न्यू यूरिया पॉलिसी 2015 का कार्यान्वयन

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • रसायन और उर्वरक संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर : आनंदराव अडसुल) ने 19 दिसंबर, 2017 को ‘न्यू यूरिया पॉलिसी 2015 के कार्यान्वयन’ पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। न्यू यूरिया पॉलिसी 2015 को मई 2015 में जारी किया गया था। यह पॉलिसी निम्नलिखित का प्रयास करती है: (i) देसी यूरिया का उत्पादन बढ़ाना, (ii) यूरिया उत्पादन में ऊर्जा दक्षता (एनर्जी एफिशियंसी) को बढ़ावा देना, और (iii) केंद्र सरकार पर सब्सिडी के दबाव को कम करना।
     
  • यूरिया उत्पादन : 2015-16 की तुलना में 2016-17 में यूरिया उत्पादन में गिरावट आई, जैसा कि तालिका 1 में प्रदर्शित है। कमिटी ने कहा कि यूरिया के उत्पादन में यह गिरावट संतोषजनक नहीं थी। इसके अतिरिक्त कमिटी ने कहा कि पॉलिसी के लागू होने के बाद कुछ यूरिया मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट्स में उत्पादन कम हो गया। कमिटी ने सुझाव दिया कि उर्वरक विभाग को नियमित अंतराल पर यूरिया पॉलिसी की प्रगति की समीक्षा करनी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पॉलिसी प्रभावी ढंग से लागू हो रही है।

तालिका 1: यूरिया का उत्पादन (2014-17) (लाख मीट्रिक टन में)

 

2014-15

2015-16

2016-17

सार्वजनिक

69.3

70.8

71.4

सहकारी

63.5

69.4

66.8

निजी

93.1

104.6

103.8

कुल

225.9

244.8

242.0

SourceReport No. 40, Standing Committee on Chemicals and Fertilizers, December 2017; PRS.

  • यूरिया उत्पादन के लिए प्रोत्साहन : पॉलिसी के अंतर्गत 25 यूरिया यूनिट्स को उत्पादन लागत पर सब्सिडी दी जाती है, अगर वे अपनी अधिसूचित क्षमता से अधिक उत्पादन करती हैं। सब्सिडी का कैलकुलेशन इंटरनेशनल प्राइजिंग पॉलिसी (आईपीपी) के आधार पर किया जाता है। कमिटी ने गौर किया कि आईपीपी में बदलाव होने से कुछ यूरिया मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट्स के लिए निश्चित क्षमता से अधिक उत्पादन करना लाभकारी नहीं है। आईपीपी की अस्थिरता को देखते हुए कमिटी ने सुझाव दिया कि अधिसूचित क्षमता से अधिक उत्पादन करने पर यूरिया यूनिट्स को जो सब्सिडी दी जाती है, उसकी अदायगी को कुछ समय के लिए आईपीपी से डीलिंक कर दिया जाना चाहिए।
     
  • उत्पादन लागत पर सब्सिडी का भुगतान : कमिटी ने कहा कि अधिकृत कंपनियों को उत्पादन लागत पर सब्सिडी की राशि नहीं चुकाई गई। इस पर कमिटी ने यह सुझाव दिया कि इन कंपनियों को बिना देरी किए सब्सिडी दी जानी चाहिए, साथ ही विंटेज प्लांट्स (30 वर्ष से अधिक पुराने प्लांट्स) को जल्द से जल्द विशेष मुआवजा दिया जाना चाहिए।
     
  • ऊर्जा दक्षता : वर्तमान में गैस आधारित 25 यूरिया प्लांट्स को ऊर्जा संबंधी मानकों के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया है। प्रत्येक वर्ग के लिए जो ऊर्जा संबंधी मानक निश्चित किए गए हैं, उनके आधार पर इन यूनिट्स को छूट मिलती है। कमिटी ने कहा कि ऐसी फर्टिलाइजर यूनिट्स को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, चूंकि लक्षित मानकों को हासिल करने के लिए काफी अधिक निवेश की जरूरत पड़ती है। प्रॉजेक्ट्स एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड (पीडीआईएल) की एक रिपोर्ट में यह कहा गया कि इस पॉलिसी के अंतर्गत कुछ फर्टिलाइजर यूनिट्स को या तो नुकसान उठाना पड़ेगा या वे ऊर्जा लक्ष्य हासिल नहीं कर पाएंगी। कमिटी ने सुझाव दिया कि पीडीआईएल ने जो रिपोर्ट सौंपी है, उसे देखते हुए केंद्र सरकार को ऐसी फर्टिलाइजर यूनिट्स की कठिनाइयों को दूर करने का हल तलाशना चाहिए।
     
  • यूरिया यूनिट्स को गैस की सप्लाई : यूरिया यूनिट्स को एक समान मूल्य पर गैस प्राप्त हो, यह सुनिश्चित करने के लिए इन यूनिट्स को राष्ट्रीय ग्रिड से जोड़ा गया है। कमिटी ने गौर किया कि यूरिया मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट्स को रोजाना कुल 48-49 एमएमएससीएमडी (मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर्स पर डे) की जरूरत होती है। लेकिन देश में घरेलू गैस की सीमित उपलब्धता को देखते हुए फर्टिलाइजर सेक्टर के लिए घरेलू गैस आबंटन की अधिकतम सीमा 31.5 एमएमएससीएमडी निर्धारित की गई है। इसके अतिरिक्त इन यूनिट्स को रोजाना की जरूरत से 50% से भी कम (19-21 एमएमएससीएमडी) की सप्लाई की जाती है। इस कमी को दूर करने के लिए री-गैसिफाइड लिक्विफाइड प्राकृतिक गैस का आयात किया जाता है जो प्राकृतिक गैस के मुकाबले महंगी होती है। कमिटी ने सुझाव दिया कि यूरिया यूनिट्स को कम से कम 31.5 एमएमएससीएमडी (गैस आबंटन के लिए निर्धारित की गई मौजूदा राष्ट्रीय सीमा) की सप्लाई की जानी चाहिए।

 

 

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