विविध

कोविड-19 महामारी पर केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया (7-13 अप्रैल, 2020)

13 अप्रैल, 2020 को भारत में कोविड-19 के 9,152 पुष्ट मामले हैं। इनमें से 857 मरीजों का इलाज हो चुका है/उन्हें डिस्चार्ज किया जा चुका है और 308 की मृत्यु हुई है।

जैसे इस महामारी का प्रकोप बढ़ा और वायरस से संबंधित जानकारियों में इजाफा हुआ, केंद्र सरकार ने इसकी रोकथाम के लिए अनेक नीतिगत फैसलों की घोषणा की। इसके अतिरिक्त इन फैसलों से प्रभावित नागरिकों और व्यवसायों को मदद देने के उपायों की भी घोषणा की गई। इस ब्लॉग पोस्ट में हम केंद्र सरकार के 7 अप्रैल से 13 अप्रैल तक के कुछ मुख्य कदमों का सारांश प्रस्तुत कर रहे हैं।

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SourceMinistry of Health and Family Welfare, PRS.

स्वास्थ्य

सर्वोच्च न्यायालय ने कोविड-19 की मुफ्त टेस्टिंग और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए पर्सनल प्रोटेक्टिव उपकरणों के प्रावधान का आदेश दिया

  • स्वास्थ्यकर्मियों के लिए सुरक्षा: न्यायालय ने यह भी कहा कि कोविड-19 के मरीजों का इलाज करने वाले स्वास्थ्यकर्मी इस महामारी के संभावित जोखिम से जुड़े लांछन के कारण जनता द्वारा हिंसा का शिकार हो रहे हैं। न्यायालय ने कहा कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पुलिस प्रशासन को निर्देश देना चाहिए कि अस्पतालों, उन स्थानों पर- जहां लोगों को क्वारंटाइन में रखा गया है, और स्क्रीनिंग के दौरान डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ को सुरक्षा प्रदान करें। उन लोगों के खिलाफ जरूरी कार्रवाई की जानी चाहिए जो कोविड-19 की रोकथाम में लगे डॉक्टरों, मेडिकल स्टाफ और दूसरे सरकारी अधिकारियों के कामकाज को बाधित कर रहे हैं और किसी प्रकार का अपराध कर रहे हैं।

कुछ वस्तुओं पर कस्टम ड्यूटी और हेल्थ सेस से छूट

केंद्र सरकार ने कुछ वस्तुओं पर बेसिक कस्टम्स ड्यूटी और हेल्थ सेस की वसूली से छूट दी है। इनमें वेंटिलेटर्स, फेस मास्क्स, पीपीई, कोविड-19 टेस्टिंग किट्स और इन वस्तुओं की मैन्यूफैक्चरिंग के लिए जरूरी वस्तुएं शामिल हैं। यह छूट 30 सितंबर, 2020 तक लागू रहेगी।

वित्तीय सहायता

कोविड-19 पर आपात प्रतिक्रिया और स्वास्थ्य प्रणाली तैयारी पैकेज

केंद्र सरकार ने कोविड-19 आपात प्रतिक्रिया और स्वास्थ्य प्रणाली तैयारी पैकेज को मंजूरी दी है। इसे जनवरी 2020 और मार्च 2024 के दौरान तीन चरणों में लागू किया जाएगा। पैकेज के उद्देश्यों में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) राष्ट्रीय एवं राज्य स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूती देना, (ii) कोविड-19 के लिए तैयारी को मदद देना, (iii) जरूरी मेडिकल उपकरणों और दवाओं की खरीद करना, (iv) निगरानी करने के लिए लेबोरेट्रीज़ स्थापित करना, और (v) जैविक सुरक्षा।   

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने कार्यक्रम के चरण 1 के लिए धनराशि जारी करनी शुरू कर दी है। यह कार्यक्रम जून 2020 तक चलेगा। इस धनराशि को निम्नलिखित गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा: (i) कोविड-19 के मरीजों के लिए अस्पताल और आइसोलेशन वार्ड बनाना, (ii) वेंटिलेटर्स देना, (iii) डायग्नॉस्टिक क्षमताओं में विस्तार करना, और (iv) बीमारी की सामुदायिक निगरानी।  

राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली से आंशिक निकासी की अनुमति

राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली के सबस्क्राइबर्स अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए आंशिक निकासी कर सकते हैं। सबस्क्राइबर के औपचारिक अनुरोध पर निकासी की अनुमति है। इस राशि को सबस्क्राइबर, उसके पति या पत्नी, बच्चों (गोद लिए बच्चे सहित) या निर्भर माता-पिता के इलाज के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

पांच लाख रुपए तक के सभी लंबित इनकम टैक्स रिफंड जारी किए जाएंगे 

व्यवसायों और लोगों को तत्काल राहत देने के लिए पांच लाख रुपए तक के सभी लंबित इनकम टैक्स रिफंड तत्काल जारी किए जाएंगे। इससे 14 लाख टैक्सपेयर्स को लाभ मिलने का अनुमान है। इसके अतिरिक्त सभी लंबित जीएसटी और कस्टम्स रिफंड जारी किए जाएंगे। इससे लगभग एक लाख बिजनेस एंटिटीज़ को लाभ मिलेगा। लगभग 18,000 करोड़ रुपए का कुल रिफंड दिया जाएगा। 

कोविड-19 के कारण मृत्यु की स्थिति में भारतीय खाद्य निगम कर्मचारियों को मुआवजा

केंद्र सरकार ने भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के 1.08 लाख कर्मचारियों को मौद्रिक मुआवजा देने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। इसमें वे 80,000 श्रमिक भी शामिल हैं जो देश की सप्लाई फूड चेन में काम करते हैं। वर्तमान में आतंकवादी हमलों, बम विस्फोट, भीड़ की हिंसा या प्राकृतिक आपदाओं की स्थितियों में एफसीआई कर्मचारियों के परिवारों की मृत्यु होने पर उन्हें मुआवजा मिलता है। हालांकि इसमें एफसीआई के नियमित और ठेके पर काम करने वाले श्रमिक शामिल नहीं हैं। इस प्रस्ताव के अंतर्गत 24 मार्च, 2020 और 23 सितंबर, 2020 के बीच कोविड-19 के कारण मृत्यु होने पर ड्यूटी पर सभी श्रमिकों का बीमा किया जाएगा। नियमित श्रमिक 15 लाख रुपए के हकदार होंगे, ठेके पर काम करने वाले श्रमिक 10 लाख रुपए के हकदार होंगे, श्रेणी 1 के अधिकारी 35 लाख रुपए, श्रेणी 2 के 30 लाख रुपए तथा श्रेणी 3 एवं श्रेणी 4 के कर्मचारी 25 लाख रुपए के हकदार होंगे। 

गैर सरकारी संगठनों को राहत कार्यों के लिए एफसीआई से सीधे खाद्यान्न खरीदने की अनुमति

सरकार ने कहा है कि लॉकडाउन के दौरान हजारों गरीब लोगों को खाना पहुंचाने में गैर सरकारी संगठन और चैरिटेबल संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इन संगठनों को बिना किसी परेशानी के खाद्यान्न मिलता रहे, इसके लिए केंद्र सरकार ने एफसीआई को निर्देश दिया है कि वह ओपन मार्केट सेल स्कीम रेट पर गैर सरकारी संगठनों को गेहूं और चावल दे। ये दरें आम तौर पर राज्य सरकारों और पंजीकृत बल्क यूजर्स के लिए आरक्षित होती हैं। इसका अर्थ यह है कि ये संगठन पूर्व निर्धारित आरक्षित मूल्य पर एफसीआई से एक बार में एक से दस मीट्रिक टन गेहूं और चावल खरीद सकते हैं।

वित्तीय संसाधन बढ़ाना

संसद के सदस्यों के वेतन और लाभों में कटौती

इस हफ्ते केंद्र ने दो अध्यादेश जारी किए: (i) सांसदों के वेतन में एक वर्ष के लिए 30% की कटौती हेतु संसद सदस्यों के वेतन, भत्ते और पेंशन एक्ट, 1954, में संशोधन और (ii) मंत्रियों के सत्कार भत्ते में एक वर्ष के लिए 30% की कटौती हेतु मंत्रियों का वेतन और भत्ते एक्ट, 1952 में संशोधन। सरकार ने 1954 के एक्ट में अधिसूचित नियमों में भी संशोधन किया है ताकि सांसदों के कुछ भत्तों में एक वर्ष के लिए कटौतियां की जा सकेंऔर दो वर्षों के लिए एमपीलैड योजना को रोका गया है। एमपीलैड योजना से संसद सदस्यों को अपने निर्वाचन क्षेत्रों में विकास संबंधी कार्य के सुझाव देने का मौका मिलता है। कोविड-19 महामारी से निपटने के लिए केंद्र के वित्तीय संसाधनों को पूरा करने हेतु ये परिवर्तन किए गए हैं। सांसदों और मंत्रियों के वेतन और भत्तों में प्रस्तावित कटौती से लगभग 55 करोड़ रुपए की बचत होगी और एमपीलैड योजना को रोकने से 7800 करोड़ रुपए की बचत की उम्मीद है। कोविड-19 के कारण तत्काल आर्थिक संकट से लड़ने के लिए जितनी अनुमानित राशि की जरूरत होगी, यह बचत राशि उसका क्रमशः 0.03% और 4.5% है।

सांसदों के वेतन और लाभों में कटौती के प्रभावों पर अधिक जानकारी के लिए कृपया यहां देखें। 

कोविड-19 के प्रसार पर अधिक जानकारी और महामारी पर केंद्र एवं राज्य सरकारों की प्रतिक्रियाओं के लिए कृपया यहां देखे 

