उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी संस्थानों की भूमिका

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी संस्थानों की भूमिका

हमारे देश में शिक्षा व्यवस्था के तीन स्तर हैं- प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च। इनमें से प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की शिक्षा स्कूल स्तर पर प्रदान की जाती है, जबकि उच्च शिक्षा कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर दी जाती है। 

शिक्षा प्रदाता दो प्रकार के हो सकते हैं- सरकारी और निजी। निजी स्कूल सरकार के आंशिक वित्त पोषण से चलाए जा सकते हैं (जिन्हें एडेड कहा जाता है) और पूर्ण रूप से स्व वित्त पोषित भी हो सकते हैं (जिन्हें अन-एडेड कहा जाता है)। सरकारी स्कूलों की स्थापना और प्रबंधन सरकार करती है। वही इन स्कूलों को अनुदान भी देती है। जब सरकार के पास शिक्षा की सार्वभौमिक सुविधा प्रदान करने के लिए संसाधन सीमित होते हैं तो निजी क्षेत्र की मदद ली जाती है। अधिकतर अर्थव्यवस्थाओं में निजी क्षेत्र लाभ के उद्देश्य से काम करता है। लेकिन जब शिक्षा की बात आती है, तो निजी क्षेत्र से यह अपेक्षा की जाती है कि वह गैर लाभकारी उद्देश्य से कार्य करेगा।[1],[2]

कुछ विशेषज्ञों का विचार है कि विनियमन (रेगुलेशन) की कमी होने के कारण निजी क्षेत्र के कुछ स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त फीस अधिक होने के कारण अनेक विद्यार्थियों की पहुंच उन तक नहीं हो पाती। दूसरी तरफ कुछ का यह मानना है कि उच्च शिक्षा में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण इस क्षेत्र में निवेश और गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी आवश्यक है।[3],[4]

वर्तमान में मानव संसाधन विकास संबंधी स्थायी समिति ‘उच्च शिक्षा में निजी क्षेत्र की भूमिका’ की पड़ताल कर रही है। इस संदर्भ में हम भारत में उच्च शिक्षा में निजी क्षेत्र की भूमिका का एक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं। इस नोट में शिक्षा क्षेत्र की विनियामक संरचना की व्याख्या की गई है और उच्च शिक्षा में निजी क्षेत्र की भागीदारी से संबंधित प्रमुख मुद्दों को रेखांकित किया गया है।

विनियामक संरचना

संवैधानिक प्रावधान

संविधान की समवर्ती सूची के अंतर्गत जिन विषयों को शामिल किया गया है, उनमें से एक शिक्षा भी है।[5] इसका अर्थ यह है कि शिक्षा से संबंधित कानूनों को केंद्र और राज्य, दोनों द्वारा बनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त उच्च शिक्षा और अनुसंधान के मानकों को निर्धारित करने का शासनादेश केंद्र को दिया गया है जोकि संघ सूची का विषय है।[6] साथ ही, विश्वविद्यालयों को स्थापित करने, उनका विनियमन करने और उन्हें बंद करने की शक्ति राज्यों के पास है जोकि राज्य सूची का विषय है।[7] 

प्रशासनिक संरचना

केंद्र में मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) देश में शिक्षा से संबंधित नीतियां बनाता है और कानूनों एवं योजनाओं को लागू करता है। मंत्रालय के तहत उच्च शिक्षा विभाग, उच्च शिक्षा क्षेत्र के लिए उत्तरदायी है। राज्य स्तर पर राज्य शिक्षा विभाग उपरोक्त कार्य करते हैं। स्वास्थ्य, कृषि इत्यादि क्षेत्रों में विशेषज्ञता प्राप्त व्यावसायिक पाठ्यक्रम प्रदान करने वाले संस्थानों का विनियमन उनसे संबंधित मंत्रालयों द्वारा किया जाता है। 

विनियामक निकाय

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) उच्च शिक्षा के मुख्य विनियामक हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को विनियमित करने के लिए 15 व्यावसायिक परिषदें हैं। संसद के अधिनियमों द्वारा स्थापित सांविधिक निकायों में भारतीय मेडिकल परिषद, भारतीय बार परिषद, वास्तुकला परिषद इत्यादि शामिल हैं।   

उच्च शिक्षा संस्थानों के प्रकार

तालिका 1 में देश में स्थापित होने वाले उच्च शिक्षा संस्थानों के संबंध में जानकारी दी गई है।[8]

तालिका 1 : भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों के प्रकार, उदाहरण और संख्या

विश्वविद्यालय

मानदंड

विश्वविद्यालय

राष्ट्रीय महत्व के संस्थान

डीम्ड विश्वविद्यालय

गठन

संसद या राज्य विधानमंडल के अधिनियम द्वारा गठित 

संसद के अधिनियम के माध्यम से घोषित   

यूजीसी के सुझाव पर केंद्र सरकार द्वारा प्रदत्त दर्जा। विशेषज्ञ समिति के निष्कर्ष के आधार पर यूजीसी यह सुझाव देता है। तकनीकी संस्थानों को डीम्ड विश्वविद्यालय घोषित करने के मामले में एआईसीटीई यूजीसी को सलाह देती है।

प्रकृति और दायरा

विश्वविद्यालयों को डिग्री देने या कॉलेजों को संबद्ध करने का अधिकार होता है। निजी विश्वविद्यालय कॉलेजों को संबद्ध नहीं कर सकते।

ऐसे संस्थान डिग्री देने का अधिकार रखते हैं।

संविधान में यह प्रावधान है कि केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित वैज्ञानिक या तकनीकी शिक्षण संस्थानों को राष्ट्रीय महत्व के संस्थान घोषित किया जा सकता है।[9] प्रत्येक संस्थान का अभिशासन संबंधित अधिनियम द्वारा किया जाता है।

ऐसे विश्वविद्यालय डिग्री देने का अधिकार रखते हैं। वे देश में (पहला कैंपस जिस स्थान पर बना है, उससे अलग किसी दूसरे स्थान पर) और देश से बाहर कैंपस बना सकते हैं। ऐसे संस्थान स्नातकोत्तर अध्ययन पर ध्यान केंद्रित करते हुए किसी विशिष्ट क्षेत्र या विशेषज्ञता में एडवांस स्तर के पाठ्यक्रम प्रस्तावित कर सकते हैं।

उदाहरण

दिल्ली विश्वविद्यालय एक सरकारी विश्वविद्यालय है और उत्तर प्रदेश में एमेटी विश्वविद्यालय एक निजी विश्वविद्यालय है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) को क्रमशः एम्स अधिनियम, 1956, आईआईटी अधिनियम, 1961 एवं एनआईटी अधिनियम, 2007 द्वारा अभिशासित किया जाता है।

