आदिवासियों के लिए शैक्षणिक योजनाएं

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट का सारांश

  • सामाजिक न्याय और अधिकारिता संबंधी स्टैंडिंग कमिटी (चेयरपर्सन : रमेश बैस) ने 3 जनवरी, 2018 को ‘आदिवासियों के लिए शैक्षणिक योजनाएं’ पर अपनी रिपोर्ट सौंपी।
     
  • मौजूदा योजनाओं का प्रदर्शन: कमिटी ने कहा कि देश में आदिवासियों के लिए अनेक शैक्षणिक योजनाएं हैं, इसके बावजूद उनकी साक्षरता दर (59%) राष्ट्रीय साक्षरता दर (74%) से बहुत कम है। इनके निम्नलिखित कारण हैं : (i) अनुसूचित जनजातियों (एसटी) की खराब आर्थिक स्थितियां, (ii) घर से स्कूल का काफी दूर होना (खास तौर से सेकेंडरी शिक्षा और उससे ऊपर के स्तर के स्कूलों का), और (iii) इस संबंध में जागरूकता का अभाव कि लंबे समय में औपचारिक शिक्षा के क्या लाभ होते हैं। कमिटी ने गौर किया कि जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा एसटी विद्यार्थियों के लिए आश्रम पद्धति स्कूलों, प्री-मैट्रिक स्कॉलरशिप्स और पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप्स जैसे प्रयासों से आदिवासियों की शिक्षा की स्थिति में सुधार के वांछित परिणाम प्राप्त नहीं हुए। यह कहा गया कि लागू की गई योजनाओं में दृढ़ विश्वास और निगरानी की कमी पाई गई। कमिटी ने कहा कि इन योजनाओं को लागू करने में मंत्रालय को अधिक प्रतिबद्धता का प्रदर्शन करना चाहिए।
     
  • द्विभाषी (बाइलिंगुअल) प्राइमर्स को तैयार करना: द्विभाषी प्राइमर्स में क्षेत्रीय और आदिवासी भाषाओं के टेक्स्ट होते हैं ताकि आदिवासी इलाकों के स्कूलों में शिक्षण (पढ़ने और लिखने) को आसान बनाया जा सके। कमिटी ने गौर किया कि इन द्विभाषी प्राइमर्स को तैयार करने की गति धीमी है और उसने सुझाव दिया कि मंत्रालय को राज्यों के साथ इन मुद्दों को आगे बढ़ाना चाहिए।
     
  • हॉस्टल्स की स्थिति: कमिटी ने गौर किया कि देश में एसटी विद्यार्थियों के लिए 1,470 फंक्शनल हॉस्टल हैं। ये हॉस्टल्स उन एसटी विद्यार्थियों को आवास की सुविधा प्रदान करते हैं जो आर्थिक कारणों से अपनी शिक्षा को जारी रखने में समर्थ नहीं हैं। कमिटी ने कहा कि इन हॉस्टल्स का बिल्डिंग स्ट्रक्चर खराब है और वहां के भोजन की क्वालिटी अच्छी नहीं है। कमिटी ने यह भी कहा कि चूंकि मंत्रालय इन हॉस्टल्स और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाने में काफी धन खर्च करता है, इसलिए उसे इनके संचालन की उचित तरीके से निगरानी करनी चाहिए।

विशिष्ट योजनाओं का प्रदर्शन 

  • (i) आश्रम पद्धति स्कूलों की स्थापना हेतु योजना: आदिवासी उप-योजना क्षेत्रों में आश्रम पद्धति स्कूलों की स्थापना की योजना केंद्रीय प्रायोजित योजना है। इसका उद्देश्य कुछ चरमपंथ प्रभावित क्षेत्रों में लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग आश्रम स्कूल बनाना है। इन स्कूलों के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी राज्यों की है। कमिटी के अनुसार, राज्य सरकारों को आश्रम स्कूलों के रखरखाव की जिम्मेदारी सौंपने से इन स्कूलों की स्थिति खराब हुई है। कमिटी ने ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करने का सुझाव दिया कि स्कूल सभी मानदंडों का पालन करें और राज्यों द्वारा उनकी नियमित निगरानी की जाए।
     
  • (ii) पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप योजना: पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप योजना मान्यता प्राप्त संस्थानों में पोस्ट-मैट्रिक कोर्सेज़ करने वाले एसटी विद्यार्थियों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है। कमिटी ने कहा कि अधिकतर राज्य सरकारें योजना को वित्त पोषित करने की अपनी जिम्मेदारी का वहन करने की इच्छा नहीं रखतीं। इससे एसटी विद्यार्थियों के लिए शिक्षा को जारी रखना मुश्किल है।
     
  • (iii) प्री-मैट्रिक स्कॉलरशिप योजना: प्री-मैट्रिक स्कॉलरशिप योजना 9वीं और 10वीं कक्षाओं में पढ़ने वाले आदिवासी विद्यार्थियों के लिए है। कमिटी ने कहा कि 2014-15 से 2017-18 के दौरान योजना के अंतर्गत कुछ राज्यों को फंड्स नहीं जारी किए गए। कमिटी के अनुसार, अनुदानों के संवितरण में ऐसी लापरवाही की वजह मंत्रालय की ओर से दृढ़ निश्चय की कमी है।
     
  • (iv) एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूल (ईएमआरएस): एसटी विद्यार्थियों को माध्यमिक और उच्च स्तरीय शिक्षा प्रदान करने के लिए ईएमआरएस की स्थापना की गई जिसमें प्रत्येक स्कूल की क्षमता 450 विद्यार्थियों की है। ईएमआरएस की स्थापना मांग आधारित है जिन्हें राज्यों के प्रस्ताव देने के बाद स्थापित किया जाता है। कमिटी ने कहा कि अधिकतर ईएमआरएस अच्छी तरह से काम नहीं कर रहे, उनका इंफ्रास्ट्रक्चर अच्छा नहीं है और शिक्षक अपर्याप्त हैं। कमिटी ने सुझाव दिया कि मंत्रालय को ऐसी व्यवस्था तैयार करनी चाहिए जो इन स्कूलों के स्तर में सुधार करे और उन्हें उचित तरीके से संचालित करे।
     
  • (v) नेशनल ओवरसीज स्कॉलरशिप योजना: नेशनल ओवरसीज स्कॉलरशिप योजना पीएच.डी और पोस्ट डॉक्टोरल स्टडीज़ करने वाले 20 चुनींदा विद्यार्थियों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है। कमिटी ने गौर किया कि पिछले वर्षों में इस स्कॉलरशिप को प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की संख्या में कमी आई है। कमिटी ने कहा कि इसका कारण विद्यार्थियों में इस योजना के बारे में जागरूकता की कमी हो सकती है। इस बारे में कमिटी ने कहा कि किसी योजना की सफलता के लिए उचित दिशानिर्देश और प्रचार महत्वपूर्ण होते हैं।

 

 

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