बिजली क्षेत्र में स्ट्रेस्ड/नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स

रिपोर्ट का सारांश

  • ऊर्जा संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर : डॉ. कंभमपति हरिबाबू) ने 7 मार्च, 2018 को ‘बिजली क्षेत्र में स्ट्रेस्ट/नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स’ पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं :
     
  • स्ट्रेस्ड एसेट्स: कमिटी ने कहा कि आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 में दोहरी बैलेंस शीट की समस्या का जिक्र किया गया था। कंपनियों की निर्धारित अवधि (आरबीआई के अनुसार 90 दिन) में इतनी कमाई नहीं हो रही है कि वे बैंक लोन पर ब्याज चुकाएं। ये लोन नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) में बदल जाते हैं जिससे बैंकों को उचित उपाय करने पड़ते हैं (जैसे रैक्टिफिकेशन, रीस्ट्रक्चरिंग और रिकवरी)। परिणामस्वरूप ये कंपनियां नई क्षमताओं में निवेश नहीं करना चाहतीं और खराब लोन के साथ बैंक उधार नहीं देना चाहते। ऐसा ही एक क्षेत्र थर्मल पावर है जहां सबसे अधिक एनपीए हैं। स्ट्रेस्ड एसेट्स में एनपीए के साथ-साथ ऐसे प्रॉजेक्ट्स भी आते हैं जो एनपीए बन सकते हैं।
     
  • ऊर्जा क्षेत्र में स्ट्रेस्ड एसेट्स: जून 2017 तक बिजली क्षेत्र में 37,941 करोड़ रुपए का एनपीए था। कमिटी ने उन 34 थर्मल पावर प्रॉजेक्ट्स पर विचार किया जो स्ट्रेस्ड एसेट्स में बदल गए हैं। इनकी क्षमता 40 गिगावॉट की है। इन थर्मल पावर प्रॉजेक्टस पर वित्तीय दबाव के कारणों में निम्नलिखित शामिल हैं : (i) ईंधन (कोयला) उपलब्ध न होना, (ii) राज्यों द्वारा पर्याप्त पावर पर्चेज एग्रीमेंट्स (पीपीएज़) की कमी, (iii) प्रमोटर में इक्विटी और वर्किंग कैपिटल लगाने क्षमता न होना, (iv) टैरिफ संबंधी विवाद, (v) बैंकों से संबंधित समस्याएं, और (vi) प्रॉजेक्ट्स शुरू करने में विलंब, जिससे लागत बढ़ जाती है।
     
  • कमिटी ने कहा कि बिजली क्षेत्र में स्थिरता कई बातों पर निर्भर करती है जैसे मांग-आपूर्ति की स्थिति, पीपीएज़ पर हस्ताक्षर, ईंधन आपूर्ति का एग्रीमेंट (एफएसएज़), ट्रांसमिशन और वितरण नेटवर्क की उपलब्धता, बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) की वित्तीय स्थिति और दूसरे रेगुलेटरी फ्रेमवर्क। ऊर्जा क्षेत्र में स्ट्रेस्ड एसेट्स या एनपीएज़ की समस्या में ये सभी शामिल हैं।
     
  • कमिटी ने कहा कि वर्तमान में ऊर्जा क्षेत्र में ऋण बाध्यता पूरी न करने में अगर एक दिन की भी देरी होती है तो एसेट (पावर प्रॉजेक्ट) डी-रेट हो जाता है। जैसे ही रेटिंग गिरती है, बैंक एसेट को सपोर्ट करने की बजाय दंड ब्याज (पीनल इंटरेस्ट) लेने लगते हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि किसी एसेट को एनपीए के रूप में वर्गीकृत करने और इसके बाद कार्रवाई करने के लिए बैंकों को उन कारणों पर विचार करना चाहिए जिनके परिणामस्वरूप कोई एसेट एनपीए बनता है और इस संबंध में मदद करनी चाहिए ताकि वह एनपीए न बने।
     
  • कमिटी ने यह भी कहा कि बैंकों ने पावर प्रॉजेक्ट्स के लोन्स पर विचार करने के दौरान सावधानी नहीं बरती। उसने सुझाव दिया कि लोन देने की प्रक्रिया, निरीक्षण तंत्र और उसकी निगरानी पर दोबारा गौर किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त आरबीआई को सभी कमर्शियल बैंकों को परामर्श देना चाहिए कि वे इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के क्रेडिट रिस्क का आकलन करने के लिए सरकार द्वारा प्रस्तावित क्रेडिट रेटिंग सिस्टम का पालन करें और उसी के हिसाब से जोखिम का निर्धारण करें।
     