रेलवे की वित्तीय स्थिति पर कोविड-19 का प्रभाव

कोविड-19 की महामारी के कारण सभी यात्री गाड़ियां 14 अप्रैल, 2020 तक रद्द हैं। हालांकि मालवाहक सेवाएं बहाल हैं और देश के विभिन्न हिस्सों में अनिवार्य वस्तुएं पहुंचाने वाली गाड़ियां चल रही हैं। रेलवे ने ई-कॉमर्स कंपनियों और राज्य सरकारों सहित दूसरे ग्राहकों के लिए क्विक मास ट्रांसपोटेशन हेतु रेलवे पार्सल वैन्स भी उपलब्ध कराई है ताकि कुछ वस्तुओं का परिवहन किया जा सके। इनमें छोटे पार्सल साइज में मेडिकल सप्लाई, मेडिकल उपकरण, खाद्य पदार्थ इत्यादि शामिल हैं। इसके अतिरिक्त रेलवे ने कोविड-19 के दौरान मदद हेतु कई दूसरे कदम भी उठाए हैं।

चूंकि यात्रा पर 23 मार्च से 14 अप्रैल, 2020 तक प्रतिबंध है (जोकि आगे भी बढ़ सकता है), इसने 2019-20 और 2020-21 में रेलवे की वित्तीय स्थिति को प्रभावित किया है। इस पोस्ट में हम रेलवे की वित्तीय स्थिति पर चर्चा करेंगे और इस बात पर भी विचार विमर्श किया जाएगा कि यात्रा पर प्रतिबंध से रेलवे के राजस्व पर क्या संभावित असर हो सकता है।  

रेलवे के आंतरिक राजस्व पर प्रतिबंध का प्रभाव

रेलवे को मुख्य रूप से यात्री यातायात और माल की ढुलाई से आंतरिक राजस्व प्राप्त होता है। 2018-19 में (हालिया वास्तविक) माल ढुलाई और यात्री यातायात से क्रमशः 67और 27आंतरिक राजस्व प्राप्त हुआ था। शेष आंतरिक राजस्व विविध स्रोतों से प्राप्त हुआ था, जैसे पार्सल सेवा, कोचिंग रसीद और प्लेटफॉर्म टिकटों की बिक्री। 2020-21 में रेलवे को माल ढुलाई से 65% और यात्री यातायात से 27% आंतरिक राजस्व प्राप्त होने की उम्मीद है।

यात्री यातायात2020-21 में रेलवे को यात्री यातायात से 61,000 करोड़ रुपए की आय होने की उम्मीद है, जोकि 2019-20 के संशोधित अनुमानों की तुलना में 9% अधिक हैं (56,000 करोड़ रुपए)।

रेल मंत्रालय से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, फरवरी 2020 तक यात्री यातायात से लगभग 48,801 करोड़ रुपए प्राप्त हुए थे। यह 2019-20 में यात्री राजस्व के संशोधित अनुमानों की तुलना में 7,199 करोड़ रुपए कम था जिसका अर्थ यह था कि यह राशि मार्च 2020 में अर्जित करनी जरूरी होगी ताकि संशोधित अनुमान के लक्ष्यों को हासिल किया जा सके (वर्ष के लक्ष्य का 13%)। हालांकि 2019-20 (11 महीनों के लिए) में औसत यात्री राजस्व लगभग 4,432 करोड़ रुपए रहा है। उल्लेखनीय है कि मार्च 2019 में यात्री राजस्व 4,440 करोड़ रुपए था। 23 मार्च से यात्रा पर पूरी तरह से प्रतिबंध के कारण 2019-20 में रेलवे का यात्री राजस्व अपने लक्ष्य से कम हो जाएगा।  

अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि देश भर में रेल यात्राएं हमेशा की तरह कब से शुरू होंगी। कुछ राज्यों ने लॉकडाउन को बढ़ाना शुरू कर दिया है। ऐसी स्थिति में यात्री राजस्व में गिरावट लॉकडाउन के इन तीन हफ्तों के बाद भी रह सकती है। 

माल ढुलाई2020-21 में रेलवे को गुड्स ट्रैफिक से 1,47,000 करोड़ रुपए की कमाई की उम्मीद है जोकि 2019-20 के संशोधित अनुमानों की तुलना में 9% अधिक है (1,34,733 करोड़ रुपए)।

रेल मंत्रालय से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, फरवरी 2020 तक माल ढुलाई से लगभग 1,08,658 करोड़ रुपए प्राप्त हुए थे। यह 2019-20 में माल ढुलाई के संशोधित अनुमानों की तुलना में 26,075 करोड़ रुपए कम था जिसका अर्थ यह था कि यह राशि मार्च 2020 में अर्जित करनी जरूरी होगी ताकि संशोधित अनुमान के लक्ष्यों को हासिल किया जा सके (वर्ष के लक्ष्य का 19%)। हालांकि 2019-20 (11 महीनों के लिए) में औसत माल ढुलाई लगभग 10,029 करोड़ रुपए रही है। उल्लेखनीय है कि मार्च 2019 में माल ढुलाई 16,721 करोड़ रुपए था। 

हालांकि यात्री यातायात पूरी तरह से प्रतिबंधित है, माल ढुलाई जारी है। लॉकडाउन के दौरान अनिवार्य वस्तुओं का परिवहन, कार्गो मूवमेंट के लिए रेलवे का परिचालन, राहत और निकासी तथा उससे संबंधित ऑपरेशनल संगठनों को अनुमति दी गई है। रेलवे की ढुलाई वाली अनेक वस्तुओं (कोयला, लौह अयस्क, स्टील, पेट्रोलियम उत्पाद, खाद्यान्न, उर्वरक) को अनिवार्य वस्तुएं घोषित किया गया है। लॉकडाउन में रेलवे ने स्पेशल पार्सल रेलों को चलाना भी शुरू किया है (अनिवार्य वस्तुओं, ई-कॉमर्स गुड्स इत्यादि)। इन गतिविधियों से माल राजस्व प्राप्त होने में मदद मिलती रहेगी।  

हालांकि कुछ ऐसी वस्तुएं जिनका परिवहन रेलवे करता है, जैसे सीमेंट, को अनिवार्य वस्तुओं में वर्गीकृत नहीं किया गया है। रेलवे के माल राजस्व में इन वस्तुओं के परिवहन का योगदान लगभग 8है। रेलवे ने माल ढुलाई पर वसूले जाने वाले कई शुल्कों में राहत भी दी है। यह देखना अभी बाकी है कि क्या रेलवे माल राजस्व के अपने लक्ष्यों को पूरा कर पाता है। 

रेखाचित्र 12018-19 में माल ढुलाई का हिस्सा और राजस्व (% में)

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SourcesExpenditure Profile, Union Budget 2020-21; PRS.  

माल ढुलाई यात्री यातायात को क्रॉस सब्सिडाइज़ करता है, इसकी स्थिति इस वर्ष और बुरी हो सकती है

रेलवे अपनी माल ढुलाई से प्राप्त लाभ का इस्तेमाल यात्री सेगमेंट के नुकसान की भरपाई करने और अपनी वित्तीय स्थिति में सुधार करने के लिए करता है। इस क्रॉस सब्सिडी से माल भाड़े में बढ़ोतरी हुई है। यात्रा पर प्रतिबंध और अगर लॉकडाउन (कुछ रूप में) जारी रहता है तो यात्री परिचालन को काफी नुकसान होगा। इससे माल ढुलाई पर क्रॉस सब्सिडी का दबाव और बढ़ सकता है। चूंकि रेलवे अपने माल भाड़े को और अधिक नहीं बढ़ा सकता, यह अस्पष्ट है कि यह क्रॉस सब्सिडी कैसे काम करेगी।

उदाहरण के लिए 2017-18 में यात्री और अन्य कोचिंग सेवाओं को 37,937 करोड़ रुपए का घाटा हुआ, जबकि माल ढुलाई को 39,956 करोड़ रुपए का लाभ हुआ। माल ढुलाई से प्राप्त लगभग 95% लाभ से यात्री और अन्य कोचिंग सेवाओं से होने नुकसान की भरपाई की गई। इस अवधि में कुल यात्री राजस्व 46,280 करोड़ रुपए था। इसका अर्थ यह था कि यात्री कारोबार में हुआ घाटा, रेलवे के राजस्व का 82% है। इसलिए 2017-18 में अपने यात्री कारोबार से रेलवे को अगर एक रुपए की आमदनी हुई तो उसने उस पर 1.82 रुपए खर्च किए।

रेलवे का व्यय

यात्रा पर प्रतिबंध से रेलवे अपनी सभी सेवाएं नहीं संचालित कर सकता, पर उसे अपने परिचालन व्यय का वहन करना होगा। कर्मचारियों का वेतन और पेंशन चुकानी होगी, जोकि कुल मिलाकर रेलवे का 66राजस्व व्यय होता है। 2015 और 2020 के बीच (बजट अनुमान), वेतन पर रेलवे के व्यय में औसत 13की दर से हर साल वृद्धि हुई है।

राजस्व व्यय का लगभग 18ईंधन पर खर्च किया जाता है लेकिन तेल की कीमतों में गिरावट के कारण इसमें कुछ कमी देखी जा सकती है। रेलवे को रखरखाव, सुरक्षा और मूल्यह्रास पर खर्च करना ही होगा क्योंकि यह दीर्घावधि की लागत हैं जिन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त माल ढुलाई के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर का नियमित रखरखाव भी जरूरी होगा। 

राजस्व अधिशेष और परिचालन अनुपात और प्रभावित हो सकते हैं

रेलवे के अधिशेष को उसके कुल आंतरिक राजस्व और कुल राजस्व व्यय (कार्यचालन व्यय और पेंशन एवं मूल्य ह्रास कोष संबंधी विनियोग) के अंतर के आधार पर आंका जाता है। परिचालन अनुपात यातायात से अर्जित होने वाले राजस्व में कार्यचालन व्यय (रेलवे के रोजमर्रा के कामकाज में होने वाला व्यय) का अनुपात होता है। इसलिए उच्च अनुपात यह संकेत देता है कि रेलवे में अधिशेष अर्जित करने की क्षमता कम है जिनका उपयोग पूंजीगत निवेश के लिए किया जा सकता है, जैसे नई लाइनें बिछाना, नए कोच लगाना, इत्यादि। राजस्व अधिशेष में गिरावट से रेलवे की अपने इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश की क्षमता प्रभावित होती है। 

पिछले एक दशक से रेलवे उच्च अधिशेष अर्जित करने के लिए संघर्ष कर रहा है। परिणामस्वरूप परिचालन अनुपात एक दशक से भी अधिक समय से लगातार 90से अधिक रहा है (रेखाचित्र 2)। 2018-19 में यह 92.8के अनुमानित अनुपात की तुलना में 97.3% हो गया। कैग (2019) ने कहा कि 2018-19 के अग्रिम को प्राप्तियों में शामिल न किया जाता तो 2017-18 का परिचालन अनुपात 102.66% होता। 

2020-21 में रेलवे द्वारा 6,500 करोड़ रुपए का अधिशेष अर्जित करने और परिचालन अनुपात के 96.2% पर बहाल रहने की उम्मीद है। लॉकडाउन के कारण राजस्व पर असर होगा तो इस अधिशेष में और गिरावट आ सकती हैऔर परिचालन अनुपात पर और बुरा असर हो सकता है। 

रेखाचित्र 2: परिचालन अनुपात 

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NoteRE – Revised Estimates, BE – Budget Estimates.

