नीति

विभिन्न राज्यों में श्रम कानूनों में छूट

भारत में कोविड-19 की रोकथाम के लिए केंद्र सरकार ने 24 मार्च, 2020 को देश व्यापी लॉकडाउन किया था। लॉकडाउन के दौरान अनिवार्य के रूप में वर्गीकृत गतिविधियों को छोड़कर अधिकतर आर्थिक गतिविधियों बंद थीं। इसके कारण राज्यों ने चिंता जताई थी कि आर्थिक गतिविधियां न होने के कारण अनेक व्यक्तियों और व्यापार जगत को आय का नुकसान हुआ है। कई राज्य सरकारों ने अपने राज्यों में स्थित इस्टैबलिशमेंट्स में कुछ गतिविधियों को शुरू करने के लिए मौजूदा श्रम कानूनों से छूट दी है। इस ब्लॉग में बताया गया है कि भारत में श्रम को किस प्रकार रेगुलेट किया जाता है और विभिन्न राज्यों ने श्रम कानूनों में कितनी छूट दी है।

भारत में श्रम को कैसे रेगुलेट किया जाता है?

श्रम संविधान की समवर्ती सूची में आने वाला विषय है। इसलिए संसद और राज्य विधानसभाएं श्रम को रेगुलेट करने के लिए कानून बना सकती हैं। वर्तमान में श्रम के विभिन्न पहलुओं को रेगुलेट करने वाले लगभग 100 राज्य कानून और 40 केंद्रीय कानून हैं। ये कानून औद्योगिक विवादों को निपटाने, कार्यस्थितियों, सामाजिक सुरक्षा और वेतन इत्यादि पर केंद्रित हैं। कानूनों के अनुपालन को सुविधाजनक बनाने और केंद्रीय स्तर के श्रम कानूनों में एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार विभिन्न श्रम कानूनों को चार संहिताओं में संहिताबद्ध करने का प्रयास कर रही है। ये चार संहिताएं हैं (i) औद्योगिक संबंध, (ii) व्यवसायगत सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यस्थितियां, (iii) वेतन, और (iv) सामाजिक सुरक्षा। इन संहिताओं में कई कानूनों को समाहित किया गया है जैसे औद्योगिक विवाद एक्ट, 1947, फैक्ट्रीज़ एक्ट, 1948 और वेतन भुगतान एक्ट, 1936।

राज्य सरकारें श्रम को कैसे रेगुलेट करती हैं?

राज्य सरकारें निम्नलिखित द्वारा श्रम को रेगुलेट कर सकती हैं: (i) अपने श्रम कानून पारित करके, या (ii) राज्यों में लागू होने वाले केंद्रीय स्तर के श्रम कानूनों में संशोधन करके। अगर किसी विषय पर केंद्र और राज्यों के कानूनों में तालमेल न हो, उन स्थितियों में केंद्रीय कानून लागू होते हैं और राज्य के कानून निष्प्रभावी हो जाते हैं। हालांकि अगर राज्य के कानून का तालमेल केंद्रीय कानून से न हो, और राज्य के कानून को राष्ट्रपति की सहमति मिल जाए तो राज्य का कानून राज्य में लागू हो सकता है। उदाहरण के लिए 2014 में राजस्थान ने औद्योगिक विवाद एक्ट, 1947 में संशोधन किया था। एक्ट में 100 या उससे अधिक श्रमिकों वाले इस्टैबलिशमेंट्स में छंटनी, नौकरी से हटाए जाने और उनके बंद होने से संबंधित विशिष्ट प्रावधान हैं। उदाहरण के लिए 100 या उससे अधिक श्रमिकों वाले इस्टैबलिशमेंट्स के नियोक्ता को श्रमिकों की छंटनी करने से पहले केंद्र या राज्य सरकार की अनुमति लेनी होगी। राजस्थान ने 300 कर्मचारियों वाले इस्टैबलिशमेंट्स पर इन विशेष प्रावधानों को लागू करने के लिए एक्ट में संशोधन किया गया। राजस्थान में यह संशोधन लागू हो गया, क्योंकि इसे राष्ट्रपति की सहमति मिल गई थी। 

किन राज्यों ने श्रम कानूनों में छूट दी है?

उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने एक अध्यादेश को मंजूरी दी और मध्य प्रदेश ने एक अध्यादेश जारी किया ताकि मौजूदा श्रम कानूनों के कुछ पहलुओं में छूट दी जा सके। इसके अतिरिक्त गुजरातराजस्थानहरियाणाउत्तराखंडहिमाचल प्रदेशअसमगोवा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश ने नियमों के जरिए श्रम कानूनों में रियायतों को अधिसूचित किया है।     

   

मध्य प्रदेश

6 मई, 2020 को मध्य प्रदेश सरकार ने मध्य प्रदेश श्रम कानून (संशोधन) अध्यादेश, 2020 को जारी किया। यह अध्यादेश दो राज्य कानूनों में संशोधन करता हैमध्य प्रदेश औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) एक्ट, 1961 और मध्य प्रदेश श्रम कल्याण निधि अधिनियम, 1982। 1961 का एक्ट श्रमिकों के रोजगार की शर्तों को रेगुलेट करता है और 50 या उससे अधिक श्रमिकों वाले इस्टैबलिशमेंट्स पर लागू होता है। अध्यादेश ने संख्या की सीमा को बढ़ाकर 100 या उससे अधिक श्रमिक कर दिया है। इस प्रकार यह एक्ट अब उन इस्टैबलिशमेंट्स पर लागू नहीं होता जिनमें 50 और 100 के बीच श्रमिक काम करते हैं। इन्हें पहले इस कानून के जरिए रेगुलेट किया गया था। 1982 के एक्ट के अंतर्गत एक कोष बनाने का प्रावधान था जोकि श्रमिकों के कल्याण से संबंधित गतिविधियों को वित्त पोषित करता है। अध्यादेश में इस एक्ट को संशोधित किया गया है और राज्य सरकार को यह अनुमति दी गई है कि वह अधिसूचना के जरिए किसी इस्टैबलिशमेंट या इस्टैबलिशमेंट्स की एक श्रेणी को एक्ट के प्रावधानों से छूट दे सकती है। इस प्रावधान में नियोक्ता द्वारा हर छह महीने में तीन रुपए की दर से कोष में अंशदान देना भी शामिल है।

इसके अतिरिक्त मध्य प्रदेश सरकार ने सभी नए कारखानों को औद्योगिक विवाद एक्ट, 1947 के कुछ प्रावधानों से छूट दी है। श्रमिकों को नौकरी से हटाने और छंटनी तथा इस्टैबलिशमेंट्स के बंद होने से संबंधित प्रावधान राज्य में लागू रहेंगे। हालांकि एक्ट के औद्योगिक विवाद निवारण, हड़ताल और लॉकआउट और ट्रेड यूनियंस जैसे प्रावधान लागू नहीं होंगे। ये छूट अगले 1,000 दिनों (33 महीने) तक लागू रहेगी। उल्लेखनीय है कि औद्योगिक विवाद एक्ट, 1947 राज्य सरकार को यह अनुमति देता है कि वह कुछ इस्टैबलिशमेंट्स को इसके प्रावधानों से छूट दे सकती है, अगर सरकार इस बात से संतुष्ट है कि औद्योगिक विवादों के निपटान और जांच के लिए एक तंत्र उपलब्ध है।

उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने उत्तर प्रदेश विशिष्ट श्रम कानूनों से अस्थायी छूट अध्यादेश, 2020 को मंजूरी दी। न्यूज रिपोर्ट्स के अनुसार, अध्यादेश मैन्यूफैक्चरिंग प्रक्रियाओं में लगे सभी कारखानों और इस्टैबलिशमेंट्स को तीन वर्ष की अवधि के लिए सभी श्रम कानूनों से छूट देता है, अगर वे कुछ शर्तो को पूरा करते हैं। इन शर्तों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • वेतन: अध्यादेश निर्दिष्ट करता है कि श्रमिकों को न्यूनतम वेतन से कम वेतन नहीं चुकाया जा सकता। इसके अतिरिक्त श्रमिकों को वेतन भुगतान एक्ट, 1936 में निर्धारित समय सीमा के भीतर वेतन चुकाना होगा। एक्ट में निर्दिष्ट किया गया है कि (i) 1,000 से कम श्रमिकों वाले इस्टैबलिशमेंट्स को वेतन अवधि के अंतिम दिन के बाद सातवें दिन से पहले मजदूरी का भुगतान करना होगा, और (ii) सभी दूसरे इस्टैबलिशमेंट्स को वेतन अवधि के अंतिम दिन के बाद दसवें दिन से पहले मजदूरी का भुगतान करना होगा। वेतन श्रमिकों के बैंक खातों में चुकाया जाएगा। 
  • स्वास्थ्य एवं सुरक्षाअध्यादेश कहता है कि भवन निर्माण एवं अन्य निर्माण श्रमिक एक्ट, 1996 तथा फैक्ट्रीज़ एक्ट, 1948 में निर्दिष्ट स्वास्थ्य एवं सुरक्षा संबंधी प्रावधान लागू होंगे। ये प्रावधान खतरनाक मशीनरी के प्रयोग, निरीक्षण, कारखानों के रखरखाव इत्यादि को रेगुलेट करते हैं। 
  • काम के घंटेश्रमिकों से दिन में 11 घंटे से अधिक काम नहीं कराया जा सकता, और काम का विस्तार रोजाना 12 घंटे से अधिक नहीं हो सकता।   
  • मुआवजाकिसी दुर्घटना में मृत्यु या विकलांगता की स्थिति में श्रमिकों को कर्मचारी मुआवजा एक्ट, 1923 के अनुसार मुआवजा दिया जाएगा। 
  • बंधुआ मजदूरीबंधुआ श्रम प्रणाली (उन्मूलन) एक्ट, 1973 लागू रहेगा। यह बंधुआ मजदूरी के उन्मूलन का प्रावधान करता है। बंधुआ मजदूरी ऐसे प्रणाली होती है जिसमें लेनदार देनदार के साथ कुछ शर्तों पर समझौता करता है, जैसे उसके द्वारा या उसके परिवार के किसी सदस्य द्वारा लिए गए ऋण को चुकाने के लिए वह मजदूरी करेगा, विशेष रूप से अपनी जाति या समुदाय या सामाजिक बाध्यता के कारण। 
  • महिला एवं बच्चेश्रम कानून के महिलाओं और बच्चों के रोजगार से संबंधित प्रावधान लागू रहेंगे।  

यह अस्पष्ट है कि क्या सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक विवाद निवारण, ट्रेड यूनियन, हड़तालों इत्यादि का प्रावधान करने वाले श्रम कानून अध्यादेश में निर्दिष्ट तीन वर्ष की अवधि के लिए उत्तर प्रदेश के व्यापारों पर लागू रहेंगे। चूंकि अध्यादेश केंद्रीय स्तर के श्रम कानूनों के कार्यान्वयन को प्रतिबंधित करता है, उसे लागू होने के लिए राष्ट्रपति की सहमति की आवश्यकता है।   

