नमामि गंगे का ऑडिट

कैग रिपोर्ट का सारांश

  • भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने 19 दिसंबर, 2017 को गंगा नदी के संरक्षण (नमामि गंगे)’ पर अपनी प्रदर्शन ऑडिट रिपोर्ट सौंपी। गंगा संरक्षण के पूर्ववर्ती और चालू कार्यक्रमों को एकीकृत करने के लिए मई 2015 में नमामि गंगे या एकीकृत गंगा संरक्षण मिशन को अंब्रैला कार्यक्रम के तौर पर मंजूर किया गया था। कैग ने फंड्स की उपलब्धता एवं उपयोग, विभिन्न योजनाओं/प्रॉजेक्टस के नियोजन (प्लानिंग) एवं कार्यान्वयन, मानव संसाधनों की प्रचुरता और निरीक्षण एवं मूल्यांकन प्रणालियों के प्रभावों का आकलन करने के लिए यह ऑडिट किया। ऑडिट के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं :
     
  • वित्तीय प्रबंधन : संशोधित अनुमानों की तुलना में 2014-15 से 2016-17 के दौरान केवल आठ से 63% फंड्स का उपयोग किया गया। इसी अवधि के दौरान राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) की 2,134 करोड़ रुपए की राशि का उपयोग नहीं हो पाया। सभी राज्य कार्यक्रम प्रबंधन समूहों (एसपीएमजीज़) के संबंध में यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट्स (यूसीज़) को जमा करने में भी विलंब पाया गया।
     
  • कैग ने सुझाव दिया कि एनएमसीजी वार्षिक कार्रवाई योजना तैयार कर सकता है, वार्षिक कार्रवाई योजना के आधार पर बजट अनुमान लगा सकता है और बजट आबंटन की तुलना में वास्तविक व्यय की नियमित समीक्षा करने के लिए उपयुक्त कार्रवाई कर सकता है। व्यय का नियमित निरीक्षण करने के लिए एनएमसीजी यूसीज़/एसपीएमजीज़ के वित्तीय वक्तव्यों की तैयारी और निश्चित समय पर उन्हें सौंपना सुनिश्चित कर सकता है।
     
  • प्रॉजेक्ट की प्लानिंग : राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी अथॉरिटी की अधिसूचना के आठ वर्ष से अधिक होने के बावजूद एनएमसीजी के पास कोई नदी घाटी प्रबंधन योजना नहीं है। 2014-15 से 2016-17 के दौरान 154 विस्तृत प्रॉजेक्ट रिपोर्ट्स (डीपीआरज़) में से केवल 71 मंजूर हुई थीं।
     
  • कैग ने सुझाव दिया कि लंबे समय से गंगा संरक्षण योजना को लागू करने के लिए एनएमसीजी गंगा नदी घाटी प्रबंधन योजना को प्राथमिकता के आधार पर अंतिम रूप दे सकता है और समयबद्ध तरीके से उसे लागू कर सकता है। एनएमसीजी यह सुनिश्चित भी कर सकता है कि डीपीआरज़ समयबद्ध तरीके से मंजूर किए जाएं।
     
  • प्रदूषण की कमी : अगस्त 2017 तक एनएमसीजी ने 1,397 मिलियन लीटर प्रति दिन (एमएलडी) की कुल क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्ज़ (एसटीपीज़) के लिए डीपीआरज़ को अंतिम रूप और मंजूरी नहीं दी है। इन डीपीआरज़ को मंजूरी देने की टारगेट डेट सितंबर 2016 थी। 5,111 करोड़ रुपए की लागत वाले 46 एसटीपीज़ और इंटरसेप्शन और डायवर्जन प्रॉजेक्ट्स में से 26 प्रॉजेक्ट्स में देरी हुई जिनकी लागत 2,710 करोड़ रुपए है। इसके कारणों में निम्नलिखित शामिल हैं : (i) प्रॉजेक्ट्स को लागू करने में देरी, (ii) जमीन उपलब्ध न होना और (iii) ठेकेदारों का धीमी गति से काम करना।
     
  • कैग ने सुझाव दिया कि एनएमसीजी सभी कस्बों और गांवों में सीवरेज से जुड़ी कमियों को व्यापक रूप से दूर कर सकता है। मिशन समयबद्ध तरीके से सीवेज प्रणालियों, एसटीपीज़ और इंटरसेप्शन और डायवर्जन वर्क्स की योजना भी बना सकता है। विभिन्न राज्यों की सरकारी अथॉरिटीज़ और एग्जीक्यूटिंग एजेंसियों की सलाह से एनएमसीजी और एसपीएमजीज़ यह सुनिश्चित करने के लिए एग्रीमेंट्स कर सकते हैं कि ठेके देने से पहले भूमि उपलब्ध हो।
     
  • गांवों की सफाई व्यवस्था : व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों, सूचना और शिक्षा अभियानों और ठोस तरल कचरा प्रबंधन जैसी गतिविधियों के लिए एनएमसीजी ने पांच राज्यों को 951 करोड़ रुपए की कुल राशि जारी की थी। लेकिन बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल ने इसमें से केवल आधी राशि का उपयोग किया। कैग ने सुझाव दिया है कि पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय की सलाह से एनएमसीजी उपलब्ध राशि के अच्छे से अच्छे उपयोग, समझदारी पूर्ण और व्यावहारिक योजना, डेटा की प्रामाणिकता और हासिल लक्ष्यों की निगरानी को सुनिश्चित कर सकता है।
     
  • मानव संसाधन की कमी : 2014-15 से 2016-17 के दौरान एनएमसीजी में मानव संसाधन की 44% से 65% कमी पाई गई। एसपीएमजीज़ में यह कमी 20% से 89% के बीच थी। कैग ने सुझाव दिया कि एनएमसीजी रिक्तियों को भरने के लिए भर्ती के नियम बना सकता है और कर्मचारियों की स्वीकृत संख्या को बढ़ा सकता है ताकि एनएमसीजी और एसपीएमजी, दोनों स्तरों पर प्रॉजेक्ट्स को प्रभावी तरीके से लागू किया जा सके।
     
  • निरीक्षण और मूल्यांकन : अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले 988 उद्योगों के संबंध में सीपीसीबी द्वारा 5,016 कंप्लायंस वैरिफिकेशन किए जाने चाहिए। लेकिन 2011-17 के दौरान केवल 3,163 (63%) वैरिफिकेशन किए गए। कैग ने सुझाव दिया कि सीपीसीबी को प्रदूषण की निगरानी रखने का जो काम मिला है, उसे गति देने के प्रयास किए जाने चाहिए।

 

 

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