Sources:  Expenditure Profile, Union Budget 2020-21; PRS.  

राजस्व के अन्य स्रोत

आंतरिक स्रोतों के अतिरिक्त रेलवे के वित्त पोषण के दो अन्य स्रोत होते हैं(i) केंद्र सरकार से बजटीय समर्थन, और (ii) अतिरिक्त बजटीय संसाधन (जैसे प्राथमिक उधारियां, जिसमें संस्थागत वित्त पोषण, सार्वजनिक निजी सहभागिता और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश शामिल हैं)।

केंद्र सरकार से बजटीय सहयोगकेंद्र सरकार रेलवे को अपना नेटवर्क बढ़ाने और पूंजीगत व्यय में निवेश के लिए सहयोग देती है। 2020-21 में केंद्र सरकार से सकल बजटीय सहयोग 70,250 करोड़ रुपए प्रस्तावित है। यह 2019-20 के संशोधित अनुमानों से 3अधिक है (68,105 करोड़ रुपए)। उल्लेखनीय है कि कोविड महामारी के कारण सरकारी राजस्व भी प्रभावित हो रहा है, यह राशि भी वर्ष के दौरान कम हो सकती है। 

उधारियांरेलवे अधिकतर भारतीय रेलवे वित्त निगम (आईआरएफसी) के जरिए धनराशि उधार लेता है। आईआरएफसी बाजार से धनराशि लेता है (टैक्स योग्य तथा टैक्स मुक्त बॉन्ड इश्यूएंस, बैंकों और वित्तीय संस्थानों से टर्म लोन्स), और फिर भारतीय रेलवे के रोलिंग स्टॉक एसेट्स और प्रॉजेक्ट एसेट्स को वित्त पोषित करने के लिए एक लीजिंग मॉडल का इस्तेमाल करता है।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान उपलब्ध संसाधनों और व्यय के बीच के अंतर को कम करने के लिए उधारियां बढ़ाई गईं। जैसा कि पहले कहा गया है, रेलवे के अधिकतर पूंजीगत व्यय को केंद्र सरकार के बजटीय सहयोग के जरिए पूरा किया जाता है। 2015-16 में इस प्रवृत्ति में बदलाव हुआ और रेलवे के अधिकतर पूंजीगत व्यय को ईबीआर के जरिए पूरा किया गया। 2020-21 में ईबीआर के जरिए 83,292 करोड़ रुपए जुटाने का अनुमान है जोकि 2019-20 के संशोधित अनुमानों से कुछ अधिक हैं (83,247 करोड़ रुपए)।

उल्लेखनीय है कि इन दोनों स्रोतों को मुख्य रूप से रेलवे के पूंजीगत व्यय को वित्त पोषित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। केंद्र सरकार के सहयोग के कुछ हिस्सों का इस्तेमाल रणनीतिक लाइनों पर रेलवे को होने वाले परिचालनगत नुकसान और आईआरसीटीसी पर ई-टिकटिंग की परिचालन लागत की भरपाई के लिए किया जाता है (2020-21 के बजट अनुमानों के अनुसार 2,216 करोड़ रुपए)।

अगर इस वर्ष रेलवे की राजस्व प्राप्तियों में गिरावट होती है तो राजस्व व्यय को वित्त पोषित करने के लिए उसे केंद्र सरकार के अतिरिक्त सहयोग की जरूरत हो सकती है या वह उसे अपनी उधारियों के जरिए वित्त पोषित करेगा। हालांकि उधारियों पर अधिक निर्भरता से रेलवे की वित्तीय स्थिति और खराब हो सकती है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान रेल आधारित माल ढुलाई और यात्री यातायात, दोनों की वृद्धि में गिरावट हुई है (देखें रेखाचित्र 3)। इससे माल ढुलाई और यात्री ट्रेनों के मुख्य कारोबार से रेलवे की आय प्रभावित हुई। राजस्व में गिरावट बढ़ने से भविष्य में रेलवे के अपने उधार चुकाने की क्षमता प्रभावित होगी।

रेखाचित्र 3माल ढुलाई और यात्री यातायात की मात्रा में वृद्धि (वर्ष दर वर्ष)

NoteRE – Revised Estimates; BE – Budget Estimates

Sources:  Expenditure Profile, Union Budget 2020-21; PRS.  

रेलवे की सामाजिक सेवा

मालगाड़ियां चलाने के अतिरिक्त रेलवे ऐसे अनेक कार्य कर रहा है जोकि महामारी को नियंत्रित करने में मददगार हों। उदाहरण के लिए रेलवे की मैन्यूफैक्चरिंग क्षमता का इस्तेमाल कोविड-19 से निपटने के लिए किया जा रहा है। रेलवे के उत्पादन केंद्रों में पीपीई गियर जैसी वस्तुएं बनाई जा रही हैं। रेलवे इस बात का पता भी कर रहा है कि साधारण बेड, मेडिकल ट्रॉली और वेंटिलेटर्स बनाने के लिए अपने मौजूदा मैन्यूफैक्चरिंग केंद्रों का इस्तेमाल कैसे किया जाए। जिन स्थानों पर आईआरसीटीसी बेस किचन मौजूद हैं, रेलवे ने वहां जरूरतमंद लोगों को थोक में पका हुआ खाना बांटना भी शुरू किया है। रेलवे ने कोविड मरीजों के लिए अपने अस्पताल भी खोल दिए हैं।   

6 अप्रैल तक 2,500 रेलवे कोचों को आईसोलेशन कोचों में तब्दील किया गया था। देश में 133 स्थानों पर औसतन एक दिन में 375 कोचों को तब्दील किया गया है। 

इस बात पर विचार करते हुए कि रेलवे सरकार के अंतर्गत एक कमर्शियल विभाग के रूप में कार्य करता है, सवाल यह उठता है कि क्या उसे ऐसी सामाजिक बाध्यताओं का पालन करना चाहिए। नीति आयोग (2016) ने कहा कि रेलवे के सामाजिक और कमर्शियल उद्देश्यों में स्पष्टता की कमी है। तर्क दिया जा सकता है कि महामारी के दौरान ऐसी सेवाओं को सार्वजनिक हित माना जाना चाहिए। फिर भी सवाल यह है कि ऐसी सेवाएं प्रदान करने का वित्तीय दबाव किसे वहन करना चाहिएवह भारतीय रेलवे होना चाहिए या केंद्र अथवा राज्य सरकार को स्पष्ट सब्सिडी के रूप में यह राशि प्रदान करनी चाहिए?

देश और विभिन्न राज्यों में कोविड के दैनिक मामलों के संख्या संबंधी विवरण के लिए कृपया यहां देखें। केंद्र और राज्य द्वारा जारी कोविड संबंधी मुख्य अधिसूचनाओं के लिए कृपया यहां देखें। रेलवे के कामकाज और वित्तीय स्थिति पर विस्तृत विवरण कृपया यहां देखें और इस वर्ष के रेल बजट को समझने के लिए कृपया यहां देखें 

कोविड-19 महामारी पर केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया (जनवरी 2020-7 अप्रैल, 2020)

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 17 जनवरी, 2020 को नए कोरोनावायरस (कोविड-19) के प्रसार की घोषणा की जोकि चीन में फैल रहा था।[1] 11 मार्च, 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोविड-19 को विश्वव्यापी महामारी घोषित किया। 7 अप्रैल, 2020 को भारत में कोविड-19 के 4,421 पुष्ट मामले हैं।[2]  इनमें से 326 मरीजों का इलाज हो चुका है/उन्हें डिस्चार्ज किया जा चुका है और 114 की मृत्यु हुई है।1  

जैसे इस महामारी का प्रकोप बढ़ा और वायरस से संबंधित जानकारियों में इजाफा हुआ, केंद्र सरकार ने इसकी रोकथाम के लिए अनेक नीतिगत फैसलों की घोषणा की। इसके अतिरिक्त इन फैसलों से प्रभावित नागरिकों और व्यवसायों को मदद देने के उपायों की भी घोषणा की गई। इस ब्लॉग पोस्ट में हम केंद्र सरकार के 7 अप्रैल तक के कुछ मुख्य कदमों का सारांश प्रस्तुत कर रहे हैं। 

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SourceCOVID-19, PRS.