काम के घंटों में परिवर्तन

फैक्ट्रीज़ एक्ट, 1948 राज्य सरकारों को इस बात की अनुमति देता है कि वह तीन महीने के लिए काम के घंटों से संबंधित प्रावधानों से कारखानों को छूट दे सकती है, अगर कारखान अत्यधिक काम कर रहे हैं (एक्सेप्शनल अमाउंट ऑफ वर्क)। इसके अतिरिक्त राज्य सरकारें पब्लिक इमरजेंसी में कारखानों को एक्ट के सभी प्रावधानों से छूट दे सकती हैं। गुजरात, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, गोवा, असम और उत्तराखंड की सरकारों ने इस प्रावधान की मदद से कुछ कारखानों के लिए काम के अधिकतम साप्ताहिक घंटों को 48 से बढ़ाकर 72 तथा रोजाना काम के अधिकतम घंटों को 9 से बढ़ाकर 12 कर दिया। इसके अतिरिक्त मध्य प्रदेश  ने सभी कारखानों को फैक्ट्रीज़ एक्ट, 1948 के प्रावधानों से छूट दे दी, जोकि काम के घंटों को रेगुलेट करते हैं। इन राज्य सरकारों ने कहा कि काम के घंटों को बढ़ाने से लॉकडाउन के कारण श्रमिकों की कम संख्या की समस्या को हल किया जा सकेगा और लंबी शिफ्ट्स से यह सुनिश्चित होगा कि कारखानों में कम श्रमिक काम करें, ताकि सोशल डिस्टेसिंग बनी रहे। तालिका 1 में विभिन्न राज्यों में काम के अधिकतम घंटों में वृद्धि को प्रदर्शित किया गया है। 

तालिका 1विभिन्न राज्यों में काम के घंटों में बदलाव

राज्य 

इस्टैबलिशमेंट्स

सप्ताह में काम के अधिकतम घंटे 

रोज काम के अधिकतम घंटे 

ओवरटाइम वेतन

समय अवधि

गुजरात 

सभी कारखाने

48 घंटे से बढ़ाकर 72 घंटे 

घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे 

आवश्यक नहीं

तीन महीने

हिमाचल प्रदेश

सभी कारखाने

48 घंटे से बढ़ाकर 72 घंटे  

घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे  

आवश्यक

तीन महीने

राजस्थान 

अनिवार्य वस्तुओं का वितरण करने वाले और अनिवार्य वस्तुओं और खाद्य पदार्थों की मैन्यूफैक्चरिंग करने वाले सभी कारखाने 

48 घंटे से बढ़ाकर 72 घंटे  

घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे  

आवश्यक

तीन महीने

हरियाणा 

सभी कारखाने

निर्दिष्ट नहीं 

घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे  

आवश्यक

दो महीने 

उत्तर प्रदेश

सभी कारखाने

48 घंटे से बढ़ाकर 72 घंटे 

घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे 

आवश्यक नहीं

तीन महीने*

उत्तराखंड

सभी कारखाने और सतत प्रक्रिया उद्योग जिन्हें सरकार ने काम करने की अनुमति दी है

सप्ताह में अधिकतम दिन

12-12 घंटे की दो शिफ्ट

आवश्यक 

तीन महीने

असम

सभी कारखाने

निर्दिष्ट नहीं

घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे

आवश्यक

तीन महीने

गोवा

सभी कारखाने

निर्दिष्ट नहीं

घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे

आवश्यक

लगभग तीन महीने

मध्य प्रदेश

सभी कारखाने

निर्दिष्ट नहीं 

निर्दिष्ट नहीं 

निर्दिष्ट नहीं

तीन महीने

Note: *The Uttar Pradesh notification was withdrawn

कोविड-19 महामारी पर केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया (27 अप्रैल- 4 मई, 2020)

4 मई, 2020 तक भारत में कोविड-19 के 42,533 पुष्ट मामले हैं। 27 अप्रैल से 14,641 नए मामले दर्ज किए गए हैं। पुष्ट मामलों में 11,707 मरीजों का इलाज हो चुका है/उन्हें डिस्चार्ज किया जा चुका है और 1,373 की मृत्यु हई है। जैसे इस महामारी का प्रकोप बढ़ा हैकेंद्र सरकार ने इसकी रोकथाम के लिए अनेक नीतिगत फैसलों और महामारी से प्रभावित नागरिकों और व्यवसायों को मदद देने के उपायों की घोषणाएं की हैं। इस ब्लॉग पोस्ट में हम केंद्र सरकार के 27 अप्रैल से 4 मई, 2020 तक के कुछ मुख्य कदमों का सारांश प्रस्तुत कर रहे हैं।

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SourceMinistry of Health and Family Welfare; PRS.

लॉकडाउन

18 मई, 2020 तक लॉकडाउन बढ़ाया गया

गृह मंत्रालय ने 4 मई, 2020 से लॉकडाउन को दो हफ्तों के लिए बढ़ाने का आदेश दिया (18 मई, 2020 तक)। इस लॉकडाउन में जिन गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा रहेगा, वे इस प्रकार हैं

  • यात्रा और आवाजाहीनिम्नलिखित द्वारा आवाजाही: (iहवाई (मेडिकल और सुरक्षा कारणों के अतिरिक्त)(iiरेल (सुरक्षा उद्देश्यों के अतिरिक्त)(iii) अंतरराज्यीय बस (केवल केंद्र सरकार द्वारा अनुमत), और (iv) मेट्रो प्रतिबंधित रहेगी। मेडिकल कारणों के अतिरिक्त या केंद्र सरकार द्वारा अनुमत होने पर लोग अंतरराज्यीय आवाजाही कर सकते हैं। गैर अनिवार्य गतिविधियों के लिए राज्य के भीतर लोगों की आवाजाही पर शाम 7 बजे से सुबह 7 बजे तक प्रतिबंध है। 

  • शिक्षासभी शिक्षण संस्थान जैसे स्कूल और कॉलेज बंद रहेंगे, सिवाय ऑनलाइन लर्निंग को छोड़कर।

  • हॉस्पिटैलिटी सेवाएं और मनोरंजक गतिविधियांहोटल जैसी सभी हॉस्पिटेलिटी सेवाएं बंद रहेंगी, सिवाय क्वारंटाइन सुविधाएं या स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिस और बेसहारा लोगों को आवास की सुविधा प्रदान करने वाले होटल खुले रहेंगे। इसके अतिरिक्त सिनेमा, मॉल, जिम और बार जैसे मनोरंजक केंद्र बंद रहेंगे।

  • धार्मिक जमावड़ेसभी धार्मिक स्थल बंद रहेंगे और धार्मिक उद्देश्यों के लिए लोगों को जमावड़े पर प्रतिबंध लगा रहेगा।

लॉकडाउन के संशोधित दिशानिर्देशों में जिलों की रेड, ग्रीन और ऑरेंज जोन्स के रूप में रिस्क प्रोफाइलिंग करना शामिल है। जोन का वर्गीकरण स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा किया जाएगा और इसे साप्ताहिक आधार पर राज्यों के साथ साझा किया जाएगा। राज्य अतिरिक्त जिलों को रेड या ऑरेंज जोन में शामिल कर सकते हैं। लेकिन वे किसी जिले के वर्गीकरण को नीचे नहीं कर सकते। किसी जिले को रेड से ऑरेंज जोन में या ऑरेंज से ग्रीन जोन में तब खिसकाया जाएगा, जब वहां 21 दिनों में कोई मामला सामने नहीं आता। जोन्स का वर्गीकरण और अनुमत गतिविधियों का विवरण इस प्रकार है

  • रेड जोन्स या हॉटस्पॉट्स: इन जिलों को सक्रिय मामलों की कुल संख्या, पुष्ट मामलों के डबलिंग रेट और जांच एवं निगरानी संबंधी फीडबैक के आधार पर वर्गीकृत किया जाएगा। रेड जोन्स में जिन अतिरिक्त गतिविधियों पर प्रतिबंध रहेगा, वे इस प्रकार हैं: (i) साइकिल और ऑटोरिक्शा, (ii) टैक्सी, (iii) बस और (iv) नाई की दुकानें, स्पा और सैलून। जिन गतिविधियों की अनुमति होगी, उनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) व्यक्तियों की आवाजाही (चारपहिया वाहन पर अधिकतम दो लोग और दुपहिया वाहन पर एक व्यक्ति), (ii) ग्रामीण क्षेत्रों में सभी औद्योगिक इस्टैबलिशमेंट्स और शहरी क्षेत्रों में अनिवार्य वस्तुओं की मैन्यूफैक्चरिंग करने वाले कुछ औद्योगिक इस्टैबलिशमेंट्स, और (iii) सभी स्टैंडएलोन और आस-पड़ोस की दुकानें। 

  • ग्रीन जोन्स: इन जोन्स में ऐसे जिले शामिल हैं जहां अब तक कोई पुष्ट मामले नहीं हुए या पिछले 21 दिनों में कोई पुष्ट मामले सामने नहीं आए। इन जोन्स में किसी अतिरिक्त गतिविधि पर प्रतिबंध नहीं है। रेड जोन्स में अनुमत गतिविधियों के अतिरिक्त इन जोन्स में बसें 50सीटिंग क्षमता के साथ चल सकती हैं। 

  • ऑरेंज जोन्सइन जोन्स में वे सभी जिले शामिल हैं जो रेड या ऑरेंज जोन्स में नहीं आते। इन जोन्स में अंतरराज्यीय या राज्यों की भीतर बसें नहीं चलेंगी। जिन गतिविधियों की अनुमति होगी (रेड जोन्स में अनुमत गतिविधियों के अतिरिक्त), वे इस प्रकार हैं: (i) अधिकतम एक ड्राइवर और दो यात्रियों के साथ टैक्सियां, (ii) अनुमत गतिविधियों के लिए व्यक्तियों और वाहनों की अंतरराज्यीय आवाजाही, और (iii) अधिकतम एक ड्राइवर और दो यात्रियों के साथ चारपहिया वाहन। 

जिला प्रशासन रेड और ऑरेंज जोन्स में आने वाले कुछ क्षेत्रों को कंटेनमेंट जोन्स के रूप में चिन्हित कर सकता है। कंटेनमेंट जोन्स में आवासीय कालोनियां, टाउन्स या म्यूनिसिपल वॉर्ड जैसे क्षेत्र शामिल हो सकते हैं। कंटेनमेंट जोन्स में स्थानीय प्रशासन आरोग्य सेतु ऐप का 100% कवरेज, कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग, जोखिम के आधार पर व्यक्तियों का क्वारंटाइन और घर-घर छानबीन सुनिश्चित कर सकता है। इसके अतिरिक्त केवल मेडिकल इमरजेंसी और अनिवार्य वस्तुओं के लिए व्यक्ति आना-जाना कर सकता है। 

