एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के अंतर्गत कानूनी शिक्षा और शोध को प्रोत्साहन

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • कार्मिक, लोक शिकायत, विधि एवं न्याय संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयरपर्सन: डॉ. ई.एम.सुदर्सना नचियप्पा) ने 4 अगस्त, 2016 को ‘एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के अंतर्गत कानूनी शिक्षा और शोध को प्रोत्साहन’ पर रिपोर्ट सौंपी।
     
  • राष्ट्रीय महत्व के संस्थान बनें नेशनल लॉ स्कूल: वर्तमान में देश में 17 लॉ स्कूल हैं जिन्हें विभिन्न राज्य सरकारों ने स्थापित किया है। कमिटी ने टिप्पणी की कि अधिक से अधिक राज्यों को ऐसे नेशनल लॉ स्कूल स्थापित करने चाहिए जो लॉ की पांच वर्ष की डिग्री प्रदान करते हों। इन संस्थानों के साथ वैसा ही व्यवहार किया जाना चाहिए जैसा ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) के साथ किया जाता है। इसके अतिरिक्त इन संस्थानों को केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित किया जाना चाहिए। कमिटी ने सुझाव दिया कि राज्य कानूनों के अंतर्गत स्थापित नेशनल लॉ स्कूलों को राष्ट्रीय महत्व के संस्थान घोषित किया जा सकता है।
     
  • बीसीआई द्वारा गठित कमिटियों को वैधानिक आधार: वर्तमान में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) द्वारा एलएलबी डिग्री के स्टैंडर्ड्स को रेगुलेट करने के लिए लीगल एजुकेशन कमिटी (एलईसी) का गठन किया गया है। लेकिन एलईसी निर्धारित सीमा से अधिक बड़ी है। बीसीआई ने कानूनी शिक्षा के स्टैंडर्ड्स को अपग्रेड करने के लिए करिकुलम डेवलपमेंट कमिटी (सीडीसी) और डायरेक्टरेट ऑफ लीगल एजुकेशन (डीएलई) का गठन भी किया है। स्टैंडिंग कमिटी ने कहा कि एलईसी का विस्तार और सीडीसी एवं डीएलई का गठन, ये दोनों मामले एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत बीसीआई की शक्तियों के दायरे से बाहर के मामले हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि एडवोकेट्स एक्ट के जरिये इन निकायों को वैधानिक आधार दिया जाए।
     
  • करिकुलम तैयार करने के लिए यूनिवर्सिटीज़ को स्वायत्तता: कमिटी ने गौर किया कि लॉ यूनिवर्सिटीज़ में पोस्ट ग्रैजुएट, स्पेशलाइज्ड कोर्सेज़ और रिसर्च करिकुलम को तैयार करने का काम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) करता है। कमिटी ने सुझाव दिया कि इन यूनिवर्सिटीज़ को अपने कोर्सेज खुद तैयार करने की स्वायत्तता दी जानी चाहिए।
     
  • लॉ यूनिवर्सिटीज़ को वित्तीय सहायता: कमिटी ने कहा कि नेशनल लॉ स्कूलों, लॉ यूनिवर्सिटीज़ और यूनिवर्सिटीज़ के लीगल विभागों को पर्याप्त वित्तीय सहायता की जरूरत है। कमिटी ने सुझाव दिया कि कानूनी शिक्षा संस्थानों को वित्तीय स्थिरता प्रदान करने के लिए यूजीसी एक्ट, 1956 के अंतर्गत नियम बनाए जाएं और यह दायित्व यूजीसी को सौंपा जाए। जिस प्रकार टेक्नोलॉजिकल और एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटीज़ को वित्तीय सहायता दी जाती है, उसी प्रकार कानूनी शिक्षा संस्थानों को भी मदद दी जाए।
     
  • पंचाट (आर्बिट्रेशन) इत्यादि पर कोर्स: कमिटी ने सुझाव दिया कि कानूनी शिक्षा संस्थानों को कई नए क्षेत्रों जैसे पंचाट, मध्यस्थता इत्यादि पर ध्यान देना चाहिए। कमिटी ने यह सलाह भी दी कि बेसिक लॉ कोर्सेज़, जैसे करारनामे (डीड्स) का मसौदा तैयार करना, सुलह और मध्यस्थता को हाई सेकेंडरी स्कूल के स्तर पर ही पढ़ाया जा सकता है।
     
  • एडवोकेट एकेडमियों का गठन: कमिटी ने सलाह दी कि केंद्र को राज्य सरकारों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए कि वे एडवोकेट्स को प्रशिक्षित करने के लिए स्टेट जुडीशियल एकेडमी की तर्ज पर एडवोकेट एकेडमियों का गठन करें। कमिटी ने यह सुझाव भी दिया कि केंद्र सरकार को इन एकेडमियों के गठन के लिए वित्तीय सहयोग प्रदान करना चाहिए।

 

 

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