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज को 1964 में डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया।

संख्या

अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (एआईएसएचई) के अनुसार, वर्ष 2014 में देश में कुल 665 विश्वविद्यालय थे।

वर्तमान में ऐसे 73 संस्थान हैं।

देश में 127 डीम्ड विश्वविद्यालय हैं।

कॉलेज

 

कॉलेज

स्टैंड अलोन संस्थान

स्वायत्त कॉलेज

प्रकृति और दायरा

ऐसे सरकारी या निजी संस्थान हो सकते हैं जिनके पास डिग्री देने का अधिकार नहीं होता। डिग्री देने के लिए उनके किसी सरकारी विश्वविद्यालय से संबद्ध होने की अपेक्षा की जाती है। 

ऐसे संस्थान या कॉलेज हैं (जोकि विश्वविद्यालयों से संबद्ध नहीं हैं) जोकि डिग्री नहीं दे सकते और डिप्लोमा स्तर के पाठ्यक्रम संचालित कर सकते हैं। 

अपना पाठ्यक्रम, शिक्षण, मूल्यांकन, परीक्षा प्रणालियां इत्यादि निर्धारित करते हैं।

डिग्री देने के उद्देश्य से किसी विश्वविद्यालय के तत्वावधान में बने रहते हैं। स्वायत्त कॉलेज का दर्जा विशेषज्ञ समिति के सुझाव पर और राज्य सरकार एवं संबंधित विश्वविद्यालय के परामर्श से यूजीसी द्वारा प्रदान किया जाता है।  

उदाहरण

सेंट स्टीफंस कॉलेज, दिल्ली

जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान

मुंबई का सेंट जेवियर्स कॉलेज वर्ष 2010 से स्वायत्त कॉलेज है। वह मुंबई विश्वविद्यालय के तत्वावधान में डिग्री देता है।

संख्या

एआईएसएचई के अनुसार, वर्ष 2014 में भारत में 36,812 कॉलेज थे।

वर्तमान में 11,565 स्टैंड अलोन संस्थान संचालित किए जा रहे हैं।

भारत में दिसंबर 2014 तक 487 स्वायत्त कॉलेज थे।[10]

Sources: “AISHE 2013-14 (Provisional)”, MHRD, 2015; Report of the Central Advisory Board of Education (CABE) Committee on Autonomy of Higher Education Institutions, MHRD, June 2005; UGC; AICTE; PRS.

निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना

हरियाणा में निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना की शर्तें- केस स्टडी

अन्य राज्यों के समान हरियाणा में निजी विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए किसी पृथक कानून को अधिनियमित करने की जरूरत नहीं पड़ती। हर बार जब किसी नए विश्वविद्यालय की स्थापना करनी होती है, विधानमंडल द्वारा निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए निर्धारित मुख्य अधिनियम में संशोधन किया जाता है (अधिनियम की अनुसूची में विश्वविद्यालय को जोड़कर)। हरियाणा में निजी विश्वविद्यालयों से स्व वित्त पोषित होने की अपेक्षा की जाती है जिन्हें न्यूनतम 3 करोड़ रुपए की राशि का एनडॉमेंट फंड बरकरार रखना होता है। किसी विश्वविद्यालय की स्थापना से पहले प्रायोजक निकाय के पास 20 एकड़ भूमि, अगर वह म्यूनिसिपल दायरे से बाहर हो, या 10 एकड़ भूमि, अगर वह म्यूनिसिपल दायरे के अंदर हो, होने की अपेक्षा भी की जाती है।

स्रोत: हरियाणा निजी विश्वविद्यालय अधिनियम, 2006

एक विश्वविद्यालय को ट्रस्ट, सोसाइटी, गैरलाभकारी संस्था होना चाहिए या ऐसी संस्थाओं द्वारा संचालित होना चाहिए। निजी विश्वविद्यालय की स्थापना के यही दो तरीके हैं। मुख्य रूप से विश्वविद्यालय की स्थापना संसद के किसी अधिनियम (केंद्रीय विश्वविद्यालय) या राज्य विधानमंडल के किसी अधिनियम (राज्य विश्वविद्यालय) द्वारा की जाती है। अब तक संसद के अधिनियम द्वारा किसी निजी विश्वविद्यालय की स्थापना नहीं की गई है। इन विश्वविद्यालयों की स्थापना का एक और तरीका यह है कि किसी शैक्षणिक संस्थान को डीम्ड विश्वविद्यालय (मानित विश्वविद्यालय) घोषित किया जाए। वर्तमान में 229 विश्वविद्यालयों का प्रबंधन निजी स्तर पर किया जा रहा है।[11]  संभव है कि किसी निजी विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए हर राज्य के भूमि संबंधी नियम और प्रक्रियाएं अलग-अलग हों। लेकिन राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे कुछ राज्यों के कानूनों का विश्लेषण करने से स्पष्ट होता है कि विभिन्न राज्यों में इनसे जुड़ी शर्तें कमोबेश एक समान ही हैं।[12]  उदाहरण के लिए हरियाणा राज्य में निजी विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए जरूरी शर्तों का विवरण अलग से बॉक्स में दिया गया है।

 

निजी विश्वविद्यालय प्रारंभ करने की प्रक्रिया :

केंद्र सरकार के जरिये निजी विश्वविद्यालय को स्थापित करने के अन्य तरीके:[13] एक मौजूदा निजी संस्थान/कॉलेज को सामान्य या ‘द नोवो’ (नए सिरे से) श्रेणियों में डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा दिया जा सकता है। सामान्य श्रेणी के अंतर्गत एक संस्थान को निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना होता है:  (i) उसकी स्थापना को कम से कम 15 वर्ष पूरे होने चाहिए, (ii) उसे इंजीनियरिंग, प्रबंधन जैसी परंपरागत डिग्रियों की बजाय विशेषज्ञता के क्षेत्रों में संलग्न होना चाहिए, (iii) उसे बाहरी एक्रेडेशन और एसेसमेंट प्राप्त होना चाहिए, (iv) उसके पास गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान के लिए जरूरी ढांचा और आधुनिक सूचना संसाधन होने चाहिए, इत्यादि। पुणे की सिम्बायसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी को सामान्य श्रेणी के तहत डीम्ड विश्वविद्यालय घोषित किया गया है। 

