भारत में पब्लिक क्रेडिट रजिस्ट्री

हाई लेवल टास्क फोर्स रिपोर्ट का सारांश

  • भारत में पब्लिक क्रेडिट रजिस्ट्री बनाने की आवश्यकता और संभावना का विश्लेषण करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने एक हाई लेवल टास्क फोर्स (चेयर: वाय. एम. देवस्थली) का गठन किया था। टास्क फोर्स ने 4 अप्रैल, 2018 को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
     
  • पब्लिक क्रेडिट रजिस्ट्री एक विस्तृत डेटाबेस होता है। इसमें कर्जदारों की ऋण संबंधी सूचनाएं होती हैं और यह डेटाबेस उधार और ऋण देने वाले सभी संस्थानों को उपलब्ध होता है। सामान्य तौर पर सरकारी अथॉरिटी, जैसे देश का केंद्रीय बैंक पब्लिक क्रेडिट रजिस्ट्री का प्रबंधन करता है और कर्ज देने और/या कर्ज लेने वालों के लिए इसमें अपने ऋण संबंधी विवरण को दर्ज कराना कानूनन अनिवार्य होता है।
     
  • टास्क फोर्स के विचारार्थ विषयों (टर्म्स ऑफ रिफरेंस) में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) भारत में ऋण संबंधी सूचनाओं की मौजूदा उपलब्धता की समीक्षा करना और उसकी कमी का मूल्यांकन करना, (ii) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रेडिट रजिस्ट्रीज़ की सर्वोत्तम कार्य प्रणालियों का अध्ययन करना, और (iii) अगर रजिस्ट्री बनाई जाती है तो एक ब्यौरेवार क्रेडिट रजिस्ट्री के दायरे और संरचना का निर्धारण करना।
     
  • मौजूदा भारतीय संदर्भ: वर्तमान में भारत में सरकारी और निजी, दोनों स्तरों पर विभिन्न संस्थाएं क्रेडिट डेटा स्टोर करती हैं:
    • (i) देश में निजी क्षेत्र की चार क्रेडिट सूचना कंपनियां (सीआईसीज़) हैं- ट्रांसयूनियन क्रेडिट इनफॉरमेशन ब्यूरो (इंडिया) लिमिटेड (ट्रांसयूनियन सिबिल), इक्विफैक्स, एक्सपीरियन और क्रिफ हाई मार्क। आरबीआई ने रेगुलेटेड क्रेडिट संस्थानों के लिए यह अनिवार्य किया है कि वे सभी प्रकार की सीआईसीज़ में कर्जदारों की ऋण संबंधी सूचनाओं को दर्ज कराएं।
       
    • (ii) आरबीआई के अंतर्गत निम्नलिखित शामिल हैं: (i) सेंट्रल रिपॉजिटरी ऑफ इनफॉरमेशन ऑन लार्ज क्रेडिट्स (सीआरआईएलसी), और (ii) बेसिक स्टैटिस्टिकल रिटर्न-1 (बीएसआर-1)। सीआरआईएलसी में ऐसे सभी कर्जदारों की क्रेडिट संबंधी सूचनाएं होती हैं जिनके ऋण पांच करोड़ रुपए से अधिक के हैं। बीएसआर-1 सभी ऋणों का क्षेत्र आधारित विवरण प्रदान करता है, राशि चाहे कितनी भी हो और इसीलिए इसमें कर्जदारों की व्यक्तिगत पहचान उपलब्ध नहीं है।
       
    • (iii) इसके अतिरिक्त कुछ अन्य प्रणालियां भी हैं जो विशिष्ट ऋण सूचनाएं दर्ज करती हैं जैसे इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी संहिता, 2016 के अंतर्गत पंजीकृत इनफॉरमेशन यूटिलिटीज़। इसमें ऋण, देनदारियों जैसी वित्तीय सूचनाएं और बैलेंस शीट संबंधी विवरण स्टोर होते हैं। इसके जरिए डीफॉल्ट्स की पहचान करने में मदद मिलती है।
       
  • मौजूदा संरचनाओं की चुनौतियां: टास्क फोर्स ने देश में ऋण सूचनाओं से जुड़ी मौजूदा संरचनाओं में अनेक प्रकार की कमियों का पता लगाया, जैसे (i) स्टोर किया गया डेटा विस्तृत नहीं है और विभिन्न एंटिटीज में बंटा हुआ है, जैसे बैंक से कर्ज, कॉरपोरेट्स में आपसी उधारियां, विदेशी उधारियां, इत्यादि एक रेपोजिटरी में उपलब्ध नहीं है, (ii) यह अपने आप किए जाने वाले खुलासों पर निर्भर है, उदाहरण के लिए कर्जदार को अपनी आय का विवरण, एसेट्स और देनदारियों के बारे में खुद खुलासा करना होता है, (iii) डेटा को दोबारा पुष्ट (क्रॉस वैलिडेट) करना पड़ता है, जैसे लिस्टेड कंपनियों के लिए इनकम टैक्स वेबसाइट्स को चेक करना पड़ता है, (iv) सूचनाओं के सभी स्रोतों के बीच समय अंतराल (टाइम लैग्स) और विसंगतियां भी हैं यानी सभी में भिन्न-भिन्न समय पर दर्ज की गई सूचनाएं प्राप्त होती हैं और उनमें एकरूपता भी नहीं होती, (v) ऋण संस्थानों पर सूचना दर्ज कराने का अत्यधिक दबाव है क्योंकि उन्हें अलग-अलग एंटिटीज़ में सूचनाएं दर्ज करानी पड़ती हैं, और (vi) सिबिल जैसे पोर्टल पेड पोर्टल हैं और ऋणदाता को डेटा हासिल करने का खर्च खुद उठाना पड़ता है।
     