मूवमेंट पर प्रतिबंध 

देश में 21 दिन का लॉकडाउन

गृह मामलों के मंत्रालय ने कोविड-19 के प्रकोप को रोकने के लिए 25 मार्च, 2020 से 14 अप्रैल, 2020 के दौरान 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा की।[3] लॉकडाउन के अंतर्गत अनिवार्य वस्तुएं या अनिवार्य सेवाएं प्रदान करने वाले, तथा कृषि कार्यों से संबंधित गतिविधियों वाले इस्टैबलिशमेंट्स को छोड़कर बाकी सभी इस्टैबलिशमेंट्स बंद रहेंगे। अनिवार्य वस्तुओं में खाद्य, दवाएं और बिजली शामिल हैं। अनिवार्य सेवाओं में बैंकिंग सेवाएं, दूरसंचार और फार्मास्यूटिकल्स शामिल हैं। सभी वस्तुओं (अनिवार्य या गैर अनिवार्य) का परिवहन भी चालू रहेगा।[4],[5],[6],[7],[8]   

सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों को निम्नलिखित के लिए निर्देश दिए गए हैं: (i) असहाय प्रवासी मजदूरों सहित जरूरतमंद लोगों के लिए अस्थायी शेल्टर और भोजन के लिए पर्याप्त प्रबंधन सुनिश्चित करना, (ii) प्रवासी श्रमिकों को कम से कम 14 दिनों तक क्वारंटाइन में रखना, (iii) नियोक्ताओं को निर्देश देना कि लॉकडाउन के दौरान वेतन चुकाया जाए, और (ivमकान मालिकों को इस बात को लिए सुनिश्चित करना कि वे मजदूरों और विद्यार्थियों से एक महीने का किराया नहीं मांगेंगे।[9]   

वित्तीय सहायता

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना कोविड-19 में राहत प्रदान करेगी

26 मार्च को वित्त मंत्री ने गरीबों के लिए प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के अंतर्गत 1.7 लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज की घोषणा की।[10] पैकेज की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:10,[11]

  • सार्वजनिक स्वास्थ्य कर्मचारियों (जैसे डॉक्टरनर्सपैरामेडिक्स और आशा कार्यकर्ता) के लिए 50 लाख रुपए का बीमा कवर जो कोविड-19 के रोगियों का इलाज कर रहे हैं।[12]

  • गरीब परिवारों को अगले तीन महीने तक हर महीने पांच किलोग्राम गेहूं या चावल और एक किलोग्राम चुनींदा दाल दी जाएगी। 

  • प्रधानमंत्री जन धन योजना के अंतर्गत 20.करोड़ महिला खाताधारकों को अगले तीन महीने के लिए 500 रुपए प्रति माह मिलेंगे। इसके अतिरिक्त आठ करोड़ गरीब परिवारों को अगले तीन महीनों में तीन गैस सिलेंडर मुफ्त दिए जाएंगे।

टैक्स भुगतान की समय सीमा में वृद्धि और राहत 

31 मार्च, 2020 को टैक्सेशन और अन्य कानून (विभिन्न प्रावधानों में राहत) अध्यादेश, 2020 जारी किया गया।10  अध्यादेश विशिष्ट कानूनों के संबंध में कुछ राहत प्रदान करता है जैसे समय सीमा को बढ़ाना और सजा से छूट। इन कानूनों में इनकम टैक्स एक्ट, 1961 (आईटी एक्ट), कुछ फाइनांस एक्ट्स, और बेनामी संपत्ति लेनदेन पर प्रतिबंध एक्ट, 1988 शामिल हैं। अध्यादेश की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • समय सीमा बढ़ाना: अध्यादेश निर्दिष्ट कानूनों के अंतर्गत कुछ कार्यों के अनुपालन या पूर्णता के लिए 20 मार्च2020 की समय सीमा को बढ़ाकर 29 जून2020 करता है। जैसे (i) अधिकारियों और ट्रिब्यूनलों द्वारा नोटिस और अधिसूचना जारी करनाकार्यवाही पूरी करना और आदेश पारित करना, (ii) अपीलजवाब और आवेदन दाखिल करना और दस्तावेज प्रस्तुत करना, और (iii) आईटी एक्ट के अंतर्गत कुछ कटौतियों या भत्तों का दावा करने के लिए कोई भी निवेश या भुगतान करना।

  • ब्याज और सजादेय तिथि के बाद किया गया कोई भी कर भुगतान (20 मार्च2020 और 29 जून2020 के बीच) अभियोजन या दंड के लिए उत्तरदायी नहीं होगा। भुगतान में देरी के लिए देय ब्याज की दर प्रति माह 0.75% से अधिक नहीं होगी।

  • पीएम केयर्स फंड में दान: किसी व्यक्ति द्वारा आपात स्थितियों में पीएम केयर्स फंड में किया गया दान 100% टैक्स कटौती का पात्र होगा।

  • जीएसटी अनुपालन: केंद्र सरकार केंद्रीय वस्तु और सेवा कर एक्ट, 2017 एक्ट के अंतर्गत विभिन्न अनुपालनों और कार्यों के लिए समय सीमा के विस्तार की अधिसूचना दे सकती है। 

आऱबीआई ने कोविड-19 के कारण उत्पन्न वित्तीय संकट को दूर करने के उपाय किए

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने कोविड-19 के कारण उत्पन्न हुए वित्तीय संकट से निपटने के लिए अनेक उपायों की घोषणा की।[13],[14],[15]  मुख्य उपायों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • पॉलिसी रेट्स में कटौती: रेपो रेट (वह दर जिस पर आरबीआई बैंकों को उधार देता है) 5.15% से घटाकर 4.4% कर दी गई है। रिवर्स रेपो रेट (जिस दर पर आरबीआई बैंकों से उधार लेता है) 4.9% से 4.0% कम कर दी गई है।

  • लिक्विडिटी प्रबंधन: बाजार में लिक्विडिटी को बढ़ाने के लिए उपाय किए गए हैं ताकि यह सुनिश्चित हो कि वित्तीय बाजार और संस्थान सामान्य रूप से कार्य कर रहे हैं। इन उपायों में 26 मार्च, 2021 तक सभी बैंकों के लिए कैश रिज़र्व रेशियो (सीआरआर) 4% से घटाकर 3% करना शामिल है। सीआरआर तरल नकदी की वह मात्रा होती है जिसे बैंकों को अपनी कुल जमा के प्रतिशत के रूप में आरबीआई के पास रखना होता है। इससे 3.74 लाख करोड़ रुपए की लिक्विडिटी के इंजेक्ट होने की उम्मीद है। 

  • लोन चुकाने के लिए उधारकर्ताओं को राहत: सभी बैंकों और वित्तीय संस्थानों (एनबीएफसी सहित) को सभी टर्म लोन की किश्तों (कृषिखुदरा और फसल ऋण सहित) के भुगतान और कार्यशील पूंजी ऋण पर ब्याज (जैसे ओवरड्राफ्ट सुविधाएं), जोकि मार्च, 2020 और 31 मई, 2020 के बीच देय हैं, पर तीन महीने की मोहलत देने की अनुमति है।

राज्यों को अल्पावधि का ऋण

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए वेज़ और मीन्स एडवांसेज़ (डब्ल्यूएमए) सीमाओं की समीक्षा के लिए एक एडवाइजरी कमिटी का गठन किया है। डब्ल्यूएमए आरबीआई द्वारा राज्य सरकारों को दिए जाने वाले अस्थायी लोन्स को कहा जाता है। कमिटी के अंतिम सुझाव सौंपने तक सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए डब्ल्यूएमए की सीमा को 30बढ़ा दिया गया है। संशोधित सीमाएं 1 अप्रैल से 20 सितंबर, 2020 तक लागू रहेंगी।[16]

पीएम केयर्स फंड

केंद्र सरकार ने कोविड-19 महामारी जैसी आपात स्थितियों से निपटने के लिए राष्ट्रीय कोष बनाया है। आपात स्थितियों में प्रधानमंत्री नागरिक सहायता और राहत कोष (पीएम केयर्स फंड) नामक सरकारी चैरिटेबल ट्रस्ट कोविड-19 से प्रभावित लोगों को राहत प्रदान करेगा। इस ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रधानमंत्री हैं और इसके सदस्यों में रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री शामिल हैं।[17]

पीएम केयर्स फंड में दान देने वाला व्यक्ति 100% टैक्स कटौती का पात्र है।[18]  अनिवासी भारतीय भी फॉरेन इनवर्ड रेमिटेंस के जरिए कोष में योगदान दे सकते हैं।[19] 

स्वास्थ्य संबंधी उपाय

कोविड-19 की टेस्टिंग 

वर्तमान में सरकारी केंद्रों में कोविड-19 के लक्षण वाले सभी लोगों का निदान मुफ्त किया जा रहा है।[20]   इसके अतिरिक्त सरकार ने कोविड-19 की जांच के लिए कुछ निजी लेबोरेट्रीज़ को मंजूरी दी है। निजी लैब्स में स्क्रीनिंग की कीमत 4,500 रुपए से अधिक नहीं हो सकती।[21] 27 मार्च तक कोविड-19 के सैंपल्स की जांच के लिए 136 सरकारी टेस्टिंग सेंटर्स थे और 3 अतिरिक्त कलेक्शन सेंटर्स।[22] इसके अतिरिक्त 12 राज्यों में जांच की पेशकश करने वाली 59 निजी लेबोरेट्रीज़ थीं। ये राज्य हैं, दिल्लीमहाराष्ट्रकेरलपश्चिम बंगालउत्तर प्रदेशतेलंगानातमिलनाडुओडिशाकर्नाटकहरियाणा, उत्तराखंड और गुजरात।[23]

मंत्रालय ने उन लोगों के लिए दिशानिर्देश निर्धारित किए हैं जिनका इन लेबोरेट्रीज़ में परीक्षण किया जा सकता है। इनमें शामिल हैं: (i) उन लोगों के संपर्क में आने वाले लोग जोकि कोविड-19 के लिए पॉजिटिव पाए गए हैं, और (ii) कोविड-19 प्रभावित देशों में यात्रा के इतिहास वाले व्यक्ति, जिनमें लक्षण दिखाई दिए हैं, (iii) लक्षण वाले स्वास्थ्यकर्मी, और (iv) श्वास की गंभीर बीमारी वाले व्यक्ति।21

बड़े आउटब्रेक वाले क्षेत्रों के लिए कंटेनमेंट प्लान

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने कोविड-19 को फैलने से रोकने के लिए एक योजना बनाई है। इस योजना में निम्नलिखित उपाय सुझाए गए हैं:[24] 

  • ज्योग्राफिक क्वारंटाइनइस रणनीति में जिस निर्दिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में प्रकोप (आउटब्रेक) ज्यादा है, वहां लोगों के आने-जाने पर प्रतिबंध लगाया जाएगा।

