जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) फसलें और पर्यावरण पर उनका प्रभाव

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी, पर्यावरण एवं वन संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयर : रेणुका चौधरी) ने 25 अगस्त, 2017 को ‘जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) फसलें और पर्यावरण पर उनका प्रभाव’ पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गेनिज्म्स (जीएमओज़) ऐसे पौधे, पशु या सूक्ष्मजीव होते हैं जिनमें विशेष लक्षणों को उत्पन्न करने के लिए उनकी जेनेटिक संरचना को बदला जाता है। जेनेटिक इंजीनियरिंग टेक्नीक से उत्पन्न होने वाले पौधों को जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) फसलें कहा जाता है। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं :
     
  • रेगुलेटरी फ्रेमवर्क : कमिटी ने मौजूदा रेगुलेटरी मैकेनिज्म की प्रभावशीलता पर अलग-अलग विचार प्रकट किए। कमिटी ने कहा कि एक तरफ सरकार कठोर रेगुलेटरी मैकेनिज्म के मौजूद होने का दावा करती है तो दूसरी ओर नागरिक समाज के संगठनों का विचार है कि रेगुलेटरी मैकेनिज्म सिर्फ कागजों पर कठोर है। यह प्रक्रिया डेटा पर निर्भर करती है जोकि टेक्नोलॉजी डेवलपर्स द्वारा रेगुलेटरों को उपलब्ध कराया जाता है। यह टिप्पणी भी की गई कि किसी भी रेगुलेटर ने क्लोस्ड फील्ड ट्रायल नहीं किए और वे केवल उसी डेटा पर निर्भर रहे जो उन्हें टेक्नोलॉजी डेवलपर ने प्रदान किए। इससे टेक्नोलॉजी डेवलपर के पास इस बात की गुंजाइश रहती है कि वह रेगुलेटर की जरूरत के हिसाब से डेटा में छेड़छाड़ कर सके।
     
  • कमिटी ने सुझाव दिया कि केंद्र सरकार को राज्यों की सलाह से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि फील्ड ट्रायल्स का काम वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में उचित परिवेश में किया जाए और उसमें कृषि विश्वविद्यालयों का परामर्श लिया जाए। इससे जैविक और स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी और प्राथमिक डेटा के हेरफेर की गुंजाइश कम से कम होगी।
     
  • जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमिटी : कमिटी ने जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमिटी (जीईएसी) के कामकाज में कमियां दर्ज कीं। यह अप्रेजल कमिटी वातावरण में जेनेटिकली इंजीनियर्ड जीवों और उत्पादों को जारी करने की अनुमति देती है। स्टैंडिंग कमिटी ने कहा जीईएसी के अधिकतर सदस्य सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों से हैं, और राज्यों या नागरिक समाज के संगठनों का इसमें कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। कमिटी ने अप्रेजल कमिटी के गठन और पर्यावरण मंत्रालय द्वारा सदस्यों के चयन एवं उनकी क्वॉलिफिकेश के लिए अपनाए जाने वाले मानदंडों में एडहॉकिज़्म भी पाया। इसके अतिरिक्त कमिटी ने यह टिप्पणी की कि जीईएसी के तीन में से दो पदों पर मंत्रालय के अधिकारी काबिज हैं और इससे अन्य सदस्यों की नियुक्ति में परस्पर हितों का टकराव हो सकता है। कमिटी ने सुझाव दिया कि बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र के किसी विशेषज्ञ को जीईएसी का प्रमुख बनाया जाना चाहिए जिसे वैज्ञानिक डेटा और उसके प्रभावों की समझ हो।
     
  • कमिटी ने कहा कि मंत्रालय को जीईएसी के कामकाज और संगठनात्मक ढांचे की समीक्षा करनी चाहिए और जरूरी सुधारात्मक उपाय करने चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि आकलन और मंजूरी की प्रक्रिया पारदर्शी है।
     
  • जीएम फसलों की स्थिति : कमिटी ने टिप्पणी की कि यूरोप, जापान, रूस, इस्राइल इत्यादि सहित सर्वाधिक विकसित 20 देशों में से 17 देश जीएम फसलें नहीं उगाते। इसका कारण यह है कि इस बात के प्रमाण अधिक से अधिक मिल रहे हैं कि इन फसलों का नुकसान अधिक है, और लाभ कम। भारत में बीटी कपास ऐसी अकेली जीएम फसल है जिसकी बुवाई की जाती है। बीटी कपास की सफलता के अपने आकलन में कमिटी ने टिप्पणी की कि सरकारी डेटा उत्पादन के बारे में बात करता है, किसी निश्चित क्षेत्र में औसत उपज के बारे में नहीं। 2005 में जब बीटी कपास को इंट्रोड्यूस किया गया, तब से कपास की उपज में कितनी वृद्धि हुई, इसका आकलन किया जा सकता है। यह गौर किया गया कि 2000-05 के बीच देश में कपास की उपज 69% बढ़ गई, लेकिन तब बीटी कपास की हिस्सेदारी कुल कपास क्षेत्र में 6% से भी कम थी। 2005 से 2015 के बीच जब बीटी कपास को 94% क्षेत्र में उगाया गया, तब उपज में केवल 10% की बढ़ोतरी हुई। कमिटी ने सुझाव दिया कि मंत्रालय को बीटी कपास की सफलता के बेहतर आकलन के लिए एक व्यापक अध्ययन करना चाहिए।
     
  • जीएम सरसों का व्यावसायीकरण (कमर्शियलाइजेशन) : कमिटी ने गौर किया कि जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमिटी ने जीएम सरसों के व्यावसायीकरण को मंजूरी दी, इसके बावजूद कि सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले पर फैसला लंबित है। यह कहा गया कि जीएम सरसों के प्रतिकूल प्रभाव के प्रमाण है क्योंकि यह हर्बिसाइड टॉलरेंट जीएम फसल है। यह टिप्पणी भी की गई कि अनेक राज्य सरकारों ने इसके प्रवेश का विरोध किया था, यहां तक कि फील्ड ट्रायल्स के रूप में भी। कमिटी ने सुझाव दिया कि देश में कोई जीएम फसल नहीं लाई जाएगी, जब तक कि पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर उसके असर का वैज्ञानिक आकलन नहीं कर लिया जाता। उसके दीर्घकालीन प्रभावों पर विचार करने और प्रतिभागी, स्वतंत्र और पारदर्शी तरीके से उसका मूल्यांकन करने के बाद ही ऐसा किया जाए।

 

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