‘द नोवो’ श्रेणी के अंतर्गत किसी संस्थान को ज्ञान के ऐसे अनूठे और उभरते हुए क्षेत्र के लिए समर्पित होना चाहिए जिससे संबंधित अध्ययन किसी मौजूदा संस्थान द्वारा नहीं किया जा रहा हो। मंत्रालय ऐसे संस्थान को पांच वर्ष पूर्ण होने पर द नोवो श्रेणी के तहत डीम्ड विश्वविद्यालय के रूप में नामित कर सकता है। द एनर्जी एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट (टेरी) को इसी प्रकार डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा हासिल हुआ है।

डीम्ड विश्वविद्यालय घोषित होने के बाद भी विश्वविद्यालयों की फंडिंग के नियम नहीं बदलते। हां, ऐसे विश्वविद्यालयों को अपनी अनुमोदित भौगोलिक सीमाओं से परे काम करने की अनुमति मिल सकती है और वे ऑफ कैंपस (देश में किसी और स्थान पर अतिरिक्त कैंपस) या ऑफ शोर कैंपस (देश के बाहर कैंपस) शुरू कर सकते हैं। डीम्ड विश्वविद्यालय भारत और विदेशों में स्थित अन्य विश्वविद्यालयों या डीम्ड विश्वविद्यालयों के साथ संयुक्त कार्यक्रम भी संचालित कर सकते हैं।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2009 से अब तक किसी संस्थान को डीम्ड विश्वविद्यालय घोषित नहीं किया गया है। केंद्र ने जनवरी 2010 में 44 विश्वविद्यालयों की डीम्ड की मान्यता समाप्त कर दी थी क्योंकि वे विभिन्न शर्तों को पूरा करने में असमर्थ थे। किसी के पास पर्याप्त आधारभूत ढांचा नहीं था तो किसी की इनटेक कैपेसिटी में गैर अनुपातिक ढंग से बढ़ोतरी दिखाई दे रही थी। किसी की फीस बहुत ज्यादा थी तो कोई ज्ञान के उभरते हुए क्षेत्रों में किए जाने वाले प्रयासों का पर्याप्त प्रमाण नहीं पेश कर पाया था। विश्वविद्यालयों ने केंद्र के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की।[14] लेकिन न्यायालय ने फैसले को नहीं बदला और अंतिम फैसला यूजीसी पर छोड़ दिया।                                                                                                            

विनियमन

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2002 में छत्तीसगढ़ राज्य ने विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए एक अधिनियम पारित किया। यह अधिनियम राज्य सरकार को केवल अधिसूचना के माध्यम से विशिष्ट अधिकार क्षेत्र और स्थान पर विश्वविद्यालय स्थापित करने की अनुमति देता था। इसके खिलाफ दो जनहित याचिकाएं दायर की गईं जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने इस अधिनियम से संबंधित प्रावधानों को रद्द कर दिया और कहा कि विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए विधानसभा को अधिनियम बनाना होगा। परिणामस्वरूप ऐसे सभी विश्वविद्यालय बंद हो गए।

Source: Prof. Yashpal & Anr. vs State of Chhattisgarh & Ors., February 11, 2005.

यूजीसी के पास डीम्ड विश्वविद्यालयों की मान्यता, उनके कार्य संचालन और मान्यता समाप्त करने से संबंधित शक्तियां हैं। उसके पास अन्य विश्वविद्यालयों को उनके रखरखाव एवं विकास के लिए अनुदान देने की भी शक्ति है और वह विश्वविद्यालयों द्वारा ली जाने वाली फीस को भी विनियमित कर सकता है। यूजीसी के मानकों का अनुपालन न करने की स्थिति में अनुदान वापस लिए जा सकते हैं या अगर कॉलेज फीस और दूसरे विनियमों का अनुपालन नहीं करता तो किसी विश्वविद्यालय से उसकी संबद्धता रद्द की जा सकती है।[15]  निजी कॉलेज, जोकि इंजीनियरिंग, टाउन प्लानिंग, प्रबंधन इत्यादि जैसे तकनीकी पाठ्यक्रमों का संचालन करते हैं और जिन्हें एआईसीटीई से फंडिंग मिलती है, से शैक्षणिक मानदंडों और विनियमों के अनुपालन की अपेक्षा की जाती है।[16]

मुख्य मुद्दे और विश्लेषण

इस खंड में हम भारत में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी संस्थाओं की भूमिका पर विशेष ध्यान केंद्रित करते हुए विभिन्न मुद्दों का विश्लेषण करेंगे।

आपूर्ति  

लाभकारी शैक्षणिक और निजी संस्थान

निजी संस्थाएं आम तौर पर लाभ के उद्देश्य से कार्य करती हैं लेकिन पिछले कुछ वर्षों के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने शिक्षण संस्थानों की प्रकृति को लाभकारी नहीं, धर्मार्थ के रूप में व्याख्यायित किया है। इसलिए शिक्षा प्रदान करते हुए असाधारण या अवैध लाभ नहीं कमाया जा सकता। अगर अतिरिक्त राजस्व अर्जित होता है तो शिक्षण संस्थान द्वारा उसका प्रयोग अपने विस्तार और शैक्षणिक विकास के लिए किया जाएगा।1,2

सुझाव : यूजीसी द्वारा परिकल्पित सार्वजनिक निजी भागीदारी के प्रकार

यूजीसी ने उच्च शिक्षा क्षेत्र में निजी संस्थाओं की भागीदारी के निम्नलिखित चार मॉडल्स का सुझाव दिया है: (i) बुनियादी ढांचा मॉडल : निजी क्षेत्र बुनियादी ढांचे में निवेश करता है और सरकार संस्थान का संचालन और प्रबंधन करती है, निजी निवेशक को वार्षिक भुगतान किए जाते हैं, (ii) आउटसोर्सिंग मॉडल : निजी क्षेत्र का निवेशक बुनियादी ढांचे में निवेश करता है और संस्थान का संचालन एवं प्रबंधन करता है, सरकार उसे विशिष्ट सेवाओं के लिए भुगतान करती है, (iii) इक्विटी/हाइब्रिड मॉडल: सरकार और निजी क्षेत्र, दोनों बुनियादी ढांचे में निवेश करते हैं और संस्थान के संचालन एवं प्रबंधन की जिम्मेदारी निजी क्षेत्र की होती है, और (iv) रिवर्स आउटसोर्सिंग मॉडल : सरकार बुनियादी ढांचे में निवेश करती है और निजी क्षेत्र संस्थान का संचालन एव प्रबंधन करता है।

Source: Higher Education in India, UGC, December 2003.