  • क्लस्टर कंटेनमेंट: इस रणनीति में किसी भौगोलिक क्षेत्र में शुरुआत में मामलों का पता लगने पर वहां बीमारी की रोकथाम की जाएगी। क्लस्टर कंटेनमेंट में ज्योग्राफिक क्वारंटाइन, सोशल डिस्टेंसिंग, सभी संदिग्ध मामलों की टेस्टिंग और लोगों में जागरूकता फैलाना शामिल हैं। 

दवाओं और मेडिकल उपकरणों के निर्यात पर प्रतिबंध 

केंद्र सरकार ने कुछ मेडिकल उपकरणों और दवाओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है ताकि भारत में उनकी उपलब्धता सुनिश्चित हो। उदाहरण के लिए वेंटिलेटर्स, सर्जिकल मास्क्स, डायग्नॉस्टिक किट्स और पैरासीटामोल और हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन जैसी दवाओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया गया है।[25],[26],[27],[28]

यात्रा पर प्रतिबंध

घरेलू और अंतरराष्ट्रीय यात्राओं पर प्रतिबंध, वीसा जारी करना रद्द

नागरिक उड्डयन: नागरिक उड्डयन महानिदेशक ने 24 मार्च, 2020 से 14 अप्रैल, 2020 के दौरान सभी यात्री घरेलू उड़ानों पर प्रतिबंध लगा दिया।[29],[30]  देश में आने तथा देश से जाने वाली सभी अंतरराष्ट्रीय कमर्शियल यात्री उड़ानों को 14 अप्रैल, 2020 को शाम 6.30 बजे तक के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया (डीजीसीए द्वारा निर्दिष्ट कार्गो और दूसरी अन्य उड़ानों को छोड़कर)।[31]  राजनयिकोंअधिकारियोंसंयुक्त राष्ट्र/अंतरराष्ट्रीय संगठनों को जारी वीज़ा तथा रोजगार और प्रॉजेक्ट्स वीजा को छोड़कर किसी भी देश के सभी मौजूदा वीजा 13 मार्च से 15 अप्रैल2020 तक रद्द कर दिए गए हैं।[32] 

रेलवेभारतीय रेलवे ने 14 अप्रैल, 2020 तक सभी यात्री गाड़ियों को रद्द कर दिया।[33]  हालांकि अनिवार्य वस्तुओं का परिवहन जारी रहेगा।[34]  रेलवे ने रेलवे पार्सल वैन को ई-कॉमर्स संस्थाओं और राज्य सरकारों सहित अन्य ग्राहकों के लिए त्वरित माल परिवहन के लिए उपलब्ध कराया है। इनमें छोटे पार्सल आकारों में चिकित्सा आपूर्तिचिकित्सा उपकरणभोजन आदि शामिल हैं।[35] 

कोविड-19 के संबंध में केंद्र सरकार के मुख्य नीतिगत फैसलों पर अधिक विवरण के लिए कृपया यहां देखें।

कोविड-19 के प्रसार पर अधिक जानकारी और महामारी पर केंद्र एवं राज्य सरकारों की प्रतिक्रियाओं के लिए कृपया यहां देखें।

 

[1] Novel coronavirus outbreak in China, Ministry of Health and Family Welfare, January 17, 2020, https://www.mohfw.gov.in/pdf/TraveladvisorytotravelersvisitingChina17012020.pdf.

[2] Ministry of Health and Family Welfare website, last accessed on March 31, 2020, https://www.mohfw.gov.in/index.html.

[3] Order No1-29/2020-PP, National Disaster Management Authority, March 24, 2020, https://mha.gov.in/sites/default/files/ndma%20order%20copy.pdf.

[4] Order No40-3/2020-DM-I(A), Ministry of Home Affairs, March 24, 2020, https://mha.gov.in/sites/default/files/MHAorder%20copy.pdf.

[5] “Guidelines on measures to be taken by Ministries/Department of Government of India, State/Union Territory Governments and State/Union Territory Authorities for containment of COVID-19 Epidemic in the Country, Ministry of Home Affairs, March 24, 2020, https://mha.gov.in/sites/default/files/Guidelines.pdf.

[6] Second Addendum to Order No40-3/2020-DM-I(A), Ministry of Home Affairs, March 24, 2020, https://mha.gov.in/sites/default/files/PR_SecondAddendum_27032020.pdf.

[7] “Consolidated Guidelines on the measures to be taken by Ministries/Departments of Government of India, State/Union Territory Governments and State/Union Territory Authorities for containment of COVID-10 Epidemic in the Country, as notified by the Ministry of Home Affairs on 24.03.2020 and further modified on 25.03.2020 and 27.03.2020, Ministry of Home Affairs, https://mha.gov.in/sites/default/files/PR_ConsolidatedGuidelinesofMHA_28032020.pdf.

[10] “Finance Minister announces Rs 1.70 Lakh Crore relief package under Pradhan Mantri Garib Kalyan Yojana for the poor to help them fight the battle against Corona Virus, Press Information Bureau, Ministry of Finance, March 26, 2020.

[11] “Monetary and Fiscal policy response by Government of Indian and Regulators, Department of Economic Affairs, Ministry of Finance, March 27, 2020, https://dea.gov.in/sites/default/files/India%20economic%20policy%20response%20on%20%20COVID%2019%20Fiscal%20and%20Monetary%20as%20on%2027032020.pdf.

[12] “Pradhan Mantri Garib Kalyan PackageInsurance Scheme for Health Workers Fighting COVID-19, Press Information Bureau, Ministry of Health and Family Welfare, March 29, 2020

[13] Seventh Bi-Monthly Policy Statement 2019-20, Press Release, Reserve Bank of India, March 27, 2020, https://rbidocs.rbi.org.in/rdocs/PressRelease/PDFs/PR2129F5E23A447E0F4A00955429716C53F5A2.PDF.

[14] Statement on Developmental and Regulatory Practices, Reserve Bank of India, Press Releases, March 27, 2020, https://www.rbi.org.in/Scripts/BS_PressReleaseDisplay.aspx?prid=49582.

[15] “COVID-19 – Regulatory Package, Notifications, Reserve Bank of India, March 27, 2020, https://www.rbi.org.in/Scripts/NotificationUser.aspx?Id=11835.

[16] RBI announces further measures for dealing with the COVID-19 pandemic, Reserve Bank of India, April 1, 2020, https://rbidocs.rbi.org.in/rdocs/PressRelease/PDFs/PR2167BA409AC37FA8460497BA0C9B283E5DD9.PDF.

[17] Appeal to generously donate to Prime Ministers Citizen Assistance and Relief in Emergency Situations Fund (PM CARES Fund)’, Press Information Bureau, Prime Ministers Office, March 28, 2020, https://pib.gov.in/PressReleseDetailm.aspx?PRID=1608851.

[18] The Taxation and Other Laws (Relaxation of Certain ProvisionsOrdinance, 2020, Gazette of India, Ministry of Law and Justice, March 31, 2020, http://www.egazette.nic.in/WriteReadData/2020/218979.pdf.

[19] Rupee Drawing Arrangement – Remittance to the Prime Ministers Citizen Assistance and Relief in Emergency Situations (PM-CARESFund, Reserve Bank of India, April 3, 2020, https://rbidocs.rbi.org.in/rdocs/Notification/PDFs/NOT2087A69F5158C174585A46C69B78BD96DBD.PDF.

[20] Strategy for COVID-19 testing in India, India Council for Medical Research, Ministry of Health and Family Welfare, March 17, 2020, https://www.mohfw.gov.in/pdf/LabTestingAdvisory.pdf.

[21] Guidelines for COVID-19 testing in private laboratories in India, Ministry of Health and Family Welfare, March 21, 2002 https://www.mohfw.gov.in/pdf/NotificationofICMguidelinesforCOVID19testinginprivatelaboratoriesiIndia.pdf.

[22] Government Approved Laboratories by ICMR, Ministry of Health and Family Welfare, April 7, 2020.   https://icmr.nic.in/sites/default/files/upload_documents/Govt_Labs_functional_for_COVID19_testing_05042020.pdf.

[23] Private Approved Laboratories by ICMR, Ministry of Health and Family Welfare, April 7, 2020.  https://icmr.nic.in/sites/default/files/upload_documents/Private_Labs_06042020.pdf

[24] Containment Plan for Large Outbreaks, Ministry of Health and Family Welfare, April 4, 2020, https://www.mohfw.gov.in/pdf/3ContainmentPlanforLargeOutbreaksofCOVID19Final.pdf.

[25] S.O1171(E), Amendment in Export Policy of Masks, Ventilators and textile raw material for masks and coveralls, Ministry of Commerce and Industry, March 19, 2020, http://egazette.nic.in/WriteReadData/2020/218857.pdf

[26] S.O955(E), Amendment in Export Policy of APIs and formulations made from these APIs, Ministry of Commerce and Industry, March 3, 2020, http://egazette.nic.in/WriteReadData/2020/216551.pdf.

[27] Notification no01/2015-2020, Amendment in Export Policy of Hydroxychloroquine, Ministry of Commerce and Industry, April 4, 2020, https://prsindia.org/files/covid19/notifications/1492.IND_Export_Restriction_Hydroxychloroquine_Apr_4.pdf

[28] Notification no59/2015-2020, Amendment in Export Policy of Diagnostic Kits, April 4, 2020, https://prsindia.org/files/covid19/notifications/1491.IND_Export_Restriction_Diagnostic_Kits_Apr_4.pdf.

[29] AV11011/1/2020-US(AGOffice-MOCA, Ministry of Civil Aviation, March 23, 2020, https://www.civilaviation.gov.in/sites/default/files/Revised-%20COVID-19%20-%20Order%20under%20Section%208B.pdf.