विभिन्न स्थानों पर फंसे हुए लोगों की आवाजाही

गृह मंत्रालय ने विशेष ट्रेनों द्वारा प्रवासी श्रमिकों, तीर्थयात्रियों, पर्यटकों, विद्यार्थियों और विभिन्न स्थानों पर फंसे हुए लोगों की आवाजाही को मंजूरी दी। इसके लिए सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ऐसे लोगों को भेजने, उन्हें प्राप्त करने और उनके पंजीकरण के लिए नोडल अधिकारियों को नामित करेंगे। इस विनिमय के लिए लोगों को भेजने और उन्हें प्राप्त करने वाले दोनों राज्यों का सहमत होना जरूरी है। प्रत्येक ट्रेन 1,200 लोगों को ले जा सकती है और कोई ट्रेन 90% क्षमता से कम पर नहीं चलेगी। राज्य सरकार द्वारा यात्रा की अनुमति देने वाले लोगों को टिकट का कुछ मूल्य चुकाना पड़ सकता है।

शिक्षा

यूजीसी ने विश्वविद्यालयों की परीक्षाओं और शैक्षणिक कैलेंडर के संबंध में दिशानिर्देश जारी किए

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने कोविड-10 महामारी के मद्देनजर विश्वविद्यालयों की परीक्षाओं और शैक्षणिक कैलेंडर पर दिशानिर्देश जारी किए।   

  • शैक्षणिक कैलेंडरविश्वविद्यालयों में ईवन सेमिस्टर्स की क्लासेज़ 16 मार्च, 2020 से रद्द कर दी गईं। दिशानिर्देशों में यह कहा गया है कि शिक्षण को 31 मई तक जारी रखा जाना चाहिए, भले ही वह ऑनलाइन या दूरस्थ शिक्षण मोड, सोशल मीडिया (व्हॉट्सएप/यूट्यूब)ईमेल या वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए हो। मौजूदा शैक्षणिक वर्ष के लिए परीक्षाएं जुलाई 2020 में की जानी चाहिए और परिणाम 31 जुलाई (टर्मिनल ईयर के विद्यार्थियों के लिए) और 14 अगस्त (इंटरमीडिएट ईयर के विद्यार्थियों के लिए) को घोषित किए जाने चाहिए।

  • शैक्षणिक सत्र 2020-21 पुराने विद्यार्थियों के लिए अगस्त 2020 और नए विद्यार्थियों के लिए सितंबर 2020 हो सकता है। नए विद्यार्थियों के लिए दाखिला प्रक्रिया अगस्त के महीने में की जा सकती है। परिणामस्वरूप 2020-21 का ईवन सेमिस्टर 27 जनवरी, 2021 से शुरू हो सकता है। शैक्षणिक सत्र 2021-22 की शुरुआत अगस्त 2021 हो सकती है। 2019-20 के शेष सत्र और 2020-21 के शैक्षणिक सत्र के लिए शिक्षण के नुकसान की भरपाई के लिए विश्वविद्यालय छह दिन के सप्ताह का पैटर्न अपना सकता है।

  • परीक्षाएंविश्वविद्यालय ऑफलाइन या ऑनलाइन मोड में सेमिस्टर या वार्षिक परीक्षाएं ले सकती है। यह ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ के निर्देशों का पालन करते हुए और सभी विद्यार्थियों के लिए निष्पक्ष अवसरों को सुनिश्चित करते हुए किया जाना चाहिए। परीक्षाओं के वैकल्पिक, सरल तरीकों को अपनाकर ऐसा किया जा सकता है, जैसे एमसीक्यू (मल्टीपल च्वाइस क्वेश्चंस) आधारित परीक्षाएं या ओपन बुक परीक्षाएं। अगर मौजूदा स्थिति को देखते हुए परीक्षाएं नहीं की जा सकती हैं तो पिछले सेमिस्टर में आंतरिक मूल्यांकन और प्रदर्शन के आधार पर ग्रेडिंग की जा सकती है। विश्वविद्यालय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पीएचडी वाइवा परीक्षा संचालित कर सकते हैं।

  • दूसरे दिशानिर्देश: प्रत्येक विश्वविद्यालय को एक कोविड-19 सेल स्थापित करना होगा ताकि महामारी के दौरान विद्यार्थियों की परीक्षाओं और शिक्षण गतिविधियों से संबंधित शिकायतों को हल किया जा सके। उसे विद्यार्थियों को इसके बारे में प्रभावी तरीके से बताना होगा। इसके अतिरिक्त जल्द फैसला लेने के लिए यूजीसी में भी एक कोविड-19 सेल बनाया जाएगा।

कोविड-19 के प्रसार पर अधिक जानकारी और महामारी पर केंद्र एवं राज्य सरकारों की प्रतिक्रियाओं के लिए कृपया यहां देखें

कोविड-19 महामारी पर केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया (20-27 अप्रैल, 2020)

27 अप्रैल, 2020 तक भारत में कोविड-19 के 27,892 पुष्ट मामले हैं। 20 अप्रैल तक 10,627 नए मामले दर्ज किए गए हैं। पुष्ट मामलों में 6,185 मरीजों का इलाज हो चुका है/उन्हें डिस्चार्ज किया जा चुका है और 872 की मृत्यु हुई है। जैसे इस महामारी का प्रकोप बढ़ा है, केंद्र सरकार ने इसकी रोकथाम के लिए अनेक नीतिगत फैसलों और महामारी से प्रभावित नागरिकों और व्यवसायों को मदद देने के उपायों की घोषणाएं की हैं। इस ब्लॉग पोस्ट में हम केंद्र सरकार के 20 अप्रैल से 27 अप्रैल तक के कुछ मुख्य कदमों का सारांश प्रस्तुत कर रहे हैं।

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SourceMinistry of Health and Family Welfare; PRS.

लॉकडाउन

विशिष्ट क्षेत्रों में स्थित दुकानों के लिए लॉकडाउन से राहत

गृह मामलों के मंत्रालय ने निम्नलिखित को खोलने के लिए आदेश दिया है: (i) ग्रामीण क्षेत्रों में सभी दुकानें, शॉपिंग मॉल्स की दुकानों को छोड़कर, और (ii) सभी स्टैंडएलोन दुकानें, आस-पड़ोस की दुकानें, और शहरी क्षेत्रों में आवासीय कॉम्प्लैक्सों की दुकानें। बाजारों में स्थित दुकानों, मार्केट कॉम्प्लैक्स या शहरी क्षेत्रों में शॉपिंग मॉल्स में कामकाज की अनुमति नहीं है। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के शॉप्स और इस्टैबलिशमेंट्स एक्ट के अंतर्गत पंजीकृत दुकानों को ही खोले जाने की अनुमति है। इसके अतिरिक्त जिन ग्रामीण या शहरी क्षेत्रों को कंटेनमेंट जोन्स घोषित किया गया है, वहां की दुकानें नहीं खोली जाएंगी। आदेश में यह भी कहा गया है कि शराब की बिक्री पर प्रतिबंध जारी रहेगा।

केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल्स का कामकाज बंद रहेगा 

केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल का कामकाज 3 मई, 2020 तक बंद रहेगा। जब कामकाज शुरू होगा तो अवकाश के दिनों को भी वर्किंग डे माना जा सकता है। अधिकतर केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल कोविड-19 हॉटस्पॉट्स में स्थित हैं, इस बात को ध्यान में रखते हुए यह फैसला किया गया है।

वित्तीय उपाय

आरबीआई ने म्युचुअल फंड्स के लिए 50,000 करोड़ रुपए की विशेष लिक्विडिटी सुविधा की घोषणा की

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 50,000 करोड़ रुपए मूल्य के म्युचुअल फंड्स के लिए विशेष लिक्विडिटी सुविधा (एसएलएफ-एमएफ) खोलने का फैसला किया है। इससे म्युचुअल फंड्स पर लिक्विडिटी का दबाव खत्म होगा। एसएलएफ-एमएफ के अंतर्गत आरबीआई निर्धारित रेपो रेट पर 90 दिनों की अवधि में रेपो ऑपरेशन करेगी। एसएलएफ-एमएफ तत्काल इस्तेमाल के लिए उपलब्ध होगा और बैंक इन फंड्स को हासिल करने के लिए अपनी बोलियां सौंप सकते हैं। यह योजना 27 अप्रैल से 11 मई, 2020 के लिए उपलब्ध है या तब तक के लिए जब तक आबंटित राशि का इस्तेमाल नहीं हो जाता (इनमें से जो पहले हो)। आरबीआई योजना की समयावधि और राशि की समीक्षा करेगी, जोकि बाजार की स्थितियों पर निर्भर करता है। बैंक विशेष रूप से म्युचुअल फंड्स की लिक्विडिटी संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए इस राशि का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह निम्नलिखित के जरिए किया जा सकता है: (i) लोन देना, और (ii) इनवेस्टमेंट ग्रेड कॉरपोरेट बॉन्ड्स, कमर्शियल पेपर्स, डिबेंचर्स और म्युचुअल फंड्स के सर्टिफिकेट्स ऑफ डिपॉजिट्स के आउटराइट परचेस और/या उनके लिए कोलेट्रेल लेना। 

आरबीआई ने अल्पावधि के फसल ऋण के लिए इन्टरेस्ट सबवेंशन और प्रॉम्प्ट रीपमेंट इनसेंटिव योजनाओं के लाभ का दायरा बढ़ाया

भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को तीन लाख रुपए तक के अल्पावधि फसल ऋण के लिए इन्टरेस्ट सबवेंशन और प्रॉम्प्ट रीपमेंट इनसेंटिव योजनाओं के लाभों को क्रमशः 2और 3बढ़ाने की सलाह दी। जिन किसानों के एकाउंट्स ड्यू हैं या 1 मार्च, 2020 से 1 मई, 2020 के बीच ड्यू होने वाले हैं, इस योजना के लिए पात्र होंगे। 

स्वास्थ्य सेवा कर्मियों का संरक्षण

महामारी रोग (संशोधन) अध्यादेश, 2020 जारी 

महामारी रोग (संशोधन) अध्यादेश, 2020 को 22 अप्रैल, 2020 को जारी किया गया। अध्यादेश महामारी रोग एक्ट1897 में संशोधन करता है। एक्ट में खतरनाक महामारियों की रोकथाम से संबंधित प्रावधान हैं। अध्यादेश इस एक्ट में संशोधन करता है जिससे महामारियों से जूझने वाले स्वास्थ्यकर्मियों को संरक्षण प्रदान किया जा सकेतथा ऐसी बीमारियों को फैलने से रोकने के लिए केंद्र सरकार की शक्तियों में विस्तार करता है। अध्यादेश की मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • परिभाषाएं: अध्यादेश स्वास्थ्य सेवा कर्मियों को ऐसे व्यक्तियों के रूप में परिभाषित करता है जिन पर अपने कर्तव्यों का पालन करने के दौरान महामारियों के संपर्क में आने का जोखिम है। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं: (i) पब्लिक और क्लिनिकल स्वास्थ्यसेवा प्रदाता जैसे डॉक्टर और नर्स, (ii) ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसे एक्ट के अंतर्गत बीमारी के प्रकोप की रोकथाम के लिए सशक्त किया गया हैऔर (iii) अन्य कोई व्यक्ति जिसे राज्य सरकार ने ऐसा करने के लिए नामित किया है।
     