देश में ज्ञान आधारित समाज निर्मित करने से उद्देश्य से वर्ष 2005 में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग (एनकेसी) का गठन किया गया। इसके तहत शिक्षा क्षेत्र में सुधार का लक्ष्य भी था। एनकेसी लाभकारी शिक्षण संस्थानों को बढ़ावा नहीं देता था।3  उच्च शिक्षा क्षेत्र में सुधार के लिए वर्ष 2008 में यशपाल समिति का गठन किया गया। इस समिति ने भी सुझाव दिया कि उच्च शिक्षा प्रदान करने वाली निजी संस्थाओं को केवल लाभ के उद्देश्य से कार्य नहीं करना चाहिए।4  हालांकि एनकेसी और यशपाल समिति, दोनों ने यह सुझाव दिया कि शिक्षा के अवसर बढ़ाने के लिए उच्च शिक्षा में निजी निवेश को प्रोत्साहित किया जाना अनिवार्य है। इस पुस्तिका में फीस के ढांचे शीर्षक के अंतर्गत इस पहलू पर विस्तार से चर्चा की गई है।

अमेरिका सहित अनेक देशों में कई वर्षों से विभिन्न निजी, लेकिन अलाभकारी उच्च शिक्षण संस्थान कार्य कर रहे हैं। इनमें स्टैंडफोर्ड यूनिवर्सिटी, मैसेच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी आदि शामिल हैं। इसके अतिरिक्त अमेरिका में यूनिवर्सिटी ऑफ फीनिक्स नामक एक निजी और लाभकारी विश्वविद्यालय भी मौजूद है। दूसरी तरफ ब्रिटेन की उच्च शिक्षा प्रणाली में भी अनेक निजी संस्थाएं अलाभकारी आधार पर कार्य कर रही हैं।  

मांग

पहुंच

दाखिला

कम संख्या में दाखिलाभारत की मौजूदा जनसंख्या 121 करोड़ है। [17] सकल दाखिला अनुपात (जीईआर) हासिल करने के लिए शिक्षा के विशिष्ट स्तर (इस मामले में उच्च शिक्षा) में दाखिला प्राप्त कुल विद्यार्थियों के प्रतिशत को कुल जनसंख्या के संबंधित आयु वर्ग (18-24 वर्ष) से विभाजित किया जाता है। वर्ष 2013 में उच्च शिक्षा के  लिए जीईआर 14% से 24% था। वैसे इस वर्ष उच्च शिक्षा के लिए जीईआर दो सरकारी रिपोर्टों में अलग-अलग दर्ज किया गया था। मंत्रालय के अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण में जीईआर 24% था जबकि उच्च शिक्षा विभाग की अनुदान मांगों की जांच करने वाली स्थायी समिति की रिपोर्ट में यह अनुपात 13.6% था।11,[18]

भारत में उच्च शिक्षा में जीईआर पिछले 11 वर्षो में दुगुना हुआ है। वर्ष 2002-03 में यह अनुपात 9% था जोकि 2013-14 में बढ़कर 24% पर पहुंच गया। वर्ष 2013 में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान की शुरुआत की जिसका मुख्य उद्देश्य राज्यों के उच्च शिक्षण संस्थानों को वित्त पोषित करना था। इस योजना का लक्ष्य 2020 तक उच्च शिक्षा में 30% जीईआर हासिल करना है। लेकिन जीईआर के बढ़ने के बावजूद यह प्रदर्शित होता है कि 18-24 वर्ष के आयु वर्ग के केवल 24% व्यक्तियों का वास्तव में विश्वविद्यालयों में दाखिला हुआ है। जबकि इस आयु वर्ग के अंतर्गत आने वाली एक बड़ी आबादी की पहुंच अब भी उच्च शिक्षा तक नहीं है। ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों की तुलना में यह काफी कम है, जैसा कि निम्नलिखित तालिका से स्पष्ट होता है। 

रेखाचित्र 1:  वर्ष 2014 के दौरान विभिन्न देशों में उच्च शिक्षा में सकल दाखिला अनुपात (जीईआर)

 

Sources: “Demands for Grants of Department of Higher Education, Standing Committee on Human Resource Development 2015-16; PRS.

उच्च शिक्षा की मांग में अपेक्षित वृद्धि: प्राथमिक शिक्षा के लिए जीईआर 100% से अधिक और माध्यमिक शिक्षा के लिए 50% से अधिक है। चूंकि प्राथमिक शिक्षा में दाखिला अधिक हुआ है और माध्यमिक शिक्षा में दाखिले एवं ड्रॉप आउट की समस्या को दूर किया जा रहा है, इसलिए अगले कुछ वर्षो में उच्च शिक्षा हासिल करने के इच्छुक विद्यार्थियों की संख्या के बढ़ने की संभावना है। इस प्रकार विश्वविद्यालयी शिक्षा की मांग भी बढ़ने वाली है। दूसरी तरफ एनकेसी ने यह स्वीकार किया है कि बड़े पैमाने पर उच्च शिक्षा के विस्तार को सहयोग देने के लिए सरकारी वित्त पोषण पर्याप्त नहीं होगा। 

उल्लेखनीय है कि पिछले 10 वर्षों के दौरान उच्च शिक्षा पर केंद्र सरकार का व्यय लगभग स्थिर रहा है जोकि उसके कुल व्यय का लगभग 1-1.5% है। [19] हालांकि विभिन्न समितियों ने माना कि उच्च शिक्षा में निजी क्षेत्र के निवेश करने से इस व्यय को बढ़ाने में मदद मिलेगी, लेकिन उच्च शिक्षा पर निजी क्षेत्र के व्यय से संबंधित आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। वर्तमान में भारत अपनी जीडीपी का 1% हिस्सा उच्च शिक्षा पर व्यय करता है। इसके विपरीत अमेरिका अपनी जीडीपी का 3% उच्च शिक्षा पर खर्च करता है। अन्य देशों की स्थिति इस प्रकार- कनाडा 2.5%, चिली 2%, रूस 1% और ब्राजील 0.5%। अमेरिका, चिली और कोरिया में उच्च शिक्षा पर निजी क्षेत्र के व्यय का उच्च अनुपात प्रदर्शित होता है (जीडीपी के 1.7% से 2.1% के बीच)।[20]

