रेलवे में सुरक्षा

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • रेलवे पर गठित स्टैंडिंग कमिटी (चेयरमैन: सुदीप बंदोपाध्याय) ने 14 दिसंबर, 2016 को रेलवे में सुरक्षा पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। कमिटी के प्रमुख निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:
     
  • संस्थागत संरचना : कमिटी ने टिप्पणी की कि रेलवे के प्रत्येक विभाग के परिसंपत्तियों की सुरक्षा से जुड़े मापदंड अलग-अलग हैं। प्रत्येक विभाग सुरक्षा के संबंध में अपनी चिंताओं को प्राथमिकता देता है। फिर भी विभागों के बीच सुरक्षा से संबंधित भिन्नताओं और विभागों से इतर सुरक्षा प्राथमिकताओं के चलते भारतीय रेलवे के लिए संपूर्ण सुरक्षा को सुनिश्चित करना कठिन हो सकता है। कमिटी ने सुझाव दिया कि सुरक्षा प्रदान करने का कार्य एक अलग विभाग को सौंपा जाए। रेलवे मंत्रालय को रेलवे के सुरक्षित कार्यकलाप पर ध्यान केंद्रित करने के लिए एक सदस्य (सुरक्षा) को नियुक्त करना चाहिए।
     
  • रेलवे में पर्याप्त निवेश नहीं : कमिटी ने टिप्पणी की कि 1950 से 2016 के बीच एक ओर रेलवे का रूट किलोमीटर 23% तक बढ़ा, तो दूसरी ओर उसके यात्री और माल ढुलाई यातायात में क्रमशः 1,344% और 1,642% की वृद्धि हुई। रेल नेटवर्क के अत्यंत धीमे विस्तार ने मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर पर अनावश्यक दबाव बनाया है जिससे भीड़-भाड़ बढ़ी है और सुरक्षा संबंधी समझौते करने पड़े हैं। इसके अतिरिक्त रेलवे में पर्याप्त निवेश न होने के कारण भीड़भाड़ भरे रूट, नई ट्रेनों को शामिल न कर पाना, ट्रेनों की गति को कम करना और अधिक रेल दुर्घटनाएं जैसे परिणाम सामने आए हैं।
     
  • मानव रहित लेवल क्रॉसिंग्स पर दुर्घटनाएं : कमिटी ने टिप्पणी की कि मानव रहित लेवल क्रॉसिंग्स (यूएमएलसीज) (या रेलवे क्रॉसिंग्स) रेल दुर्घटनाओं में लोगों के हताहत होने का सबसे बड़ा कारण बने हुए हैं। वर्तमान में रेल नेटवर्क में 14,440 यूएमएलसीज हैं। वर्ष 2014-15 में लगभग 40% और वर्ष 2015-16 में लगभघ 28% दुर्घटनाएं यूएमएलसीज पर हुईं। वर्ष 2010 से 2013 के बीच मंत्रालय यूएमएलसीज को समाप्त करने के लक्ष्य पूरे नहीं कर पाया। इसके बाद 2014-15 में यूएमएलसीज को समाप्त करने का लक्ष्य लगभग 50% कम कर दिया गया। कमिटी ने सुझाव दिया कि सड़क का प्रयोग करने वालों को आने वाली ट्रेन के बारे में ऑडियो विजुअल चेतावनी देने के लिए अप्रोचिंग ट्रेन वॉर्निंग सिस्टम्स, ट्रेन एक्चुएटेड वॉर्निंग सिस्टम्स जैसे कुछ उपाय किए जाने चाहिए। इसके अतिरिक्त आने वाले ट्रैफिक की गति को कम करने के लिए लेवल क्रॉसिंग गेट्स से पहले सड़कों पर अतिरिक्त स्पीड ब्रेकर बनाए जाने चाहिए। फाटक वाले क्रॉसिंग या मानव रहित क्रॉसिग्स, दोनों जगहों पर ऐसे उपाय किए जाने चाहिए।
     
