म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट से बिजली उत्पादन

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • ऊर्जा संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: डॉ. किरीट सोमैय्या) ने म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट (म्यूनिसिपल ठोस कचरा/अवशिष्ट) से बिजली उत्पादन पर अपनी रिपोर्ट 5 अगस्त, 2016 को सौंपी। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:
     
  • म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट : देश में प्रति दिन 1.43 लाख मीट्रिक टन का ठोस कचरा उत्पन्न होता है। इसमें से 23% कचरे का उपचार और निस्तारण किया जाता है। उल्लेखनीय है कि स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) के तहत, वर्ष 2019 तक म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट के शत प्रतिशत वैज्ञानिक प्रसंस्करण और निस्तारण की परिकल्पना की गई है। कमिटी ने सुझाव दिया कि सभी शहरी स्थानीय निकायों को कचरे को उपचारित करने की प्रणालियां स्थापित करने के लिए कार्रवाई योजना तैयार करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त सभी सरकारी कार्यालयों, घरों और वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों में कचरे को अलग-अलग करना (सेग्रेगेशन) अनिवार्य किया जाना चाहिए। कमिटी ने यह सुझाव भी दिया कि एसबीएम के तहत म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट के वैज्ञानिक उपचार और निस्तारण को अनिवार्य किया जाना चाहिए।
     
  • तकनीकी विकल्प : कचरे से ऊर्जा विभिन्न प्रकार से उत्सर्जित की जा सकती है, जैसे : (i) गीले बायोग्रेडेबल कचरे का बायोमीथेनेशन (इससे बायोगैस उत्पादित होती है), (ii) ज्वलनशील कचरे के सूखे, उच्च ऑर्गेनिक अवयवों से उत्सर्जित ईंधन को जलाना, और (iii) ठोस कचरे की मास बर्निंग (एक साथ जलाना)। इनमें से अधिकतर तकनीकों का प्रयोग करने के लिए कचरे को उचित तरीके से अलग-अलग (सेग्रेगेट) करना होता है और इसके लिए कोई प्रभावी तंत्र मौजूद नहीं है। कमिटी ने सुझाव दिया कि सरकार को कचरे को ऊर्जा में बदलने के लिए नीतिगत और तकनीकी सहयोग प्रदान करना चाहिए। इसके अतिरिक्त म्यूनिसिपल कचरे की मास बर्निंग को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए क्योंकि यह पर्यावरण के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है।
     
  • शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) की भूमिका : कमिटी ने कहा कि ऊर्जा क्षेत्र में कचरे के उपयोग को लेकर कई समस्याएं आती हैं, जैसे (i) अनियमित और अपर्याप्त आपूर्ति, (ii) निश्चित शुल्क का भुगतान न होना, और (iii) बिजली सहित कचरा प्रसंस्करण की परियोजनाओं की मार्केटिंग न होना। म्यूनिसिपल ठोस कचरे को प्रबंधित करने के लिए एसबीएम के तहत अनेक कदम उठाए गए हैं जैसे शहरी स्थानीय निकाय वाले राज्यों के लिए वायबिलिटी गैप फंडिंग। फिर भी इनसे शहरों को कचरे की नियमित आपूर्ति करने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जा सका। कमिटी ने सुझाव दिया कि राज्यों और शहरी स्थानीय निकायों को दिए जाने वाले अनुदान को बढ़ाया जाना चाहिए। इस क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए उपकरणों और मशीनरी पर टैक्स छूट देने पर विचार किया जाना चाहिए।
     
  • कमिटी ने यह सुझाव भी दिया कि कचरा एकत्र करने की प्रक्रिया अधिक वैज्ञानिक और प्रभावी होनी चाहिए। स्थानीय निकायों को प्रति दिन उत्पन्न होने वाले म्यूनिसिपल कचरे की मात्रा का उचित तरीके से अनुमान लगाना चाहिए जिससे अवशिष्ट ऊर्जा संयंत्र तक तयशुदा तरीके से उसकी आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। कचरा एकत्रण की क्षमता को बढ़ाने के लिए राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों को कचरा बीनने वालों और कबाड़ियों को औपचारिक तंत्र में शामिल करना चाहिए।
     
  • शुल्क की दर : केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग (सीईआरसी) ने कचरे से बनने वाली बिजली के लिए 7.9 रुपए प्रति यूनिट की शुल्क दर अधिसूचित की है। कमिटी ने सुझाव दिया कि विद्युत एक्ट, 2003 में संशोधन के माध्यम से सीईआरसी द्वारा शुल्क दर के निर्धारण के कार्य की समीक्षा की जानी चाहिए। ऊर्जा संयंत्रों में सभी प्रकार के कचरे से उत्सर्जित होने वाली बिजली की शुल्क दर को प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी के जरिये तय किया जाना चाहिए।
     
  • कमिटी ने यह सुझाव भी दिया कि अधिक प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों जैसे रेस्त्रां, होटल और अन्य वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों से यह कहा जाना चाहिए कि वे कचरे को अलग-अलग करने (सेग्रेगेशन) और उसके निस्तारण से संबंधित वैज्ञानिक पद्धतियों को विकसित करें। अगर वे ऐसा करने में सफल नहीं होते तो उन पर टैक्स, सेस या जुर्माना लगाया जा सकता है। कमिटी ने कहा कि आम लोगों को कचरे के निस्तारण के लिए दो बार भुगतान करना पड़ता है : (i) पहली बार स्थायीन निकायों को अपने घर से कचरा एकत्र करने के लिए, और (ii) दूसरी बार कचरे से बिजली बनाने वाले को मुआवजा देने के लिए बिजली की ऊंची कीमत चुकाकर। कमिटी ने सुझाव दिया कि कुछ वैकल्पिक व्यवस्था अपनाई जानी चाहिए जिससे आम लोगों को दो बार भुगतान करने पर मजबूर न होना पड़े।
     
  • अथॉरिटीज : कमिटी ने इस बात पर गौर किया कि केंद्रीय स्तर पर अनेक मंत्रालय म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट के निपटान का काम करते हैं। इनमें शहरी विकास, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय शामिल हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि राज्य सरकार एवं स्थानीय निकायों और केंद्रीय मंत्रालयों के प्रतिनिधियों की सदस्यता वाली मॉनिटरिंग कमिटी गठित की जानी चाहिए। यह कमिटी हर स्तर पर प्रयासों में समन्वय स्थापित करेगी और ‘कचरे से ऊर्जा’ (वेस्ट टू एनर्जी) संयंत्रों को सफल बनाने हेतु कार्य-विधियों और तकनीकों से संबंधित सुझाव देगी। कमिटी में तकनीकी विशेषज्ञ, वित्तीय विश्लेषक, निजी क्षेत्र के प्रतिनिधि इत्यादि शामिल हो सकते हैं।

 

 

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