  • ‘हिंसक कार्य’ में ऐसे कोई भी कार्य शामिल हैं जो स्वास्थ्य सेवा कर्मियों के खिलाफ किए गए हैं: (i) जीवन या काम की स्थितियों को प्रभावित करने वाला उत्पीड़न, (ii) जीवन को नुकसानचोटक्षति या खतरा पहुंचाना, (iii) कर्तव्यों का पालन करने में बाधा उत्पन्न करना, और (iv) स्वास्थ्य सेवा कर्मी की संपत्ति या दस्तावेजों को नुकसान या क्षति पहुंचाना। संपत्ति में निम्नलिखित शामिल हैं: (i) क्लिनिकल इस्टैबलिशमेंट, (ii) क्वारंटाइन केंद्र, (iii) मोबाइल मेडिकल यूनिट, और (iv) ऐसी अन्य संपत्ति जिससे स्वास्थ्य सेवा कर्मी का महामारी से संबंधित कोई प्रत्यक्ष हित जुड़ा हो।
     
  • स्वास्थ्य सेवा कर्मी की सुरक्षा और संपत्ति को क्षति: अध्यादेश निर्दिष्ट करता है कि कोई भी व्यक्ति निम्नलिखित नहीं कर सकता: (i) स्वास्थ्य सेवा कर्मी के खिलाफ हिंसक कार्रवाई करना या ऐसा करने के लिए किसी को उकसानाया (ii) महामारी के दौरान किसी संपत्ति को नुकसान या क्षति पहुंचानाया ऐसा करने के लिए किसी को उकसाना। इस प्रावधान का उल्लंघन करने पर तीन महीने से लेकर पांच वर्ष तक की कैद या 50,000 रुपए से लेकर दो लाख रुपए तक का जुर्माना हो सकता है। अदालत की अनुमति से पीड़ित अपराधी को क्षमा कर सकता है। अगर स्वास्थ्य सेवा कर्मी के खिलाफ हिंसक कार्रवाई गंभीर क्षति पहुंचाती हैतो अपराध करने वाले व्यक्ति को छह महीने से लेकर सात वर्ष तक की कैद हो सकती है और एक लाख रुपए से लेकर पांच लाख रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है। ये अपराध संज्ञेय और गैर जमानती हैं।

अध्यादेश पर अधिक विवरण के लिए कृपया यहां देखें

वित्तीय सहायता

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज के अंतर्गत उपाय 

वित्त मंत्रालय के अनुसार, 26 मार्च से 22 अप्रैल, 2020 के बीच लगभग 33 करोड़ गरीब लोगों को लॉकडाउन के दौरान प्रत्यक्ष रूप से 31,235 करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता दी गई है। बैंक अंतरणों के लाभार्थियों में विधवाएं, प्रधानमंत्री जन धन योजना के अंतर्गत महिला खाताधारक, वरिष्ठ नागरिक और किसान शामिल हैं। प्रत्यक्ष बैंक अंतरणों के अतिरिक्त अन्य प्रकार से भी सहायता मुहैय्या कराई गई है। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं

  • 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 40 लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न दिए गए हैं। 
     
  • लाभार्थियों को 2.करोड़ मुफ्त गैस सिलिंडर दिए गए है। 
     
  • राज्य सरकारों द्वारा प्रबंधित भवन निर्माण एवं निर्माण कोषों से 2.2 करोड़ भवन निर्माण एवं निर्माण श्रमिकों को 3,497 करोड़ रुपए संवितरित किए गए हैं। 

कोविड-19 के प्रसार पर अधिक जानकारी और महामारी पर केंद्र एवं राज्य सरकारों की प्रतिक्रियाओं के लिए कृपया यहां देखें।

सूचना के अधिकार नियम, 2019 के अंतर्गत सीआईसी और आईसीज़ का कार्यकाल और वेतन

सूचना का अधिकार (संशोधन) एक्ट, 2019 द्वारा सूचना का अधिकार एक्ट, 2005 में संशोधन किया गया है। आरटीआई एक्ट, 2005 में केंद्र और राज्य स्तरों पर क्रमश: चीफ इनफॉरमेशन कमीश्नर (सीआईसी) और इनफॉरमेशन कमीश्नरों (आईसीज़) के कार्यकाल, सेवा की शर्तें और वेतन को विनिर्दिष्ट किया गया था। आरटीआई (संशोधन) एक्ट, 2019 में इन प्रावधानों को हटाया गया है और कहा गया है कि केंद्र सरकार नियमों के जरिए सेवा शर्तों और वेतन को अधिसूचित करेगी।[1],[2]  

सूचना का अधिकार नियम, 2019 को 24 अक्टूबर, 2019 को अधिसूचित किया गया था।[3] इन नियमों में केंद्र और राज्य स्तरों पर क्रमशः सीआईसी और आईसीज़ के कार्यकाल, सेवा शर्तों और वेतन को निर्धारित किया गया है। तालिका 1 में सूचना के अधिकार एक्ट, 2005 और सूचना के अधिकार नियम, 2019 के अंतर्गत सीआईसी और आईसीज़ के कार्यकाल और वेतन से संबंधित प्रावधानों की तुलना की गई है।

तालिका 1: सूचना के अधिकार एक्ट, 2005 और सूचना के अधिकार नियम, 2019 के प्रावधानों की तुलना

प्रावधान

आरटीआई एक्ट, 2005

आरटीआई नियम, 2019

कार्यकाल

सीआईसी और आईसीज़ (केंद्र और राज्य स्तर पर) का कार्यकाल पांच वर्ष होगा। 

सीआईसी और आईसीज़ (केंद्र और राज्य स्तर पर) का कार्यकाल तीन वर्ष होगा। 

वेतन

सीआईसी और आईसीज़ का वेतन (केंद्रीय स्तर पर) चीफ इलेक्शन कमीश्नर और इलेक्शन कमीश्नर को चुकाए जाने वाले वेतन के बराबर (2,50,000 रुपए प्रति माह) होगा।

इसी प्रकार, सीआईसी और आईसीज़ (राज्य स्तर पर) का वेतन क्रमशः इलेक्शन कमीश्नरों (2,50,000 रुपए प्रति माह) और राज्य सरकार के मुख्य सचिव (2,25,000 रुपए प्रति माह) को चुकाए जाने वाले वेतन के बराबर होगा। 

सीआईसी और आईसीज़ (केंद्रीय स्तर पर) का वेतन प्रति माह क्रमशः 2,50,000 रुपए और 2,25,00 रुपए होगा।

 

 

 

 

सीआईसीज़ और आईसीज़ (राज्य स्तर पर) का वेतन प्रति माह 2,25,000 रुपए होगा।

Source: The Right to Information (Term of Office, Salaries, Allowances and Other Terms and Conditions of Service of Chief Information Commissioner, Information Commissioners in the Central Information Commission, State Chief Information Commissioner and State Information Commissioners in the State Information Commission) Rules, 2019; The High Court and the Supreme Court Judges (Salaries and Conditions of Service) Amendment Act, 2017; Indian Administrative Services (Pay) Rules, 2016; PRS.

 

[1] Right to Information Act, 2005, https://rti.gov.in/rti-act.pdf.

[2] Right to Information (Amendment Act), 2019, file:///C:/Users/Dell/Downloads/The%20Right%20to%20Information%20(Amendment)%20Bill,%202019%20Text.pdf.

[3] The Right to Information (Term of Office, Salaries, Allowances and Other Terms and Conditions of Service of Chief Information Commissioner, Information Commissioners in the Central Information Commission, State Chief Information Commissioner and State Information Commissioners in the State Information Commission) Rules, 2019, http://egazette.nic.in/WriteReadData/2019/213438.pdf.

क्या निजीकरण की योजना बनाई जा रही है?

विनिवेश पर सचिवों के कोर ग्रुप ने हाल ही में पांच सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयूज़) के विनिवेश को मंजूरी दी है। इसमें चार पीएसयूज़: भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (बीपीसीएल), शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एससीआई), नॉर्थ ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (नीप्को) और टीएचडीसी (टिहरी हाइड्रो पावर कॉम्प्लैक्स को संचालित और प्रबंधित करने वाला) में सरकार की पूरी शेयरहोल्डिंग और कंटेनर कॉरपोरेशन इन इंडिया लिमिटेड (कॉनकोर) में 30% शेयरहोल्डिंग शामिल हैं। वर्तमान में कॉनकोर में सरकार की शेयरहोल्डिंग 54.8% है। बिक्री के बाद यह हिस्सेदारी घटकर 25% से कम रह जाएगी।  

पिछले कुछ वर्षों के दौरान सरकार ने दूसरे कई पीएसयूज़ के निजीकरण पर लगे विधायी अवरोध हटाए हैं। इससे यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या सरकार उनके निजीकरण की योजना बना रही है। 

पीएसयूज़ के निजीकरण पर सर्वोच्च न्यायालय का क्या आदेश था

2003 में सरकार ने एचपीसीएल और बीपीसीएल में शेयरहोल्डिंग को बेचने का ऐसा ही एक प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव को सर्वोच्च न्यायालय में इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि इससे उन कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन होता है जिनके जरिए सरकार को कुछ खास एसेट्स का स्वामित्व हस्तांतरित किया गया था (जोकि बाद में पीएसयूज़ बने)। उदाहरण के लिए संसद के एक्ट के जरिए भारत में बर्मा शेल के राष्ट्रीयकरण और उनकी रिफाइनरी तथा मार्केटिंग कंपनियों के विलय के बाद बीपीसीएल की स्थापना हुई थी। न्यायालय ने यह आदेश दिया था कि केंद्र सरकार संबंधित कानूनों में संशोधन किए बिना एचपीसीएल और बीपीसीएल का निजीकरण (यानी अपने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष स्वामित्व को 51% से कम) नहीं कर सकती। इसलिए बीपीसीएल में प्रत्यक्ष रूप से और एचपीसीएल में अप्रत्यक्ष रूप से (दूसरे पीएसयू ओएनजीसी के जरिए) सरकार की अधिकांश हिस्सेदारी है। 

जिन पांच कंपनियों के निजीकरण को मंजूरी दी गई है, उनमें बीपीसीएल और एससीआई (जिसमें दो राष्ट्रीयकृत कंपनियां जयंती शिपिंग कंपनी और मुगल लाइन लिमिटेड का विलय किया गया था) शामिल हैं। संबंधित राष्ट्रीयकरण एक्ट्स को पिछले पांच वर्षों में निरस्त कर दिया गया है।

सरकार ने निजीकरण से विधायी अवरोध कैसे हटाए?