  • पटरी से उतरने के कारण दुर्घटनाएं : 2003-04 और 2015-16 के दौरान दुर्घटनाओं में हताहत होने का दूसरा सबसे बड़ा कारण रेलों का पटरियों से उतरना था। वर्ष 2015-16 में लगभग 84% दुर्घटनाएं रेलों के पटरियों से उतरने के कारण हुईं। रेलों के पटरियों से उतरने के मुख्य कारणों में से एक है पटरियों या रोलिंग स्टॉक की खराबी। देश में रेल की पटरियों की कुल लंबाई 1,14,907 किलोमीटर है जिसमें 4,500 किलोमीटर का हर वर्ष नवीनीकरण किया जाना चाहिए। वर्तमान में जहां 5,000 किलोमीटर पटरियों का वार्षिक नवीनीकरण अभी बाकी है, सिर्फ 2,700 किलोमीटर के नवीनीकरण का लक्ष्य रखा गया है। कमिटी ने यह टिप्पणी भी की कि अगर लिंक हॉफमैन बुश (एलएचबी) कोच वाली ट्रेनें पटरियों से उतरती हैं तो हताहतों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है। इसका कारण यह है कि दुर्घटना की स्थिति में ऐसे कोच एक के ऊपर एक नहीं चढ़ते। कमिटी ने सुझाव दिया कि भारतीय रेलवे को एलएचबी कोचों का पूरी तरह इस्तेमाल करना चाहिए।
     
  • रेलवे कर्मचारियों के कारण दुर्घटनाएं : कमिटी ने टिप्पणी दी कि आधे से अधिक दुर्घटनाएं रेल कर्मचारियों की चूक के कारण होती हैं। इनमें काम करने में चूक, मरम्मत का काम ठीक से न करना, शॉर्ट कट्स को अपनाना, सुरक्षा संबंधी नियमों और कार्य प्रक्रियाओं की अनदेखी करना इत्यादि शामिल है। कमिटी ने सुझाव दिया कि प्रत्येक श्रेणी के रेल कर्मचारियों के लिए नियमित रिफ्रेशर कोर्स संचालित किए जाने चाहिए। इस कोर्स में सामान्य गलतियों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं की केस स्टडी, काम करने का पैटर्न, आधुनिकीकरण और तकनीकी उन्नयन शामिल किया जा सकता है।
     
  • लोको-पायलट्स के कारण दुर्घटनाएं : सिग्नल संबंधी गलतियों के कारण भी दुर्घटनाएं होती हैं जिनके लिए लोको-पायलट्स (ट्रेन ऑपरेटर) जिम्मेदार होते हैं। रेल यातायात के बढ़ने से हर किलोमीटर पर लोको-पायलट्स को सिग्नल का सामना करना पड़ता है और उन्हें लगातार हाई अलर्ट पर रहना होता है। इसके अतिरिक्त वर्तमान में लोको-पायलट्स को किसी भी प्रकार का तकनीकी सहयोग प्राप्त नहीं है और उन्हें सिग्नल पर सतर्क नजर रखनी पड़ती है और उसी के अनुसार ट्रेन को नियंत्रित करना पड़ता है। लोको-पायलट्स ड्यूटी के लिए निश्चित घंटों से अधिक काम करते हैं और अत्यधिक दबाव में होते हैं। उनके काम का दबाव और थकान हजारों यात्रियों की जिंदगी जोखिम में डालती है और ट्रेनों के संचालन की सुरक्षा को प्रभावित करती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि लोको पायलट्स और दूसरे संबंधित रनिंग स्टाफ को काम करने की अच्छी स्थितियां, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और उनके प्रदर्शन को सुधारने के लिए अन्य सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए। सिग्नलों को समान दूरियों पर लगाया जाना चाहिए। सिग्नल दृश्य होने चाहिए। साथ ही सिग्नल ऐसे स्थान पर लगे होने चाहिए कि गति से आती ट्रेन में उचित दूरी पर ब्रेक लगाई जा सके।

 

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