देश में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रभाव

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • कृषि संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर: हुकुमदेव नारायण यादव) ने 11 अगस्त, 2016 को ‘देश में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रभाव’ पर अपनी रिपोर्ट को सौंपी। कमिटी के निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:
     
  • उर्वरकों की खपत: कमिटी ने पाया कि देश में रासायनिक उर्वरकों की खपत कृषि उत्पादन के स्तर के साथ बढ़ी है। 1960 के दशक में कृषि उत्पादन 83 मिलियन टन था जोकि वर्ष 2014-15 में 252 मिलियन टन हो गया। इस अवधि में रासायनिक उर्वरकों (जिनमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाशियम जैसे रसायन आते हैं) का प्रयोग भी एक मिलियन टन से बढ़कर 25.6 मिलियन टन हो गया।
     
  • देश को अपनी आबादी का पेट भरने के लिए वर्ष 2025 तक 300 मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन करना होगा। कमिटी ने कहा कि इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए 45 मिलियन टन उर्वरकों की आवश्यकता होगी। इसमें 6-7 मिलियन टन जैविक खाद हो सकती है लेकिन शेष मात्रा रासायनिक उर्वरकों से पूरी करनी होगी। कमिटी ने सुझाव दिया कि मिट्टी के उपजाऊपन और मानव एवं पशु स्वास्थ्य पर रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए व्यापक अध्ययन किया जाना चाहिए।
     
  • उर्वरकों की उपलब्धता: देश में रासायनिक उर्वरकों का उपभोग 2001-02 में 17.4 मिलियन टन से बढ़कर 2012-13 में 25.5 मिलियन टन हो गया। लेकिन रासायनिक उर्वरकों की घरेलू उपलब्धता 14.5 मिलियन टन से बढ़कर सिर्फ 16.1 मिलियन टन हुई। इससे इस बात का संकेत मिलता है कि उर्वरकों के आयात में वृद्धि हुई है।
     
  • उर्वरकों के उपयोग में असंतुलन: कमिटी ने पाया कि वर्तमान में देश के 525 जिलों में से 292 जिलों (56%) में 85% उर्वरकों का उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त उन उर्वरकों का उपयोग सबसे अधिक किया जाता है जिनमें नाइट्रोजन अधिक होती है। नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाशियम की खाद के उपयोग का अनुपात 6.7:2.4:1 है, जबकि सुझाव यह दिया जाता है कि इनके उपयोग का अनुपात 4:2:1 होना चाहिए। कमिटी ने सुझाव दिया कि उर्वरकों के संतुलित उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए रणनीति बनाई जानी चाहिए।
     
  • कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग: कमिटी ने पाया कि देश में रासायनिक कीटनाशकों का उपभोग भी बढ़ा है। यह वर्ष 2010-11 में 55,540 टन था जोकि 2014-15 में बढ़कर 57,353 टन हो गया। दूसरी ओर इसी अवधि में रासायनिक कीटनाशकों का आयात 53,996 टन से बढ़कर 77,376 टन हो गया। कमिटी ने कहा कि कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से मानव और पशुओं, दोनों के स्वास्थ्य पर बुरा असर हो सकता है। लेकिन इस संबंध में व्यापक अध्ययन के लिए पर्याप्त फंड न होना एक बड़ी बाधा है। कमिटी ने सुझाव दिया कि कीटनाशकों के आयात और प्रयोग से संबंधित नीति बनाए जाने की जरूरत है।
     
  • उर्वरकों से संबंधित सबसिडी: कमिटी ने कहा कि मौजूदा नीति के तहत तरल उर्वरकों, जैव उर्वरकों और जैविक एवं गोबर की खाद पर सबसिडी नहीं दी जाती। ऐसे उर्वरक मिट्टी की गुणवत्ता को बरकरार रखने के लिए अधिक प्रभावी माने जाते हैं और पर्यावरण के अनुकूल भी होते हैं। मौजूदा नीति विभिन्न प्रकार के उर्वरकों के संतुलित प्रयोग को प्रोत्साहित करने में असफल रही है। कमिटी ने सुझाव दिया कि सबसिडी की मौजूदा नीति में संशोधन किया जाए और देश की परिस्थितियों के अनुकूल नई नीति तैयार की जाए।
     
  • जैव उर्वरक और जैविक कृषि को बढ़ावा: कमिटी ने कहा कि जैव उर्वरकों का अधिक से अधिक उपयोग करने और जैविक कृषि को ओर बढ़ने की जरूरत है। उसने सुझाव दिया कि जैव उर्वरकों के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के लिए भी एक नीति बनाई जानी चाहिए। किसानों को बड़े पैमाने पर जैविक कृषि की तरफ बढ़ने के लिए वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान की जानी चाहिए।
     
  • उर्वरकों के लिए रेगुलेटिंग अथॉरिटीज: कमिटी ने पाया कि नए उर्वरकों को सर्टिफाई करने की मौजूदा प्रणाली में बहुत समय लगता है। उसने सुझाव दिया कि उर्वरकों को सर्टिफाई करने, उनकी गुणवत्ता की जांच करने, नई खोज करने और उनके मूल्य को निर्धारित करने की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए फर्टिलाइजर डेवलपमेंट एंड रेगुलेटरी अथॉरिटी का गठन किया जाना चाहिए।
     
  • कीटनाशकों के प्रयोग पर निगरानी: रसायन और उर्वरक मंत्रालय कीटनाशकों के उत्पादन की निगरानी करता है जबकि उनके प्रयोग पर निगरानी रखने का काम कृषि मंत्रालय का है। कमिटी ने टिप्पणी दी कि कीटनाशक क्षेत्र के लिए रेगुलेटरी फ्रेमवर्क बनाने के लिए कीटनाशक एक्ट, 1968 की समीक्षा किए जाने की जरूरत है। इसके अतिरिक्त देश में कीटनाशकों के उत्पादन, आयात और बिक्री को रेगुलेट करने के लिए पेस्टिसाइड डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन अथॉरिटी बनाई जानी चाहिए।

 

 

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