आंकड़े प्रदर्शित करते हैं कि वर्तमान में निजी क्षेत्र उच्च शिक्षा की उपलब्धता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। वर्ष 2014 तक देश में कुल 36,812 कॉलेज थे। इनमें से 20,390 निजी और 6,768 सरकारी कॉलेज थे।11उल्लेखनीय है कि इन आंकड़ों (और रेखाचित्र 2 में प्रदर्शित आंकड़ों) से यह प्रदर्शित नहीं होता कि सरकारी या निजी संस्थानों में कितनी सीटें उपलब्ध थीं और उनमें से कितनी सीटें भरी गईं या खाली रहीं। इसके अतिरिक्त विभिन्न राज्यों में विश्वविद्यालय की स्थापना से जुड़ी विनियामक शर्तें भिन्न-भिन्न हो सकती हैं। यह भी एक कारण हो सकता है कि कुछ राज्यों में अन्य राज्यों की तुलना में सरकारी/निजी संस्थानों में दाखिले की दर अधिक है (जैसा कि तालिका 2 दिखाया गया है)।

रेखाचित्र 2:  वर्ष 2013 में गैर सहायता प्राप्त निजी संस्थानों की हिस्सेदारी और दाखिले का प्रतिशत

Sources: AISHE 2014; PRS.

राज्यों के स्तर पर आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में सबसे अधिक कॉलेज हैं। इसके बाद उत्तर प्रदेश और गुजरात का स्थान है। इन राज्यों में निजी कॉलेजों की भी सबसे अधिक संख्या है। परिशिष्ट में सभी राज्यों से संबंधित विवरण उपलब्ध हैं।

अध्ययन के विभिन्न विषय

जहां तक अध्ययन के विषयों का प्रश्न है, भारत के उच्च शिक्षा क्षेत्र में स्नातक स्तर पर अधिकतर विद्यार्थी कला वर्ग (33.7%) में दाखिला लेते हैं, इसके बाद इंजीनियरिंग एवं टेक्नोलॉजी (18.89%) और वाणिज्य (14.51%) का स्थान आता है। जहां स्नातकोत्तर स्तर पर अधिकतर विद्यार्थियों ने मैनेजमेंट अध्ययन को चुना (20.64%), वहीं एम.फिल स्तर पर सामाजिक विज्ञान का वर्ग अग्रणी रहा (24.07%)। वर्ष 2013 में पीएच.डी. स्तर पर अधिकतर विद्यार्थियों ने विज्ञान वर्ग को चुना (22.15%)।[21] 

एनकेसी ने यह पाया कि इंजीनियरिंग, मेडिसिन और प्रबंधन जैसे विषयों में शिक्षा का निजीकरण इस हद तक बढ़ गया है कि इनमें से दो तिहाई से लेकर तीन चौथाई सीटें निजी संस्थानों में ही हैं। वर्ष 2012 में एक यूजीसी रिपोर्ट में टिप्पणी की गई कि भारत में सरकारी और निजी संस्थानों का विषम वितरण है। इसका कारण यह है कि सरकारी विश्वविद्यालयों में परंपरागत विषयों (कला और विज्ञान) में बड़े पैमाने पर दाखिला होता है, जबकि निजी संस्थानों में अधिकतर विद्यार्थी बाजार संचालित विषयों (इंजीनियरिंग, प्रबंधन, इत्यादि) में दाखिला लेते हैं।[22] 2014 में भारत पर केंद्रित ब्रिटिश काउंसिल की एक रिपोर्ट ने सुझाव दिया था कि ऐसे विषय आम तौर पर अधिक रोजगारपरक होते हैं और अधिकतर कंपनियां इंजीनियरिंग और प्रबंधन के विद्यार्थियों को नौकरियां देती हैं। [23]

यशपाल समिति ने यह भी रेखांकित किया कि इंजीनियरिंग, मेडिसिन औऱ प्रबंधन जैसे उभरते हुए क्षेत्रों में निजी निवेश अधिक है, इसके बावजूद परंपरागत विषयों जैसे कला इत्यादि में अभी भी अधिक दाखिले हो रहे हैं। समिति ने कहा कि निजी क्षेत्र को व्यावसायिक रूप से सुसंगत क्षेत्रों जैसे प्रबंधन, एकाउंटेंसी, मेडिसिन इत्यादि तक ही खुद को सीमित नहीं रखना चाहिए। इसलिए दाखिले की संख्या को बढ़ाने की जिम्मेदारी फिलहाल सरकार की है।

आरक्षण

पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय यह कह चुका है कि निजी गैर सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों की अपने प्रशासन पर पूर्ण स्वायत्तता होती है। न्यायालय ने यह भी कहा था कि योग्यता के सिद्धांत का उत्सर्ग नहीं होना चाहिए यानी विद्यार्थियों को उनकी शैक्षणिक क्षमता या योग्यता के आधार पर दाखिला मिलना चाहिए। निजी संस्थान का प्रबंधन अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए विद्यार्थियों के दाखिले का कोटा तय कर सकता है, लेकिन ऐसा योग्यता आधारित दाखिले की परीक्षा से संतुष्ट होने पर ही किया जाएगा। इसका अर्थ यह है कि सरकार गैर सहायता प्राप्त निजी शिक्षण संस्थान में आरक्षण की नीति को अनिवार्य नहीं बना सकती। आरक्षण सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों (अजा), अनुसूचित जनजातियों (अजजा), इत्यादि के लिहाज से सकारात्मक पहल है। इन संस्थानों में आरक्षण को अनिवार्य न करने का स्पष्टीकरण यह है कि इस प्रकार की शर्त लगाना दाखिले की प्रक्रिया, इत्यादि तय करने के संस्थानों के अधिकारों और स्वायत्तता का अतिक्रमण माना जाएगा। संस्थान और सरकार के बीच परस्पर निर्णय लेने की स्थिति में ही आरक्षण दिया जाना संभव था।2,[24]