[30] No.4/1/2020-IR, Director General of Civil Aviation, March 27, 2020, https://dgca.gov.in/digigov-portal/Upload?flag=iframeAttachView&attachId=130618666

[31] No.4/1/2020-IR, Director General of Civil Aviation, March 26, 2020, https://dgca.gov.in/digigov-portal/Upload?flag=iframeAttachView&attachId=130618625

[32] No.4/1/2020-IR, Director General of Civil Aviation, January 30 to March 17, 2020, https://dgca.gov.in/digigov-portal/Upload?flag=iframeAttachView&attachId=130617742

[33] “Ministry of Railways extends Cancellation of Passenger Train Services till 2400 hrs of 14th April, 2020, Press Information Bureau, Ministry of Railways, March 25, 2020

[34] Transportation of essential commodities to various parts of the country by Indian Railways continues at full speed, Press Information Bureau, Ministry of Railways, March 30, 2020.   

[35] “Indian Railways to run Special Parcel Trains for carriage of essential items in small parcel sizes during the complete lockdown in fight against COVID-19, Press Information Bureau, Ministry of Railways, March 29, 2020.  

Financial health of the Indian Railways

Earlier today, the Union Cabinet announced the merger of the Railways Budget with the Union Budget.  All proposals under the Railways Budget will now be a part of the Union Budget.  However, to ensure detailed scrutiny, the Ministry’s expenditure will be discussed in Parliament.  Further, Railways will continue to maintain its autonomy and financial decision making powers.  In light of this, this post discusses some of the ways in which Railways is financed, and issues it faces with regard to financing. Separation of Railways Budget and its financial implications The Railways Budget was separated from the Union Budget in 1924.  While the Union Budget looks at the overall revenue and expenditure of the central government, the Railways Budget looks at the revenue and expenditure of the Ministry of Railways.  At that time, the proportion of Railways Budget was much higher as compared to the Union Budget.  The separation of the Budgets was done to ensure that the central government receives an assured contribution from the Railways revenues.  However, in the last few years, Railways’ finances have deteriorated and it has been struggling to generate enough surplus to invest in improving its infrastructure. Indian Railways is primarily financed through budgetary support from the central government, its own internal resources (freight and passenger revenue, leasing of railway land, etc.), and external resources (market borrowings, public private partnerships, joint ventures, or market financing). Every year, all ministries, except Railways, get support from the central government based on their estimated revenue and expenditure for the year.  The Railways Ministry is provided with a gross budgetary support from the central government in order to expand its network.  However, unlike other Ministries, Railways pays a return on this investment every year, known as dividend.  The rate of this dividend is currently at around 5%, and also includes the interest on government budgetary support received in the previous years. Various Committees have observed that the system of receiving support from the government and then paying back dividend is counter-productive.  It was recommended that the practice of paying dividend can be avoided until the financial health of Railways improves.  In the announcement made today, the requirement to pay dividend to the central government has been removed.  This would save the Ministry from the liability of paying around Rs 9,700 crore as dividend to the central government every year.  However, Railways will continue to get gross budgetary support from the central government. Declining internal revenue In addition to its core business of providing transportation, Railways also has several social obligations such as: (i) providing certain passenger and coaching services at below cost fares, (ii) running uneconomic branch lines (connectivity to remote areas), and (iii) granting concessions to various categories of people (like senior citizens, children, etc.).  All these add up to about Rs 30,000 crore.  Other inelastic expenses of Railways include pension charges, fuel expenses, lease payments, etc.  Such expenses do not leave any financial room for the Railways to make any infrastructure investments. Railways1 In the last few years, Railways has been struggling due to a decline in its revenue from passenger and freight traffic.  In addition, the support from the central government has broadly remained constant. In 2015-16, the gross budgetary support and internal revenue saw a decline, while there was some increase in the extra budgetary resources (shown in Figure 1).   Railways’ internal revenue primarily comes from freight traffic (about 65%), followed by passenger traffic (about 25%).  About one-third of the passenger revenue comes from first class passenger traffic and the remaining two-third comes from second class passenger traffic.  In 2015-16, Railways passenger traffic decreased by 4% and total passenger revenue decreased by 10% from the budget estimates.  While revenue from second class saw a decrease of 13%, revenue from first class traffic decreased by 3%.  In the last few years, Railways’ internal sources have been declining, primarily due to a decline in both passenger as well as freight traffic. Freight traffic Railways2The share of Railways in total freight traffic has declined from 89% to 30% over the last 60 years, with most of the share moving towards roads (see Figure 2).  With regard to freight traffic, Railways generates most of its revenue from the transportation of coal (about 44%), followed by cement (8%), iron ore (7%), and food-grains (7%).  In 2015-16, freight traffic decreased by 10%, and freight earnings reduced by 5% from the budget estimates. The Railways Budget for 2016-17 estimates an increase of 12% in passenger revenue and a 0.26% increase in passenger traffic.  Achieving a 12% increase in revenue without a corresponding increase in traffic will require an increase in fares. Flexi fares and passenger traffic A few days ago, the Ministry of Railways introduced a flexi-fare system for certain categories of trains.  Under this system, the base fare for Rajdhani, Duronto and Shatabdi trains will increase by 10% with every 10% of berths sold, subject to a ceiling of up to 1.5 times the base fare.  While this could also be a way for Railways to improve its revenue, it has raised concerns about train fares becoming more expensive.  Note that the flexi-fare system will apply only to first class passenger traffic, which contributes to about 8% of the total Railways revenue.  It remains to be seen if the new system increases Railways revenue, or further decreases passenger traffic (people choosing other modes of travel, such as airways, if fares increase significantly). While the Railways is trying to improve revenue by raising fares, this may increase the financial burden on passengers.  In the past, various Parliamentary Committees have observed that the investment planning in Railways from the government’s side is politically driven rather than need driven.  This has resulted in the extension of uneconomic, un-remunerative, yet socially desirable projects in every budget.  It has been recommended that projects based on social and commercial considerations must be categorised separately in the Railways accounts, and funding for the former must come from the central or state governments.  It has also been recommended that Railways should bring in more accuracy in determining its public service obligations. The decision to merge the Railways Budget with the Union Budget seems to be on the lines of several of these recommendations.  However, it remains to be seen whether merging the Railway Budget with the Union Budget will  improve the transporter’s finances or if it would require bringing in more reforms.

 

 

 

Maternity leave in India and other countries

Earlier today, a Bill to raise maternity benefits was introduced and passed in Rajya Sabha.  The Bill amends the Maternity Benefit Act, 1961.  The Act regulates the employment of women during the period of child birth, and provides maternity benefits.  The Act applies to factory, mines, plantations, shops and other establishments. Duration of maternity leave: The Act states that every woman will be entitled to maternity benefit of 12 weeks.  The Bill increases this to 26 weeks.  Further, under the Act, this maternity benefit should not be availed before six weeks from the date of expected delivery.  The Bill changes this to eight weeks. In case of a woman who has two or more children, the maternity benefit will continue to be 12 weeks, which cannot be availed before six weeks from the date of the expected delivery. Maternity leave for adoptive and commissioning mothers: Further, the Bill introduces a provision to grant 12 weeks of maternity leave to: (i) a woman who legally adopts a child below three months of age; and (ii) a commissioning mother.  A commissioning mother is defined as a biological mother who uses her egg to create an embryo implanted in another woman.  The 12-week period of maternity benefit will be calculated from the date the child is handed over to the adoptive or commissioning mother. Informing women employees of the right to maternity leave: The Bill introduces a provision which requires every establishment to intimate a woman at the time of her appointment of the maternity benefits available to her.  Such communication must be in writing and electronically. Option to work from home: The Bill introduces a provision that states that an employer may permit a woman to work from home.  This would apply if the nature of work assigned to the woman permits her to work from home.  This option can be availed of, after the period of maternity leave, for a duration that is mutually decided by the employer and the woman. Crèche facilities: The Bill introduces a provision which requires every establishment with 50 or more employees to provide crèche facilities within a prescribed distance.  The woman will be allowed four visits to the crèche in a day.  This will include her interval for rest. Various countries provide maternity leave.  However, the duration of leave varies across different countries.[i]  We present a comparison of maternity leave available in different countries, as on 2014, below. Sources: International Labour Organisation Report (2014); PRS.   [i]. “Maternity and Paternity at work: Legislation across countries”, International Labour Organisation Report (2014), http://www.ilo.org/wcmsp5/groups/public/---dgreports/---dcomm/---publ/documents/publication/wcms_242615.pdf.      

