गंगा नदी की डीसिल्टिंग के लिए दिशानिर्देश

एक्सपर्ट कमिटी की रिपोर्ट का सारांश 

  • एम.ए. चितले की अध्यक्षता में एक्सपर्ट कमिटी ने मई, 2017 में ‘भीमगौड़ा (उत्तराखंड) से फरक्का (पश्चिम बंगाल) तक गंगा नदी की डीसिल्टेशन (गाद निकालने के काम) के लिए दिशानिर्देशों की तैयारी’ पर अपनी रिपोर्ट जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय को सौंपी।
     
  • कमिटी के संदर्भ की शर्तों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) गंगा नदी की इकोलॉजी और प्रवाह के लिए डीसिल्टेशन की जरूरत साबित करना, और (ii) गंगा नदी के डीसिल्टेशन के लिए दिशानिर्देश तैयार करना। कमिटी के मुख्य निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं:
     
  • डीसिल्टेशन और इकोलॉजी: कमिटी ने टिप्पणी की कि नदियों में सिल्टेशन (गाद जमा होना) एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। फिर भी भारी वर्षा, जंगलों के कटान, जलाशयों के जल में संरचनागत हस्तक्षेप और बाड़ बनाने से नदियों में सिल्टेशन बढ़ता है। इसका नतीजा यह होता है कि नदियों की बहाव क्षमता कम होती है और बाढ़ की स्थिति पैदा होती है। साथ ही नदियों में जल भंडारण के उपायों को भी नुकसान पहुंचता है। जब नदी को चौड़ा या गहरा किए बिना उसकी प्राकृतिक क्षमता को बरकरार रखने के लिए महीन गाद और तलछट को निकाला जाता है तो उस प्रक्रिया को डीसिल्टेशन कहा जाता है। डिसिल्टेशन से नदी के हाइड्रॉलिक प्रदर्शन में सुधार होता है। फिर भी अंधाधुंध गाद निकालने से नदी की इकोलॉजी और प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
     
  • डीसिल्टिंग के सिद्धांत: कमिटी ने नदियों में डीसिल्टिंग की योजना बनाने और उसे अमल में लाने के सिद्धांतों को प्रस्तावित किया। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
     
  • नदियों में गाद के प्रवाह को कम करने के लिए कृषि की बेहतर पद्धतियों और नदी तट के सुरक्षा संबंधी कार्यों/कटाव रोधी कार्यों के साथ यह भी जरूरी है कि कैचमेंट क्षेत्र का प्रबंधन और वॉटरशेड विकास का कार्य व्यापक तरीके से किया जाए;
     
  • कटाव, प्रवाह और तलछट का जमाव नदी में प्राकृतिक रूप से होता है। ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि बांध/बैराज से नदी में गाद का बहाव कुछ प्रकार हो कि नदी में तलछट का संतुलन बना रहे;
     
  • ड्रेजिंग (डीसिल्टिंग) से सामान्य तौर पर बचना चाहिए। डीसिल्टिंग की मात्रा डिपोजीशन की दर से अधिक नहीं होनी चाहिए। डिपोजीशन वह प्रक्रिया है जिसमें गोला पत्थर, कंकड़ और रेत नदी के तल में जमा होते हैं। यानी हर वर्ष इन वस्तुओं की नदी तल में जमा होने वाली मात्रा को इनके नदी के वेग के साथ बहने की मात्रा से ज्यादा होना चाहिए;
     
  • नदियों के घुमाव के लिए पर्याप्त कॉरिडोर दिए जाने चाहिए जिससे उनके प्रवाह में बाधा न पड़े; और
     
  • नदी के भीतर तलछट को जमा होने से रोका जाना चाहिए, और इसकी बजाय भूमि पर इसे जमा किया जाना चाहिए।
     
  • डीसिल्टेशन के काम के लिए दिशानिर्देश: डीसिल्टेशन के बेहतर आकलन और प्रबंधन के लिए कमिटी ने निम्नलिखित उपाय सुझाए हैं:
     
  • डीसिल्टेशन के लिए वार्षिक तलछट बजट बनाने के अतिरिक्त तलछट के बहाव (नदी क्षेत्र से तलछट के बहाव) की प्रक्रिया का अध्ययन किया जाना चाहिए; और
     
  • तलछट बजट को तैयार करने और डीसिल्टिंग की जरूरत को पुष्टि देने के लिए बाढ़ के मार्ग का अध्ययन करने का काम एक तकनीकी संस्थान को सौंपा जाना चाहिए।
     
  • गंगा नदी में डीसिल्टिंग का काम: गंगा नदी के संबंध में कमिटी ने जिन दिशानिर्देशों का सुझाव दिया है, उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं :
     
  • बाढ़ के मैदानों और नदी किनारे की झीलों के लिए नदियों के आस-पास के क्षेत्रों को खाली रखा जाना चाहिए जिससे बाढ़ की तीव्रता को कम किया जा सके। बाढ़ के मैदानों में अतिक्रमण और झीलों के पुनरुद्धार (रीक्लेमेशन) से बचना चाहिए। इसकी बजाय आस-पास की झीलों को डीसिल्ट किया जाना चाहिए ताकि उनकी भंडारण क्षमता को बढ़ाया जा सके।
     
  • जहां निर्माण कार्यों (जैसे बैराज/पुल) की वजह से बड़े पैमाने पर सिल्टेशन हुआ है, वहां नदी को गहरा करने के लिए प्री सिलेक्टेड चैनल के साथ डीसिल्टेशन किया जाना चाहिए। इससे नदी के प्रवाह को मार्ग मिल सकेगा। नदी तल से निकाली गई गाद को किसी दूसरे स्थान पर डंप किया जा सकता है।

 

 

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