2014 और 2019 के बीच संसद ने छह रिपीलिंग और संशोधन एक्ट्स पारित किए जिनके जरिए लगभग 722 कानून रद्द हुए। इनमें केंद्र सरकार को कंपनियों के स्वामित्व का हस्तांतरण करने वाले कानून भी शामिल थे जिनके अंतर्गत बीपीसीएल, एचपीसीएल और ओआईएल की स्थापना हुई थी। इनमें उन कानूनों का निरस्तीकरण भी शामिल था जिनके जरिए सीआईएल में विलय होने वाली कंपनियों के स्वामित्व को केंद्र सरकार को हस्तांतरित कर दिया था। इसका अर्थ यह है कि अब सरकार इन सरकारी कंपनियों का निजीकरण कर सकती है, चूंकि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश द्वारा रखी गई शर्तों को पूरा कर दिया गया है। इन रिपीलिंग और संशोधन एक्ट्स ने दूसरे कई राष्ट्रीयकरण एक्ट्स को भी निरस्त कर दिया जिनके अंतर्गत पीएसयूज़ की स्थापना की गई थी। निम्नलिखित तालिका में इनमें से कुछ कंपनियों की सूची दी गई है। उल्लेखनीय है कि भारतीय विधि आयोग (2014) ने इनमें से कई कानूनों (एसो एक्ट, बर्मा शेल एक्ट, बर्न कंपनी एक्ट सहित) को इस आधार पर निरस्त करने का सुझाव दिया था कि ये कानून राष्ट्रीयकृत कंपनी के संबंध में किसी भी उद्देश्य की पूर्ति नहीं करते। हालांकि यह सुझाव भी दिया गया था कि इन एक्ट्स को निरस्त करने से पहले सभी राष्ट्रीयकरण एक्ट्स का अध्ययन किया जाना चाहिए और अगर जरूरी हो तो रिपीलिंग एक्ट में सेविंग्स क्लॉज का प्रावधान किया जाना चाहिए।

क्या इन एक्ट्स को पारित करने से पहले संसद कोई जांच करती है?

इनमें से कई को रिपीलिंग और संशोधन एक्ट, 2016 के जरिए निरस्त किया गया है। इनमें बीपीसीएल, एचपीसीएल, ओआईएल, कोल इंडिया लिमिटेड, एससीआई, नेशनल टेक्सटाइल्स कॉरपोरेशन, हिंदुस्तान कॉपर और बर्न स्टैंडर्ड कंपनी लिमिटेड से संबंधित एक्ट्स शामिल हैं। इस बिल को पार्लियामेंटरी स्टैंडिंग कमिटी को रेफर नहीं किया गया और एक त्वरित बहस (लोकसभा में 50 मिनट और राज्यसभा में 20 मिनट) के बाद पारित कर दिया गया। इसी प्रकार 2017 में सेल, पावरग्रिड और स्टेट ट्रेडिंग कॉरपोरेशन के निजीकरण से संबंधित दो एक्ट्स पारित किए गए लेकिन उनकी समीक्षा भी स्टैंडिंग कमिटी द्वारा नहीं की गई।

अब क्या होगा?

एक्ट्स के निरस्तीकरण के बाद इन कंपनियों के निजीकरण के मार्ग की विधायी अड़चनें दूर हो गई हैं। इसका अर्थ यह है कि सरकार को उनकी शेयरहोल्डिंग को बेचने में संसद से पूर्व मंजूरी की जरूरत नहीं है। इसलिए अब सरकार यह निर्धारित करेगी कि इन संस्थाओं का निजीकरण करना है अथवा नहीं।

तालिका 1: 2014 से निरस्त किए गए कुछ राष्ट्रीयकरण एक्ट्स (सूची पूर्ण नहीं है)

कंपनी

निरस्त होने वाले एक्ट

रिपीलिंग एक्ट

शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एससीआई)

जयंती शिपिंग कंपनी (शेयरों का अधिग्रहण) एक्ट, 1971

रिपीलिंग और संशोधन एक्ट, 2016

मुगल लाइन लिमिटेड (शेयरों का अधिग्रहण) एक्ट, 1984

भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल)

बर्मा शेल (भारत में उपक्रमों का अधिग्रहण) एक्ट, 1976

रिपीलिंग और संशोधन एक्ट, 2016

हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल)

एस्सो (भारत में उपक्रमों का अधिग्रहण) एक्ट, 1974

रिपीलिंग और संशोधन एक्ट, 2016

कैल्टेक्स [कैल्टेक्स ऑयल रिफाइनरी (इंडिया) लिमिटेड के शेयरों और भारत में कैल्टेक्स (इंडिया) लिमिटेड के उपक्रमों का अधिग्रहण] एक्ट, 1977

कोसन गैस कंपनी (उपक्रम का अधिग्रहण) एक्ट, 1979

कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल)

कोकिंग कोल माइन्स (आपात प्रावधान) एक्ट, 1971

रिपीलिंग और संशोधन एक्ट, 2016

कोल माइन्स (प्रबंधन को अधिकार में लेना) एक्ट, 1973

कोकिंग कोल माइन्स (राष्ट्रीयकरण) एक्ट, 1972

रिपीलिंग और संशोधन (दूसरा) एक्ट, 2017

कोल माइन्स (राष्ट्रीयकरण) एक्ट, 1973

स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल)

बोलानी अयस्क लिमिटेड (शेयरों का अधिग्रहण) और विविध प्रावधान एक्ट, 1978

रिपीलिंग और संशोधन (दूसरा) एक्ट, 2017

भारतीय आयरन और स्टील कंपनी (शेयरों का अधिग्रहण) एक्ट, 1976

पावर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया

नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड, नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड और द नॉर्थ-ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (पावर ट्रांसमिशन सिस्टम्स का अधिग्रहण और हस्तांतरण) एक्ट, 1993

रिपीलिंग और संशोधन (दूसरा) एक्ट, 2017

नेवेली लिग्नाइट कॉरपोरेशन लिमिटेड (पावर ट्रांसमिशन सिस्टम का अधिग्रहण और हस्तांतरण) एक्ट, 1994

ऑयल इंडिया लिमिटेड (ओआईएल)

बर्मा ऑयल कंपनी [ऑयल इंडिया लिमिटेड के शेयरों और असम ऑयल कंपनी लिमिटेड तथा बर्मा ऑयल कंपनी (इंडिया ट्रेडिंग) लिमिटेड के भारत के उपक्रमों का अधिग्रहण] एक्ट, 1981

रिपीलिंग और संशोधन एक्ट, 2016

स्टेट ट्रेडिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एसटीसी)

टी कंपनीज़ (रुग्ण चाय इकाइयों का अधिग्रहण और हस्तांतरण) एक्ट, 1985

रिपीलिंग और संशोधन एक्ट, 2017

नेशनल टेक्सटाइल कॉरपोरेशन लिमिटेड (एनटीसी)

रुग्ण कपड़ा उपक्रम (प्रबंधन को अधिकार में लेना) एक्ट, 1972

रिपीलिंग और संशोधन एक्ट, 2016

कपड़ा उपक्रम (प्रबंधन को अधिकार में लेना) एक्ट, 1983

लक्ष्मीरतन और अथरटन वेस्ट कॉटन मिल्स (प्रबंधन को अधिकार में लेना) एक्ट, 1976

हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड

इंडियन कॉपर कॉरपोरेशन (उपक्रम का अधिग्रहण) एक्ट, 1972

रिपीलिंग और संशोधन एक्ट, 2016

बर्न स्टैंडर्ड कंपनी लिमिटेड

बर्न कंपनी एंड इंडियन स्टैंडर्ड वैगन कंपनी (राष्ट्रीयकरण) एक्ट, 1976

रिपीलिंग और संशोधन एक्ट, 2016

भारतीय रेलवे

फतवा-इस्लामपुर लाइट रेलवे लाइन (राष्ट्रीयकरण) एक्ट, 1985

रिपीलिंग और संशोधन एक्ट, 2016

ब्रेथवेट एंड कंपनी लिमिटेड, रेलवे मंत्रालय

ब्रेथवेट एंड कंपनी (इंडिया) लिमिटेड (उपक्रमों का अधिग्रहण और हस्तांतरण) एक्ट, 1976

रिपीलिंग और संशोधन (दूसरा) एक्ट, 2017

ग्रेशन एंड क्रेवन ऑफ इंडिया (प्राइवेट) लिमिटेड (उपक्रमों का अधिग्रहण और हस्तांतरण) एक्ट, 1977

एंड्र्यू यूल एंड कंपनी लिमिटेड

ब्रेंटफोर्ड इलेक्ट्रिक (इंडिया) लिमिटेड (उपक्रमों का अधिग्रहण और हस्तांतरण) एक्ट, 1987

रिपीलिंग और संशोधन (दूसरा) एक्ट, 2017

ट्रांसफॉर्मर्स एंड स्विचगियर लिमिटेड (उपक्रमों का अधिग्रहण और हस्तांतरण) एक्ट, 1983

रिपीलिंग और संशोधन एक्ट, 2019

एलकॉक एशडाउन (गुजरात) लिमिटेड, गुजरात सरकार का उपक्रम

एल्कॉक एशडाउन कंपनी लिमिटेड (उपक्रमों का अधिग्रहण) एक्ट, 1973

रिपीलिंग और संशोधन एक्ट, 2019

बंगाल कैमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड (बीसीपीएल)

बंगाल कैमिकल एंड फार्मास्युटिकल वर्क्स लिमिटेड (उपक्रमों का अधिग्रहण और हस्तांतरण) एक्ट, 1980

रिपीलिंग और संशोधन (दूसरा) एक्ट, 2017

फार्मास्युटिकल्स विभाग के अंतर्गत आने वाले संगठन

स्मिथ, स्टेनस्ट्रीट एंड कंपनी लिमिटेड (उपक्रमों का अधिग्रहण और हस्तांतरण) एक्ट, 1977

रिपीलिंग और संशोधन (दूसरा) एक्ट, 2017

बंगाल इम्युनिटी कंपनी लिमिटेड (उपक्रमों का अधिग्रहण और हस्तांतरण) एक्ट, 1984

Sources: Repealing and Amending Act, 2015; Repealing and Amending (Second) Act, 2015; Repealing and Amending Act, 2016; Repealing and Amending Act, 2017; Repealing and Amending (Second) Act, 2017; Repealing and Amending Act, 2019.

ई- सिगरेट पर हालिया प्रतिबंध की व्याख्या

सरकार ने भारत में इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट को प्रतिबंधित करने के लिए बुधवार को एक अध्यादेश जारी किया। इस संबंध में हम यह स्पष्ट कर रहे हैं कि इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट क्या होती है, उससे संबंधित मौजूदा रेगुलेशंस क्या है और इस अध्यादेश के प्रावधान क्या हैं।

इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट क्या होती है?