7th Pay Commission's review of central government salaries

The Union Cabinet approved the implementation of Seventh Pay Commission recommendations yesterday.  The Commission was tasked with reviewing and proposing changes to the pay, pension and efficiency of government employees. These recommendations will apply to 33 lakh central government employees, in addition to 14 lakh armed forces personnel and 52 lakh pensioners.  This will take effect from January 1, 2016. Number of Employees Pensioners                 Pay, Allowances and Pension of central government employees In relation to an employee, the Commission proposed to increase (i) the minimum salary to Rs 18,000 per month, and (ii) the maximum salary to Rs 2,50,000 per month. It also recommended moving away from the existing system of pay bands and grade pay, which is used to determine an employee’s salary.  Instead, it proposed a new pay matrix which will take into account the hierarchy of employees, and their pay progression during the course of employment.  The Commission also suggested that this matrix should be reviewed periodically, with a frequency of less than 10 years. The Pay Commission also suggested a linkage between performance and remuneration of an employee.  For this, it proposed the introduction of performance related pay which will be based on an annual appraisal of the employee.  In addition, it recommended that annual increments of an employee should be withheld, if he is unable to meet the benchmark required for regular promotion or career progression. The Commission also sought to abolish or merge some of the allowances that may be given to employees by various government departments.  It suggested that, of the 196 allowances that exist, 52 should be abolished and 36 should either be merged under existing heads, or be included under proposed allowances.  Some of these allowances involved payment of a meagre amount of close to Rs 100 per month. In addition, the rates of House Rent Allowance (HRA) were revised.  The Commission proposed a methodology to increase the HRA rates every time the Dearness Allowance given to employees increased to 50% or 100%.  Dearness Allowance is given to employees in lieu of increases in the cost of living, on account of inflation. The Commission had also proposed a new methodology for computing pension for pensioners who retired before January 1, 2016.  This is aimed at bringing parity between past and current pensioners.  As part of the new methodology, two options for calculation of pension have been prescribed, and the pensioner may opt for either one. Financial Impact on the government Table 7CPCThe implementation of the Seventh Pay Commission recommendations is expected to cost the government Rs 1,02,100 crore.  Of this amount, 72% will be borne by the central government, and 28% by the railways. As a result, the overall expenditure is expected to increase by 23.6%, with a 16% increase in expenses on pay, 63% in allowances and 24% in pension. Addressing the issue of vacancy VacancyAs of 2014, the central government had a job vacancy of 18.5%.[i]  These vacancies may need to be filled or abolished, if required, to reduce redundancy.[ii] It may be noted that the Second Administrative Reforms Commission had observed that reducing the number of government employees is necessary for modern and professional governance.  Further, it had expressed concern that the increasing expenditure on salaries of government employees may be at the cost of investment in priority areas such as infrastructure development and poverty alleviation.[iii] Inducting specialised personnel in the government The Second Administrative Reforms Commission had also observed that some senior positions in the central government require specific skill sets (including technical and administrative know-how).[iii] One way of developing these skill-sets is to recruit personnel directly into these departments so that they can over a period of time develop the required skills.  For example, personnel from the Central Engineering Service (Roads) may aspire and be qualified to hold senior positions in the Ministry of Road, Transport and Highways or a body like the National Highways Authority of India. However, another view is that special skill-sets may be inducted in the government through lateral entry of experts from outside government.  This will allow for widening of the pool of candidates and greater competition for these positions.[iii] The Second Administrative Reforms Commission had also recommended that senior positions in the government should be open to all services. The last Pay Commission’s recommendations, in 2008, led to an increased demand in the automobile, consumer products and real estate related sectors.  With the Seventh Pay Commission’s recommendations expected to take effect from January 1, 2016, their impact on the economy and the consumer market will become known in due course of time.     [i] Report of the Seventh Central Pay Commission, Ministry of Finance, 2015 http://finmin.nic.in/7cpc/7cpc_report_eng.pdf. [ii] “Union govt has 729,000 vacancies: report”, Live Mint, November 30, 2015, http://www.livemint.com/Home-Page/X6U6xFe5oR2pW4simMmAhK/Union-govt-has-729000-vacancies-report.html. [iii] 10th and 13th Reports of the Second Administrative Reforms Commission, 2008 and 2009.  

The rise of Non Performing Assets in India

At noon today, the Finance Minister introduced a Bill in Parliament to address the issue of delayed debt recovery.  The Bill  amends four laws including the SARFAESI Act and the DRT Act, which are primarily used for recovery of outstanding loans.  In this context, we examine the rise in NPAs in India and ways in which this may be dealt with. I. An overview of Non-Performing Assets in India  Banks give loans and advances to borrowers which may be categorised as: (i) standard asset (any loan which has not defaulted in repayment) or (ii) non-performing asset (NPA), based on their performance.  NPAs are loans and advances given by banks, on which the borrower has ceased to pay interest and principal repayments. Graph for blog In recent years, the gross NPAs of banks have increased from 2.3% of total loans in 2008 to 4.3% in 2015 (see Figure 1 alongside*).  The increase in NPAs may be due to various reasons, including slow growth in domestic market and drop in prices of commodities in the global markets.  In addition, exports of products such as steel, textiles, leather and gems have slowed down.[i] The increase in NPAs affects the credit market in the country.  This is due to the impact that non-repayment of loans has on the cash flow of banks and the availability of funds with them.[ii]  Additionally, a rising trend in NPAs may also make banks unwilling to lend.  This could be because there are lesser chances of debt recovery due to prevailing market conditions.[iii]  For example, banks may be unwilling to lend to the steel sector if companies in this sector are making losses and defaulting on current loans. There are various legislative mechanisms available with banks for debt recovery.  These include: (i) Recovery of Debt Due to Banks and Financial Institutions Act, 1993 (DRT Act) and (ii) Securitisation and Reconstruction of Financial Assets and Security Interest Act, 2002 (SARFAESI Act).  The Debt Recovery Tribunals established under DRT Act allow banks to recover outstanding loans.  The SARFAESI Act allows a secured creditor to enforce his security interest without the intervention of courts or tribunals.  In addition to these, there are voluntary mechanisms such as Corporate Debt Restructuring and Strategic Debt Restructuring, which   These mechanisms allow banks to collectively restructure debt of borrowers (which includes changing repayment schedule of loans) and take over the management of a company. II. Challenges and recommendations for reform In recent years, several committees have given recommendations on NPAs. We discuss these below. Action against defaulters: Wilful default refers to a situation where a borrower defaults on the repayment of a loan, despite having adequate resources. As of December 2015, the public sector banks had 7,686 wilful defaulters, which accounted for Rs 66,000 crore of outstanding loans.[iv]  The Standing Committee of Finance, in February 2016, observed that 21% of the total NPAs of banks were from wilful defaulters.  It recommended that the names of top 30 wilful defaulters of every bank be made public.  It noted that making such information publicly available would act as a deterrent for others. Asset Reconstruction Companies (ARCs): ARCs purchase stressed assets from banks, and try to recover them. The ARCs buy NPAs from banks at a discount and try to recover the money.  The Standing Committee observed that the prolonged slowdown in the economy had made it difficult for ARCs to absorb NPAs. Therefore, it recommended that the RBI should allow banks to absorb their written-off assets in a staggered manner.  This would help them in gradually restoring their balance sheets to normal health. Improved recovery: The process of recovering outstanding loans is time consuming. This includes time taken to resolve insolvency, which is a situation where a borrower is unable to repay his outstanding debt.  The inability to resolve insolvency is one of the factors that impacts NPAS, the credit market, and affects the flow of money in the country.[v]  As of 2015, it took over four years to resolve insolvency in India.  This was higher than other countries such as the UK (1 year) and USA (1.5 years).  The Insolvency and Bankruptcy Code seeks to address this situation.  The Code, which was passed by Lok Sabha on May 5, 2016, is currently pending in Rajya Sabha. It provides a 180-day period to resolve insolvency (which includes change in repayment schedule of loans to recover outstanding loans.)  If insolvency is not resolved within this time period, the company will go in for liquidation of its assets, and the creditors will be repaid from these sale proceeds.


  [i] ‘Non-Performing Assets of Financial Institutions’, 27th Report of the Department-related Standing Committee on Finance, http://164.100.47.134/lsscommittee/Finance/16_Finance_27.pdf. [ii] Bankruptcy Law Reforms Committee, November 2015, http://finmin.nic.in/reports/BLRCReportVol1_04112015.pdf. [iii] Volume 2, Economic Survey 2015-16, http://indiabudget.nic.in/es2015-16/echapter-vol2.pdf. [iv] Starred Question No. 17, Rajya Sabha, Answered on April 26, Ministry of Finance. [v] Report of the Bankruptcy Law Reforms Committee, Ministry of Finance, November 2015, http://finmin.nic.in/reports/BLRCReportVol1_04112015.pdf. *Source:  ‘Non-Performing Assets of Financial Institutions’, 27th Report of the Department-related Standing Committee on Finance, http://164.100.47.134/lsscommittee/Finance/16_Finance_27.pdf; PRS.  

Coal Block Allocations and the 2015 Bill

Earlier this week, Lok Sabha passed the Bill that provides for the allocation of coal mines that were cancelled by the Supreme Court last year.  In light of this development, this post looks at the issues surrounding coal block allocations and what the 2015 Bill seeks to achieve.