वर्ष 2005 में संविधान (93वां संशोधन) अधिनियम लागू हुआ और संविधान में अनुच्छेद 15 (5) का सन्निवेश किया गया। यह अधिनियम सरकार को सभी निजी शिक्षण संस्थानों (सहायता प्राप्त और गैर सहायता प्राप्त) में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े नागरिकों, अजा, अजजा इत्यादि के लिए आरक्षण को अनिवार्य करने की शक्ति प्रदान करता है। इसमें अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को अपवाद माना गया है। वर्ष 2008 में इस निर्णय को चुनौती दी गई, लेकिन न्यायालय ने अनुच्छेद 15 (5) की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी। न्यायालय ने कहा कि अगर आरक्षण को इन अल्पसंख्यक संस्थानों पर थोपा जाएगा तो वे अपनी विशिष्टता गंवा देंगे और गैर अल्पसंख्यकों के समानांतर उन्हें एक मंच पर लाना संभव नहीं होगा। हालांकि न्यायालय ने गैर सहायता प्राप्त निजी संस्थानों में आरक्षण को लागू करने से संबंधित प्रश्न को अनुत्तरित छोड़ दिया, क्योंकि इस पहलु को प्रत्यक्षतः चुनौती नहीं दी गई थी।[25] वर्ष 2014 में इस मुद्दे को शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2010 के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। यह अधिनियम प्राथमिक विद्यालयों (निजी गैर सहायता प्राप्त विद्यालयों सहित) में समाज के आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के लिए 25% आरक्षण को अनिवार्य बनाता है। न्यायालय का कहना था कि कानून के तहत सरकार के लिए यह अनिवार्य है कि वह निजी संस्थानों को ऐसी शिक्षा के खर्च की अदायगी करे। इसके अतिरिक्त यह संविधान के अवसर की समानता के उद्देश्य के भी अनुकूल है। न्यायालय ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 15 (5) गैर सहायता प्राप्त निजी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण के संबंध में संवैधानिक रूप से मान्य है।[26] 

फीस का ढांचा

निजी उच्च शिक्षण संस्थानों पर अक्सर यह आरोप लगता है कि वे विद्यार्थियों से कैपिटेशन फीस (अध्ययन के दौरान फीस के अतिरिक्त कोई अन्य राशि) वसूलते हैं। इससे उनकी शिक्षा वहन योग्य नहीं होती। निजी संस्थानों में फीस के ढांचे के कारण भी सभी लोगों की पहुंच उच्च शिक्षा तक नहीं हो पाती। 2008 में यशपाल समिति ने इस संबंध में आंकड़े जारी किए थे। इनमें कहा गया था कि निजी संस्थानों में इंजीनियरिंग कोर्स के लिए 1-10 लाख, मेडिसन के एडवांस कोर्स के लिए 20-40 लाख, डेंटल कोर्स के लिए 5-12 लाख और कला एवं विज्ञान के कोर्स के लिए 30,000-50,000 रुपए की कैपिटेशन फीस है।4

तकनीकी शिक्षण संस्थानों, चिकित्सा शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों में अनुचित तरीकों पर प्रतिबंध विधेयक, 2010 (जोकि 15 वीं लोकसभा के भंग होने के साथ रद्द हो गया) की समीक्षा करते हुए मानव संसाधन विकास संबंधी स्थायी समिति ने कहा था कि अनेक निजी संस्थान बहुत अधिक फीस वसूलते हैं। किसी स्पष्ट नियम के अभाव में ऐसे विश्वविद्यालयों द्वारा फीस के रूप में मोटी रकम वसूली जाती रहेगी।[27] वर्तमान में यूजीसी कुछ हद तक डीम्ड विश्वविद्यालयों द्वारा संचालित किए जाने वाले पाठ्यक्रमों की फीस का विनियमन करता है। समिति का कहना था कि वसूली गई फीस पाठ्यक्रम को संचालित करने की लागत से जुड़ी होनी चाहिए और संस्थान को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शिक्षा का व्यावसायीकरण नहीं किया जा रहा।13

वर्ष 2002 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि निजी गैर सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों द्वारा वसूली जाने वाली फीस को विनियमित किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त कैपिटेशन फीस पर रोक लगाते हुए न्यायालय ने संस्थानों को ऐसी फीस वसूलने को अनुमति दी जोकि उपयुक्त कही जा सके।2  मुनाफाखोरी को रोकने और कैपिटेशन फीस को प्रतिबंधित करने के लिए वर्ष 2003 में न्यायालय ने कहा कि व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के फीस के ढांचे को एक समिति द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए। इस निर्णय के बाद मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों ने इन समितियों का गठन किया। लेकिन ऐसे मामले भी सामने आए जब कुछ समितियों ने फीस के ढांचे को निर्धारित करने के दौरान संस्थान की वित्तीय स्थिति को ध्यान में नहीं रखा, बल्कि यह देखा कि विद्यार्थी कितनी फीस चुका सकते हैं।1

निजी संस्थान दावा करते हैं कि निम्नलिखित कारणों से फीस के ढांचे में संशोधन किया जाता है : (i) प्रभारों में एकाएक होने वाली वृद्धि या संबद्ध विश्वविद्यालयों द्वारा अतिरिक्त फीस की उगाही, (ii) कर्मचारियों के बढ़े हुए वेतन और बाजार में आने वाले उतार-चढ़ावों के कारण संस्थानों के रखरखाव, प्रशासनिक व्यय (लैब के उपकरणों का रखरखाव, नए सॉफ्टवेयर को खरीदना इत्यादि) में होने वाली वृद्धि, (iii) विश्वविद्यालय द्वारा मूल्य संवर्धित पाठ्यक्रमों या सेवाओं से संबंधित अतिरिक्त फीस/प्रभार, और  (iv) अन्य अप्रत्याशित परिस्थितियां।27

गुणवत्ता

एक्रेडेशन

विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाने और उनके विस्तार के अतिरिक्त उनकी गुणवत्ता में सुधार भी महत्वपूर्ण है। एक्रेडेशन इन संस्थानों की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने का एक तरीका है। जो संस्थान स्वेच्छा से अपना एक्रेडेशन कराना चाहते हैं, इस प्रक्रिया के माध्यम से निर्धारित मानदंडों के आधार पर उनके प्रदर्शन का आकलन किया जाता है। इन मानदंडों में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं : (i) पाठ्यक्रम, (ii) शिक्षण-शिक्षा मूल्यांकन, (iii) शोध और परामर्श, (iv) आधारभूत संरचना और शिक्षा संसाधन, (v) विद्यार्थियों का सहयोग, (vi) अभिशासन, नेतृत्व और प्रबंधन, (vii) नवाचार और उत्तम कार्य-पद्धति, (viii) विद्यार्थियों का प्रदर्शन, (ix) अच्छे परिणाम प्राप्त करने में सुधार, और (x) सुविधाएं और तकनीकी सहयोग, इत्यादि। इन पर विचार करने के बाद एक्रेडेशन अथॉरिटी द्वारा संस्थान को निर्णायक अंक दिए जाते हैं।[28] 

उच्च शिक्षण संस्थानों में एक्रेडेशन को अनिवार्य करने के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए नेशनल एक्रेडेशन रेगुलेटरी अथॉरिटी (नारा) विधेयक, 2010 को मई, 2010 में संसद में पेश किया गया। यह एक्रेडेशन संस्थाओं के पंजीकरण और निरीक्षण के लिए नेशनल एक्रेडेशन रेगुलेटरी अथॉरिटी की स्थापना करता है। विधेयक के अनुसार केवल सरकारी संस्थाएं उच्च शिक्षण संस्थानों को एक्रेडेट कर सकती हैं। 15 वीं लोकसभा के भंग होने के साथ यह विधेयक रद्द हो गया।

Sources: The NARA for Higher Educational Institutions Bill, 2010.