अध्यादेश स्पष्ट करता है कि इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट (ई-सिगरेट) एक बैटरी चालित उपकरण होता है जोकि किसी पदार्थ को गर्म करता है ताकि कश लेने के लिए वाष्प पैदा हो। इस पदार्थ में निकोटिन हो सकती है, अथवा नहीं भी हो सकती। ई-सिगरेट में कई प्रकार के स्वाद हो सकते हैं, जैसे मेंथॉल, आम, तरबूज और खीरा। आम तौर पर ई-सिगरेट का आकार परंपरागत तंबाकू उत्पाद (जैसे सिगरेट, सिगार या हुक्का) जैसा होता है, लेकिन वह पेन या यूएसबी मेमोरी स्टिक जैसे रोजमर्रा के सामान के आकार वाली भी हो सकती है। 

परंपरागत सिगरेट से अलग ई-सिगरेट में तंबाकू नहीं होता और इसलिए वह सिगरेट एवं अन्य तंबाकू उत्पाद एक्ट, 2003 के अंतर्गत रेगुलेटेड नहीं है। यह एक्ट भारत में सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पादों की बिक्री, उत्पादन और वितरण को रेगुलेट तथा सिगरेट के विज्ञापर को प्रतिबंधित करता है।

ई-सिगरेट्स के अंतरराष्ट्रीय रेगुलेशन क्या हैं?

भारत ने डब्ल्यूएचओ फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन टोबैको कंट्रोल (डब्ल्यूएचओ एफसीटीसी) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस कन्वेंशन को तंबाकू की महामारी के भूमंडलीकरण की प्रतिक्रियास्वरूप विकसित किया गया था। 2014 में डब्ल्यूएचओ एफसीटीसी ने हस्ताक्षरकर्ता देशों को ई-सिगरेट को प्रतिबंधित या रेगुलेट करने पर विचार करने हेतु आमंत्रित किया था। सेहत पर इन उत्पादों के बुरे असर के कारण यह सुझाव दिया गया था जिसके कारण फेफड़ों के कैंसर, हृदय संबंधी रोग और धूम्रपान से जुड़ी दूसरी बीमारियां हो सकती हैं।

इसके बाद ब्राजील, मैक्सिको, सिंगापुर और थाईलैंड जैसे अनेक देशों ने ई-सिगरेट्स के उत्पादन, निर्माण और बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया। हाल ही में यूएसए में न्यूयॉर्क और मिशिगन ने फ्लेवर्ड ई-सिगरेट्स की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया है। दूसरी तरफ यूके में कुछ शर्तों के साथ ई-सिगरेट्स के निर्माण और बिक्री की अनुमति है। इसके अतिरिक्त ई-सिगरेट्स के विज्ञापन और प्रमोशन तथा उनमें निकोटिन के स्तर को भी रेगुलेट किया जाता है।

अध्यादेश से पूर्व क्या भारत में ई-सिगरेट पर रेगुलेशन था?

अगस्त 2018 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने सभी राज्यों को एक एडवाइजरी जारी कि जिसमें उनसे यह अपेक्षा की गई थी कि वे किसी नई ई-सिगरेट को मंजूरी नहीं देंगे और उनकी बिक्री और विज्ञापन पर रोक लगाएंगे। इस एडवाइजरी के आधार पर दिल्ली, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश सहित 15 राज्यों ने ई-सिगरेट पर प्रतिबंध लगा दिया। हालांकि मार्च 2019 में दिल्ली उच्च न्यायालय में इस एडवाइजरी को चुनौती दी गई जिसके बाद इस प्रतिबंध पर स्टे लगा दिया गया।

अध्यादेश क्या करता है?

अध्यादेश भारत में ई-सिगेट्स के उत्पादन, निर्माण, आयात, निर्यात, परिवहन, बिक्री, वितरण और विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाता है। इस प्रावधान का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को एक वर्ष तक का कारावास भुगतना पड़ेगा या एक लाख रुपए का जुर्माना भरना पड़ेगा या दोनों सजा भुगतनी होगी। एक बार से अधिक बार अपराध करने पर तीन वर्ष तक का कारावास भुगतना पड़ेगा और पांच लाख रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ेगा। 

इसके अतिरिक्त ई-सिगरेट के स्टोरेज पर छह महीने तक का कारावास या 50,000 रुपए का जुर्माना होगा, या दोनों सजा भुगतनी पड़ेगी। अध्यादेश के लागू होने के बाद (यानी 18 सितंबर, 2019) ई-सिगरेट का मौजूदा स्टॉक रखने वालों को इन स्टॉक्स की घोषणा करनी होगी और उन्हें अधिकृत अधिकारी के निकटवर्ती कार्यालय में जमा कराना होगा। यह अधिकृत अधिकारी पुलिस अधिकारी (कम से कम सब इंस्पेक्टर स्तर का) हो सकता है, या केंद्र या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत कोई भी अन्य अधिकारी।

उल्लेखनीय है कि अध्यादेश में ई-सिगरेट रखने या इस्तेमाल करने से संबंधित कोई प्रावधान नहीं हैं। अध्यादेश अगले छह महीने तक लागू रहेगा और इसे संसद के अगले सत्र के शुरू होने के छह हफ्तों के अंदर संसद की मंजूरी की जरूरत होगी। अगर अध्यादेश इस समयावधि में पारित नहीं होता, तो यह लागू नहीं रहेगा।

Rethinking education: The draft NEP 2016

The Ministry of Human Resource Development released the draft National Education Policy, 2016 in July this year.[1]  The Ministry was receiving comments on the draft policy until the end of September 2016.  In this context, we provide an overview of the proposed framework in the draft Policy to address challenges in the education sector. The country’s education policy was last revised in 1992.  It outlined equitable access to quality education, with a common educational structure of 10+2+3 years.  The draft Policy 2016 aims to create an education system which ensures quality education and learning opportunities for all.  The focus areas of intervention of the draft Policy are: (i) access and participation, (ii) quality of education, (iii) curriculum and examination reforms, (iv) teacher development and management and (v) skill development and employability.  Through these key interventions, the draft Policy provides a framework for the development of education in the country over the next few years.  We discuss the key areas of intervention below. Access and participation Figure 1 (1)Presently in the country, enrolment at pre-school levels for children between the ages of 3- 5 years is low.  38% of children in this age bracket are enrolled in pre-school education in government anganwadi centres, while 27% of the children are not attending any (either government or private) pre-school.[2]  In contrast, the enrolment rate in primary education, which is class 1-5, is almost 100%.  However, this reduces to 91% in classes 6-8 and 78% in classes 9-12.[3]  The trend of lower enrolment rates is seen in higher education (college and university level), where it is at 24%.[4]  Due to low enrolment rates after class 5, transition of students from one level to the next is a major challenge.  Figure 1 shows the enrolment rates across different education levels. With regard to improving participation of children in pre-school education, the draft Policy aims to start a program for children in the pre-school age group which will be implemented in coordination with the Ministry of Women and Child Development.  It also aims to strengthen pre-school education in anganwadis by developing learning materials and training anganwadi workers.  Presently, the Right to Education (RTE) Act, 2009 applies to elementary education only.  To improve access to education, the draft Policy suggests bringing secondary education under the ambit of the RTE Act.  However, a strategy to increase enrolment across different levels of education has not been specified. Quality of education Figure 2 (1)A large number of children leave school before passing class eight.  In 2013-14, the proportion of students who dropped out from classes 1-8 was 36% and from classes 1-10 was 47%.3  Figure 2 shows the proportion of students who exited the school system in classes 1-8 in 2008-09 and 2013-14. Among the population of children who stay in school, the quality or level of learning is low.  The Economic Survey 2015-16 noted that the proportion of class 3 children able to solve simple two-digit subtraction problems fell from 26% in 2013 to 25% in 2014.  Similarly, the percentage of class two children who cannot recognize numbers up to 9 increased from 11.3% in 2009 to 19.5% in 2014.[5] To address the issue of learning levels in school going children, the draft Policy proposes that norms for learning outcomes should be developed and applied uniformly to both private and government schools.  In addition, it also recommends that the existing no-detention policy (promoting all students of a class to the next class, regardless of academic performance) till class 8  be amended and limited to class 5.  At the upper primary stage (class six onward), the system of detention should be restored. Curriculum and examination reforms It has been noted that the current curriculum followed in schools does not help students acquire relevant skills which are essential to become employable.  The draft Policy highlights that the assessment practices in the education system focus on rote learning and testing the students’ ability to reproduce content knowledge, rather than on understanding. The draft Policy aims to restructure the present assessment system to ensure a more comprehensive evaluation of students, and plans to include learning outcomes that relate to both scholastic and co-scholastic domains.  In order to reduce failure rates in class 10, the Policy proposes to conduct examination for the subjects of mathematics, science and English in class 10 at two levels.  The two levels will be part A (at a higher level) and part B (at a lower level).  Students who wish to opt for a vocational stream or courses for which mathematics, science and English are not compulsory may opt for part B level examination. Teacher development and management It has been observed that the current teacher education and training programs are inadequate in imparting the requisite skills to teachers.  The mismatch between institutional capacity to train teachers and required supply in schools results in a shortage of qualified teachers.  At the level of classes 9-12, the Rashtriya Madhyamik Shiksha Abhiyan prescribes a teacher-pupil ratio of 1:30.[6]  However, some states have a higher teacher-pupil ratio: Chhattisgarh (1:45), Bihar (1:57) and Jharkhand (1:68).3  In various central universities, the total number of sanctioned teaching posts is 16,339, of which 37% are lying vacant.[7] The draft Policy recommends that state governments should set up independent teacher recruitment commissions to facilitate transparent, merit based recruitment of principals, teachers, and other academic staff.  For teacher development, a Teacher Education University should be set up at the national level to focus on teacher education and faculty development.  In addition, the draft Policy also states that all teacher education institutes must have mandatory accreditation.  To ensure effective teacher management, periodic assessment of teachers in government and private schools should be carried out and linked to their future promotions and increments. Skill development and employability It has been noted that the current institutional arrangements to support technical and vocational education programs for population below 25 years of age is inadequate.  The social acceptability of vocational education is also low.  Presently, over 62% of the population in the country is in the working age-group (15-59 years).[8]  Only 10% of this workforce (7.4 crore) is trained, which includes about 3% who are formally trained and 7% who are informally trained.[9]  In developed countries, skilled workforce is between 60-90% of the total workforce.[10] The draft Policy proposes to integrate skill development programs in 25% of schools and higher education institutions in the country.  This is in line with the National Skill Development and Entrepreneurship Policy that was released by the government in 2015. The draft Policy 2016 focuses on important aspects that have not been addressed in previous policies such as: (i) curriculum and examination reforms, and (ii) teacher development .  Although the Policy sets a framework for improving education in the country,  the various implementation strategies that will be put in place to achieve the education outcomes envisaged by it remains to be seen. For an analysis on some education indicators such as enrolment of students, drop-out rates, availability of teachers and share of government and private schools, please see our Vital Stats on the ‘overview of the education sector’ here. [1] Some Inputs for Draft National Education Policy 2016, Ministry of Human Resource Development, http://mhrd.gov.in/sites/upload_files/mhrd/files/Inputs_Draft_NEP_2016.pdf. [2] Rapid Survey on Children, 2013-14, Ministry of Women & Child Development, Government of India, http://wcd.nic.in/sites/default/files/RSOC%20FACT%20SHEETS%20Final.pdf. [3] Secondary education in India, U-DISE 2014-15, National University of Educational Planning and Administration, http://www.dise.in/Downloads/Publications/Documents/SecondaryFlash%20Statistics-2014-15.pdf. [4] All India Survey on Higher Education 2014-15, http://aishe.nic.in/aishe/viewDocument.action?documentId=197. [5] Economic Survey 2015-16, Volume-2, http://indiabudget.nic.in/es2015-16/echapvol2-09.pdf. [6] Overview,  Rashtriya Madhyamik Shiksha Abhiyan, Ministry of Human Resource Development, http://mhrd.gov.in/rmsa. [7] “265th Report: Demands for Grants (Demand No. 60) of the Department of Higher Education”, Standing Committee on Human Resource Development, April 2013, 2015, http://164.100.47.5/newcommittee/reports/EnglishCommittees/Committee%20on%20HRD/265.pdf. [8] “Ministry of Skill Development and Entrepreneurship: Key Achievements and Success Stories in 2015”, Ministry of Skill Development and Entrepreneurship, Press Information Bureau, December 15, 2015. [9] Draft Report of the Sub-Group of Chief Ministers on Skill Development, NITI Aayog, September 2015, http://niti.gov.in/mgov_file/Final%20report%20%20of%20Sub-Group%20Report%20on%20Skill%20Development.pdf. [10] Economic Survey 2014-15, Volume  2, http://indiabudget.nic.in/es2014-15/echapter-vol2.pdf.