  • मौजूदा संरचना के परिणाम: मौजूदा संरचनाओं में अलग-अलग खंडों में सूचनाएं दर्ज कराई जाती हैं और उनमें एकरूपता भी नहीं होती। इससे ऋण बाजार की कार्यक्षमता पर असर पड़ता है, जैसे (i) ऋण संस्थानों के पास सभी कर्जदारों की पूरी सूचना नहीं होती, इसलिए सभी कर्जदार एक बराबर ब्याज चुकाते हैं, भले ही उनकी जोखिम या क्रेडिट रेटिंग कोई भी हो, (ii) ऋणदाताओं द्वारा उन ग्राहकों को कर्ज देने की आशंका बनती है जिन्होंने पूर्व में कोई चूक या अपराध किया हो पर इसके बारे में ऋणदाताओं को जानकारी न हो, इस प्रकार ऋणदाताओं को अधिक बड़े ऋण जोखिम का सामना करना पड़ सकता है, और (iii) इससे बाजार के कुछ उपवर्गों को ऋण मिलने में रुकावट आ सकती है जैसे छोटे और मध्यम दर्जे के उद्योगों को बाय डीफॉल्ट रिस्की माना जाता है और अक्सर ऋण संबंधी पूर्व विवरण न होने के कारण उन्हें जरूरत के समय ऋण नहीं मिल पाते।
     
  • पब्लिक क्रेडिट रजिस्ट्री: टास्क फोर्स ने कहा कि सूचनाओं में एकरूपता होने और ऋण तक सभी की पहुंच बढ़ने से ऋण बाजार में पारदर्शिता आएगी और इससे ऋणदाताओं और कर्जदारों, दोनों को मदद मिलेगी। कमिटी ने पारदर्शिता के लिए पब्लिक क्रेडिट रजिस्ट्री बनाने का सुझाव दिया। क्रेडिट रजिस्ट्री के लिए निम्नलिखित आवश्यक है: (i) उसे उपयुक्त कानूनी ढांचे का समर्थन मिलना चाहिए, (ii) उसमें सभी प्रकार के ऋणों की सूचना स्टोर होनी चाहिए, चाहे ऋण की राशि कोई भी हो, (iii) उसमें ऐसी सूचनाएं भी स्टोर होनी चाहिए जिन्हें वर्तमान में क्रेडिट इनफॉरमेशन सिस्टम में रिकॉर्ड नहीं किया जाता, जैसे बाहरी उधारियों से संबंधित डेटा, (iv) उसमें सप्लीमेंटरी क्रेडिट डेटा स्टोर होना चाहिए, जैसे पहले किए गए युटिलिटी बिल के भुगतान, इससे ऐसे लोगों को भी ऋण लाभ मिल सकेंगे, जिन्होंने पहले कोई ऋण न लिया हो, और (v) उसे सभी प्रकार की सूचनाओं की सुरक्षा और प्राइवेसी सुनिश्चित करनी चाहिए। इसमें कर्जदार अपनी क्रेडिट रिपोर्ट एसेस कर पाएं। साथ ही सभी स्टेकहोल्डर्स को नीड टू नो’ आधार पर एसेस मिलना चाहिए और उसे केवल अधिकृत उद्देश्य के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त रिपोर्टिंग एंटिटीज को रजिस्ट्री में रिपोर्ट किए गए डेटा की गुणवत्ता सुनिश्चित करनी चाहिए।
     
  • अंतरराष्ट्रीय प्रणालियां: यूरोपीय संघ के अधिकतर सदस्य देशों सहित विभिन्न देशों में सेंट्रल क्रेडिट रजिस्ट्री का प्रबंधन देश का केंद्रीय बैंक करता है। रजिस्ट्री में रिपोर्ट करना कानून द्वारा अनिवार्य होता है। यह ऋणदाताओं और कर्जदारों को क्रेडिट रिपोर्ट उपलब्ध कराता है (अपनी खुद की स्थितियों पर)। पब्लिक रजिस्ट्री के अतिरिक्त कई निजी क्रेडिट ब्यूरो भी होते हैं जिनमें रिपोर्ट करना स्वैच्छिक होता है। निजी ब्यूरो अपनी क्रेडिट सूचनाओं में पब्लिक रजिस्ट्रीज़, टैक्स अथॉरिटीज़, युटिलिटी बिल पेमेंट डेटाबेस और लीगल प्रोसीडिंग्स डेटाबेस जैसे स्रोतों से प्राप्त होने वाले डेटा को भी शामिल करते हैं और ऋणदाताओं को डेटा उपलब्ध कराते हैं। वे क्रेडिट एसेसमेंट और स्कोरिंग जैसी सेवाएं भी उपलब्ध कराते हैं।

 

 

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