology for allocation of coal as per provisions as Para B (viii) (a) of SHAKTI Policy of Ministry of Coal amended as per Para 2.1 (a) of HLEC Recommendations, Ministry of Power, August 21, 2019, https://powermin.nic.in/sites/default/files/webform/notices/Draft_Methodology_for_allocation_of_coal_as_per_provisions_as_ParaB.pdf.

[66] Explanatory Memorandum- Proposed framework for Real-Time Market for Electricity, Central Electricity Regulatory Commission, August 6, 2019, http://www.cercind.gov.in/2019/draft_reg/RTM-EM-2019.pdf.

[67]Discussion Paper on Re-designing Real Time Electricity Markets in India, Central Electricity Regulatory Commission, July 2018, http://www.cercind.gov.in/2018/draft_reg/RTM.pdf.

[68] Guidelines on implementation of Phase II of Grid Connected Rooftop Solar Programme for achieving 40 GW capacity from Rooftop Solar by the year 2022, Ministry of New and Renewable Energy, August 21, 2019, https://mnre.gov.in/sites/default/files/schemes/Notification-20082019-184419.pdf.

[69]Power Minister Shri RK Singh approves proposal to declare ocean energy as Renewable Energy, Press Information Bureau, August 22, 2019, https://pib.gov.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1582638.

[70]Power Minister Shri RK Singh launches SARAL State Rooftop Solar Attractiveness Index during RPM Meeting, Press Information Bureau, Ministry of New and Renewable Energy, August 21, 2019, https://pib.gov.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1582543

[71] The Mineral Conservation and Development Rules, 2017, http://ibm.nic.in/writereaddata/files/04192017182323MCDR_2017.pdf.

[72]Sustainable Development Framework, Ministry of Mines Website as accessed on August 23, 2019, https://mines.gov.in/writereaddata/UploadFile/SDF_Overview_more.pdf.

[73] Star Rating Scheme, Indian Bureau of Mines Website as accessed on August 23, 2019, https://mitra.ibm.gov.in/Pages/Star-Rating.aspx.

[74] Mineral Conservation and Development (Amendment) Rules, 2019, The Gazette of India, August 13, 2019, http://egazette.nic.in/WriteReadData/2019/210554.pdf.

[75]KABIL Set up to Ensure Supply of Critical Minerals, Press Information Bureau, Ministry of Mines, August 1, 2019, https://pib.gov.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1581058.

[76]Report Of Working Group On Mineral Exploration And Development (Other Than Coal & Lignite) for the 12th Five Year Plan, Planning Commission, http://planningcommission.gov.in/aboutus/committee/wrkgrp12/wg_rep_min.pdf.

[77]Draft Safety Codes for Iron and Steel Sector, Ministry of Steel, August 19, 2019, https://steel.gov.in/safety/draft-safety-codes-iron-steel-sector-seeking-comments-stakeholders.

[78]The Jallianwala Bagh National Memorial (Amendment) Bill, 2018, Ministry of Culture, https://www.prsindia.org/sites/default/files/bill_files/THE%20JALLIANWALA%20BAGH%20NATIONAL%20MEMORIAL%20Bill%20Text.pdf.

[79]Consultation Paper on Review of Scope of Infrastructure Providers Category-I (IP-I) Registration, Telecom Regulatory Authority of India, August 16, 2019,

https://main.trai.gov.in/sites/default/files/CP_NSL_Infra_16082019.pdf.

[80]Consultation Paper on Tariff related issues for Broadcasting and Cable services, Telecom Regulatory Authority of India, August 16, 2019,

https://main.trai.gov.in/sites/default/files/CP_Tariff_BnCS_16082019%20%281%29_0.pdf.

[81]  “Information Note to the Press: Consultation Paper on Tariff related issues for Broadcasting and Cable services, Telecom Regulatory Authority of India, August 16, 2019,

https://main.trai.gov.in/sites/default/files/PR_No.55of2019.pdf.

[82]List of MoUs signed during visit of Prime Minister to France (August 22, 2019)’, Ministry of External Affairs, August 22, 2019, https://www.mea.gov.in/bilateral-documents.htm?dtl/31756/List_of_MoUs_signed_during_visit_of_Prime_Minister_to_France_August_22_2019.

[83]List of MoUs signed during visit of External Affairs Minister to China, Ministry of External Affairs, August 12, 2019, https://www.mea.gov.in/bilateral-documents.htm?dtl/31725/List_of_MoUs_signed_during_visit_of_External_Affairs_Minister_to_China.

[84] Indian Railways to enforce ban on single use plastic material, Press Information Bureau, Ministry of Railways, August 21, 2019

 

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