The status of ground water: Extraction exceeds recharge

Yesterday, Members of Parliament in Lok Sabha discussed the situation of drought and drinking water crisis in many states.  During the course of the discussion, some MPs also raised the issue of ground water depletion.  Last month, the Bombay High Court passed an order to shift IPL matches scheduled for the month of May out of the state of Maharashtra.  The court cited an acute water shortage in some parts of the state for its decision. In light of water shortages and depletion of water resources, this blog post addresses some frequently asked questions on the extraction and use of ground water in the country. Q: What is the status of ground water extraction in the country? A: The rate at which ground water is extracted has seen a gradual increase over time.  In 2004, for every 100 units of ground water that was recharged and added to the water table, 58 units were extracted for consumption.  This increased to 62 in 2011.[1]  Delhi, Haryana, Punjab and Rajasthan, saw the most extraction.  For every 100 units of ground water recharged, 137 were extracted. In the recent past, availability of ground water per person has reduced by 15%.  In India, the net annual ground water availability is 398 billion cubic metre.[2]  Due to the increasing population in the country, the national per capita annual availability of ground water has reduced from 1,816 cubic metre in 2001 to 1,544 cubic metre in 2011. Rainfall accounts for 68% recharge to ground water, and the share of other resources, such as canal seepage, return flow from irrigation, recharge from tanks, ponds and water conservation structures taken together is 32%. Q: Who owns ground water? A: The Easement Act, 1882, provides every landowner with the right to collect and dispose, within his own limits, all water under the land and on the surface.[9] The consequence of this law is that the owner of a piece of land can dig wells and extract water based on availability and his discretion.[10]  Additionally, landowners are not legally liable for any damage caused to  water resources as a result of over-extraction.  The lack of regulation for over-extraction of this resource further worsens the situation and has made private ownership of ground water common in most urban and rural areas. Q: Who uses ground water the most? What are the purposes for which it is used? A: 89% of ground water extracted is used in the irrigation sector, making it the highest category user in the country.[3]  This is followed by ground water for domestic use which is 9% of the extracted groundwater.  Industrial use of ground water is 2%.  50% of urban water requirements and 85% of rural domestic water requirements are also fulfilled by ground water. IMAGEThe main means of irrigation in the country are canals, tanks and wells, including tube-wells.  Of all these sources, ground water constitutes the largest share. It provides about 61.6% of water for irrigation, followed by canals with 24.5%. Over the years, there has been a decrease in surface water use and a continuous increase in ground water utilisation for irrigation, as can be seen in the figure alongside. [4]   Q: Why does agriculture rely most on ground water? A: At present, India uses almost twice the amount of water to grow crops as compared to China and United States.  There are two main reasons for this.  First, power subsidies for agriculture has played a major role in the decline of water levels in India.  Since power is a main component of the cost of ground water extraction, the availability of cheap/subsidised power in many states has resulted in greater extraction of this resource.[5]  Moreover, electricity supply is not metered and a flat tariff is charged depending on the horsepower of the pump.  Second, it has been observed that even though Minimum Support Prices (MSPs) are currently announced for 23 crops, the effective price support is for wheat and rice.[6]  This creates highly skewed incentive structures in favour of wheat and paddy, which are water intensive crops and depend heavily on ground water for their growth. It has been recommended that the over extraction of ground water should be minimized by regulating the use of electricity for its extraction.[7]  Separate electric feeders for pumping ground water for agricultural use could address the issue.  Rationed water use in agriculture by fixing quantitative ceilings on per hectare use of both water and electricity has also been suggested.[8]  Diversification in cropping pattern through better price support for pulses and oilseeds will help reduce the agricultural dependence on ground water.[6]     [1] Water and Related Statistics, April 2015, Central Water Commission, http://www.cwc.gov.in/main/downloads/Water%20&%20Related%20Statistics%202015.pdf. [2] Central Ground Water Board website, FAQs, http://www.cgwb.gov.in/faq.html. [3] Annual Report 2013-14, Ministry of Water Resources, River Development and Ganga Rejuvenation, http://wrmin.nic.in/writereaddata/AR_2013-14.pdf. [4] Agricultural Statistics at a glance, 2014, Ministry of Agriculture; PRS. [5] Report of the Export Group on Ground Water Management and Ownership, Planning Commission, September 2007, http://planningcommission.nic.in/reports/genrep/rep_grndwat.pdf. [6] Report of the High-Level Committee on Reorienting the Role and Restructuring of Food Corporation of India, January 2015, http://www.fci.gov.in/app/webroot/upload/News/Report%20of%20the%20High%20Level%20Committee%20on%20Reorienting%20the%20Role%20and%20Restructuring%20of%20FCI_English_1.pdf. [7] The National Water Policy, 2012, Ministry of Water Resources, http://wrmin.nic.in/writereaddata/NationalWaterPolicy/NWP2012Eng6495132651.pdf. [8] Price Policy for Kharif Crops- the Marketing Season 2015-16, March 2015, Commission for Agricultural Costs and Prices, Department of Agriculture and Cooperation, Ministry of Agriculture, http://cacp.dacnet.nic.in/ViewReports.aspx?Input=2&PageId=39&KeyId=547. [9] Section 7 (g), Indian Easement Act, 1882. [10] Legal regime governing ground water, Sujith Koonan, Water Law for the Twenty-First Century-National and International Aspects of Water Law Reform in India, 2010.

The Net Neutrality Debate in India

Yesterday, the Telecom and Regulatory Authority of India (TRAI) released the Prohibition of Discriminatory Tariffs for Data Services Regulations, 2016.  These regulations prohibit Telecom Service Providers from charging different tariffs from consumers for accessing different services online.  A lot of debate has taken place around network (net) neutrality in India, in the past few months.  This blog post seeks to present an overview of the developments around net neutrality in India, and perspectives of various stakeholders. Who are the different stakeholders in the internet space? To understand the concept of net neutrality, it is important to note the four different kinds of stakeholders in the internet space that may be affected by the issue.  They are: (i) the consumers of any internet service, (ii) the Telecom Service Providers (TSPs) or Internet Service Providers (ISPs), (iii) the over-the-top (OTT) service providers (those who provide internet access services such as websites and applications), and (iv) the government, who may regulate and define relationships between these players.  TRAI is an independent regulator in the telecom sector, which mainly regulates TSPs and their licensing conditions, etc., What is net neutrality? The principle of net neutrality states that internet users should be able to access all content on the internet without being discriminated by TSPs.  This means that (i) all websites or applications should be treated equally by TSPs, (ii) all applications should be allowed to be accessed at the same internet speed, and (iii) all applications should be accessible for the same cost.  The 2016 regulations that TRAI has released largely deal with the third aspect of net neutrality, relating to cost. What are OTT services? OTT services and applications are basically online content.  These are accessible over the internet and made available on the network offered by TSPs.  OTT providers may be hosted by TSPs or ISPs such as Bharti Airtel, Vodafone, Idea, VSNL (government provided), etc.  They offer internet access services such as Skype, Viber, WhatsApp, Facebook, Google and so on.  Therefore, OTT services can broadly be of three types: (i) e-commerce, (ii) video or music streaming and, (iii) voice over internet telephony/protocol services (or VoIP communication services that allow calls and messages).  Prior to the recent TRAI regulations prohibiting discriminatory tariffs, there was no specific law or regulation directly concerning the services provided by OTT service providers. How is net neutrality regulated? Until now, net neutrality has not directly been regulated in India by any law or policy framework.  Over the last year, there have been some developments with respect to the formulation of a net neutrality policy.  TRAI had invited comments on consultation papers on Differential Pricing for Data Services as well as Regulatory Framework for Over-The-Top Services (OTT).[i],[ii]  A Committee set up by the Department of Telecommunications (DoT) had also examined the issue of net neutrality.[iii] Internationally, countries like the USA, Japan, Brazil, Chile, Norway, etc. have some form of law, order or regulatory framework in place that affects net neutrality.  The US Federal Communications Commission (telecom regulator in the USA) released new internet rules in March 2015, which mainly disallow: (i) blocking, (ii) throttling or slowing down, and (iii) paid prioritisation of certain applications over others.[iv]  While the UK does not allow blocking or throttling of OTT services, it allows price discrimination. What do TRAI’s 2016 Regulations say? The latest TRAI regulations state that: (i) no service provider is allowed to enter into any agreement or contract that would result in discriminatory tariffs being charged to a consumer on the basis of content (data services), (ii) such tariffs will only be permitted in closed electronic communications networks, which are networks where data is neither received nor transmitted over the internet, (iii) a service provider may reduce tariff for accessing or providing emergency services, (iv) in case of contravention of these regulations, the service provider may have to pay Rs 50,000 per day of contravention, subject to a maximum of Rs 50 lakh, etc.[v] It may be noted that, in 2006 and 2008, TRAI had suggested that the internet sector remain unregulated and non-discriminatory (net neutral).[vi][vii]What are some of the key issues and perspectives of various stakeholders on net neutrality? TSPs and ISPs:  TSPs invest in network infrastructure and acquire spectrum, without getting a share in the revenue of the OTT service providers. Some have argued that the investment by TSPs in internet infrastructure or penetration levels would diminish if they are not permitted to practice differential pricing, due to a lack of incentive. Another contention of the TSPs is that certain websites or applications require higher bandwidth than others.  For example, websites that stream video content utilise much more bandwidth than smaller messaging applications, for which the TSPs need to build and upgrade network infrastructure.  The Committee set up by DoT had recommended that the TSPs may need to better manage online traffic so that there is better quality of service for consumers and no network congestion. Further, the Committee also said that in case of local and national calls, TSP (regular calling) and OTT communication services (calls made over the internet) may be treated similarly for regulatory purposes.  However, in case of international VoIP calling services and other OTT services, it did not recommend such regulatory oversight. Consumers and/or OTT service providers:  The Committee set up by the DoT said that the core principles of net neutrality (equal treatment and equality in speed and cost) should be adhered to.  It also said that OTT services (online content) enhance consumer welfare and increase productivity in many areas.  These services should be actively encouraged. In the absence of neutrality, the internet may be fragmented and not as easily accessible to those who are unable to pay for certain services. It has been said that discrimination of internet content by TSPs could be detrimental to innovation as the bigger market players would be able to pay their way out of being throttled.  This could potentially result in TSPs restricting consumers’ access to small-scale, but innovative or qualitative OTT services (restricting growth and innovation for start-ups too). Now that regulations regarding price discrimination are in force, we do not know whether TRAI or the government will enforce rules regarding other aspects of net neutrality.  Also, the extent to which these regulations would affect the business of TSPs and OTT service providers remains to be seen. [i] “Consultation Paper on Differential Pricing for Data Services”, the Telecom Regulatory Authority of India, December 9, 2015, http://www.trai.gov.in/WriteReaddata/ConsultationPaper/Document/CP-Differential-Pricing-09122015.pdf. [ii] “Consultation Paper on Regulatory Framework for Over-the-top (OTT) services”, TRAI, March 27, 2015, http://www.trai.gov.in/WriteReaddata/ConsultationPaper/Document/OTT-CP-27032015.pdf. [iii] “Net Neutrality, DoT Committee Report”, Ministry of Communications and Information Technology, May 2015, http://www.dot.gov.in/sites/default/files/u10/Net_Neutrality_Committee_report%20%281%29.pdf. [iv] “In the Matter of Protecting and Promoting the Open Internet: Report and Order on Remand, Declaratory Ruling, and Order”, Federal Communications Commission USA, February 26, 2015, http://transition.fcc.gov/Daily_Releases/Daily_Business/2015/db0403/FCC-15-24A1.pdf. [v] “Prohibition of Discriminatory Tariffs for Data Services Regulations, 2016”, TRAI, February 8, 2016. [vi] “Consultation Paper on Review of Internet Services”, TRAI, December 2006, http://www.trai.gov.in/WriteReaddata/ConsultationPaper/Document/consultation27dec06.pdf. [vii] “Recommendations on Issues related to Internet Telephony”, TRAI, August 18, 2008, http://www.trai.gov.in/WriteReadData/Recommendation/Documents/recom18aug08.pdf.