In September 2014, the Supreme Court cancelled the allocations of 204 coal blocks.  Following the Supreme Court judgement, in October 2014, the government promulgated the Coal Mines (Special Provisions) Ordinance, 2014 for the allocation of the cancelled coal mines.  The Ordinance, which was replaced by the Coal Mines (Special Provisions) Bill, 2014, could not be passed by Parliament in the last winter session, and lapsed. The government then promulgated the Coal Mines (Special Provisions) Second Ordinance, 2014 on December 26, 2014.  The Coal Mines (Special Provisions) Bill, 2015 replaces the second Ordinance and was passed by Lok Sabha on March 4, 2015. Why is coal considered relevant? Coal mining in India has primarily been driven by the need for energy domestically.  About 55% of the current commercial energy use is met by coal.  The power sector is the major consumer of coal, using about 80% of domestically produced coal. As of April 1, 2014, India is estimated to have a cumulative total of 301.56 billion tonnes of coal reserves up to a depth of 1200 meters.  Coal deposits are mainly located in Jharkhand, Odisha, Chhattisgarh, West Bengal, Madhya Pradesh, Andhra Pradesh and Maharashtra. How is coal regulated? The Ministry of Coal has the overall responsibility of managing coal reserves in the country.  Coal India Limited, established in 1975, is a public sector undertaking, which looks at the production and marketing of coal in India.  Currently, the sector is regulated by the ministry’s Coal Controller’s Organization. The Coal Mines (Nationalisation) Act, 1973 (CMN Act) is the primary legislation determining the eligibility for coal mining in India.  The CMN Act allows private Indian companies to mine coal only for captive use.  Captive mining is the coal mined for a specific end-use by the mine owner, but not for open sale in the market.  End-uses currently allowed under the CMN Act include iron and steel production, generation of power, cement production and coal washing.  The central government may notify additional end-uses. How were coal blocks allocated so far? Till 1993, there were no specific criteria for the allocation of captive coal blocks.  Captive mining for coal was allowed in 1993 by amendments to the CMN Act.  In 1993, a Screening Committee was set up by the Ministry of Coal to provide recommendations on allocations for captive coal mines.  All allocations to private companies were made through the Screening Committee.  For government companies, allocations for captive mining were made directly by the ministry.  Certain coal blocks were allocated by the Ministry of Power for Ultra Mega Power Projects (UMPP) through tariff based competitive bidding (bidding for coal based on the tariff at which power is sold).  Between 1993 and 2011, 218 coal blocks were allocated to both public and private companies under the CMN Act. What did the 2014 Supreme Court judgement do? In August 2012, the Comptroller and Auditor General of India released a report on the coal block allocations. CAG recommended that the allocation process should be made more transparent and objective, and done through competitive bidding. Following this report, in September 2012, a Public Interest Litigation matter was filed in the Supreme Court against the coal block allocations.  The petition sought to cancel the allotment of the coal blocks in public interest on grounds that it was arbitrary, illegal and unconstitutional. In September 2014, the Supreme Court declared all allocations of coal blocks, made through the Screening Committee and through Government Dispensation route since 1993, as illegal.  It cancelled the allocation of 204 out of 218 coal blocks.  The allocations were deemed illegal on the grounds that: (i) the allocation procedure followed by the Screening Committee was arbitrary, and (ii) no objective criterion was used to determine the selection of companies.  Further, the allocation procedure was held to be impermissible under the CMN Act. Among the 218 coal blocks, 40 were under production and six were ready to start production.  Of the 40 blocks under production, 37 were cancelled and of the six ready to produce blocks, five were cancelled.  However, the allocation to Ultra Mega Power Projects, which was done via competitive bidding for lowest tariffs, was not declared illegal. What does the 2015 Bill seek to do? Following the cancellation of the coal blocks, concerns were raised about further shortage in the supply of coal, resulting in more power supply disruptions.  The 2015 Bill primarily seeks to allocate the coal mines that were declared illegal by the Supreme Court.  It provides details for the auction process, compensation for the prior allottees, the process for transfer of mines and details of authorities that would conduct the auction.  In December 2014, the ministry notified the Coal Mines (Special Provisions) Rules, 2014.  The Rules provide further guidelines in relation to the eligibility and compensation for prior allottees. How is the allocation of coal blocks to be carried out through the 2015 Bill? The Bill creates three categories of mines, Schedule I, II and III.  Schedule I consists of all the 204 mines that were cancelled by the Supreme Court.  Of these mines, Schedule II consists of all the 42 mines that are under production and Schedule III consists of 32 mines that have a specified end-use such as power, iron and steel, cement and coal washing. Schedule I mines can be allocated by way of either public auction or allocation.  For the public auction route any government, private or joint venture company can bid for the coal blocks.  They can use the coal mined from these blocks for their own consumption, sale or for any other purpose as specified in their mining lease.  The government may also choose to allot Schedule I mines to any government company or any company that was awarded a power plant project through competitive bidding.  In such a case, a government company can use the coal mined for own consumption or sale.  However, the Bill does not provide clarity on the purpose for which private companies can use the coal. Schedule II and III mines are to be allocated by way of public auction, and the auctions have to be completed by March 31, 2015.  Any government company, private company or a joint venture with a specified end-use is eligible to bid for these mines. In addition, the Bill also provides details on authorities that would conduct the auction and allotment and the compensation for prior allottees.  Prior allottees are not eligible to participate in the auction process if: (i) they have not paid the additional levy imposed by the Supreme Court; or (ii) if they are convicted of an offence related to coal block allocation and sentenced to imprisonment of more than three years. What are some of the issues to consider in the 2015 Bill? One of the major policy shifts the 2015 Bill seeks to achieve is to enable private companies to mine coal in the future, in order to improve the supply of coal in the market.  Currently, the coal sector is regulated by the Coal Controller’s Organization, which is under the Ministry of Coal.  The Bill does not establish an independent regulator to ensure a level playing field for both private and government companies bidding for auction of mines to conduct coal mining operations.   In the past, when other sectors have opened up to the private sector, an independent regulatory body has been established beforehand.  For example, the Telecom Regulatory Authority of India, an independent regulatory body, was established when the telecom sector was opened up for private service providers.  The Bill also does not specify any guidelines on the monitoring of mining activities by the new allottees. While the Bill provides broad details of the process of auction and allotment, the actual results with regards to money coming in to the states, will depend more on specific details, such as the tender documents and floor price.  It is also to be seen whether the new allotment process ensures equitable distribution of coal blocks among the companies and creates a fair, level-playing field for them.  In the past, the functioning of coal mines has been delayed due to delays in land acquisition and environmental clearances.  This Bill does not address these issues.  The auctioning of coal blocks resulting in improving the supply of coal, and in turn addressing the problem of power shortage in the country, will also depend on the efficient functioning of the mines,  in addition to factors such as transparent allocations.

Special Category status and centre-state finances

"No one can ignore Odisha's demand. It deserves special category status. It is a genuine right," said Odisha Chief Minister, Naveen Patnaik, earlier this month. The Odisha State assembly has passed a resolution requesting special category status and their demands follow Bihar's recent claim for special category status. The concept of a special category state was first introduced in 1969 when the 5th Finance Commission sought to provide certain disadvantaged states with preferential treatment in the form of central assistance and tax breaks. Initially three states Assam, Nagaland and Jammu & Kashmir were granted special status but since then eight more have been included (Arunachal Pradesh,  Himachal Pradesh,  Manipur, Meghalaya, Mizoram, Sikkim, Tripura and Uttarakhand). The rationale for special status is that certain states, because of inherent features, have a low resource base and cannot mobilize resources for development. Some of the features required for special status are: (i) hilly and difficult terrain; (ii) low population density or sizeable share of tribal population; (iii) strategic location along borders with neighbouring countries; (iv) economic and infrastructural backwardness; and (v) non-viable nature of state finances. [1. Lok Sabha unstarred question no. 667, 27 Feb, 2013, Ministry of Planning] The decision to grant special category status lies with the National Development Council, composed of the Prime Minster, Union Ministers, Chief Ministers and members of the Planning Commission, who guide and review the work of the Planning Commission. In India, resources can be transferred from the centre to states in many ways (see figure 1). The Finance Commission and the Planning Commission are the two institutions responsible for centre-state financial relations.

Figure 1: Centre-state transfers (Source: Finance Commission, Planning Commission, Budget documents, PRS)

 

Planning Commission and Special Category The Planning Commission allocates funds to states through central assistance for state plans. Central assistance can be broadly split into three components: Normal Central Assistance (NCA), Additional Central Assistance (ACA) and Special Central Assistance. NCA, the main assistance for state plans, is split to favour special category states: the 11 states get 30% of the total assistance while the other states share the remaining 70%.  The nature of the assistance also varies for special category states; NCA is split into 90% grants and 10% loans for special category states, while the ratio between grants and loans is 30:70 for other states. For allocation among special category states, there are no explicit criteria for distribution and funds are allocated on the basis of the state's plan size and previous plan expenditures. Allocation between non special category states is determined by the Gadgil Mukherjee formula which gives weight to population (60%), per capita income (25%), fiscal performance (7.5%) and special problems (7.5%).  However, as a proportion of total centre-state transfers NCA typically accounts for a relatively small portion (around 5% of total transfers in 2011-12). Special category states also receive specific assistance addressing features like hill areas, tribal sub-plans and border areas. Beyond additional plan resources, special category states can enjoy concessions in excise and customs duties, income tax rates and corporate tax rates as determined by the government.  The Planning Commission also allocates funds for ACA (assistance for externally aided projects and other specific project) and funds for Centrally Sponsored Schemes (CSS). State-wise allocation of both ACA and CSS funds are prescribed by the centre. The Finance Commission Planning Commission allocations can be important for states, especially for the functioning of certain schemes, but the most significant centre-state transfer is the distribution of central tax revenues among states. The Finance Commission decides the actual distribution and the current Finance Commission have set aside 32.5% of central tax revenue for states. In 2011-12, this amounted to Rs 2.5 lakh crore (57% of total transfers), making it the largest transfer from the centre to states. In addition, the Finance Commission recommends the principles governing non-plan grants and loans to states.  Examples of grants would include funds for disaster relief, maintenance of roads and other state-specific requests.  Among states, the distribution of tax revenue and grants is determined through a formula accounting for population (25%), area (10%), fiscal capacity (47.5%) and fiscal discipline (17.5%).  Unlike the Planning Commission, the Finance Commission does not distinguish between special and non special category states in its allocation.

RTE Act's ban on screening of students not applicable to nursery admission: Delhi High Court

Latest in the string of litigations filed after the enactment of the Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009 (RTE Act), the Delhi High Court ruled that the Act shall not apply to nursery admissions in unaided private schools for the unreserved category of students.  The decision, given on February 19, was in response to writ petitions filed by Social Jurist, a civil rights group and the Delhi Commission for the Protection of Child Rights.  It contended that the guidelines of the Ministry of Human Resource Development related to schools’ selection procedure should also be applicable to pre-primary and pre-school classes. The right to education is applicable to children between the age of 6 and 14 years.  The RTE Act states that schools have to reserve certain proportion of their seats for disadvantaged groups.  It adds that where the school admits children at pre-primary level, the reservation for children of weaker sections shall apply.  However, it does not mention whether other RTE norms are applicable to pre-schools.  It only states that the appropriate government may make necessary arrangements for providing pre-school education to children between the age of 3 and 6 years. Guidelines of the Ministry with regard to selection procedure of students:

  • Criteria of admission for 25% seats reserved for disadvantaged groups: For Class 1 or pre-primary class, unaided schools shall follow a system of random selection out of the applications received from children belonging to disadvantaged groups.
  • Criteria of admission for rest of the seats: Each unaided school should formulate a policy of admission on a rational, reasonable and just basis.  No profiling shall be allowed based on parental educational qualifications.  Also, there can be no testing or interviews for any child or parent.

The two issues that the court considered were: (a) whether RTE applies to pre-schools including nursery schools and for education of children below six years of age; (b) whether RTE applies to the admission of children in pre-schools in respect of the unreserved seats (25% of seats are reserved for children belonging to disadvantaged groups). According to the verdict, the guidelines issued by the government do not apply to the unreserved category of students i.e. 75% of the admission made in pre-schools in private unaided schools.  This implies that private unaided schools may formulate their own policies regarding admission in pre-schools for the unreserved category of students.  However, they apply to the reserved category of students i.e. 25% of the admission s made in these schools for disadvantaged groups. The court has however stated that in its view this is the right time for the government to consider the applicability of RTE Act to the nursery classes too.  In most schools, students are admitted from nursery and they continue in the same school thereafter.  Therefore, the RTE Act’s prohibition of screening at the time of selection is rendered meaningless if it is not applicable at the nursery level.