कृषि फसल बीमा योजनाएं

कैग की रिपोर्ट का सारांश

  • नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने 21 जुलाई, 2017 को ‘कृषि फसल बीमा योजनाओं का प्रदर्शन’ पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में 2011-12 और 2015-16 की अवधि के दौरान नौ राज्यों में फसल बीमा योजनाओं के प्रदर्शन की पड़ताल की गई। इन योजनाओं में राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एनएआईएस), संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एमएनएआईएस), और मौसम आधारित फसल बीमा कार्यक्रम (डब्ल्यूबीसीआईपी) शामिल हैं। फसल बीमा योजनाओं का लक्ष्य किसानों को उपज के नुकसान के खिलाफ बीमा कवर प्रदान करना है। इन योजनाओं के कार्यान्वयन की जिम्मेदारी कृषि सहकारिता और किसान कल्याण मंत्रालय की है। भारतीय कृषि बीमा कंपनी (एआईसी) और निजी बीमा कंपनियां इन योजनाओं की कार्यान्वयन एजेंसियां हैं। ऑडिट रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष और सुझाव निम्नलिखित हैं :
     
  • किसानों का कवरेज: कैग ने गौर किया कि जनगणना 2011 के अनुसार, किसानों की जनसंख्या की तुलना में इस योजना के तहत बीमाकृत किसानों की संख्या कम है। 2011 से 2016 की खरीफ और रबी फसलों के बीच केवल 8% से 22% किसान इन सभी योजनाओं के तहत कवर किए गए। कैग ने गौर किया कि एनएआईएस, जो छोटे और सीमांत किसानों को सबसिडी प्रदान करती है, के अंतर्गत कवरेज की दर 2% से 13% है। कैग ने सुझाव दिया कि किसानों को बड़ी संख्या में कवरेज प्राप्त है, यह सुनिश्चित करने के लिए कृषि सहकारिता और किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा प्रभावी उपाय किए जाने चाहिए, चाहे किसानों ने लोन लिया हो अथवा न लिया हो।
     
  • लाभार्थी किसानों का डेटा: कैग ने गौर किया कि एआईसी और राज्य सरकारों द्वारा लाभार्थी किसानों के डेटा को मेनटेन नहीं किया गया। इसके अतिरिक्त एमएनएआईएस और डब्ल्यूबीसीआईएस में यह अनिवार्य नहीं कि केंद्र और राज्य सरकारें बीमाकृत किसानों के डेटाबेस को मेनटेन करें। कैग ने सुझाव दिया कि केंद्र और राज्य सरकारों को निगरानी और कार्यान्वयन के लिए लाभार्थी किसानों का डेटाबेस मेनटेन करना चाहिए।
     
  • प्रक्रियाओं में विलंब: कैग ने गौर किया कि हालांकि कृषि सहकारिता और किसान कल्याण मंत्रालय अपने हिस्से के फंड्स समय पर जारी करता है, राज्य सरकारें अपना हिस्सा जारी करने में विलंब करती हैं। इसके अतिरिक्त कैग ने: (i) राज्यों द्वारा फसलों और कवर किए जाने वाले क्षेत्र की अधिसूचना जारी करने और उपज संबंधी डेटा की प्राप्ति, (ii) कार्यान्वयन एजेंसियों द्वारा दावों की प्रोसेसिंग, और (iii) बैंकों में डेक्लेरेशन की प्राप्ति और दावों की अदायगी में भी विलंब पाया। कैग ने सुझाव दिया कि राज्य सरकारों, कार्यान्वयन एजेंसियों और बैंकों द्वारा तय समय पर कार्रवाई की जाए, मंत्रालय को यह सुनिश्चित करने के लिए कारगर उपाय करने चाहिए।
     
  • निजी बीमा कंपनियों के दावों का वैरिफिकेशन: कैग ने गौर किया कि एमएनएआईएस और डब्ल्यूबीसीआईएस के अंतर्गत फंड्स जारी करने से पहले बीमा कंपनियों के दावों को वैरिफाई करने में एआईसी विफल रही। कृषि सहकारिता और किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों के तहत यह विनिर्दिष्ट किया गया है कि निम्नलिखित जमा कराने पर निजी बीमा कंपनियों को फंड्स जारी किए जा सकते हैं: (i) कवर किए जाने वाले दावों से जुड़े आंकड़े, जिसके साथ संबंधित राज्य सरकार से प्राप्त सर्टिफिकेट भी होना चाहिए, और (ii) स्कीम कवरेज का रैंडम वैरिफिकेशन। कैग ने सुझाव दिया कि मंत्रालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दावों के वैरिफिकेशन के बाद ही निजी बीमा कंपनियों को भुगतान किया जाए। यह गौर करते हुए कि निजी कंपनियों को इन योजनाओं के तहत बड़ी मात्रा में फंड्स दिए गए हैं, कैग ने यह सुझाव भी दिया कि कैग द्वारा ऐसी कंपनियों के ऑडिट की जरूरत है।
     
  • एनएआईएस के अंतर्गत बचत : एकत्र किए गए प्रीमियम और एआईसी द्वारा देय दावों के बीच अंतर होने से एनएआईएस के अंतर्गत बचत संभव है। कैग ने टिप्पणी की कि योजना के तहत ऐसी बचत होने पर उसके उपयोग के संबंध में एनएआईएस के दिशानिर्देश कुछ नहीं कहते। एआईसी ने 1999-2000 और 2015-16 के रबी मौसम के बीच 2,519 करोड़ रुपए (एकत्र किया गया 18% प्रीमियम) की बचत की। इस संबंध में, कैग ने यह सुझाव दिया कि इस बचत के साथ क्या किया जाए, इसका फैसला कृषि सहकारिता और किसान कल्याण मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और एआईसी को करना चाहिए।
     
  • योजनाओं की निगरानी: कैग ने टिप्पणी की कि कार्यान्वयन एजेंसियों और केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा योजनाओं की निगरानी उचित प्रकार से नहीं की गई। कैग ने गौर किया कि योजना की निगरानी के लिए टेक्निकल सपोर्ट यूनिट का गठन नहीं किया गया। इसके अतिरिक्त कृषि सहकारिता और किसान कल्याण मंत्रालय ने योजनाओं की पीरियॉडिक एप्रेजल रिपोर्ट तैयार नहीं की गई थी। कैग ने सुझाव दिया कि केंद्र और राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी स्तरों पर योजनाओं की निगरानी की जा रही है।

 

 

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