  • स्ट्रैटेजिक डेट रीस्ट्रक्चरिंग (एसडीआर): एक बार कोई प्रॉजेक्ट एनपीए के रूप में वर्गीकृत होता है तो उधार देने वाले अनेक उपाय करते हैं। इनमें से एक एडीआर है जिसमें ओनरशिप बदलकर एकाउंट्स की रीस्ट्रक्चिंग की जाती है। अगर उधार लेने वाली कंपनी ऑपरेशनल या प्रबंधकीय अक्षमता की वजह से स्ट्रेस से बाहर नहीं निकल पाती तो इस तरीके को चुना जाता है। कमिटी ने कहा कि एसडीआर हमेशा कारगर नहीं होता क्योंकि इसके वे समस्याएं हल नहीं होतीं जिनके कारण कोई प्रॉजेक्ट एनपीए बनता है। उसने सुझाव दिया कि प्रबंधन (एसेट के प्रमोटर) को बदलने पर तभी विचार किया जाना चाहिए, जब यह तय हो जाए कि प्रबंधन के फैसले के कारण ही कोई एसेट स्ट्रेस्ड एसेट में बदला है।
     
  • कोयले की उपलब्धता: कमिटी ने कहा कि राष्ट्रीय थर्मल पावर कॉरपोरेशन के अनेक प्लांट्स में कोयला बहुत कम उपलब्ध है। कोयला आबंटन की नई नीति शक्ति के अंतर्गत कोल लिंकेजेज़ नीलामी के आधार पर दिए जाते हैं। इस नीलामी के लिए पात्रता ऊर्जा मंत्रालय के लेटर्स ऑफ एश्योरेंस (एलओएज़) से निर्धारित होती है। कमिटी ने कहा कि 34 स्ट्रेस्ड एसेट्स के मामले में, कोल लिंकेज आबंटित होने के बावजूद तीन महीने तक एलओए जारी नहीं किए गए जिससे योग्य प्रमोटरों को कोयला मिलने में देरी हुई।
     
  • कमिटी ने सुझाव दिया कि कोल इंडिया लिमिटेड को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रत्येक प्रमोटर को समयबद्ध तरीके से उतना कोयला प्रदान किया जाए जितना जरूरी है। इसके अतिरिक्त पावर प्लांट्स को पर्याप्त कोयला मिलना चाहिए ताकि वे 85% एफीशिएंसी के साथ काम कर सकें। पावर प्लांट्स को मुख्य रूप से घरेलू कोयला इस्तेमाल करना चाहिए। अगर इन प्लांट्स की आर्थिक व्यवहार्यता बनी रहे तो उन्हें 15-20% आयातित कोयला इस्तेमाल करने की अनुमति दी जा सकती है।
     
  • राष्ट्रीय बिजली नीति: कमिटी ने कहा कि ऊर्जा क्षेत्र का विकास संतुलित नहीं है। हालांकि उत्पादन को डीलाइसेंस करने से उत्पादन गतिविधियां बढ़ी हैं, पर दूसरे सेगमेंट्स (ट्रांसमिशन और वितरण) पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया। बिजली नीति मंजूरियों, भूमि अधिग्रहण, पुराने और इनएफीशिएंट प्लांट्स को जारी रखने, एफएसए नीतियों में अस्थिरता और रेगुलेशन से संबंधित चुनौतियों और विलंब जैसी समस्याओं पर गौर नहीं करती। कमिटी ने ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए बिजली नीति पर दोबारा विचार करने का सुझाव दिया।

 

अस्वीकरणः प्रस्तुत रिपोर्ट आपके समक्ष सूचना प्रदान करने के लिए प्रस्तुत की गई है। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च (पीआरएस) की स्वीकृति के साथ इस रिपोर्ट का पूर्ण रूपेण या आंशिक रूप से गैर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए पुनःप्रयोग या पुनर्वितरण किया जा सकता है। रिपोर्ट में प्रस्तुत विचार के लिए अंततः लेखक या लेखिका उत्तरदायी हैं। यद्यपि पीआरएस विश्वसनीय और व्यापक सूचना का प्रयोग करने का हर संभव प्रयास करता है किंतु पीआरएस दावा नहीं करता कि प्रस्तुत रिपोर्ट की सामग्री सही या पूर्ण है। पीआरएस एक स्वतंत्र, अलाभकारी समूह है। रिपोर्ट को इसे प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के उद्देश्यों अथवा विचारों से निरपेक्ष होकर तैयार किया गया है। यह सारांश मूल रूप से अंग्रेजी में तैयार किया गया था। हिंदी रूपांतरण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी के मूल सारांश से इसकी पुष्टि की जा सकती है।