यातना के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र कनवेंशन का कार्यान्वयन

 विधि आयोग की रिपोर्ट का सारांश

  • भारतीय विधि आयोग (चेयरपर्सन : डॉ. जस्टिस बी.एस.चौहान) ने 30 अक्टूबर, 2017 को विधि और न्याय मंत्रालय को कानून के जरिए ‘यातना एवं अन्य क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार या दंड के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र कनवेंशनका कार्यान्वयनपर अपनी रिपोर्ट सौंपी। भारत ने इस कनवेंशन पर 14 अक्टूबर, 1997 को हस्ताक्षर किए थे लेकिन अब तक उसका अनुमोदन (रैटिफिकेशन) नहीं किया है।
     
  • सर्वोच्च न्यायालय के सुझाव के बाद इस मामले को जुलाई, 2017 को विधि आयोग के पास भेजा गया था। मौत की सजा पर लंबे समय तक फैसला न लिए जाने के कारण अक्सर आरोपियों को यातना से गुजरना पड़ता है। इसी से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने यह सुझाव दिया था।
     
  • कनवेंशन का उद्देश्य : कनवेंशन यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि विभिन्न देश ऐसी संस्थागत प्रक्रियाओं को स्थापित करें जिनसे यातना के इस्तेमाल पर रोक लगाई जा सके। प्रत्येक देश, जोकि इस कनवेंशन में साझीदार हैं, से यह अपेक्षा की जाती है कि वे कुछ कदम उठाएंगे, जैसे (i) यातना को रोकने के लिए कानूनी, प्रशासनिक, न्यायिक या अन्य उपाय, करना और (ii) यह सुनिश्चित करना कि यातना एक दंडनीय अपराध है, इत्यादि। इन शर्तों को पूरा करने के लिए आयोग ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 और भारतीय एविडेंस एक्ट, 1872 में संशोधन का सुझाव दिया है। इसके अतिरिक्त आयोग ने मसौदा यातना रोकथाम बिल, 2017 भी सौंपा है। यह मसौदा बिल उन कृत्यों को स्पष्ट करता है जिन्हें यातना कहा जा सकता है और ऐसे कृत्यों के लिए दंड का निर्धारण करता है।
     
  • कनवेंशन की पुष्टि : आयोग ने गौर किया कि भारत को विदेशों से अपराधियों के प्रत्यर्पण में समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कनवेंशन किसी ऐसे देश में प्रत्यर्पण पर प्रतिबंध लगाता है जहां यातना दिए जाने का खतरा है। आयोग ने सुझाव दिया कि इस मसले को कनवेंशन को पुष्टि देकर हल किया जाना चाहिए।
     
  • यातना की परिभाषा : आयोग ने गौर किया कि मौजूदा भारतीय कानूनों में यातना की कोई परिभाषा नहीं दी गई है। मसौदा यातना रोकथाम बिल, 2017 के अनुसार, पब्लिक सर्वेंट या उसके द्वारा अधिकृत कोई व्यक्ति यातना के कृत्य में लिप्त है, अगर वह सूचना हासिल करने या दंड देने के उद्देश्य से दूसरे व्यक्ति को : (i) गंभीर चोट, (ii) जीवन, अंग या स्वास्थ्य को खतरा या (iii) गंभीर शारीरिक या मानसिक दर्द पहुंचाता है। इस प्रक्रिया के दौरान अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो यह भी यातना ही माना जाएगा। इस परिभाषा में यातना के दौरान होने वाली मृत्यु को भी शामिल किया गया है।
     
  • यातना के कृत्यों के लिए दंड : यातना के इस्तेमाल को रोकने के लिए आयोग ने उन व्यक्तियों के लिए कड़े दंड का सुझाव दिया है जो ऐसे कृत्य करते हैं। मसौदा यातना रोकथाम बिल, 2017 के अनुसार, यातना के लिए 10 वर्ष तक का कारवास और जुर्माना भुगतना पड़ सकता है। अगर यातना के कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो दंड में जुर्माने के अतिरिक्त मृत्यु या आजीवन कारावास भी शामिल हैं।
     
  • व्यक्तियों को सुरक्षा : आयोग ने सुझाव दिया कि यातना के पीड़ितों, शिकायतकर्ताओं और गवाहों को संभावित हिंसा और दुर्व्यवहार से सुरक्षित रखने के लिए प्रभावी प्रक्रियाओं को स्थापित किया जाए। मसौदा यातना रोकथाम बिल, 2017 इन व्यक्तियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य सरकारों को देता है। शिकायत दर्ज कराने के समय से लेकर अपराध के लिए मुकदमा चलाने तक राज्य सरकार इन व्यक्तियों को सुरक्षा प्रदान करेगी।
     
  • यातना के लिए मुआवजा : यातना की स्थिति में मुआवजे के भुगतान को अनुमति देने के लिए आयोग ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 में संशोधन का सुझाव दिया। आयोग ने सुझाव देते हुए कहा कि न्यायालयों ने पहले भी विभिन्न प्रकार की यातनाओं, जिसमें अवैध तरीके से कैद में रखना और हिरासत में यातना देना शामिल है, के लिए मुआवजे का आदेश दिया है।
     
  • आयोग ने सुझाव दिया कि न्यायालयों को मुआवजे का निर्धारण करने के लिए अन्य कारणों के अतिरिक्त यह भी देखना चाहिए कि किसी व्यक्ति को पहुंचाई गई चोट की प्रकृति क्या है और चोट किस कारण से और किस हद तक पहुंचाई गई है। इसके अतिरिक्त न्यायालयों को पीड़ित की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मुआवजे में मेडिकल उपचार और पुर्नवास शामिल हों।
     
  • हिरासत में चोट : आयोग ने यह सुनिश्चित करने के लिए भारतीय एविडेंस एक्ट, 1872 में संशोधन के सुझाव दिए कि अगर पुलिस हिरासत में किसी व्यक्ति को चोटें लगती हैं तो यह माना जाएगा कि ये पुलिस द्वारा पहुंचाई गई हैं। यह साबित करने की जिम्मेदारी (बर्डन ऑफ प्रूफ) पुलिस अधिकारियों की है कि किसी व्यक्ति को ये चोटें कैसे लगीं।
     
  • सॉवरिन इम्युनिटी : सॉवरिन इम्युनिटी नामक सिद्धांत के अनुसार सरकार अपने एजेंट्स (जैसे पुलिस बलों) के कृत्यों के लिए जिम्मेदार नहीं है। आयोग ने कहा कि न्यायालयों ने इस सिद्धांत को विभिन्न मामलों में नामंजूर किया है और इसलिए सरकार के एजेंट्स यातना के कृत्यों में शामिल नहीं हो सकते। आयोग ने दोहराया कि देश के नागरिक संवैधानिक अधिकारों, जैसे जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों के हकदार हैं।

 

 

अस्वीकरणः प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) की स्वीकृति के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।