Swachh Bharat Mission (Gramin)

Earlier this month, guidelines for the Swachh Bharat Mission (Gramin) were released by the Ministry of Drinking Water and Sanitation.  Key features of the Swachh Bharat Mission (Gramin), as outlined in the guidelines, are detailed below.  In addition, a brief overview of sanitation levels in the country is provided, along with major schemes of the central government to improve rural sanitation. The Swachh Bharat Mission, launched in October 2014, consists of two sub-missions – the Swachh Bharat Mission (Gramin) (SBM-G), which will be implemented in rural areas, and the Swachh Bharat Mission (Urban), which will be implemented in urban areas.  SBM-G seeks to eliminate open defecation in rural areas by 2019 through improving access to sanitation.  It also seeks to generate awareness to motivate communities to adopt sustainable sanitation practices, and encourage the use of appropriate technologies for sanitation. I. Context Data from the last three Census’, in Table 1, shows that while there has been some improvement in the number of households with toilets; this number remains low in the country, especially in rural areas. Table 1:  Percentage of households with toilets (national)

Year Rural Urban Total
1991 9% 64% 24%
2001 22% 74% 36%
2011 31% 81% 47%

In addition, there is significant variation across states in terms of availability of household toilets in rural areas, as shown in Table 2.  Table 2 also shows the change in percentage of rural households with toilets from 2001 to 2011.  It is evident that the pace of this change has varied across states over the decade. Table 2: Percentage of rural households with toilets

State

2001

2011

% Change

Andhra Pradesh

18

32

14

Arunachal Pradesh

47

53

5

Assam

60

60

0

Bihar

14

18

4

Chhattisgarh

5

15

9

Goa

48

71

23

Gujarat

22

33

11

Haryana

29

56

27

Himachal Pradesh

28

67

39

Jammu and Kashmir

42

39

-3

Jharkhand

7

8

1

Karnataka

17

28

11

Kerala

81

93

12

Madhya Pradesh

9

13

4

Maharashtra

18

38

20

Manipur

78

86

9

Meghalaya

40

54

14

Mizoram

80

85

5

Nagaland

65

69

5

Odisha

8

14

6

Punjab

41

70

30

Rajasthan

15

20

5

Sikkim

59

84

25

Tamil Nadu

14

23

9

Tripura

78

82

4

Uttar Pradesh

19

22

3

Uttarakhand

32

54

23

West Bengal

27

47

20

All India

22

31

9

II. Major schemes of the central government to improve rural sanitation The central government has been implementing schemes to improve access to sanitation in rural areas from the Ist Five Year Plan (1951-56) onwards.  Major schemes of the central government dealing with rural sanitation are outlined below.

Central Rural Sanitation Programme (1986): The Central Rural Sanitation Programme was one of the first schemes of the central government which focussed solely on rural sanitation.  The programme sought to construct household toilets, construct sanitary complexes for women, establish sanitary marts, and ensure solid and liquid waste management.
Total Sanitation Campaign (1999): The Total Sanitation Campaign was launched in 1999 with a greater focus on Information, Education and Communication (IEC) activities in order to make the creation of sanitation facilities demand driven rather than supply driven. Key components of the Total Sanitation Campaign included: (i) financial assistance to rural families below the poverty line for the construction of household toilets, (ii) construction of community sanitary complexes, (iii) construction of toilets in government schools and aganwadis, (iv) funds for IEC activities, (v) assistance to rural sanitary marts, and (vi) solid and liquid waste management.
Nirmal Bharat Abhiyan (2012): In 2012, the Total Sanitation Campaign was replaced by the Nirmal Bharat Abhiyan (NBA), which also focused on the previous elements.  According to the Ministry of Drinking Water and Sanitation, the key shifts in NBA were: (i) a greater focus on coverage for the whole community instead of a focus on individual houses, (ii) the inclusion of certain households which were above the poverty line, and (iii) more funds for IEC activities, with 15% of funds at the district level earmarked for IEC.
Swachh Bharat Mission (Gramin) (2014): Earlier this year, in October, NBA was replaced by Swachh Bharat Mission (Gramin) (SBM-G) which is a sub-mission under Swachh Bharat Mission.  SBM-G also includes the key components of the earlier sanitation schemes such as the funding for the construction of individual household toilets, construction of community sanitary complexes, waste management, and IEC. Key features of SBM-G, and major departures from earlier sanitation schemes, are outlined in the next section.

III. Guidelines for Swachh Bharat Mission (Gramin) The guidelines for SBM-G, released earlier this month, outline the strategy to be adopted for its implementation, funding, and monitoring. Objectives: Key objectives of SBM-G include: (i) improving the quality of life in rural areas through promoting cleanliness and eliminating open defecation by 2019, (ii) motivating communities and panchayati raj institutions to adopt sustainable sanitation practices, (iii) encouraging appropriate technologies for sustainable sanitation, and (iv) developing community managed solid and liquid waste management systems. Institutional framework: While NBA had a four tier implementation mechanism at the state, district, village, and block level, an additional tier has been added for SBM-G, at the national level.  Thus, the implementation mechanisms at the five levels will consist of: (i) National Swachh Bharat Mission (Gramin), (ii) State Swachh Bharat Mission (Gramin), (iii) District Swachh Bharat Mission (Gramin), (iv) Block Programme Management Unit, and (v) Gram Panchayat/Village and Water Sanitation Committee.  At the Gram Panchayat level, Swachhta Doots may be hired to assist with activities such as identification of beneficiaries, IEC, and maintenance of records. Planning: As was done under NBA, each state must prepare an Annual State Implementation Plan.  Gram Panchayats must prepare implementation plans, which will be consolidated into Block Implementation Plans.  These Block Implementation Plans will further be consolidated into District Implementation Plans.  Finally, District Implementation Plans will be consolidated in a State Implementation Plan by the State Swachh Bharat Mission (Gramin). A Plan Approval Committee in Ministry of Drinking Water and Sanitation will review the State Implementation Plans.  The final State Implementation Plan will be prepared by states based on the allocation of funds, and then approved by National Scheme Sanctioning Committee of the Ministry. Funding: Funding for SBM-G will be through budgetary allocations of the central and state governments, the Swachh Bharat Kosh, and multilateral agencies.  The Swachh Bharat Kosh has been established to collect funds from non-governmental sources.  Table 3, below, details the fund sharing pattern for SBM-G between the central and state government, as provided for in the SBM-G guidelines. Table 3: Funding for SBM-G across components

Component Centre State Beneficiary Amount as a % of SBM-G outlay
IEC, start-up activities, etc 75% 25% - 8%
Revolving fund 80% 20% - Up to 5%
Construction of household toilets 75%(Rs 9000)90% for J&K, NE states, special category states 25%(Rs 3000)10% for J&K, NE states, special category states -- Amount required for full coverage
Community sanitary complexes 60% 30% 10% Amount required for full coverage
Solid/Liquid Waste Management 75% 25% - Amount required within limits permitted
Administrative charges 75% 25% - Up to 2% of the project cost

One of the changes from NBA, in terms of funding, is that funds for IEC will be up to 8% of the total outlay under SBM-G, as opposed to up to 15% (calculated at the district level) under NBA.  Secondly, the amount provided for the construction of household toilets has increased from Rs 10,000 to Rs 12,000.  Thirdly, while earlier funding for household toilets was partly through NBA and partly though the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme (MGNREGS), the provision for MGNREGS funding has been done away with under SBM-G.  This implies that the central government’s share will be met entirely through SBM-G. Implementation: The key components of the implementation of SBM-G will include: (i) start up activities including preparation of state plans, (ii) IEC activities, (iii) capacity building of functionaries, (iv) construction of household toilets, (v) construction of community sanitary complexes, (vi) a revolving fund at the district level to assist Self Help Groups and others in providing cheap finance to their members (vii) funds for rural sanitary marts, where materials for the construction of toilets, etc., may be purchased, and (viii) funds for solid and liquid waste management. Under SBM-G, construction of toilets in government schools and aganwadis will be done by the Ministry of Human Resource Development and Ministry of Women and Child Development, respectively.  Previously, the Ministry of Drinking Water and Sanitation was responsible for this. Monitoring: Swachh Bharat Missions (Gramin) at the national, state, and district levels will each have monitoring units.  Annual monitoring will be done at the national level by third party independent agencies.  In addition, concurrent monitoring will be done, ideally at the community level, through the use of Information and Communications Technology. More information on SBM-G is available in the SBM-G guidelines, here.