ऐसी समीक्षा प्रक्रिया का उद्देश्य यह होता है कि विद्यार्थियों के लिए शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता का आकलन करना आसान हो और वे जानकारी प्राप्त करने के बाद उन्हें चुनें। इससे संस्थान भी अपनी ताकत, कमजोरियों और अपनी योजना के भीतरी पहलुओं के बारे में जान सकते हैं। इस प्रकार का विश्लेषण अनुदान संस्थाओं को आंकड़े प्रदान करने में सहायक हो सकता है और स्नातक विद्यार्थियों की रोजगारपरकता बढ़ सकती है।

भारत में नेशनल एसेसमेंट एंड एक्रेडेशन काउंसिल एक स्वायत्त निकाय है जिसकी स्थापना 1994 में यूजीसी द्वारा की गई थी। इसका मुख्य कार्य उन संस्थानों के आकलन और एक्रेडेशन के माध्यम से शिक्षा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करना था जो इसके लिए स्वेच्छापूर्ण तैयार हों। किसी संस्थान का पुनर्आकलन पांच वर्ष की अवधि के बाद किया जाता है। परिषद द्वारा दिए गए अंक के पुनर्आकलन के लिए कोई संस्थान एक वर्ष के बाद आवेदन कर सकता है लेकिन तीन वर्ष के बाद वह ऐसा कोई आवेदन नहीं कर सकता।28राष्ट्रीय एक्रेडेशन बोर्ड की स्थापना एआईसीटीई अधिनियम, 1987 के तहत की गई थी। बोर्ड के अधिकारों में निम्नलिखित शामिल हैं : (i) तकनीकी संस्थान या कार्यक्रम का आकलन या एक्रेडेशन, (ii) गुणवत्ता आकलन के लिए कार्य-विधि विकसित करने हेतु कॉलेजों और तकनीकी संस्थानों के साथ कार्य करना, और (iii) विश्लेषण की प्रक्रिया को संस्थानों के साथ साझा करना। व्यापक रूप से बोर्ड प्रोग्राम एक्रेडेशन की निगरानी करता है। परिषद और बोर्ड, दोनों सरकारी और निजी उच्च शिक्षण संस्थानों का एक्रेडेशन करते हैं।[29]

फिर भी यह सुनिश्चित करने के लिए कि निकाय निर्धारित समयावधि में एक्रेडेशन का कार्य पूरा करते हैं, प्रभावी कार्यशैली और रणनीतियां तैयार की जानी चाहिए। वर्तमान में इन निकायों के पास एक्रेडेशन के लिए अनेक आवेदन लंबित पड़े रहते हैं (2009 में रिपोर्ट प्रकाशित करने के दौरान एनकेसी का यह कहना था कि केवल 10% संस्थानों का ही एक्रेडेशन किया गया है)। इसके अतिरिक्त संस्थानों को एक्रेडेशन के बाद संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए क्योंकि गुणवत्ता उन्नयन सतत प्रक्रिया होती है। संस्थान की आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन इकाई (इंटरनल क्वालिटी एश्योरेंस सेल) को शैक्षणिक उत्कृष्टता और प्रशासनिक कार्यकुशलता पर निरंतर ध्यान केंद्रित करना पड़ सकता है। अंततः परिषद जैसे एक्रेडेशन निकाय समय-समय पर संस्थानों को इस संबंध में जानकारी दे सकते हैं कि विश्वव्यापी परिप्रेक्ष्य में उत्कृष्टता के मानदंडों के लिहाज से उनकी क्या स्थिति है।[30]

तालिका 2: एक्रेडेशन की अंतरराष्ट्रीय प्रणालियों के बीच तुलना

देश

एक्रेडेशन की प्रणाली

सं.रा.अमेरिका

फेडरल सेक्रेटरी ऑफ एजुकेशन द्वारा मान्यता प्राप्त सरकारी और निजी एजेंसियों को संस्थानों और कार्यक्रमों को एक्रेडेट करने की अनुमति है।

ब्रिटेन

सरकारी और निजी, दोनों प्रकार के निकाय एक्रेडेशन एजेंसी हो सकते हैं। सरकारी फंडिंग से चलने वाले या डिग्री देने का अधिकार रखने वाले विश्वविद्यालयों का एक्रेडेशन सरकारी निकायों द्वारा किया जाता है। निजी संस्थानों को ब्रिटिश एक्रेडेशन काउंसिल और द एक्रेडेशन सर्विस फॉर इंटरनेशनल कॉलेजेस जैसे निजी निकाय भी एक्रेडेशन दे सकते हैं।

जर्मनी

एक्रेडेशन एजेंसियां निजी अलाभकारी संस्थाएं होती हैं जिनका निरीक्षण एक्रेडेशन काउंसिल (फाउंडेशन फॉर द एक्रेडेशन ऑफ स्टडी प्रोग्राम्स के तहत) द्वारा किया जाता है।

कनाडा

एसोसिएशन ऑफ यूनिवर्सिटीज एंड कॉलेजेस ऑफ कनाडा की सदस्यता को गुणवत्ता आश्वासन माना जाता है। इसके अतिरिक्त संस्थानों को एक्रेडेट करने के लिए राज्य विशिष्ट सरकारी या निजी एक्रेडेटिंग एजेंसियां भी मौजूद हैं। कुछ व्यावसायिक प्रोग्राम्स (इंजीनियरिंग और नर्सिंग) को भी व्यावसायिक निकायों द्वारा एक्रेडेट किया जाता है।

Sources: US Department of Higher Education; UK Border Office; Federation for Accreditation of Study Programmes Germany; Association of Universities and Colleges of Canada; PRS

परिशिष्ट

निजी और सरकारी कॉलेजों की राज्यवार संख्या और दाखिला

राज्य

निजी कॉलेजों की संख्या

सरकारी कॉलेजों की संख्या

निजी कॉलेजों में दाखिला % में

सरकारी कॉलेजों में दाखिला % में

अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह

0

4

0

100%

आंध्र प्रदेश

1423

139

91%

9%

अरुणाचल प्रदेश

6

9

8%

92%

असम

38

328

3%

97%

बिहार

81

452

14%

86%

चंडीगढ़

8

16

55%

45%

छत्तीसगढ़

336

294

46%

54%

दादरा और नगर हवेली

4

2

53%

47%

दमन और दीव

4

2

20%

80%

दिल्ली

72

86

31%

69%

गोवा

30

20

59%

41%

गुजरात

1345

476

70%

30%

हरियाणा

531

149

64%

36%

हिमाचल प्रदेश

132

122

36%

64%

जम्मू कश्मीर

112

107

16%

84%

झारखंड

60

115

15%

85%

कर्नाटक

2442

604

71%

29%

केरल

645

151

84%

16%

मध्य प्रदेश

1200

555

52%

48%

महाराष्ट्र

3522

769

78%

22%

मणिपुर

34

48

43%

57%

मेघालय

23

14

63%

37%

मिजोरम

1

28

1%

99%

नागालैंड

39

21

64%

36%

ओड़ीशा

553

286

63%

37%

पुद्दूचेरी

48

24

62%

38%

पंजाब

330

105

63%

37%

राजस्थान

840

283

41%

59%

सिक्किम

5

7

14%

86%

तमिलनाडु

2141

335

83%

17%

तेलंगाना

1242

143

87%

13%

त्रिपुरा

6

39

6%

94%

उत्तर प्रदेश

2460

544

85%

15%

उत्तराखंड

136

95

35%

65%

पश्चिम बंगाल

541

396

36%

64%

कुल

20390

6768

64%

36%

Sources: AISHE 2014; PRS.    *Note: Figures based on actual responses received by Ministry during survey.

 

[1] Islamic Academy of Education vs. State of Karnataka & Ors., Writ Petition (Civil) 350 of 1993.

[2] TMA Pai Foundation vs. State of Karnataka &Ors., Write Petition (Civil) 317 of 1993.

[3] Report to the Nation: 2006-2009, National Knowledge Commission, March 2009, http://www.aicte-india.org/downloads/nkc.pdf.

[4] Report of the Committee to Advise on Renovation and Rejuvenation of Higher Education, 2009, http://mhrd.gov.in/sites/upload_files/mhrd/files/document-reports/YPC-Report.pdf.

[5] Entry 25, Concurrent List, Constitution of India.

[6] Entry 66, Union List, Constitution of India.

[7] Entry 32, State List, Constitution of India.

[8] Report of the Central Advisory Board of Education (CABE) Committee on Autonomy of Higher Education Institutions, Ministry of Human Resource Development, June 2005, http://mhrd.gov.in/sites/upload_files/mhrd/files/document-reports/AutonomyHEI.pdf.

[9] Entry 64, Union List, Constitution of India.

[10] Unstarred Question No. 1628, Lok Sabha, December 3, 2014.

[11] All India Survey on Higher Education 2013-14 (Provisional)”, Ministry of Human Resource Development, 2015, http://mhrd.gov.in/sites/upload_files/mhrd/files/statistics/AISHE13-14P.pdf.

[12] Rajasthan Private Universities Act, 2005, May 8, 2005, http://www.lawsofindia.org/pdf/rajasthan/2005/2005Rajasthan10.pdf; Madhya Pradesh Niji Vishwavidyalaya (Sthapana Avam Sanchalan) Adhiniyam, 2007, May 25, 2007, http://www.highereducation.mp.gov.in/adhiniyam/PrivateUniversityACt2007English.pdf; Gujarat Private Universities Act, 2009, July 7, 2009, http://gujarat-education.gov.in/education/Images/extra-9.pdf.  

[13]UGC (Institutions Deemed to be Universities) Regulations, 2010, University Grants Commission, May 21, 2010, http://www.ugc.ac.in/oldpdf/regulations/gazzeetenglish.pdf; UGC (Institutions Deemed to be Universities) (Amendment) Regulations, 2014, http://www.ugc.ac.in/pdfnews/1842250_deemedregulation2014.PDF.

[14] Viplav Sharma vs. Union of India & Ors., Writ Petition (Civil) 142 of 2006.

[15] University Grants Commission Act, 1956, Ministry of Human Resource Development.

[16] All India Council for Technical Education Act, 1987, Ministry of Human Resource Development.

[17] Single year age data, Population Enumeration Data (Final Population), 2011 Census of India.

[18] 265th Report: Demands for Grants 2015-16 (Demand No. 60) of the Department of Higher Education, Standing Committee on Human Resource Development, April 23, 2015, http://164.100.47.5/newcommittee/reports/EnglishCommittees/Committee%20on%20HRD/265.pdf.

[19] Demands for Grants of Department of Higher Education, Expenditure Budget, http://indiabudget.nic.in/index.asp.

[20]Education at a Glance 2010, Organisation for Economic Cooperation and Development Indicators, 2010, http://www.oecd.org/education/skills-beyond-school/45926093.pdf.

[21] All India Survey on Higher Education 2012-13 (Provisional)”, Ministry of Human Resource Development, 2015, http://mhrd.gov.in/sites/upload_files/mhrd/files/statistics/AISHE2012-13F.pdf.

[22] Inclusive and Qualitative Expansion of Higher Education 2012-17, University Grants Commission, November 2011, http://www.ugc.ac.in/ugcpdf/740315_12FYP.pdf.

[23] India Employability Survey Report 2014, British Council, 2014, https://www.kcl.ac.uk/campuslife/services/careers/Students-Graduates/Global-Careers/India-Employability-Report-2014--FINAL.pdf.

[24] P.A. Inamdar and Ors. vs. State of Maharashtra & Ors., Appeal (Civil) 5041 of 2005.

[25] Ashoka Kumar Thakur vs. Union of India & Ors., Writ Petition (Civil) 265 of 2006.

[26] Pramati Educational and Cultural Trust & Ors. vs. Union of India & Ors., Writ Petition (Civil) 416 of 2012.

[27] 236th Report on the Prohibition of Unfair Practices in Technical Educational Institutions, Medical Educational Institutions and Universities Bill, 2010, Standing Committee on Human Resource Development, May 30, 2011, http://164.100.47.5/newcommittee/reports/EnglishCommittees/Committee%20on%20HRD/236.pdf.

[28] National Assessment and Accreditation Council of India, University Grants Commission, http://www.naac.gov.in/.

[29] National Board of Accreditation, All India Council for Technical Education, http://www.nbaind.org/views/Home.aspx.

[30] Higher Education in India: Issues, Concerns and New Directions, University Grants Commission, December 2003, http://www.ugc.ac.in/oldpdf/pub/he/heindia.pdf.

 

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